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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

120 चन्द्रशेखर आजाद
पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा श्रीमती कमला नेहरू ने भी भाग लिया। लोगों
ने अपने प्रिय दिवंगत क्रान्तिकारी को श्रद्धांजलियाँ अर्पित कीं। प्रसिद्ध
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल की धर्मपत्नी भी इस सभा में उपस्थित थीं।
आजाद को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई श्रीमती सान्याल ने कहा
था—
"खुदीराम बोस की भस्मी को लोगों ने ताबीज में रखकर अपने
बच्चों को पहनाया, ताकि उनके बालक भी खुदीराम बोस की तरह वीर
बन सकें। मैं इसी भावना से आजाद की राख की चुटकी लेने आई हूँ।"
इस पर लोगों ने उस भस्मी को अपने माथे पर लगाया। बड़ी मुश्किल
से थोड़ी-सी भस्मी बची, जो त्रिवेणी में बहा दी गई।
अब भारतीय जनता के पास भारत माता के इस अद्वितीय सपूत की
केवल यादें ही शेष थीं। वह पार्क जहाँ आजाद वीरगति को प्राप्त हुए थे,
एक पवित्र भूमि बन चुकी थी। वह पेड़ जिसकी ओट से आजाद ने गोलियाँ
चलाई थीं, एक पवित्र वस्तु; आराध्य की मूर्ति बन चुका था। लोगों ने
उसकी पूजा करनी प्रारम्भ कर दी थी; उस पर अपनी पवित्र श्रद्धा के
प्रतीक फूल-पत्ते चढ़ाने शुरू कर दिए थे, किन्तु अंग्रेजों को यह सहन नहीं
हुआ, अतः उन्होंने वह पेड़ भी कटवा डाला, ताकि आजाद का कोई भी
स्मृति सूचक चिह्न शेष न रहे। इस प्रकार से किसी की स्मृति के भौतिक
चिह्नों को नष्ट करने पर उसकी स्मृति नष्ट नहीं होती। आजाद भारतीयों
के दिलों में बस गए थे, और तब तक बसे रहेंगे जब तक भारतभूमि का
अस्तित्व रहेगा। आजाद की मृत्यु से भारतवर्ष से एक श्रेष्ठ वीर; एक
सच्चा देशभक्त देश से उठ गया था। इसके साथ ही क्रान्तिकारियों के एक
युग का भी अन्त हो गया।