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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

106 चन्द्रशेखर आजाद
दल की महिलाओं को इतनी जल्दी कहाँ भेजा जाए, यह भी एक विराट
समस्या थी। इस मकान के बगल में एक इन्जीनियर रहता था। कही वह
पुलिस को बम विस्फोट की सूचना न दे दे, इस विपत्ति को टालने के लिए
यशपाल उसके पास गए। उन्होंने इन्जीनियर को अपनी सारी कहानी बता
दी और उससे निवेदन किया कि वह कम-से-कम आधे घण्टे तक विस्फोट
की सूचना पुलिस को न दे। इस बीच सारे क्रान्तिकारी वहाँ से चले
जाएंगे, तभी पुलिस को इसकी सूचना दी जाए। क्रान्तिकारियों की भार-
नाओं का सम्मान करते हुए इन्जीनियर ने उनकी बात मान ली। अतः
सभी क्रान्तिकारी इस बीच वहाँ से सुरक्षित निकल गए।
सुखदेवराज घायल थे, किन्तु उन्हें किसी अस्पताल में भर्ती कराना
सम्भव नही था। इसका समाधान भी धन्वन्तरि ने निकाल लिया। दया-
नन्द आयुर्वेदिक कालेज लाहौर के प्रधानाचार्य डाक्टर आसामन्द राष्ट्रवादी
विचारों के व्यक्ति थे। धन्वन्तरि कभी उनके विद्यार्थी रह चुके थे। डा०
आसामन्द ने अपने घर पर रखकर सुखदेवराज की चिकित्सा का भार
अपने ऊपर ले लिया। उन्होंने सुखदेवराज के पैर का आपरेशन किया।
उनकी चिकित्सा से सुखदेवराज का पाँव शीघ्र ठीक हो गया। इसके बाद
उन्हें अमृतसर भेज दिया गया।
इस प्रकार अनवरत असफलताओं के बाद आजाद के सामने दल को
पुनः संगठित करने का प्रश्न सर्वप्रथम था। इसके लिए पैसों की आवश्य-
कता थी। पैसों का प्रबन्ध करने के लिए लाहौर से चले गए और दिल्ली
पहुंचे। पूर्ववर्णित गाडोदिया स्टोर डकैती उन्होंने इसी समय डाली थी।
यशपाल प्रकरण :
यद्यपि दल सदस्यो द्वारा विवाह करने का विरोध नहीं करता था,
फिर भी सक्रिय क्रान्तिकारियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अविवाहित
रहें। यदि कोई सदस्य विवाह करना चाहता था तो उसे दम से इसके लिए
अनुमति लेनी पड़ती थी। गाडोदिया स्टोर डकैती के बाद दल ने एक कार-
खाना दिल्ली में खोला था। दिखाने के लिए तो यह साबुन, तेल बनाने का
कारखाना था, किन्तु इसमें बम बनाने में प्रयुक्त होने के लिए विला-

चन्द्रशेखर आजाद 107
एसिड बनता था। इस कारखाने का संचालन श्री अज्ञेय करते थे। अज्ञेय
के अतिरिक्त यहाँ कैलाशपति, विमलप्रसाद जैन, उनकी पत्नी, यशपाल
और प्रकाशवती भी रहते थे। यशपाल और प्रकाशवती के सम्बन्ध अत्यन्त
अन्तरंग हो गए थे। वे दोनों साथ-साथ रहते हुए देखे जाने लगे। यह दल
के नियमों के विरुद्ध था। अतः दल ने निर्णय लिया कि यशपाल को गोली
मार दी जाए। यह काम वीरभद्र तिवारी को सौंपा गया। यशपाल को
गोली मारने के बजाय तिवारी ने यह बात यशपाल को बता दी। यशपाल
हाथ में रिवाल्वर लेकर कारखाने में गए और प्रकाशवती को लेकर लाहौर
चले गए।
इसके बाद यशपाल ने प्रकाशवती से विवाह कर लिया। बाद में वह
आजाद से मिले। यद्यपि आजाद एवं यशपाल का मनमुटाव दूर हो गया,
किन्तु दलीय अनुशासन की अवहेलना करने के कारण वीरभद्र तिवारी
को दल से निकाल दिया गया तथा यह कारखाना भी बन्द कर दिया
गया।
यशपाल के विरुद्ध यह कठोर निर्णय लिए जाने का कारण दलीय अनु-
शासन के साथ ही यह भी था कि यशपाल प्रकाशवती को भगाकर लाए
थे। उसके माँ-बाप द्वारा की गई कार्यवाही दल के लिए घातक सिद्ध हो
सकती थी। इस प्रकार आसक्ति में फँसकर कई सदस्य दल को हानि
पहुँचा चुके थे।

