अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ें116 · चन्द्रशेखर आजाद
साथ कम्पनी बाग में पहुँच गए और नाले से लगे हुए वृक्ष के नीचे बैठकर
प्रेस के मालिक की प्रतीक्षा करने लगे।
अभी कुछ ही देर हुई थी कि पुलिस के आदमी दिखाई पड़े। आजाद
ने अपने साथी से कहा- "लगता है मेरे यहाँ पहुँचने की सूचना पुलिस को
मिल गई है। पुलिस मुझे घेरे- इससे पहले ही तुम यहाँ से चले जाओ।"
क्रान्तिकारी साथी आजाद को छोड़कर जाना नहीं चाहता था। पर
उन्होंने उसे चले जाने के लिए विवश कर दिया। वह एक आदमी की साइ-
किल छीनकर उस पर बैठकर चला गया।
साथी के जाने के कुछ ही देर बाद पुलिस कप्तान नाट बाबर पुलिस
दल के साथ पेड़ के पास आ पहुँचा। उसके साथ पुलिस विभाग का इन्स-
पेक्टर विश्वेश्वरसिंह भी था।
नाट बाबर दूर से ही चेतावनी के स्वर में बोला- "आत्म-समर्पण
कर दो नहीं तो गोली मार दी जाएगी।"
आजाद उठकर खड़े हो गए। उन्होंने नाट बाबर की बात का उत्तर
गोली से दिया। गोली उसकी कलाई में लगी। कलाई की हड्डी टूटी तो
नहीं, पर सचक गई।
फिर तो पुलिस की ओर से गोलियाँ चलने लगीं। आजाद पेड़ की
ओट में खड़े होकर अपनी रक्षा करने लगे। पुलिस की गोलियों का उत्तर
गोलियों से देने लगे।
...आजाद बड़ी वीरता से पुलिस दल का सामना कर रहे थे। पुलिस
के लोग संख्या में अधिक थे, फिर भी वे आजाद के साहस को विचलित
नहीं कर पा रहे थे। दुर्भाग्य से गोलियाँ समाप्त हो गई-केवल एक गोली
बच गई-अन्तिम गोली!
आजाद ने अपनी पिस्तौल कनपटी पर ले जाकर उस अन्तिम गोली
को अपनी कनपटी पर चला दिया। गोली इस पार से उस पार निकल गई।
आजाद धरती की गोद में गिरते ही निष्प्राण हो गए।
श्री द्रवित हृदय ने अपनी इस पुस्तक के दो शब्द में लिखा है-
'मैंने आजाद के बलिदान का जो दृश्य देखा था, वह आज भी मेरी
आँखों के सामने चमकता है, उससे मुझे प्रेरणा मिलती है, उत्साह मिलता