सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन हरि भावनि
दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ।
दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥ 40 ॥
दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ।
साच राम का भावता, दादू कहै सुणि आइ ॥ 41 ॥
दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन।
मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 42 ॥
जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ।
दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥ 43 ॥
चाणक उपदेश
पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार।
राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥ 44 ॥
पर प्रबोध
दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात।
औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥ 45 ॥
दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश।
यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥ 46 ॥
दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ।
यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥ 47 ॥
दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि।
द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥ 48 ॥
काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ।
काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥ 49 ॥
मध्य निष्पक्ष
सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग।
ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 50 ॥
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