भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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पहला मराठा युद्ध २७५
अपने उन आदमियों के नाम भेजा था, जिन्होंने नारायनराव को
क़त्ल किया, उसमें शब्द 'धरावे' था जिसका अर्थ 'पकड़ना' है और
मेरा मतलब केवल नारायनराव को गिरफ़्तार कराने का था, किन्तु
बाद में बीच ही में किसी ने कहीं पर 'धरावे' शब्द को बदल कर
'मारावे' कर दिया। इसमें भी कोई सन्देह नहीं हो सकता कि इस
हत्याकांड में मॉस्टिन का पूरा हाथ था। सर हेनरी लारेन्स लिखता
है—"बाद में राघोबा ने नारायनराव को मार डाला × × × और
अंगरेज़ सरकार ने उसका साथ दिया। अंगरेज़ों के भारतीय
इतिहास का यह एक अत्यन्त पापमय अध्याय है।"*
उधर बम्बई की कौन्सिल ने नारायनराव की मृत्यु का समाचार
पाकर इस मौक़े को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए ग़नीमत समझा।
३० अगस्त को पूना में पेशवा नारायनराव की हत्या हुई और
१७ सितम्बर को बम्बई की कौन्सिल ने मॉस्टिन को पत्र लिखा
कि—"इस अवसर पर साष्टी और बसई प्राप्त करने में जितनी
चीजें हमें मदद दे सकें, उन्हें तुम खूब परिश्रम के साथ बढ़ाना
और चाहे कुछ भी क्यों न हो, पूना छोड़ कर कहीं न जाना।"+
नारायनराव की मृत्यु के बाद राघोबा ने अपने आपको पेशवा
- "Raghoba afterwards murdered Narain Rao. and was
supported by the British Government. A very evil chapter in Anglo Indian
History."—Calcutta Review, vol. ii, p. 430.
+" . . . to improve diligently every circumstance favourable
to the accomplishment of that event (the possession of Salsette and Bassein),
and on no account whatever to leave the Marhatta Capital."—Mill, vol. iii,
p. 425.
२७६ भारत में अंगरेज़ी राज
एलान कर दिया। मॉस्टिन और उसके साथियों ने राघोबा को
पेशवा बनने में पूरी सहायता दी। पेशवा
विद्रोही राघोबा नारायनराव के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए
और अंगरेज़ ग्रॉन्ट डफ़ अन्त में लिखता है कि—"सिवाय
उसके शत्रुओं के बाक़ी सब उससे प्रेम करते थे।"* किन्तु अंगरेज़ों
ने अब नारायनराव की ख़ूब बुराई और राघोबा की तारीफ़ें करनी
शुरू कर दीं।
पूना के अधिकांश दरबारी और वहाँ की प्रजा सब राघोबा के
विरुद्ध थे। राघोबा हर तरह से मॉस्टिन के हाथों की कठपुतली
था। मॉस्टिन ने अब उसे समझा बुझाकर निज़ाम और हैदरअली
के साथ उसका बाज़ाब्ता युद्ध छिड़वा दिया और इस युद्ध के
लिए उसे सेना सहित पूना से रवाना कर दिया। किन्तु इस लड़ाई
में राघोबा को सिवाय कष्ट और अपमान के और कुछ न मिला।
नाना फड़नवीस और उसके साथियों ने, जो अच्छी तरह देख
रहे थे कि राघोबा विदेशियों के हाथों में खेल कर मराठा साम्राज्य
की जड़ें खोखली कर रहा है, राघोबा की इस ग़ैर मौजूदगी में
अपना बल और बढ़ा लिया, यहाँ तक कि राघोबा को पूना लौटने
का साहस न हो सका। वह जान बचा कर गुजरात की ओर
भाग गया।