अष्टम अध्याय
वीरगति'
इधर भगतसिंह, राजगुरू तथा सुखदेव को फाँसी की सजा सुना दी
गई थी, उधर चन्द्रशेखर आजाद फरार अपराधी घोषित थे। इन फरारी
के दिनो में ये पुलिस की आँखों मे धूल झोंकते हुए एक स्थान से दूसरे
स्थान तक घूम रहे थे। पुलिस तो उनके पीछे पड़ी ही थी ; उसके अनेकों
मुखबिर भी इनाम के लालच में घूम रहे थे। जरा-सा सन्देह होने पर भी
पुलिस तलाशी लेने से नहीं चूकती थी, किन्तु आजाद के सामने केवल
एक ही प्रश्न था कि ऐसी परिस्थितियों मे दल को पुनः कैसे सुदृढ़ बनाया
जाए। सम्भवतः वह अपने इस अभीष्ट की सिद्धि के लिए दक्षिण भारत
जाने का विचार कर रहे थे।
अपने इसी विचार को कार्यरूप मे परिणत करने के लिए वह
इलाहाबाद पहुँचे। अन्त मे 27 फरवरी, 1931 का वह अशुभ दिन भी आ
गया। आजाद अपने एक साथी सुखदेवराज के साथ अल्फ्रेड पार्क में बैठे
हुए थे, सुबह के दस बजे का समय था। सम्भवतः किसी देशद्रोही ने
उनके अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना पुलिस को दे दी थी। इतने मे दो
पुलिस अधिकारी सूचना की सत्यता को जानने के लिए यहाँ आए, जिनके
नाम दिनेश्वर सिह और डालचन्द थे। डालचन्द चन्द्रशेखर आजाद को
पहचानता था। उसने दूर से ही उन्हें देखा और पहचान लिया। इसके
बाद दोनों लौट गए तथा तुरन्त यह सूचना गुप्तचर पुलिस अधीक्षक नाट
बावर को दे दी। नाट बावर तुरन्त अपनी गाड़ी से अल्फ्रेड पार्क पहुँच
गया तथा उसने अपनी गाड़ी आजाद से केवल 10 गज की दूरी पर खड़ी
कर दी। वह गाड़ी से उतरा और आजाद की ओर बढ़ा। वह आजाद
जीवित पकड़ना चाहता था, अतः उसने उसकी ओर

चन्द्रशेखर आजाद 109
दौड़ते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। भला आजाद ऐसा
कैसे कर सकते थे। वह उठ खड़े हुए। उन्होंने नाट की चेतावनी का उत्तर
अपनी रिवाल्वर हाथ में लेकर दिया। नाट बावर ने गोली चला दी।
इस पर आजाद ने भी गोली चलाई। गोरे की गोली आजाद की टाँग में
लगी तथा आजाद की गोरे के कन्धे में। फिर दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। सम्भवतः अन्य पुलिस भी आ गई थी। नाट बावर की कलाई घायल
हो गई। गोलियां लगातार चल रही थीं, किन्तु, कलाई घायल हो जाने
पर नाट बावर एक पेड़ की ओट में हो गया। आजाद भी घिसटते हुए
एक पेड़ की ओट में हो गए। उनके पास भी पर्याप्त गोलियाँ थी। उन्होंने
अपने साथी सुखदेवराज को गोलियाँ चलने पर वहाँ से भगा दिया था।
यद्यपि वह जाने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, किन्तु आजाद ने उनकी
एक भी नहीं सुनी और बलपूर्वक उन्हें वहाँ से भगा दिया था। अतः वह
पुलिस वालों पर अकेले गोलियाँ बरसाते रहे। नाट बावर के ओट में हो
जाने पर उसकी जगह पुलिस अधिकारी विशेश्वर सिंह ने ले ली थी।
आजाद ने उस पर निशाना साधा, इस निशाने से उसका जबड़ा टूट गया।
विशेश्वर सिंह को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उसका जबड़ा
फिर कभी ठीक न हो सका और सेवाकाल समाप्त होने से पूर्व ही उसे
कार्य मुक्त कर दिया गया।

