भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवे और हम ४३
सच्चाई के साथ कही गई है कि × × × पराजित प्रजा को अपने
बुरे से बुरे और अय्याश से अय्याश देशी नरेशों के बड़े से बड़े
ज़ुल्म इतने घातक मालूम न होते थे जितने कम्पनी के छोटे से
छोटे ज़ुल्म।”*
पुस्तक का सार
इससे अधिक अंगरेज़ विद्वानों की राय इस विषय में देने की ज़रूरत
नहीं है। सन् १७५७ से १८५७ तक सौ साल के कम्पनी के शासन में
हिन्दोस्तानी सिपाहियों का अपने देश और देशवासियों के ख़िलाफ़
जाँनिसारी के साथ विदेशी अफ़सरों की फ़रमाबरदारी करना, हिन्दोस्तानी
नरेशों का अंगरेज़ों के साथ सन्धियों की शर्तों को ईमानदारी से निबाहना,
अंगरेज़ों का बार बार जान बूझ कर अपनी सन्धियों और वादों को तोड़ना,
देशी रियासतों के यूरोपियन नौकरों का पद पद पर अपने मालिकों के साथ
विश्वासघात करना, अंगरेज़ रेज़िडेण्टों का देशी दरबारों में रह कर वहाँ फूट
डलवाना, रिश्वतें देना, गुप्त साज़िशें करना, हत्याएँ कराना और जाल
साज़ियाँ करना, देशी नरेशों का कम्पनी के साथ 'सन्धि' और 'मित्रता' के
जाल में एक बार फँस कर उससे बिना अपना मान और सर्वस्व दिए बाहर
- ". . . the Government of the East India Company in India was
tainted from the very first with mighty vices, . . . for generation after
generation the great aim and object of the servants of the Company, from
the high, civil and military functionaries downwards was to squeeze as
large as possible a fortune out of the country as quickly as might be, and
turn their backs upon it for ever, so soon as that object had been attained,
. . . In perfect truth has it been said . . . that the subjugated
race found the little finger of the Company thicker than the loins of the
worst and most dissolute of their native princes."—Dr. Russell.