इसी बीच पूना में १८ अप्रैल सन् १७७४ को पेशवा नारायनराव
*"...... all but his enemies loved him."—Grant Duff, History of
पेशवा नारायण राव की हत्या
चित्रकार—म० व० धुरन्धर
पेशवा नारायण राव ने घबरा कर अपने चचा राघोबा की शरण ली। राघोबा भीतर से
इस षड्यन्त्र में शामिल था। नारायण राव के एक मात्र विश्वस्त अनुचर ने अपने स्वामी के शरीर
से चिपट कर अपने टुकड़े टुकड़े करवा दिये। उसके बाद नारायण राव अपने चचा की गोद में
मार डाला गया।
[ द० ब० पारसनीस कृत "इतिहास संग्रह" ]
पेशवा नारायणराव की हत्या
[ चित्रकार— म० व० धुरन्धर ]
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पहला मराठा युद्ध २७७
की विधवा स्त्री के, जो अपने पति की हत्या के समय गर्भवती थी,
[पूना में दूसरे पेशवा] एक पुत्र हुआ। पूना दरबार ने एक मत से इस
[की नियुक्ति] बालक के पेशवा नियुक्त होने का एलान कर
दिया। प्रजा ने मसनद नशीनी की खुशियाँ मनाईं।
किन्तु अंगरेज़ों का हित राघोबा ही को पेशवा बनाने में था।
उन्होंने राघोबा को अपने पास सूरत बुलवा
[पहले मराठा युद्ध] लिया। सूरत में ६ मार्च सन् १७७५ को राघोबा
[की जड़] और अंगरेज़ों में एक सन्धि हो गई, जिसमें
राघोबा ने साष्टी, बसई' और सूरत प्रान्त का एक भाग कम्पनी के
नाम लिख दिया और बम्बई की अंगरेज़ कौन्सिल ने इसके बदले
में राघोबा को कम्पनी की सेना सहित पूना भेजने और पेशवा की
मसनद पर बैठाने का वादा किया। यह नाजायज़ सन्धि ही पहले
मराठा युद्ध की जड़ थी।
कर्नल कीटिंग के अधीन कम्पनी की सेना और राघोबा की
सेना दोनों मिल कर राघोबा को ज़बरदस्ती
[अंगरेज़ों की] पेशवा की मसनद पर बैठाने की ग़रज़ से पूना
[पहली हार] की ओर बढ़ीं। उधर पूना दरबार ने सेनापति
हरिपन्त फड़के के अधीन एक सेना राघोबा की बग़ावत को दमन
करने के लिए गुजरात की ओर रवाना कर दी। १८ मई सन् १७७५
को आरास नामक स्थान पर दोनों ओर की सेनाओं में घमासान
संग्राम हुआ, जिसमें राघोबा और उसके मददगारों की हार हुई।
अंगरेज़ों की बहुत सी सेना और अनेक अंगरेज़ अफ़सर मारे गए।
२७८ भारत में अंग्रेज़ी राज
किन्तु बरसात सर पर थी, इसलिए बाग़ियों का पीछा करके
उनका सर्वनाश किए बिना ही हरिपन्त फड़के को अपनी सेना
सहित पूना लौट आना पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि राघोबा और अंगरेज़ों को गुजरात में
अपनी साज़िशों के पक्का करने का अब और अच्छा मौक़ा मिला।
भारतीय नरेशों की आपसी ईर्ष्या की वजह से इस तरह की
साज़िशों के लिए मैदान उन दिनों भारत के
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़ों और] प्रायः हर प्रान्त में मिल सकता था। सन् १७६८
[पार्श्व-शीर्षक: गायकवाड़ में] में गुजरात के अन्दर महाराजा दमनाजी गायक
[पार्श्व-शीर्षक: सन्धि] वाड़ की मृत्यु हुई। तीन रानियों से उसके चार बेटे
थे—सयाजी, गोविन्दराव, मानिकजी और फ़तहसिंह। कई साल से
सयाजी और गोविन्दराव में गद्दी के लिए लड़ाइयाँ हो रही थीं।