110 चन्द्रशेखर आजाद
पुलिस वालों ने उनके पाँव में एक गोली मारी तभी उसे हाथ लगाया।
आस-पास के लोगों को जब आज़ाद के घिर जाने का समाचार
मिला, तो कई लोग म्योर कालेज के सामने जा पहुँचे थे और इस घटना
को देखते हुए वहीं से 'आज़ाद ज़िन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। आज़ाद
के भूमि पर गिर जाने पर ही पुलिस वालों का ध्यान नारे लगाने वालों
की ओर गया, तब नाट रिवाल्वर लेकर उनकी ओर लपका। इस पर
लोग म्योर सेण्ट्रल कालेज तथा मुस्लिम हास्टल के परिसर की ओर भाग
गए। इस समय उसे आज़ाद के शव को ले जाने की जल्दी थी, अतः उसने
नारे लगाने वालों का अधिक पीछा नहीं किया और लौट गया। इसके
बाद पुलिस आज़ाद के शव को लारी में रखकर ले गई तथा घोषणा कर
दी कि आज़ाद पुलिस की गोलियों से मारे गए।
आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना पुलिस को किसने दी, इस
विषय में विभिन्न मत व्यक्त किये गए हैं। कुछ पुस्तकों में लिखा मिलता
है कि यह सूचना वीरभद्र तिवारी ने दी तथा कुछ लोगों के अनुसार इलाहा-
बाद के एक सेठ ने यह सूचना दी थी। श्री मन्मथनाथ गुप्त ने स्पष्ट
रूप से तो वीरभद्र तिवारी द्वारा मुखबिरी किए जाने का उल्लेख नहीं
किया है, परन्तु उनके विचारों से यही जान पड़ता है कि वह यही कहना
चाहते हैं कि यह दुष्कर्म वीरभद्र तिवारी ने ही किया था। श्री गुप्त लिखते
हैं—

चन्द्रशेखर आजाद 111
में बहुत ही जल्दी आ जाते थे। किन्तु कई बार धोखा खाकर आखिरी
फैसला उसके साथ न रहने का किया था। वीरभद्र भी जानता था कि
वह इस प्रकार दल से निकाल दिया गया है। इसीलिए इलाहाबाद में जब
आजाद ने वीरभद्र को देखा तो वह चौकन्ने हो गए। आजाद और
सुखदेवराज जाकर अल्फ्रेड पार्क में एक जगह बैठ गए। इतने में पुलिस
अफसर विशेश्वर सिंह और ज्ञानचन्द वहाँ आए। इनमें से ज्ञानचन्द
आजाद को पहचानता था "

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चन्द्रशेखर आजाद 113
फारकत नहीं है ? तुम गरीबी का जीवन बिताते हो, यदि तुम मुझे
आजाद का पता बता दो, तो तुम्हें बड़ी सरलता से इनाम के दस हजार
रुपये मिल सकते हैं।"
तिवारी ने साफ इन्कार कर दिया। उसने कहा, "मैं आजाद के
सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता।" तिवारी आजाद का घनिष्ठ मित्र था, वह
क्रान्तिकारी नहीं था। पर वह उस पर अधिक विश्वास करते थे। वह
जब भी कानपुर जाते उसके घर अवश्य जाते। उनकी सारी गतिविधियां
का उसे पता रहता था। वह कहां जाते हैं? क्या करते हैं? ये सारी बातें
इसे मालूम रहती थीं। तिवारी के इन्कार कर देने पर इन्स्पेक्टर उसके
पीछे पड़ गया। उसने उसे समझाते हुए कहा— "दस हजार रुपये तुम्हें
इनाम के तो मिलेंगे ही, सरकार कुछ पेंशन भी देगी। तुम और तुम्हारे
बाल-बच्चे सुख से जीवन व्यतीत करेंगे। तुम्हारी वृद्धावस्था आराम से
कटेगी। आजाद एक-न-एक दिन पकड़ में अवश्य आयेंगे ही। फिर व्यर्थ
क्यों हाथ से आये अवसर को खो रहे हो। समझ में कोई कमी कर रहे
हो। बुद्धिमान मनुष्य वही है जो हाथ में आए हुए अवसर का उपयोग
करता है।"

