भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
३८ पुस्तक प्रवेश
की कोशिश की गई हो—यदि कोई तरीक़ा अधिक से अधिक
निष्ठुर, क्रूर, गर्वयुक्त और दयाशून्य हो सकता था, तो वह तरीक़ा
है जिससे भारतवर्ष की अनेक देशी रियासतों का शासन देशी
राजाओं के हाथों से छीन छीन कर ब्रिटिश सत्ता के चंगुल में
इकट्ठा कर दिया गया है × × × जब कभी हम दूसरी क़ौमों के
सामने अंगरेज़ क़ौम की सच्चाई और ईमानदारी का ज़िक्र करते हैं
तो वे भारत की ओर इशारा करके ख़ूब हिक़ारत के साथ हमारा
मज़ाक़ उड़ा सकते हैं। × × × जिस तरीक़े पर चल कर,
लगातार सौ साल से ऊपर तक, देशी राजाओं से उनके इलाक़े
छीने जाते रहे, और वह भी न्याय और औचित्य की पवित्रतम
आड़ में, उस तरीक़े से बढ़ कर दूसरों को यन्त्रणा पहुँचाने का
तरीक़ा राजनैतिक या धार्मिक किसी मैदान में किसी भी ज़ालिम
हुकूमत ने कभी पहले ईजाद न किया था; संसार में उसके
मुक़ाबले की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती।"*
- "... the mode by which the East India Company has possessed
itself of Hindostan, as the most revolting and un-Christian that can possibly
be conceived . . . if ever there was one system more Machiavelian, more
appropriative of the show of justice where the basest injustice was attempted,
more cold, cruel, haughty and unrelenting than another, it is the system by
which the Government of the different states of India has been wrested from
the hands of their respective princes and collected into the grasp of the
British power. . . Whenever we talk to other nations of British faith and
integrity, they may well point to India in derisive scorn. . . . The system
which for more than a century, was steadily at work to strip the native
princes of their dominions, and that too under the most sacred pleas of right
and expediency, is a system of torture more exquisite than regal or spiritual
वे और हम ६६
स्पेन्सर के विचार
प्रसिद्ध अंगरेज़ तत्ववेत्ता हरबर्ट स्पेन्सर पिछले क़रीब सौ साल के ईस्ट
इण्डिया कम्पनी के भारतीय शासन का सन् १८४१ में सिंहावलोकन करते
हुए लिखता है—
"पिछली सदी में भारत में रहने वाले अंगरेज़, जिन्हें बर्क ने
'भारत में शिकार की ग़रज़ से जाने वाले फ़सली परिन्दे' बतलाया
है, अपने मुक़ाबले के पेरू और मेक्सिको निवासी यूरोपियनों❄
से कुछ ही कम ज़ालिम साबित हुए। कल्पना कीजिए कि उनके
कृत्य कितने कलुषित रहे होंगे, जब कि कम्पनी के डाइरेक्टरों तक
ने यह स्वीकार किया कि 'भारत के आन्तरिक व्यापार में जो
बड़ी बड़ी पूँजियां कमाई गई हैं वे इतने ज़बरदस्त अन्यायों
और अत्याचारों द्वारा प्राप्त की गई हैं, जिनसे बढ़ कर अन्याय
और अत्याचार कभी किसी देश या किसी ज़माने में भी सुनने
में नहीं आए।' अनुमान कीजिए कि वन्सीटॉर्ट ने समाज की
जिस दशा को बयान किया है वह कितनी बीभत्स रही होगी, जब
कि वन्सीटॉर्ट हमें बतलाता है कि अंगरेज़ भारतवासियों को विवश
करके जिस भाव चाहते थे, उनसे माल ख़रीदते थे और जिस
भाव चाहते थे उनके हाथ बेचते थे, और जो कोई इनकार करता
tyranny ever before discovered; such as the world has nothing similar to
show."—The English in India—System of Territorial Acquistion, by
William Howitt.
