सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10
प्राणी तन मन मिल रह्या, इंद्री सकल विकार ।
दादू ब्रह्मा शूद्र धर, कहाँ रहै आचार ॥ 96 ॥
मन की चपलता
दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ ।
दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 97 ॥
दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत ।
मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 98 ॥
निश्चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि ।
दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥ 99 ॥
दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ ।
दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 100 ॥
मांही सूक्ष्म है रहै, बाहरि पसारै अंग ।
पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥ 101 ॥
आशय विश्राम
सपना तब लग देखिये, जब लग चंचल होइ ।
जब निश्चल लागा नाम सौं, तब सपना नांही कोइ ॥ 102 ॥
जागत जहाँ जहाँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ ।
दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥ 103 ॥
दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।
बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 104 ॥
सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ ।
दादू केते जुग गये, तो भी हऱ्या न जाइ ॥ 105 ॥
जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।
भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 106 ॥
जहाँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ ।
दादू वासा प्राण का, जहाँ पहली रह्या समाइ ॥ 107 ॥
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