114 चंद्रशेखर आजाद
जो अब तक किसी को ज्ञात नहीं था।
धरती कांप उठी। भारत मां का आंचल आंसुओं से भीग गया, पर
उन आंसुओं के मूल्य को समझने वाला कोई नहीं था। हाय रे जयचन्द
की सन्तानो ! तुम्हारे ही कारण देश दासता के बन्धनों में बंधा। तुम्हारे
ही कारण अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया और तुम्हारे ही कारण आज
भारत की स्वतंत्रता और अखण्डता खतरे में पड़ी हुई है। तुम्हारी निन्दा
किन शब्दों में की जाए ? किन शब्दों में ?
तिवारी को इलाहाबाद ले जाया गया। इलाहाबाद की पुलिस से
मिलाया गया। इलाहाबाद की पुलिस ने तिवारी के सहयोग से आज़
की गिरफ्तारी की योजना बनाई। तिवारी उस योजना के अनुसार क
करने लगा। ताने-बाने बुनने लगा।
लोभ के दैत्य ने तिवारी के कण्ठ को बुरी तरह जकड़ रखा था
उसने सोचा, जब पाप की कालिख मुंह में लगाई है, तो क्यों न अच्छी
तरह लगा लूं, जिससे नरक के दूतों को भी मुझे पहचानने में कठिनाई न
हो। मनुष्य जो भी काम करे, खूब करे, अच्छी तरह करे।
तिवारी ने लोभ के वशीभूत होकर सोचा कि पुलिस के दस हजार
रुपये तो मिलेंगे ही, क्यों न उस रुपये को भी हड़प लें, जो प्रेस के मालिक
के पास जमा हैं। आज़ाद को पता चलेगा तो कैसे चलेगा ? वह मुझ पर
अच्छी तरह विश्वास करते हैं। मैं उनसे जो कुछ कहूँगा, वह उसी को सच
मानेंगे, उसी के अनुसार करेंगे।
तिवारी प्रेस के मालिक के पास पहुँचा। उसने उनसे कहा—"आज़ाद
को रुपये की अधिक आवश्यकता है। उन्होंने मुझे भेजा है। क्रान्तिकारी
दल के आठ हजार रुपये जो तुम्हारे पास जमा हैं, मैं आज़ाद के पास पहुँचा
दूँगा।"
प्रेस का मालिक और तिवारी दोनों एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित
थे। तिवारी की बात सुनकर प्रेस के मालिक ने तिवारी से कहा—"इस
समय रुपए मेरे पास नहीं हैं, क्या तुम आज़ाद से कहकर मुझे कुछ और
समय नहीं दिला सकते?"
वास्तव में बात यह थी कि प्रेस के मालिक की नीयत खराब हो गई

