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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 504 में से

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पृष्ठ 138

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
आन लगन-व्यभिचार
तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन ।
क्या कहिये समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥ 84 ॥
साच
दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ ।
मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 85 ॥
दादू ध्यान धरे क्या होत है, जो मन नहीं निर्मल होइ ।
तो बग सब ही उद्धरैं, जे इहि विधि सीझै कोइ ॥ 86 ॥
दादू ध्यान धरे क्या होत है, जे मन का मैल न जाइ ।
बग मीनी का ध्यान धर, पसू बिचारे खाइ ॥ 87 ॥
दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ ।
मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 88 ॥
दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि ।
जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥ 89 ॥
दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ ।
दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥ 90 ॥
यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ ।
दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥ 91 ॥
दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ ।
देही की रक्षा करैं, हम जनि भीटै कोइ ॥ 92 ॥
दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।
उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ 93 ॥
दादू हाडौं मुख भव्या, चाम रह्या लिपटाय ।
मांहीं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥ 94 ॥
दादू नौवों द्वारे नरक के, निशदिन बहै बलाइ ।
शुचि कहाँ लौं कीजिये, राम सुमरि गुण गाइ ॥ 95 ॥

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