सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 148 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

चन्द्रशेखर आजाद 123
कर दिया, जो राजा पर भी निगरानी रखता था। एक बार राजा और
प्रभुदयाल बाग में बैठे हुए थे। सहसा आजाद वहाँ पहुँच गए। राजा
साहब को उनके इस तरह आने-जाने से बड़ा आश्चर्य हुआ। वह उनके
सम्मान में उठ खड़े हुए और इनके मुँह से निकल पड़ा—"पण्डितजी महा-
राज पधारिए।"
पास में बैठा प्रभुदयाल भी उठ खड़ा हुआ। राजा ने आजाद को
बैठने के लिए कहा। तभी प्रभुदयाल बोल उठा—"पण्डितजी कौन हैं?"
"बहुत बड़े ज्योतिषी हैं।" राजा साहब ने कहा।
इस पर प्रभुदयाल ने उनका नाम जानना चाहा। राजा साहब
जरा घबरा गए। आजाद उनकी घबराहट को समझ गए और तपाक
से बोल उठे—"किशनलाल।"
इस प्रकार उन्होंने परिस्थिति को बिगड़ने से संभाल लिया।
राजगुरु कुछ रंगीन स्वभाव के व्यक्ति थे। एक बार उन्हें एक सुन्दर
कैलेण्डर मिला, जिसमें किसी सुन्दर स्त्री का चित्र था। उन्होंने वह कैलेण्डर
बम के कारखाने की दीवार पर टाँग दिया। आजाद ने उसे देखा तो टुकड़े-
टुकड़े कर फेंक डाला। थोड़ी देर बाद राजगुरु ने चित्र की यह दुर्दशा देखी
तो टुकड़े उठा लिए और आजाद से पूछा—"यह किसने किया?"
"मैंने किया," आजाद बोले।
"आपने इस सुन्दर चित्र को क्यों फाड़ा?"
"क्योंकि यह सुन्दर था।"
"क्या इसके मायने यह हैं कि जो कुछ भी सुन्दर है, उसे आप नष्ट
कर देंगे?"
"हाँ, कर दूँगा।"
"क्या आप ताजमहल को तोड़ डालेंगे?"
"हाँ, तोड़ डालूँगा।"
इस समय आजाद गुस्से में थे; गुस्से में व्यक्ति क्या-क्या कह जाता
उसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता। ऐसा ही आजाद के साथ भी हुआ
था। थोड़ी ही देर में उनका गुस्सा शान्त हो गया। एक घण्टे बाद उन्होंने
देखा कि राजगुरु कुछ कर रहे हैं—एक ओर हजार की और