चन्द्रशेखर आजाद 115

दी। वह रुपया देना नहीं चाहता था। उसने सोचा था, पुलिस आजाद के
पीछे लगी रहती है। वह स्वयं तो रुपया माँगने के लिए आएँगे नहीं, किसी
को भेजेंगे तो टाल दूंगा। फिर क्यों न रुपए को हड़प लिया जाए?
तिवारी बोला—"तुम तो आजाद को अच्छी तरह जानते हो। वह
वचन को भंग करने वाले को कभी क्षमा नहीं करते, भलाई इसी में है कि
तुम रुपए मुझे दे दो।"
प्रेस के मालिक ने कहा—'पूरे रुपए तो मेरे पास नहीं हैं, केवल दो
हजार हैं, यदि चाहो तो मैं इस समय दो हजार दे सकता हूँ।"
तिवारी ने सोचा कि भागते भूत की लंगोटी ही सही! मुफ्त के ही
दो हजार क्या कम हैं? वह बोला—
"अच्छी बात है, दो हजार ही लाओ। मैं किसी तरह आजाद को मना
लूँगा।"
प्रेस के मालिक ने दो हजार रुपए तिवारी को दे दिए, उसने सोचा
यदि दो हजार दे देने से बला टल जाए तो क्या बुरा है? फिर भी छ:
हजार रुपए तो अपनी जेब में ही रहेंगे।
तिवारी रुपया लेकर चला गया। वह उसी दिन झाँसी जाकर आजाद
से मिला। उसने आजाद से कहा—"मैं प्रेस के मालिक से बात कर आया
हूँ। वह 23 फरवरी को ठीक दस बजे दिन में कम्पनी बाग में लाइब्रेरी के
सामने वाले पेड़ के नीचे जो नाले के पास है, आपसे मिलेगा और आपको
रुपए दे देगा।

116 · चन्द्रशेखर आजाद
साथ कम्पनी बाग में पहुँच गए और नाले से लगे हुए वृक्ष के नीचे बैठकर
प्रेस के मालिक की प्रतीक्षा करने लगे।
अभी कुछ ही देर हुई थी कि पुलिस के आदमी दिखाई पड़े। आजाद
ने अपने साथी से कहा- "लगता है मेरे यहाँ पहुँचने की सूचना पुलिस को
मिल गई है। पुलिस मुझे घेरे- इससे पहले ही तुम यहाँ से चले जाओ।"
क्रान्तिकारी साथी आजाद को छोड़कर जाना नहीं चाहता था। पर
उन्होंने उसे चले जाने के लिए विवश कर दिया। वह एक आदमी की साइ-
किल छीनकर उस पर बैठकर चला गया।
साथी के जाने के कुछ ही देर बाद पुलिस कप्तान नाट बाबर पुलिस
दल के साथ पेड़ के पास आ पहुँचा। उसके साथ पुलिस विभाग का इन्स-
पेक्टर विश्वेश्वरसिंह भी था।
नाट बाबर दूर से ही चेतावनी के स्वर में बोला- "आत्म-समर्पण
कर दो नहीं तो गोली मार दी जाएगी।"
आजाद उठकर खड़े हो गए। उन्होंने नाट बाबर की बात का उत्तर
गोली से दिया। गोली उसकी कलाई में लगी। कलाई की हड्डी टूटी तो
नहीं, पर सचक गई।
फिर तो पुलिस की ओर से गोलियाँ चलने लगीं। आजाद पेड़ की
ओट में खड़े होकर अपनी रक्षा करने लगे। पुलिस की गोलियों का उत्तर
गोलियों से देने लगे।
...आजाद बड़ी वीरता से पुलिस दल का सामना कर रहे थे। पुलिस
के लोग संख्या में अधिक थे, फिर भी वे आजाद के साहस को विचलित
नहीं कर पा रहे थे। दुर्भाग्य से गोलियाँ समाप्त हो गई-केवल एक गोली
बच गई-अन्तिम गोली!
आजाद ने अपनी पिस्तौल कनपटी पर ले जाकर उस अन्तिम गोली
को अपनी कनपटी पर चला दिया। गोली इस पार से उस पार निकल गई।
आजाद धरती की गोद में गिरते ही निष्प्राण हो गए।
श्री द्रवित हृदय ने अपनी इस पुस्तक के दो शब्द में लिखा है-
'मैंने आजाद के बलिदान का जो दृश्य देखा था, वह आज भी मेरी
आँखों के सामने चमकता है, उससे मुझे प्रेरणा मिलती है, उत्साह मिलता

