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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 504 में से

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पृष्ठ 121

श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ।
दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥ 39 ॥
सारा दिल सांई सौं राखै, दादू सोई सयान।
जे दिल बंटै आपना, सो सब मूढ़ अयान ॥ 40 ॥
दादू सारों सौं दिल तोरि कर, सांई सौं जोड़ै।
सांई सेती जोड़ करि, काहे को तोड़ै ॥ 41 ॥
साहिब देवै राखणा, सेवक दिल चोरै।
दादू सब धन साह का, भूला मन थोरै ॥ 42 ॥
पतिव्रत
दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक।
ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥ 43 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव।
अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥ 44 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ।
साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥ 45 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम।
सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥ 46 ॥
नारी पुरुषा देख करि, पुरुषा नारी होइ।
दादू सेवक राम का, शीलवन्त है सोइ ॥ 47 ॥
आन लग्न व्यभिचार
पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ।
जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥ 48 ॥
दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ।
ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥ 49 ॥

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