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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 504 में से

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पृष्ठ 124

श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ।
मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥ 73 ॥
जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि।
डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥ 74 ॥
दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि।
ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥ 75 ॥
साधू राखै राम को, संसारी माया।
संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥ 76 ॥
आन लगन व्यभिचार
दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध।
कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥ 77 ॥
सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन।
दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥ 78 ॥
पतिव्रत
दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान।
दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥ 79 ॥
दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास।
कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥ 80 ॥
तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द।
दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ 81 ॥
प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि।
रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहें तिनको देहि ॥ 82 ॥
कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ।
प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 83 ॥
कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि।
पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 84 ॥

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