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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 504 में से

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पृष्ठ 136

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड।
पंचों का फेन्या फिरै, माया नचावै रांड ॥ 62 ॥
दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे।
नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥ 63 ॥
आन लगन व्यभिचार
पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल।
मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥ 64 ॥
जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव।
दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥ 65 ॥
मन
अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ।
त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥ 66 ॥
घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया।
दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥ 67 ॥
सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ।
ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥ 68 ॥
क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि।
दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥ 69 ॥
दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ।
साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 70 ॥
चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध।
दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥ 71 ॥
एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि।
दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥ 72 ॥

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