❄ जिन्हों ने वहां के लाखों आदिमनिवासियो को अंग भंग कर के
और उनका शिकार खेल खेल कर उन्हें निर्मूल कर दिया—लेखक
४० पुस्तक प्रवेश
था उसे बेत या क़ैदख़ाने की सज़ा देते थे। विचार कीजिए कि
उस समय देश की क्या हालत रही होगी जब कि अपनी किसी
यात्रा को बयान करते हुए वारन हेस्टिंग्स लिखता है कि, 'हमारे
पहुँचते ही लोग अधिकांश छोटे क़स्बों और सरायों को छोड़
छोड़ कर भाग जाते थे।' इन अंगरेज़ अधिकारियों की निश्चित
नीति ही उस समय यह थी कि बिना किसी कारण के देशवासियों
के साथ दग़ा की जावे। देशी नरेशों को धोखा देकर उन्हें एक
दूसरे से लड़ा दिया गया ; पहले उनमें से किसी एक को उसके
विपक्षी के विरुद्ध मदद दी गई, और फिर किसी न किसी
दुर्व्यवहार का बहाना लेकर उसी को तख़्त से उतार दिया गया।
इन सरकारी भेड़ियों को किसी न किसी गँदले नाले का बहाना
सदा मिल जाता था। जिन मातहत सरदारों के पास इस तरह के
इलाक़े होते थे, जिन पर इन लोगों के दाँत होते थे, उनसे बड़ी
बड़ी अनुचित रक़में बतौर ख़िराज के लेकर उन्हें निर्धन कर दिया
जाता था, और अन्त में जब वे इन माँगों को पूरा करने के
नाक़ाबिल हो जाते थे तो इसी सङ्गीन जुर्म के दण्ड रूप उन्हें
गद्दी से उतार दिया जाता था। यहाँ तक कि हमारे समय (१८२१)
में भी उसी तरह के ज़ुल्म जारी हैं। आज दिन तक नमक का
कष्टकर ठेका और लगान की वही निर्दय प्रथा जारी है, जो कि
ग़रीब रय्यत से ज़मीन की क़रीब क़रीब आधी पैदावार चूस लेती
है। आज दिन तक भी वह धूर्ततापूर्ण स्वेच्छाशासन जारी है, जो
देश को पराधीन बनाए रखने और उस पराधीनता को बढ़ाने के
वे और हम ५१
लिए देशी सिपाहियों का ही बतौर साधनों के उपयोग करता है।
इसी स्वेच्छाशासन के नीचे अभी बहुत साल नहीं गुज़रे कि
हिन्दोस्तानी सिपाहियों की एक पूरी रेजिमेण्ट को इसलिए जान
बूझ कर क़त्ल कर डाला गया, क्योंकि उस रेजिमेण्ट के सिपाहियों
ने बग़ैर पहरने के कपड़ों के कूच करने से इनकार कर दिया था।
आज दिन तक पुलिस के कर्मचारी धनवान लफङ्गों के साथ मिल
कर ग़रीबों से ज़बरदस्ती धन ऐंठने के लिए सारी क़ानूनी मशीन
को काम में लाते हैं। आज के दिन तक साहब लोग हाथियों पर
बैठ कर निर्धन किसानों की खड़ी फ़सलों में से जाते हैं और गाँव
के लोगों से बिना क़ीमत दिए रसद वसूल करते हैं। आज के
दिन तक यह एक आम बात है कि दूर के ग्रामों में रहने वाले
लोग किसी यूरोपियन की शक्ल देखते ही जङ्गल में भाग
जाते हैं।"*
- "The Anglo-Indians of the last century whom Burke described as
'Birds of prey and passage in India' showed themselves only a shade less
cruel than their prototypes of Peru and Mexico. Imagine how black must
have been their deeds, when even the Directors of the Company admitted
'That the vast fortunes acquired in the inland trade have been obtained by
a scene of the most tyrannical and oppressive conduct, that was ever known
in any age or country.' Conceive the atrocious state of society described
by Vansittart, who tells us that the English compelled the natives to buy or
sell at just what rates they pleased on pain of flogging or confinement.
Judge to what a pass things must have come when, in describing a journey,
Warren Hastings says 'Most of the petty towns and serais were deserted at
our approach.' A cold-blooded treachery was the established policy of the
authorities. Princes were betrayed into war with each other; and one of
them having been helped to overcome his antagonist, was then himself
४२ पुस्तक प्रवेश
कम्पनी के पाप
एक और अंगरेज़ लेखक डॉक्टर रसल लिखता है—
"ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय शासन को आरम्भ से
ही बड़े बड़े पापों ने कलुषित कर रक्खा था, × × × लगातार
अनेक पीढ़ियों तक बड़े से बड़े सिविल और फ़ौजी अफ़सरों से
लेकर छोटे से छोटे कर्मचारियों तक, कम्पनी के मुलाज़िमों का
एक मात्र महान लक्ष्य और उद्देश यह रहता था कि जितनी जल्दी
हो सके और जितनी बड़ी से बड़ी पूँजी हो सके, इस देश से
निचोड़ ली जाय और फिर अपना मतलब पूरा करते ही सदा के
लिए इस देश को छोड़ दिया जाय । × × × यह बात बिलकुल
dethroned for some alleged misdemeanour. Always some muddied stream
was at hand as a pretext for official wolves Dependent chiefs possessing
coveted lands were impoverished by exorbitant demands for tribute and
then ultimate inability to meet these demands was construed into a treaso-
nable offence, punished by deposition. Even down to our own day kindred
iniquities are continued. Down to our own day, too are continued the
grievous salt monopoly and the pitiless taxation, that wring from the poor
ryots nearly half the produce of the soil. Down to our own day continues
the cunning despotism which uses native soldiers to maintain and extend
native subjection a despotism under which, not many years since, a regiment
of sepoys was deliberately massacred, for refusing to march without proper
clothing. Down to our own day, the police authorities league with wealthy
scamps, and allow the machinery of the law to be used for the purposes of
extortion. Down to our own day, so called gentlemen will ride their ele-
phants through the crops of impoverished peasants and will supply them-
selves with provisions from the native villages without paying for them.
And down to our own day it is common with the people in the interior to
run into the woods at sight of a European."—Social Statics, by Herbert
Spencer.
