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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 504 में से

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पृष्ठ 135

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10

मन
दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग।
जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥ 51 ॥
हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग।
दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥ 52 ॥
सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन।
दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥ 53 ॥
दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ।
काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥ 54 ॥
विरक्तता
सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर।
मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥ 55 ॥
मन
दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ।
है काया नौ-जोबनी, मन बूढ़ा है जाइ ॥ 56 ॥
दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर।
नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥ 57 ॥
जाचक
मन इन्द्री अंधा किया, घट में लहर उठाइ।
साँई सतगुरु छोड़ कर, देख दिवाना जाइ ॥ 58 ॥
दादू कहै राम बिना मन रंक है, जाचै तीनों लोक।
जब मन लागा राम सौं, तब भागे दालिद्र दोष ॥ 59 ॥
इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै।
तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥ 60 ॥
इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ।
दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥ 61 ॥

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