चन्द्रशेखर आजाद 117
है। मैंने उनके बलिदान से लेकर आज तक उनके सम्बन्ध में बार-बार पढ़ा,
तथ्यों का संग्रह किया। 'अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद' उसी का परिणाम
है। मैं कह सकता हूँ कि इसमें जो बातें लिखी गई हैं, वे साधार एवं तथ्य-
पूर्ण हैं।"
स्पष्ट है कि श्री व्यथित हृदय ने अपनी पुस्तक की सामग्री की सत्यता
का दावा किया है, किन्तु पुस्तक में आजाद की वीरगति को प्राप्त होने की
तिथि 23 मार्च (अथवा 23 फरवरी) 1931 लिखी हुई है, जो सर्वथा
असत्य है, क्योंकि 23 मार्च, 1931 अमर शहीद भगतसिंह, राजगुरू तथा
सुखदेव का बलिदान दिवस है, न कि आजाद का।
सुखदेवराज इस घटना से कुछ समय पूर्व तक आजाद के साथ ही थे।
उनके अनुसार घटना का विवरण इस प्रकार है—
“27 फरवरी प्रातः जलपान करने के बाद जब मैं अपनी साइकिल से
चला तो भैया आजाद रास्ते में ही मिल गए। हम दोनों बातें करते-करते
पार्क की तरफ बढ़ चले। भैया मुझसे पूछ रहे थे कि चूंकि मैं बर्मा हो आया
हूँ, क्या मैं बता सकता हूँ कि कुछ लोग बर्मा के रास्ते देश से बाहर जा
सकते हैं। इस सन्दर्भ में मुझे जो जानकारी थी मैंने उन्हें दी। हम दोनों
बातें करते-करते पार्क में पहुँच गए। वहाँ एक व्यक्ति पुल के ऊपर बैठा
दातून कर रहा था। उसने आजाद को घूरना शुरू कर दिया। उसकी आँखें
देखकर आजाद को कुछ सन्देह हुआ। उन्होंने मुझसे उल्लेख किया। मैंने फिर
उस व्यक्ति की ओर देखा, किन्तु उसने अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया।

118 चन्द्रशेखर आजाद
गोरे के कन्धे में। दोनों ओर से गोलियां चलनी शुरू हो गईं। एक गोली
आजाद के दाएं बाजू को चीरती हुई उनके फेफड़े में आ लगी। फिर भी
वह गोली चलाते रहे। अफसर की कलाई टूट गई। उसने अपने प्राण बचाने
के लिए अपनी मोटर में भागने का प्रयास किया। आजाद लहूलुहान हो चुके
थे, फिर भी उन्होंने अपनी गोली से मोटर का टायर पन्चर कर दिया।
इस पर वह गोरा और उसके साथी एक वृक्ष के पीछे जा छिपे।
आजाद भी एक वृक्ष की ओट में हो गए। दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। इतने में आजाद ने मुझे आदेश दिया कि मैं वहां से चला जाऊं। वह
स्वयं लड़ते-लड़ते वहां शहीद हो गए। किन्तु उन्होंने अपने एक साथी की
जान बचा ली। आजाद का शव भूमि पर पड़ा था, किन्तु किसी पुलिस को
उनके निकट जाने का साहस नहीं होता था। अन्ततः उसी गोरे अफसर ने
एक सिपाही से कहा कि वह उसकी लाश पर तनिक दूर खड़ा होकर गोली
चलाए...।"
सुखदेवराज के इस वर्णन को भी अनेक लेखकों ने विश्वसनीय नहीं
माना है। अनेक पुस्तकों के अनुसार स्वयं सुखदेव ही पुलिस का आदमी था।
यशपाल के अनुसार वीरभद्र तिवारी द्वारा मुखबिरी की कहानी सुखदेवराज
ने ही गढ़ी थी। सुखदेवराज पर इस आधार पर भी सन्देह की पुष्टि होती
है कि गोलियां चलते समय वह आजाद के साथ ही था, जबकि उसे कोई
गोली नहीं लगी और पुलिस की नजरों से वह सुरक्षित कैसे भाग गया?
क्या पुलिस ने उस पर जान-बूझकर गोली नहीं चलाई।
इस विषय पर श्री मन्मथनाथ गुप्त की यह शंका उचित लगती है—
"...यशपाल के अनुसार दल तोड़ दिया गया था, केन्द्रीय समिति तितर-
बितर कर दी गई थी, पर यह पूछा जा सकता है कि उस भयंकर दिन
इलाहाबाद में इतने क्रान्तिकारियों का जमघट क्यों था? यशपाल वहां थे,
पाण्डेय वर्मा थे, सुखदेवराज थे, वीरभद्र था...प्रश्न उठता है कि किसने
विश्वासघात किया... कितने ही आदमी थे जो अकेले या मिलकर ऐसा
विश्वासघात कर सकते थे। इस मामले में मुझे याद है कि इलाहाबाद में
आजाद की शहादत की अर्द्धशताब्दी के दिन मौजूद व्यक्तियों में से एक ने
बिना कुछ सोचे मेरे सामने कहा कि यदि मैं मुंह खोलूं, तो बहुतों के (