वे और हम ४३
सच्चाई के साथ कही गई है कि × × × पराजित प्रजा को अपने
बुरे से बुरे और अय्याश से अय्याश देशी नरेशों के बड़े से बड़े
ज़ुल्म इतने घातक मालूम न होते थे जितने कम्पनी के छोटे से
छोटे ज़ुल्म।”*
पुस्तक का सार
इससे अधिक अंगरेज़ विद्वानों की राय इस विषय में देने की ज़रूरत
नहीं है। सन् १७५७ से १८५७ तक सौ साल के कम्पनी के शासन में
हिन्दोस्तानी सिपाहियों का अपने देश और देशवासियों के ख़िलाफ़
जाँनिसारी के साथ विदेशी अफ़सरों की फ़रमाबरदारी करना, हिन्दोस्तानी
नरेशों का अंगरेज़ों के साथ सन्धियों की शर्तों को ईमानदारी से निबाहना,
अंगरेज़ों का बार बार जान बूझ कर अपनी सन्धियों और वादों को तोड़ना,
देशी रियासतों के यूरोपियन नौकरों का पद पद पर अपने मालिकों के साथ
विश्वासघात करना, अंगरेज़ रेज़िडेण्टों का देशी दरबारों में रह कर वहाँ फूट
डलवाना, रिश्वतें देना, गुप्त साज़िशें करना, हत्याएँ कराना और जाल
साज़ियाँ करना, देशी नरेशों का कम्पनी के साथ 'सन्धि' और 'मित्रता' के
जाल में एक बार फँस कर उससे बिना अपना मान और सर्वस्व दिए बाहर
- ". . . the Government of the East India Company in India was
tainted from the very first with mighty vices, . . . for generation after
generation the great aim and object of the servants of the Company, from
the high, civil and military functionaries downwards was to squeeze as
large as possible a fortune out of the country as quickly as might be, and
turn their backs upon it for ever, so soon as that object had been attained,
. . . In perfect truth has it been said . . . that the subjugated
race found the little finger of the Company thicker than the loins of the
worst and most dissolute of their native princes."—Dr. Russell.
४४ पुस्तक प्रवेश
न निकल सकना, ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अपनी निर्धारित नीति के
अनुसार भारत की प्राचीन ग्राम पञ्चायतों, शिक्षा प्रणाली, हज़ारों और
लाखों पाठशालाओं, और हज़ारों साल के उन्नत उद्योग धन्धों का नाश कर
डालना, और इन सब के नतीजे में भारत का सौ सवा सौ साल के अन्दर
संसार के सब से अधिक प्रबल, उन्नत तथा खुशहाल देशों की पंक्ति से
निकल कर सब से अधिक निर्बल, अवनत और दरिद्र देशों की पंक्ति तक
पहुँचा दिया जाना—इस सब की अत्यन्त दुखकर कहानी इस पुस्तक के
विविध अध्यायों में बयान की जायगी।
पुराने हमले
अंगरेज़ों से पहले के हमले
भारत में अंगरेज़ी राज के इतिहास को ठीक ठीक समझने के लिए
ज़रूरी है कि उससे ठीक पहले की भारत की हालत, यानी मुग़ल साम्राज्य के
समय की हालत का पूरा चित्र हमारे सामने हो। किन्तु मुग़ल साम्राज्य के
समय की हालत को बयान करने से पहले आदि काल से लेकर मुसलमानों
के हमले के समय तक भारत पर जितने और विदेशी हमले समय समय पर
हुए हैं उन सब पर भी हम एक सरसरी नज़र डालना ज़रूरी समझते हैं।
साथ ही हम यह भी दिखाना चाहेंगे कि इस तरह के हमले यूरोप के विविध
देशों पर भी हुए थे या नहीं, और यदि हुए थे तो भारत के मुक़ाबले में
यूरोपियन देशों ने उनका कहाँ तक सफलता के साथ सामना किया। हमारे
पुराने हमले ४२
इस संक्षिप्त बयान से पाठकों को मालूम हो जायगा कि इस तरह के हमले
भारत पर अन्य देशों की निस्बत अधिक नहीं हुए और न उन्हें भारत में
अधिक सफलता ही प्राप्त हुई। इन हमलों के समय अपनी रक्षा न कर
सकने के स्थान पर भारत ने ऐसे अवसरों पर यूरोपियन देशों के मुक़ाबले में
कहीं अधिक सफलता के साथ अपनी रक्षा की और अक्सर अपने हमला
करने वालों पर भौतिक और नैतिक दोनों तरह से विजय प्राप्त की।
आर्यों का हमला
भारत के ऊपर सब से पहला विदेशी हमला आर्य जाति का हमला
बताया जाता है, जिसका समय यूरोपीय विद्वानों के अनुसार ईसा से क़रीब
२,५०० साल पहले* था।
समस्त इतिहास लेखक इस बात को स्वीकार करते हैं कि आजकल के
भारतवासी, ईरानी और यूरोपनिवासी सब उसी प्राचीन आर्य जाति की
सन्तान हैं। कहा जाता है कि आज से चार पाँच हज़ार साल पहले या
कुछ ज़्यादा इन आर्य जाति के लोगों ने मध्य एशिया के किसी हिस्से से
निकल निकल कर हिन्दोस्तान, ईरान और तमाम यूरोप को विजय और
आबाद किया था। इसलिए यदि उस प्राचीन आर्य जाति द्वारा विजय
किया जाना किसी देश के लिए भी ज़िल्लत की चीज़ माना जा सकता है तो
वह हिन्दोस्तान के लिए केवल उतनी ही ज़िल्लत की चीज़ हो सकता है,
जितना ईरान, रूस, जरमनी, फ्रान्स, इंगलिस्तान, यूनान, रोम इत्यादि के
लिए, जिनकी भाषा और जिनकी सभ्यता पर प्राचीन आर्यों की भाषा और
सभ्यता की वैसी ही गहरी छाप पड़ी जैसी भारत में। इतना ही नहीं, बल्कि
- The Cambridge History of India, vol. i, p. 697.
