भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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इन क़ौमों का इस देश में बस जाना
यह बात इतिहास से ज़ाहिर है कि इस बीच जिन शक और पहलव
जातियों ने उत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया वे इस देश में
आकर पूरी तरह बस गए और विदेशी रहने के स्थान पर इस देश की
अधिक उच्चतर सभ्यता से प्रभावित होकर हर माइनों में भारतवासी बन
गए । उन्होंने भारतीय रहन सहन, भारतीय ढङ्ग के नाम, भारतीय धर्म,
भारतीय भाषा, और भारतीय सभ्यता को पूरी तरह अपना लिया । मसलन
शक जाति का सबसे मशहूर सम्राट, जिसने भारत में कुशान साम्राज्य की
नींव रक्खी, और जिसने सन् ७८ ईसवी के क़रीब अफ़ग़ानिस्तान और
सरहदी प्रदेश पर शासन किया, सुप्रसिद्ध सम्राट कनिष्क था । कनिष्क ने
बौद्धमत स्वीकार किया । उसके सिंहासन पर बैठने के समय से ही, उसी
की यादगार में शाका सम्वत् का प्रारम्भ हुआ, जिसका अभी तक भारत में
उपयोग किया जाता है । सम्राट कनिष्क का राज दक्खिन में विन्ध्या तक
और उत्तर में मध्य एशिया के अलताई पहाड़ तक फैला हुआ बताया जाता
है । कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी । बौद्ध धर्म के प्रचार में
उसने बहुत बड़ा भाग लिया । अन्तिम और सबसे बड़ी बौद्ध 'सङ्गति' यानी
महासभा का वह संयोजक था । बौद्धमत की महायान सम्प्रदाय की उसने
नींव रक्खी । संस्कृत के प्रचार में उसने बहुत बड़ा हिस्सा लिया । कनिष्क
ही के प्रचारकों ने अधिकतर चीन, तातार, तिब्बत और उत्तर एशिया में
जाकर बौद्धमत का प्रचार किया ।
शक जाति के लोग उस समय अपने को हिन्दू क्षत्री कहते थे और क्षत्री
ही माने जाते थे । उनके नाम ज़्यादातर 'वर्मन्' या 'दत्त' से समाप्त होते