अल्फ्रेड पार्क (प्रयाग) का ऐतिहासिक द्वन्द्व-युद्ध एवं अमर बलिदान उपसंहार

चन्द्रशेखर आजाद
घूरते नजर आएँगे।
"...प्रमाणों से जाहिर है कि वीरभद्र जो यशपाल के अनुसार डबल
खुफिया था, उसके अलावा बहुत से ऐसे लोग थे, जो आजाद और धन्वन्तरि
की ख्याति से जलते थे। वे आजाद को अपने उत्थान के मार्ग में रोड़ा
समझते थे।"
सत्य चाहे जो भी रहा हो, इतना तो निश्चित है कि चन्द्रशेखर आजाद
यहाँ पुलिस वालों से टक्कर लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन सब
षड्यन्त्रों से उनके त्याग, बलिदान तथा भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में
उनके महनीय योगदान में कोई अन्तर नहीं पड़ता। और बहादुरों के
रक्तपात से क्रान्तिकारियों की लालिमा और भी बढ़ती है।

120 चन्द्रशेखर आजाद
पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा श्रीमती कमला नेहरू ने भी भाग लिया। लोगों
ने अपने प्रिय दिवंगत क्रान्तिकारी को श्रद्धांजलियाँ अर्पित कीं। प्रसिद्ध
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल की धर्मपत्नी भी इस सभा में उपस्थित थीं।
आजाद को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई श्रीमती सान्याल ने कहा
था—
"खुदीराम बोस की भस्मी को लोगों ने ताबीज में रखकर अपने
बच्चों को पहनाया, ताकि उनके बालक भी खुदीराम बोस की तरह वीर
बन सकें। मैं इसी भावना से आजाद की राख की चुटकी लेने आई हूँ।"
इस पर लोगों ने उस भस्मी को अपने माथे पर लगाया। बड़ी मुश्किल
से थोड़ी-सी भस्मी बची, जो त्रिवेणी में बहा दी गई।
अब भारतीय जनता के पास भारत माता के इस अद्वितीय सपूत की
केवल यादें ही शेष थीं। वह पार्क जहाँ आजाद वीरगति को प्राप्त हुए थे,
एक पवित्र भूमि बन चुकी थी। वह पेड़ जिसकी ओट से आजाद ने गोलियाँ
चलाई थीं, एक पवित्र वस्तु; आराध्य की मूर्ति बन चुका था। लोगों ने
उसकी पूजा करनी प्रारम्भ कर दी थी; उस पर अपनी पवित्र श्रद्धा के
प्रतीक फूल-पत्ते चढ़ाने शुरू कर दिए थे, किन्तु अंग्रेजों को यह सहन नहीं
हुआ, अतः उन्होंने वह पेड़ भी कटवा डाला, ताकि आजाद का कोई भी
स्मृति सूचक चिह्न शेष न रहे। इस प्रकार से किसी की स्मृति के भौतिक
चिह्नों को नष्ट करने पर उसकी स्मृति नष्ट नहीं होती। आजाद भारतीयों
के दिलों में बस गए थे, और तब तक बसे रहेंगे जब तक भारतभूमि का
अस्तित्व रहेगा। आजाद की मृत्यु से भारतवर्ष से एक श्रेष्ठ वीर; एक
सच्चा देशभक्त देश से उठ गया था। इसके साथ ही क्रान्तिकारियों के एक
युग का भी अन्त हो गया।