४६ पुस्तक प्रवेश
इतिहासज्ञ स्वीकार करते हैं कि जिस आर्य्य जाति के लोग अपने मध्य
एशिया के आदि स्थानों से निकल कर अधिकांश यूरोपियन महाद्वीप के
ऊपर हज़ारों साल तक अर्धसभ्य अवस्था में रहते रहे, उसी जाति के लोगों
ने भारत में पहुँच कर, यूरोपियन विद्वानों के अनुसार ही, हज़रत ईसा से
कम से कम हज़ारों साल पहले एक विशाल, ऊँची और शानदार सभ्यता
की नींव रक्खी । इसकी एक वजह यह भी है कि आर्यों के आने से पहले
भी हिन्दोस्तान बिल्कुल असभ्य न था । प्राचीन संस्कृत साहित्य तक में हमें
भारत के उन आदिमवासियों की सभ्यता की उच्चता के अनेक सबूत मिलते
हैं और इस में भी सन्देह नहीं कि कई पहलुओं से उनकी सभ्यता नए
आने वाले आर्यों की सभ्यता से उच्चतर थी ।
भारत की उत्तर पच्छिमी सीमा
आर्यों के हमले के बाद भारत के ऊपर जो विदेशी हमले गिनाए जाते
हैं, उनकी असलियत को समझने के लिए हमें एक और बात ध्यान में
रखनी होगी । मध्य एशिया के दक्खिन में अफ़गानिस्तान, बलूचिस्तान
और उसके आस पास का कुछ प्रदेश ईसा से क़रीब एक हज़ार साल पहले
से लेकर औरंगज़ेब की मृत्यु के समय तक हिन्दोस्तान ईरान और उसके
पच्छिमी देशों के बीच विवाद ग्रस्त भूमि रहा है । भारत के अनेक हिन्दू और
मुसलमान सम्राटों ने भारत से बैठ कर सीस्तान, हिरात और अफ़गानिस्तान
पर हुकूमत की है । प्राचीन समय के अनेक ईरानी और यूनानी लेखकों ने
हिन्दोस्तान की सीमाएँ अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान के पच्छिम में
बयान की हैं और उस समस्त पहाड़ी प्रदेश को हिन्दोस्तान ही का अंग
माना है । आर्यों के हमले के बाद जो अनेक हमले भारत पर गिने जाते हैं
पुराने हमले ४७
उनमें से अधिकांश में भारत का अर्थ यही लिया जाता है । इस तरह उन
हमला करने वालों को भी, जिन्होंने कभी सिन्धु नदी का किनारा नहीं देखा
भारत के हमले करने वालों में शुमार किया जाता है । मसलन् कहा जाता
है कि ईरान के मशहूर बादशाह दारा के विशाल साम्राज्य में, जिसने ईसा
से ५२१ साल पहले से लेकर ४८६ साल पहले तक शासन किया, उत्तर भारत
का कुछ भाग भी शामिल था । किन्तु दारा के शिलालेखों से साफ़ पता
चलता है कि उसका साम्राज्य कभी सिन्धु नदी से आगे नहीं बढ़ा ।
सिकन्दर से पहले के हमले
आर्यों के हमले के बाद से सिकन्दर के हमले के समय तक भारत के
ऊपर सिन्धु नदी के इस ओर तक केवल दो हमलों का थोड़ा बहुत विश्वस्त
इतिहास मिलता है । इनमें पहला हमला असोरिया की जगत्प्रसिद्ध सम्राज्ञी
मलका सेमिरामिस का है, जिसने ईसा से क़रीब आठ सौ साल पहले
बलूचिस्तान को पार कर भारत विजय करने का प्रयत्न किया । इस हमले
की बाबत यूनानी इतिहास लेखक नियारकस लिखता है कि सेमिरामिस
को अपनी सेना के केवल बीस बचे हुए आदमियों सहित सिन्धु नदी से
जान बचा कर भागना पड़ा । दूसरा हमला ईरान के प्रसिद्ध विजेता कुरु का
था । यह वह कुरु था जिसे अंगरेज़ी में 'साइरस' लिखा जाता है किन्तु
जिसका असली ईरानी नाम कुरु था और जिसकी शुमार एशिया के बड़े से
बड़े विजेताओं में की जाती है । कुरु दारा का पितामह और विशाल ईरानी
साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है । काबुल से लेकर इराक़, शाम, टर्की,
बैबिलोन, मिश्र और कुछ भाग यूनान का भी इस ईरानी विजेता की
अधीनता स्वीकार कर चुका था । सेमिरामिस के बाद कुरु ने भारत पर
४८ पुस्तक प्रवेश
हमला किया। किन्तु उसे भी केवल सात आदमियों सहित जान बचा
कर सिन्धु नदी से पीछे लौट जाना पड़ा, और अन्त में किसी भारतवासी
के वार से ज़ख़्मी होकर ही उसकी मृत्यु हुई।”*
सिकन्दर का हमला
इसके बाद ईसा से ३२६ साल पहले यूनान के जगत प्रसिद्ध विजेता
सिकन्दर के भारत पर हमले का समय आता है। पश्चिमी यूरोप से लेकर
अफ़ग़ानिस्तान और बलूचिस्तान तक कोई मुल्क इस अलौकिक विजेता की
सेना के सामने न ठहर सका। उत्तर-पश्चिम की ओर से आकर सिकन्दर ने
अपनी सेना सहित सिन्धु और झेलम नदियों को पार किया। सिकन्दर को
पूरी उम्मीद थी कि वह उत्तर भारत के हरे भरे मैदानों को अपने विशाल
साम्राज्य में मिला कर भारतीय महाद्वीप को पार कर पूर्वीय सागर तक जा
पहुंचेगा। भारत की राजनैतिक हालत भी उस समय सिकन्दर के सौभाग्य से
काफ़ी बिगड़ी हुई थी, सरहद के ऊपर झेलम के उस पार तक्षशिला के राजा
और इस पार पञ्जाब के राजा पौरव में, जिसे यूनानी पोरस कहते थे, बहुत
दिनों से दुश्मनी चली आती थी। तक्षशिला का राजा अपने प्रतिस्पर्धी पौरव
के ख़िलाफ़ सिकन्दर से मिल गया। सिकन्दर ने पौरव से अधीनता स्वीकार
कराने के लिए उसके पास दूत भेजे। पौरव ने दूतों को उत्तर दिया कि मैं
अपनी सेना सहित युद्ध के मैदान में सिकन्दर और उसकी सेना के साथ बात
चीत करूँगा। सिकन्दर की जिस सेना ने झेलम को पार कर पौरव पर
हमला किया उसमें तक्षशिला के राजा की भारतीय सेना भी शामिल थी।+
- The Cambridge History of India, vol. i, pp. 330-31.