फ़तहसिंह चारों में सबसे चलता हुआ और सयाजी के पक्ष में था।
करनल कीटिंग्ज जब राघोबा की सहायता के लिए सेना लेकर
बम्बई से गुजरात आया, उसने गोविन्दराव के विरुद्ध सयाजी
के साथ सन्धि करने की कोशिश की। २२ अप्रैल सन् १७७५ को
उसका एक दूत लैफ़्टिनेन्ट जॉर्ज लवीबॉण्ड बातचीत के लिए
फ़तहसिंह के पास पहुँचा। नौजवान फ़तहसिंह ने अंगरेज़ों के साथ
सन्धि करने से इनकार कर दिया और तिरस्कार के साथ
लवीबॉण्ड को अपने यहाँ से निकाल दिया।
बम्बई की कौन्सिल ने जब यह समाचार सुना तो फ़ौरन अपने
खुर्राट दूत मॉस्टिन को कीटिंग्ज की मदद के लिए पूना से गुजरात
पहला मराठा युद्ध २७६
भेजा। इस समय तक फड़के की विजयी सेना पूना वापस पहुँच
चुकी थी। मॉस्टिन अब पूना सं गुजरात चला आया और वहाँ पर
उसने अपनी चालों का जाल बिछाना शुरू किया। अन्त में अंगरेज़ों
और फ़तहसिंह गायकवाड़ के बीच सन्धि हो गई।
इस सन्धि के अनुसार भड़ोच, चिखली, वड़ियाव और कोरल
के तीनों परगने, जिनकी आमदनी कई लाख रुपए सालाना थी,
बिना किसी तरह की लड़ाई के कम्पनी को मिल गए और सयाजी
राव गायकवाड़ अंगरेज़ों की मदद् सं बड़ोदा की गद्दी पर बैठ
गया। गायकवाड़ का राज कुल अभी तक पेशवा को अपना
अधिराज मानता था, किन्तु अब से वह सदा के लिए मराठा
मराडल से फूट कर अलग हो गया और गुजरात में अंगरेज़ों के पैर
जम गए।
सूरत की सन्धि के अनुसार अंगरेज़ों ने साष्टी और बसई
दोनों पर क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु सूरत की सन्धि को पेशवा
सरकार ने स्वीकार न किया था और बाग़ी राघोबा को पेशवा
की मसनद पर बैठाने का निष्फल प्रयत्न कर अंगरेज़ पूना सरकार
को अपना दुशमन बना चुके थे।
अंगरेज़ों के सामने उस समय वास्तव में एक कठिन समस्या
थी। राघोबा के पेशवा बन सकने की सम्भावना बहुत ही कम थी
और बाग़ी राघोबा को मदद देने के बाद पूना सरकार से बातचीत
करने का उन्हें अब कोई मुंह न था। उनके गुप्तचर मॉस्टिन का
अब फिर पूना में घुस सकना तक नामुमकिन मालूम होता था।
२४० भारत में अंगरेज़ी राज
वारन हेस्टिंग्स को इस समय एक ख़ासी अच्छी तरकीब
[वारन हेस्टिंग्स की] सूझी। उसने सीधे कलकत्ते से अपने एक विशेष
[दोरुखी चालें] दूत कर्नल अपटन को पूना दरबार के पास भेजा
और यह रुख़ लिया कि बम्बई की कौन्सिल ने
राघोबा के साथ जो सन्धि की है और उसे जो कुछ मदद दी है,
वह मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ और मेरी इजाज़त के बिना दी गई है,
इसलिए वह सन्धि नाजायज़ है और अंगरेज़ सरकार न बाग़ी
राघोबा का साथ देना चाहती है और न पेशवा सरकार से लड़ना
चाहती है।
वारन हेस्टिंग्स ने बम्बई सरकार को हुकुम दिया कि पेशवा
दरबार से युद्ध फ़ौरन बन्द किया जावे और कर्नल कीटिङ्ग और
उसकी सेना को वापस बुला लिया जावे। बम्बई सरकार ने आज्ञा
पाते ही कीटिङ्ग और उसकी रही सही सेना को सूरत वापस बुला
लिया। पेशवा दरबार के मन्त्री उस समय पुरन्धर में थे, इसलिए
कर्नल अपटन २८ दिसम्बर सन् १७७५ को पुरन्धर पहुँचा।