नवम अध्याय
आज़ाद के जीवन के कुछ प्रेरक एवं
स्मरणीय प्रसंग
धीरे-धीरे धुआँ देकर दीर्घकाल तक जलने से प्रचण्ड आलोक के साथ
एक क्षण में जलकर बुझ जाना अच्छा है। वीर चन्द्रशेखर आजाद ने भी
इसी उक्ति को अपने जीवन में चरितार्थ किया। उन्होंने अपने जीवन के
केवल 25 वसन्तों में ही भारतीय इतिहास में अपना एक अद्वितीय स्थान
बनाया।
यों तो चन्द्रशेखर आजाद का अशेष जीवन एक प्रेरक प्रसंग है, जिससे
देशवासियों को त्याग-भावना, देशप्रेम, निर्भीकता आदि शिक्षाएँ प्राप्त
होती हैं। फिर भी उनके जीवन में कुछ ऐसे प्रेरक दृष्टान्त मिलते हैं, जिनसे
प्रत्येक मनुष्य उनके विषय में कुछ सोचने के लिए बाध्य हो जाता है। उनके
हृदय में मातृभूमि के लिए अपने पूर्ण यौवन में समस्त सुख-सुविधाओं तथा
भोगों आदि का परित्याग करके वीरगति प्राप्त करने वाले इस अद्भुत
व्यक्तित्व के लिए अनायास ही श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है। अनेक
विद्वान लेखकों ने आज़ाद के जीवन के प्रेरक प्रसंगों का अपनी पुस्तकों में
वर्णन किया है। इन्हीं में से कुछ प्रसंग यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

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चन्द्रशेखर आजाद 123
कर दिया, जो राजा पर भी निगरानी रखता था। एक बार राजा और
प्रभुदयाल बाग में बैठे हुए थे। सहसा आजाद वहाँ पहुँच गए। राजा
साहब को उनके इस तरह आने-जाने से बड़ा आश्चर्य हुआ। वह उनके
सम्मान में उठ खड़े हुए और इनके मुँह से निकल पड़ा—"पण्डितजी महा-
राज पधारिए।"
पास में बैठा प्रभुदयाल भी उठ खड़ा हुआ। राजा ने आजाद को
बैठने के लिए कहा। तभी प्रभुदयाल बोल उठा—"पण्डितजी कौन हैं?"
"बहुत बड़े ज्योतिषी हैं।" राजा साहब ने कहा।
इस पर प्रभुदयाल ने उनका नाम जानना चाहा। राजा साहब
जरा घबरा गए। आजाद उनकी घबराहट को समझ गए और तपाक
से बोल उठे—"किशनलाल।"
इस प्रकार उन्होंने परिस्थिति को बिगड़ने से संभाल लिया।
राजगुरु कुछ रंगीन स्वभाव के व्यक्ति थे। एक बार उन्हें एक सुन्दर
कैलेण्डर मिला, जिसमें किसी सुन्दर स्त्री का चित्र था। उन्होंने वह कैलेण्डर
बम के कारखाने की दीवार पर टाँग दिया। आजाद ने उसे देखा तो टुकड़े-
टुकड़े कर फेंक डाला। थोड़ी देर बाद राजगुरु ने चित्र की यह दुर्दशा देखी
तो टुकड़े उठा लिए और आजाद से पूछा—"यह किसने किया?"
"मैंने किया," आजाद बोले।
"आपने इस सुन्दर चित्र को क्यों फाड़ा?"
"क्योंकि यह सुन्दर था।"
"क्या इसके मायने यह हैं कि जो कुछ भी सुन्दर है, उसे आप नष्ट
कर देंगे?"
"हाँ, कर दूँगा।"
"क्या आप ताजमहल को तोड़ डालेंगे?"
"हाँ, तोड़ डालूँगा।"
इस समय आजाद गुस्से में थे; गुस्से में व्यक्ति क्या-क्या कह जाता
उसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता। ऐसा ही आजाद के साथ भी हुआ
था। थोड़ी ही देर में उनका गुस्सा शान्त हो गया। एक घण्टे बाद उन्होंने
देखा कि राजगुरु कुछ कर रहे हैं—एक ओर हजार की और

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