- The Cambridge History of India, vol. i, p. 361.
पुराने हमले ४६
कुल हमला करने वाली सेना पौरव की सेना से तादाद में कहीं ज़्यादह
थी। पौरव के दो बेटे मैदान में काम आए। विजय सिकन्दर की ओर रही।
पौरव ज़ख़्मी हो गया और गिरफ़्तार होकर सिकन्दर के सामने लाया गया।
यूनानी इतिहास लेखक सब इस बात के साक्षी हैं कि पौरव के सौन्दर्य
उसकी वीरता और उसके साहस को देखकर सिकन्दर मुग्ध हो गया।
सिकन्दर ने मुक्त कण्ठ से पौरव की तारीफ़ की और उसका सारा राज फिर
से उसके हवाले कर दिया।
इस तरह पौरव से सन्धि कर सिकन्दर आगे बढ़ा। भारत की राज-
शक्तियों में उस समय मगध का साम्राज्य सबसे मुख्य था। पञ्जाब से चल
कर सिकन्दर ने मगध पर चढ़ाई करने का इरादा किया। किन्तु सिकन्दर
की सेना ने, जिसे पौरव के साथ के संग्राम में भारतीय वीरता का काफ़ी
परिचय मिल चुका था, व्यास नदी को पार करने से साफ़ इनकार कर दिया।
यूनानी इतिहास लेखक लिखते हैं कि सिकन्दर ने अपनी सेना का हौसला
बढ़ाने की भरसक कोशिश की, किन्तु उसकी एक न चल सकी। मजबूर
होकर भारत को विजय करने का स्वप्न पूरा किए बिना ही उस अलौकिक
जगत् विजेता को भी व्यास नदी के उस पार से पीछे लौट जाना पड़ा।
यूनानी इतिहास लेखक मेगेस्थनीज़ साफ़ लिखता है कि सिकन्दर के
आने से पहले तक भारतवासियों पर कभी भी कोई विदेशी हमला करने
वाला विजय प्राप्त न कर पाया था।*
अन्य यूनानी हमले
सिकन्दर के समय से लेकर मुसलमानों के हमले के समय तक भारत
- The Cambridge History of India, p. 331.
४
५० पुस्तक प्रवेश
पर और भी कई हमले हुए, जिनमें कुछ असफल रहे और कुछ को सफलता
मिली । इन सफल हमलों की एक विशेषता यह थी कि जो लोग भारत के
किसी हिस्से को किसी तरह विजय कर पाते थे वे अपने पुराने देशों से हर
तरह का नाता तोड़ कर भारत ही में बस जाते थे, भारत ही को अपना घर
बना लेते थे, भारत के हित और भारत की उन्नति में अपना हित और
अपनी उन्नति समझने लगते थे और थोड़े ही दिनों के अन्दर शेष भारत-
वासियों में मिल जुल कर उनके साथ पूरी तरह एक हो जाते थे ।
सिकन्दर के बाद सबमे पहले दो हमले, जो असफल रहे, यूनानी
सेनापतियों सेल्युकस और अन्तियोकस के हमले थे ।
सिकन्दर के करीब २० साल वाद सिकन्दर के सेनापति और उत्तरा-
धिकारी सेल्युकस पहले ने भारत पर हमला किया । उस समय तक मौर्य
कुल के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त का राज समस्त उत्तरी भारत में क़ायम हो
चुका था । लिखा है कि चन्द्रगुप्त की लड़कपन में सिकन्दर से भेंट हो चुकी
थी । सेल्युकस के मुक़ाबले के लिए चन्द्रगुप्त ने पाँच लाख सेना और नौ
हज़ार हाथी मैदान में खड़े किए । सेल्युकस घबरा गया और दोनों में सन्धि
होगई । सेल्युकस ने चन्द्रगुप्त को सिन्धु नदी से पूरब के समस्त देश का
अधिराज स्वीकार किया, और इसके अलावा काबुल, कन्धार, हिरात और
बलूचिस्तान भी उसी के हवाले कर दिए । इस तरह अफ़ग़ानिस्तान और
बलूचिस्तान दोनों देश जिन पर २० साल पहले सिकन्दर ने अपने नायब
शासक नियुक्त कर दिए थे, अब चन्द्रगुप्त के भारतीय साम्राज्य में शामिल
होगए । यूनानियों की किताबों से यह भी पता चलता है कि चन्द्रगुप्त ने
सेल्युकस की लड़की के साथ शादी कर ली । इस सब के बदले में चन्द्रगुप्त
पुराने हमले ५१