सखाराम बापू उस समय पेशवा का प्रधान मन्त्री था। कर्नल
अपटन के पूना जाने का उद्देश ज़ाहिरा यह था कि बम्बई कौन्सिल
के समस्त कार्यों को नाजायज़ बताकर उनके लिए कम्पनी की ओर
से दुख प्रदर्शित करे और पेशवा दरबार के साथ कम्पनी की मित्रता
और वफ़ादारी प्रकट करे। किन्तु कर्नल अपटन के पास वारन
हेस्टिंग्स के दस्तख़ती दोहरे पत्र मौजूद थे। एक सखाराम बापू के
नाम जिसका आशय ऊपर दिया जा चुका है और दूसरा बाग़ी
पहला मराठा युद्ध २८१
राघोबा के नाम, जिसमें वारन हेस्टिंग्स ने राघोबा के प्रति मित्रता
प्रकट करते हुए बम्बई कौन्सिल की समस्त काररवाई का समर्थन
किया। अपटन को हिदायत कर दी गई थी कि यह दूसरा
पत्र केवल उस सूरत में उपयोग करना, जब कि इस बीच किसी
सबब से राघोबा के पक्ष की जीत हो चुकी हो। साथ ही हेस्टिंग्स
ने जो पत्र सखाराम बापू के नाम भेजा, उसमें भी अपनी मित्रता
प्रकट करते हुए पेशवा दरबार से प्रार्थना की कि साष्टी और बसई
अंगरेज़ों ही के पास रहने दिए जायें।
पेशवा दरबार के मन्त्री, जिनमें सखाराम बापू और नाना
[मराठों को] फ़ड़नवीस जैसे नीतिज्ञ मौजूद थे, मामले को खूब
[सन्देह] समझते थे। करनल अपटन ने वारन हेस्टिंग्स
के नाम २ फ़रवरी सन् १७७६ के पत्र में लिखा—
"वे मुझसे हज़ार बार पूछते हैं कि 'आप बराबर इतनी वफ़ादारी की
क़समें क्यों खाते हैं ? बम्बई गवरमेण्ट की छेड़ी हुई लड़ाई को तो आप लोग
बुरा कहते हैं और उस लड़ाई द्वारा जो इलाके आपको मिल गए हैं उन्हें
अपने पास रखने के लिए इतने इच्छुक हैं, यह सब मामला क्या है ?'" *
पेशवा दरबार ने इस बात पर ज़िद की कि अंगरेज़ फ़ौरन
साष्टी और बसई खाली कर दें। मजबूर होकर अपटन ने ७ फ़रवरी
- "They ask me a thousand times, why we make such professions of
honor? How disapprove the war entered into by the Bombay-Government,
when we are so desirous of availing ourselves of the advantages of it?"—
Colonel Upton to warren Hastings, 2nd Feb. 1776.
२८२ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १७७६ को वारन हेस्टिंग्स को लिख दिया कि—"पूना दरबार
हमारी शर्तों पर राज़ी नहीं होता।"
वारन हेस्टिंग्स ने जब देख लिया कि सुलह से काम नहीं चल
हेस्टिंग्स की युद्ध सकता, तो अपटन के पूना रहते हुए फ़ौरन एक
की तय्यारी बहुत बड़े पैमाने पर जंग की तैयारियाँ शुरू कर
दीं। कलकत्ते और मद्रास दोनों स्थानों पर पूना
भेजने के लिए सेनाएँ जमा की जाने लगीं। भोंसले, सींधिया और
होलकर, तीनों को हेस्टिंग्स ने अपनी ओर फोड़ने की कोशिशें शुरू
कीं। हैदरअली और निज़ाम से भी उसने गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
किया, और यह कोशिश की कि यदि हैदरअली और निज़ाम पेशवा
दरबार के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों को मदद न भी दें तो कम से कम
तटस्थ रहें।
पूना दरबार को इन सब बातों की ख़बर मिलती रही। इतिहास
से पता नहीं चलता कि और कौन कौन सी बातें थीं, जिनसे डर
