अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ें114 चंद्रशेखर आजाद
जो अब तक किसी को ज्ञात नहीं था।
धरती कांप उठी। भारत मां का आंचल आंसुओं से भीग गया, पर
उन आंसुओं के मूल्य को समझने वाला कोई नहीं था। हाय रे जयचन्द
की सन्तानो ! तुम्हारे ही कारण देश दासता के बन्धनों में बंधा। तुम्हारे
ही कारण अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया और तुम्हारे ही कारण आज
भारत की स्वतंत्रता और अखण्डता खतरे में पड़ी हुई है। तुम्हारी निन्दा
किन शब्दों में की जाए ? किन शब्दों में ?
तिवारी को इलाहाबाद ले जाया गया। इलाहाबाद की पुलिस से
मिलाया गया। इलाहाबाद की पुलिस ने तिवारी के सहयोग से आज़
की गिरफ्तारी की योजना बनाई। तिवारी उस योजना के अनुसार क
करने लगा। ताने-बाने बुनने लगा।
लोभ के दैत्य ने तिवारी के कण्ठ को बुरी तरह जकड़ रखा था
उसने सोचा, जब पाप की कालिख मुंह में लगाई है, तो क्यों न अच्छी
तरह लगा लूं, जिससे नरक के दूतों को भी मुझे पहचानने में कठिनाई न
हो। मनुष्य जो भी काम करे, खूब करे, अच्छी तरह करे।
तिवारी ने लोभ के वशीभूत होकर सोचा कि पुलिस के दस हजार
रुपये तो मिलेंगे ही, क्यों न उस रुपये को भी हड़प लें, जो प्रेस के मालिक
के पास जमा हैं। आज़ाद को पता चलेगा तो कैसे चलेगा ? वह मुझ पर
अच्छी तरह विश्वास करते हैं। मैं उनसे जो कुछ कहूँगा, वह उसी को सच
मानेंगे, उसी के अनुसार करेंगे।
तिवारी प्रेस के मालिक के पास पहुँचा। उसने उनसे कहा—"आज़ाद
को रुपये की अधिक आवश्यकता है। उन्होंने मुझे भेजा है। क्रान्तिकारी
दल के आठ हजार रुपये जो तुम्हारे पास जमा हैं, मैं आज़ाद के पास पहुँचा
दूँगा।"
प्रेस का मालिक और तिवारी दोनों एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित
थे। तिवारी की बात सुनकर प्रेस के मालिक ने तिवारी से कहा—"इस
समय रुपए मेरे पास नहीं हैं, क्या तुम आज़ाद से कहकर मुझे कुछ और
समय नहीं दिला सकते?"
वास्तव में बात यह थी कि प्रेस के मालिक की नीयत खराब हो गई