ने पाँच सौ हाथी सेल्यूकस की भेंट किए और सेल्यूकस ने अफ़ग़ानिस्तान
की सरहद को पार कर अपने देश का रास्ता लिया।
चन्द्रगुप्त के पोते जगतप्रसिद्ध प्रियदर्शी सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद
मौर्यकुल की सत्ता फिर कुछ निर्बल हुई। फिर एक यूनानी सेनापति
अन्ति ओकस ने हिन्दुकुश पर्वत को पार कर किसी छोटे से सरहदी भारतीय
नरेश के इलाक़े में प्रवेश किया। किन्तु वहाँ सिवाय अपनी फ़ौज के लिए
रसद और कुछ हाथियों के अन्ति ओकस को और कुछ न मिल सका और
इतने ही से सन्तुष्ट होकर अन्ति ओकस को भी सिन्धु नदी के उस पार से
ही पीछे लौट जाना पड़ा।
अन्ति ओकस के बाद भारत पर कुछ इस तरह के हमलों का ज़िक्र
किया जाता है जिन्हें सचमुच सफल हमले कहा जा सकता है। ये हमले दो
तरह के थे— (१) बख्तियारी यूनानियों के हमले और (२) शक (सीदियन)
हूण इत्यादि मध्य एशिया की अर्ध सभ्य क़ौमों के हमले।
यूनानियों का भारत में बस जाना
सिकन्दर के साथियों में से कुछ पश्चिम एशिया में बस गए थे। शुरू
में सिकन्दर ने इन्हें अपनी ओर से कुछ एशियाई प्रान्तों के शासक नियुक्त
कर दिया था। सिकन्दर की मृत्यु के कुछ समय बाद इन लोगों ने इराक़ में
और उसके आस पास एक सुन्दर सल्तनत क़ायम कर ली, जो बख्तियारी
सल्तनत के नाम से मशहूर हुई। इन बख्तियारियों ने सेल्यूकस की पराजय
को धोने के लिए सबसे पहले हिरात, अफ़ग़ानिस्तान और बलूचिस्तान को
फिर से विजय किया। इसके बाद सिन्धु नदी के इस पार इन लोगों के
हमले शुरू हुए। ये हमले पंजाब, सिन्ध और सौराष्ट्र (काठियावाड़) तक
५२ पुस्तक प्रवेश
पहुँचे । ✡ इन हमलों के बाद मालूम होता है कि अनेक यूनानी भारत ही
में बस गए । शाकल (सियाल कोट) का राजा मिलिन्द, जिसका बौद्ध
ग्रन्थ 'मिलिन्द पन्ह' में ज़िक्र आता है, इन्हीं यूनानियों में से था ।
जो यूनानी भारत में बस गए थे उनका फिर किसी तरह का सम्बन्ध
यूनान या इराक़ इत्यादि से न रह गया । वे भारतवासियों के साथ मिल
जुल कर एक हो गए। उन्होंने भारत की भाषा, भारत के साहित्य, भारत
के धर्म, और भारत की सभ्यता को पूरी तरह अपना लिया । प्रसिद्ध बौद्ध
आचार्य नागसेन ने मिलिन्द को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी, और मिलिन्द भारत
के बड़े से बड़े धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और प्रजापालक नरेशों में गिना जाता है,
जिसकी प्रजा अत्यन्त समृद्ध और खुशहाल थी ।
इसी तरह की दूसरी मिसाल यूनानी राजदूत हीलियोदोरस की है,
जिसने तक्षशिला से विदिशा (भीलसा) पहुंच कर वैष्णव मत स्वीकार
किया और वहीं पर श्रीकृष्ण की स्मृति में एक स्तम्भ खड़ा करवाया । † इस
स्तम्भ पर खुदे हुए लेख में हीलियोदोरस ने अपने को हीलियोदोर भागवत
लिखा है। हीलियोदोर का अर्थ सूर्य का उपासक है, और भागवत का अर्थ
भगवत का अनुयायी है ।
ये यूनानी जिस प्राचीन यूनानी चित्रकारी को अपने साथ भारत लाए
✡ कालिदास के नाटक 'मालविकाग्नि मित्र' में एक संग्राम का ज़िक्र
आता है जिसमें सिन्धु नदी के तट पर राजा पुष्यमित्र के पोते वसुमित्र
ने यवन सेना को परास्त कर पीछे हटाया । उस समय के संस्कृत ग्रन्थों
में 'यवन' शब्द से इन्हीं यूनानियों का मतलब है । Ibid, p. 512.
† The Cambridge History of India, p. 558.