कर या मजबूर होकर अन्त में नाना फड़नवीस जैसे नीतिज्ञों ने
अपने विचार बदल दिए। कर्नल अपटन जिस समय निराश
होकर पुरन्धर से बंगाल लौटने को तैयार हुआ, कहा जाता है कि
पेशवा के मन्त्रियों ने उसे रोक लिया।
३ जून सन् १७७६ को पुरन्धर में पेशवा दरबार और कम्पनी
पुरन्धर की सन्धि के दरमियान एक नई सन्धि हुई, जिसमें सूरत
वाली नाजायज़ सन्धि को रद्द क़रार दिया
गया, अंगरेज़ों ने वादा किया कि हम फिर कभी राघोबा को
पहला मराठा युद्ध २८३
सहायता न देंगे, बसई' का क़िला पूना दरबार को लौटा देंगे और
इस दरबार के साथ सदा मित्रता क़ायम रक्खेंगे। पूना दरबार ने
राघोबा के गुज़ारे के लिए प्रबन्ध कर दिया और "दोस्ताना क़ायम
रखने के लिए" कम्पनी को साष्टी का टापू, भड़ौच शहर की माल-
गुज़ारी और उसके आस पास तीन लाख रुपए सालाना का
इलाक़ा बतौर जागीर दे दिया। यह भी तय हुआ कि कम्पनी का
एक वकील पेशवा के दरबार में रहा करे। पूना दरबार को
निस्सन्देह यह आशा थी कि इस उदारता के बाद हम इन विदेशी
व्यापारियों के साथ अमन से रह सकेंगे, किन्तु उनकी यह आशा
झूठी निकली। पूना के चतुर ब्राह्मण भी कूट नीति में इन विदेशियों
से टक्कर न ले सके। वास्तव में दोनों के नैतिक आदर्शों में बहुत
बड़ा अन्तर था। ज्योंही कम्पनी के डाइरेक्टरों को इस नई सन्धि
की सूचना मिली, उन्होंने फ़ौरन वारन हेस्टिंग्स को लिखा :-
"हम चाहते हैं कि राघोबा के साथ जो सन्धि हुई थी, उसके अनुसार
कम्पनी को जितना इलाक़ा मिला था, उस सबको हर हालत में अपने क़ब्ज़े
में रक्खा जावे और हम आपको आज्ञा देते हैं कि जो उपाय उसे क़ायम रखने
और उसकी रक्षा करने के लिए ज़रूरी हों, आप तुरन्त कर डालें।"*
बम्बई कौंसिल, कलकत्ता कौंसिल और कम्पनी के डाइरेक्टर,
- "We approve, under every circumstance, of the keeping of all the
territories and possessions ceded to the Company by the treaty concluded
with Raghoba; and direct that you forthwith adopt such measures as may
be necessary for their preservation and defence." Court of Directors to the
Government of Bengal, Mill, p. 436.
२८४ भारत में अंगरेज़ी राज
इन तीनों में इस सम्बन्ध में जो पत्र व्यवहार हुआ उससे इतिहास
लेखक मिल ने डाइरेक्टरों के कपट और लालच
[कम्पनी के डाइरेक्टरों का कपट] को अच्छी तरह प्रकट किया है। डाइरेक्टरों
ने इन पत्रों में स्पष्ट लिखा कि बसईं जैसे
महत्वपूर्ण इलाक़े को छोड़ देना मूर्खता है। अपनी मद्रास कौन्सिल
को युद्ध के लिए तैयार रहने और समय पड़ने पर वारन हेस्टिंग्स
की मदद करने की आज्ञा दी। भारत के तमाम अंगरेज़ अधिकारियों
को साफ़ हिदायत की कि आप लोग राघोबा का साथ न छोड़ें
और जिस बहाने हो सके, पुरन्धर की सन्धि को तोड़ कर या
मराठों को उकसाकर उनकी ओर से तुड़वाकर, राघोबा को फिर
सामने कर दें, इत्यादि।
वारन हेस्टिंग्स और उसके तमाम मातहतों के लिए ये हिदायतें
काफ़ी थीं।
पुरन्धर की सन्धि हो चुकी थी। उस पर बाज़ाब्ता कम्पनी की
