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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 504 में से

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पृष्ठ 133

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
करुणा
सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम ।
दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥ 29 ॥
क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ ।
जन्म अमोलक आपका, चले अकारथ खोइ ॥ 30 ॥
जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नाहिं।
दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥ 31 ॥
किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।
क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥ 32 ॥
इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह ।
जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥ 33 ॥
किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज ।
दादू भूला बंदगी, सज्या न एकौ काज ॥ 34 ॥
दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता ।
तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥ 35 ॥
दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार ।
का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥ 36 ॥
मन प्रबोध
बादि हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार ।
यहु मन सुस्थिर ना भया, जहाँ दादू निज सार ॥ 37 ॥
विषय अतृप्ति
दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग ।
देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥ 38 ॥
आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।
दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥ 39 ॥

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