पुराने हमले ५३
थे उसे उन्होंने भारतीय बौद्ध चित्रकारी की सहायता से ख़ासी तरक्क़ी दी ।
इसी तरह बौद्ध चित्रकारी ने भी यूनानी चित्रकारी से उस समय कई नई
बातें सीखीं । ज्योतिष, विज्ञान, दर्शन और अन्य कलाओं में भी यूनानियों
ने भारतवासियों से और भारतवासियों ने यूनानियों से बहुत कुछ शिक्षा
ली । दोनों में खुले ब्याह शादियां होने लगीं । यहाँ तक कि उस समय के
बसे हुए 'यवन' ( यूनानी ) आज भारतवासियों में इस तरह घुल मिल
कर एक हो गए हैं कि उनका कहीं पता तक नहीं रहा ।
शक और हुण क़ौमों के हमले
इन यूनानियों के बाद जैसा हम अभी ऊपर कह चुके हैं, शक, पहलव
और हुण क़ौमों के हमलों का समय आता है । ये हमले भी बख्तियारी
यूनानियों के हमलों की तरह एक दरजे तक भारत पर सफल हमले कहे जा
सकते हैं, और ये क़ौमें भी ठीक उसी तरह भारत में आकर बस गईं जिस
तरह कि यवन बस गए थे ।
सिन्धु नदी के पच्छिम में गन्धार और पुष्कलावती और पूरब में तक्षशिला
हज़रत ईसा के जन्म की सदी में शक ( सीदियन ) जाति के शासन में आ
गए । पच्छिम पञ्जाब और सिन्ध के कुछ हिस्से पर कुछ दिनों के लिए शक
जाति की हुकूमत क़ायम हो गई । उसी सदी में पहलव ( पार्थियन ) क़ौम
के लोगों ने भी सिन्ध को विजय किया । इसके बाद इन लोगों ने दक्खिन
की ओर बढ़ना शुरू किया । किन्तु आन्ध्र कुल के सम्राटों ने कई संग्रामों में
इन पर विजय प्राप्त कर मध्य और दक्खिन भारत को उनके हमलों से बचाए
रक्खा । इसीलिए शक जाति के लोगों का शासन विन्ध्या तक ही रहा ।
५४ पुस्तक प्रवेश
इन क़ौमों का इस देश में बस जाना
यह बात इतिहास से ज़ाहिर है कि इस बीच जिन शक और पहलव
जातियों ने उत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया वे इस देश में
आकर पूरी तरह बस गए और विदेशी रहने के स्थान पर इस देश की
अधिक उच्चतर सभ्यता से प्रभावित होकर हर माइनों में भारतवासी बन
गए । उन्होंने भारतीय रहन सहन, भारतीय ढङ्ग के नाम, भारतीय धर्म,
भारतीय भाषा, और भारतीय सभ्यता को पूरी तरह अपना लिया । मसलन
शक जाति का सबसे मशहूर सम्राट, जिसने भारत में कुशान साम्राज्य की
नींव रक्खी, और जिसने सन् ७८ ईसवी के क़रीब अफ़ग़ानिस्तान और
सरहदी प्रदेश पर शासन किया, सुप्रसिद्ध सम्राट कनिष्क था । कनिष्क ने
बौद्धमत स्वीकार किया । उसके सिंहासन पर बैठने के समय से ही, उसी
की यादगार में शाका सम्वत् का प्रारम्भ हुआ, जिसका अभी तक भारत में
उपयोग किया जाता है । सम्राट कनिष्क का राज दक्खिन में विन्ध्या तक
और उत्तर में मध्य एशिया के अलताई पहाड़ तक फैला हुआ बताया जाता
है । कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी । बौद्ध धर्म के प्रचार में
उसने बहुत बड़ा भाग लिया । अन्तिम और सबसे बड़ी बौद्ध 'सङ्गति' यानी
महासभा का वह संयोजक था । बौद्धमत की महायान सम्प्रदाय की उसने
नींव रक्खी । संस्कृत के प्रचार में उसने बहुत बड़ा हिस्सा लिया । कनिष्क
ही के प्रचारकों ने अधिकतर चीन, तातार, तिब्बत और उत्तर एशिया में
जाकर बौद्धमत का प्रचार किया ।
शक जाति के लोग उस समय अपने को हिन्दू क्षत्री कहते थे और क्षत्री
ही माने जाते थे । उनके नाम ज़्यादातर 'वर्मन्' या 'दत्त' से समाप्त होते
पुराने हमले ५५
थे। धीरे धीरे उनका अस्तित्व भी ‘यवनों’ के अस्तित्व की तरह शेष भारत-
वासियों के अस्तित्व में मिल कर एक हो गया।
शक और पहलव जातियों के हमलों के बाद मुसलमानों के हमले से
पहले भारत पर अब केवल एक हमला ‘हुण’ जाति का और बाक़ी रह
जाता है। यह हमला वास्तव में प्राचीन भारत पर सब से वहशियाना
हमला था। एशिया या यूरोप का क़रीब क़रीब कोई भी मुल्क इनके भयङ्कर
हमलों से नहीं बचा। इसी हुण जाति के हमलों से अपनी रक्षा करने के
लिये चीन के सम्राटों ने दो हज़ार मील लम्बी और अलौकिक चौड़ाई और
ऊँचाई की चीन की प्रसिद्ध “बड़ी दीवार” को तामीर कराया था। इन्हीं
हुण जाति के हमलों ने ईसा से क़रीब डेढ़ दो सौ साल पहले बख्तियारी
