सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 148 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

118 चन्द्रशेखर आजाद
गोरे के कन्धे में। दोनों ओर से गोलियां चलनी शुरू हो गईं। एक गोली
आजाद के दाएं बाजू को चीरती हुई उनके फेफड़े में आ लगी। फिर भी
वह गोली चलाते रहे। अफसर की कलाई टूट गई। उसने अपने प्राण बचाने
के लिए अपनी मोटर में भागने का प्रयास किया। आजाद लहूलुहान हो चुके
थे, फिर भी उन्होंने अपनी गोली से मोटर का टायर पन्चर कर दिया।
इस पर वह गोरा और उसके साथी एक वृक्ष के पीछे जा छिपे।
आजाद भी एक वृक्ष की ओट में हो गए। दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। इतने में आजाद ने मुझे आदेश दिया कि मैं वहां से चला जाऊं। वह
स्वयं लड़ते-लड़ते वहां शहीद हो गए। किन्तु उन्होंने अपने एक साथी की
जान बचा ली। आजाद का शव भूमि पर पड़ा था, किन्तु किसी पुलिस को
उनके निकट जाने का साहस नहीं होता था। अन्ततः उसी गोरे अफसर ने
एक सिपाही से कहा कि वह उसकी लाश पर तनिक दूर खड़ा होकर गोली
चलाए...।"
सुखदेवराज के इस वर्णन को भी अनेक लेखकों ने विश्वसनीय नहीं
माना है। अनेक पुस्तकों के अनुसार स्वयं सुखदेव ही पुलिस का आदमी था।
यशपाल के अनुसार वीरभद्र तिवारी द्वारा मुखबिरी की कहानी सुखदेवराज
ने ही गढ़ी थी। सुखदेवराज पर इस आधार पर भी सन्देह की पुष्टि होती
है कि गोलियां चलते समय वह आजाद के साथ ही था, जबकि उसे कोई
गोली नहीं लगी और पुलिस की नजरों से वह सुरक्षित कैसे भाग गया?
क्या पुलिस ने उस पर जान-बूझकर गोली नहीं चलाई।
इस विषय पर श्री मन्मथनाथ गुप्त की यह शंका उचित लगती है—
"...यशपाल के अनुसार दल तोड़ दिया गया था, केन्द्रीय समिति तितर-
बितर कर दी गई थी, पर यह पूछा जा सकता है कि उस भयंकर दिन
इलाहाबाद में इतने क्रान्तिकारियों का जमघट क्यों था? यशपाल वहां थे,
पाण्डेय वर्मा थे, सुखदेवराज थे, वीरभद्र था...प्रश्न उठता है कि किसने
विश्वासघात किया... कितने ही आदमी थे जो अकेले या मिलकर ऐसा
विश्वासघात कर सकते थे। इस मामले में मुझे याद है कि इलाहाबाद में
आजाद की शहादत की अर्द्धशताब्दी के दिन मौजूद व्यक्तियों में से एक ने
बिना कुछ सोचे मेरे सामने कहा कि यदि मैं मुंह खोलूं, तो बहुतों के (