साम्राज्य को तहस नहस कर दिया। रूस और यूरोप को भी इन्हीं हमलों
ने बरबाद किया और क़रीब एक हज़ार साल तक वीरान बनाए रक्खा।
भारत का भी इन हमलों से बच सकना नामुमकिन था। ईसा के जन्म से
पहले इराक़ से लेकर भारत की उत्तर पच्छिमी सीमा तक सारा मुल्क इसी
जाति के अधीन था।
ईसा की पाँचवीं सदी के मध्य में इस हुण जाति के लोगों ने भारत
पर हमला किया। एक बार पञ्जाब, मध्य भारत और मालवा तक उनका
शासन जम गया। हुण सरदार तुरामान ने भारत के सम्राट बुद्धगुप्त को
परास्त कर दिया। किन्तु उसके बाद ही सम्राट यशोधर्मदेव ने, जिसकी
राजधानी उज्जैयनी थी, और जिसका साम्राज्य हिमालय से पूर्वीय घाट तक
और ब्रह्मपुत्र से अरब समुद्र तक सारे भारत पर फैला हुआ था, सन् ५७३
ई० में तुरामान के पुत्र मिहिरकुल को मुलतान के पास कोहूर नामक स्थान
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पर परास्त कर भारत से हुण जाति की हुकूमत को मिटा दिया । इसके बाद
राज्यवर्धन ने शेष उत्तर भारत से हुण जाति के रहे सहे प्रभाव का भी अन्त
कर दिया ।
अब हम उन सब हमलों को एक एक कर बयान कर चुके हैं जो मुसल-
मानों के हमले से पहले भारत पर हुए थे । हमने यह सारा बयान यूरोपियन
इतिहास लेखकों की किताबों से ही किया है। इससे पूरी तरह अनुमान
किया जा सकता है कि भारत पर उस समय तक कितने और किस तरह के
हमले हुए । भारत ने कहाँ तक कामयाबी के साथ उनका मुक़ाबला किया,
उन हमलों से भारत को कहाँ तक हानि या लाभ हुआ, और इन सब
हमलों में और भारत पर अंगरेज़ों के हमले में कितना ज़बरदस्त अन्तर था ।
अन्य देशों पर हमले
सच यह है कि कम या ज़्यादा बाहर से हमलों का होना हर मुल्क के
इतिहास में एक मामूली बात है । फिर भी भारत पर कभी भी इतने ज़्यादा
हमले नहीं हो पाए जितने बाक़ी संसार के ज़्यादातर देशों और ख़ास कर
यूरोप के क़रीब क़रीब हर देश पर । इसके सबूत में अब हम यूरोप के
विविध देशों पर बाहर के हमलों और उनके नतीजों का सार वृत्तान्त
यूरोपियन लेखकों ही के आधार पर देते हैं, जिससे यह भी मालूम हो
जायगा कि भारत में कभी इस तरह के हमलों की वजह से उस बरबादी का
हज़ारवां हिस्सा भी देखने में नहीं आया, जो बरबादी कि इस तरह के हमलों
के सबब से तमाम यूरोप में एक हज़ार साल से ऊपर तक फैली रही ।
यूरोप पर एशियाई जातियों के हमले
अनेक यूरोपियन इतिहास लेखक स्वीकार करते हैं कि यूरोप के ऊपर
पुराने हमले ५७
एशियाई क़ौमों के हमले ईसा से हज़ारों साल पहले से जारी थे। इनमें
आर्य्य जाति के हमले का ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं। इसके बाद ईसा से
८०० साल पहले यूरोप पर अन्य एशियाई जातियों के हमलों का भी
यूरोपियन इतिहास में ज़िक्र आता है। वास्तव में इस तरह के हमले समय
समय पर बराबर होते रहे। किन्तु इस स्थान पर उन सब हमलों को छोड़
कर केवल हज़रत ईसा के जन्म के बाद के हमलों को ही थोड़े से शब्दों में
बयान कर देना चाहते हैं।
ईसा की दूसरी सदी से लेकर पूर्वीय एशिया और मध्य एशिया की
अनेक क़ौमें जैसे हुण, अबार, बलगार, ख़ज़ार, पत्ज़ेनाक, मगियार, मङ्गोल
इत्यादि बराबर अपनी एशियाई आबादियों से निकल निकल कर यूरोप
पर हमला करती रही हैं। इस तरह के हमले एक हज़ार साल तक, रूस
से लेकर जरमनी, इतालिया, इङ्गलिस्तान और स्पेन तक बराबर होते रहे।
इनमें शुरू की हमला करने वाली क़ौमों ने पूर्वी यूरोप और मध्य यूरोप में
जाकर अपनी बस्तियाँ आबाद कीं। बाद के हमला करने वालों ने इन पहले
आए हुए लोगों को उत्तर और पच्छिम की ओर भगा कर ख़ुद उनकी जगह
ले ली।
ये हमले तमाम यूरोप के ऊपर इतने लगातार और इतने अधिक देशों
पर हुए कि उन्हें एक दूसरे के बाद तरतीबवार बयान करना हमारे लिए
अनावश्यक है। इसलिए हम इन सब क़रीब एक हज़ार साल के हमलों का
सार यूरोपियन इतिहास लेखकों ही के शब्दों में दे देना चाहते हैं।
ईसा की पाँचवीं सदी में क़रीब एक चौथाई यूरोप, जिसमें यूनान,
बलकान, इतालिया, स्पेन और इङ्गलिस्तान—सब शामिल थे, रोमन लोगों