मोहर लग चुकी थी। फिर भी अंगरेज़ों ने उस
[सन्धि को तोड़ने की कोशिशें] सन्धि की शर्तों को पूरा करने में टाल मटोल
शुरू की। न उन्होंने राघोबा का साथ छोड़ा
और न बसईं का क़िला ख़ाली किया। कर्नल अपटन सन्धि करके
कलकत्ते लौट गया और जब उस सन्धि के अनुसार कम्पनी के
एक वकील को पूना भेजने का मौक़ा आया तो फिर वही प्रसिद्ध
अंगरेज़ दूत मॉस्टिन बम्बई से पूना भेजा गया।
पेशवा दरबार के नीतिज्ञ मॉस्टिन और उसके कृत्यों से अच्छी
पहला मराठा युद्ध २८५
तरह परिचित थे। वे जानते थे कि मॉस्टिन ही अंग्रेज़ों और
मराठों के बीच की सारी आपत्तियों की जड़ है। उन्होंने मॉस्टिन जैसे
आदमी के फिर अपने दरबार में भेजे जाने पर एतराज़ किया, किन्तु
कम्पनी के अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी और मार्च सन् १७७७
में मॉस्टिन कम्पनी के वकील की हैसियत से पूना पहुँच गया।
मॉस्टिन ने इस बार अपने गुप्त कुचक्रों द्वारा धीरे धीरे पेशवा
[हाशिया: अंग्रेज़ दूत मास्टिन] दरबार के एक और मन्त्री मोरोबा को अपनी
[हाशिया: का पूना दरबार में] ओर फोड़ लिया। उसने मोरोबा को नाना
[हाशिया: फूट डलवाना.] फड़नवीस से लड़ा दिया और नाना फड़नवीस
तथा प्रधान मन्त्री सखाराम बापू में भी फूट
डलवा दी। ये झगड़े यहाँ तक बढ़े कि दरबार के अन्दर नाना की
जगह मोरोबा को मिल गई और नाना कुछ दिनों के लिए दरबार
के कार्य से उदासीन होकर पुरन्धर चला गया । नाना की गैर
हाज़िरी में मोरोबा ने मॉस्टिन के कहने पर बम्बई की कौन्सिल को
यह गुप्त पत्र लिख भेजा कि आप फ़ौरन राघोबा को पेशवा की
मसनद पर बैठाने के लिए फिर से पूना ले आइए । बम्बई कौन्सिल
ने, जो केवल एक सहारा ढूंढ़ रही थी, पुरन्धर की सन्धि के विरुद्ध
फ़ौरन तैयारियां शुरू कर दीं। वारन हेस्टिंग्स ने भी ख़बर पाते ही
बम्बई की कौन्सिल की मदद के लिए एक बहुत बड़ी सेना बंगाल
से पूना भेजे जाने की आज्ञा दे दी।
करनल अपटन 'और उस समय के अन्य अंग्रेज़ों के बयानों
से साफ़ ज़ाहिर है कि पूना दरबार सच्चाई के साथ पुरन्धर की
२८६ भारत में अंग्रेज़ी राज
सन्धि पर क़ायम रहना चाहता था; किन्तु वारन हेस्टिंग्स और
उसके साथियों को इंगलिस्तान से विश्वासघात करने की आज्ञा
मिल चुकी थी।
कम्पनी की सेनाएँ अभी पूना के लिए रवाना भी न हो पाई थीं
कि पूना मन्त्रि मण्डल के फिर से बदलने की ख़बर कलकत्ते पहुँची।
मालूम होता है कि अंग्रेज़ों के नाम मोरोबा के पत्र का हाल किसी
प्रकार खुल गया। मोरोबा अहमदनगर के क़िले में क़ैद कर दिया
गया। नाना फड़नवीस अब पेशवा का प्रधान मन्त्री नियुक्त हुआ।
सखाराम बापू बहुत बूढ़ा था, वह अब दरबार के कामों से अलग
रहता था, उसमें और नाना में फिर से प्रेम हो गया। पूना दरबार
में कोई भी अब हत्यारे राघोबा के पक्ष में न था। किन्तु कम्पनी
की दुरंगी नीति जारी रही। एक ओर मॉस्टिन पूना दरबार में
रह कर नाना फड़नवीस और उसके साथियों को यह विश्वास
दिलाता रहा कि अंग्रेज़ पुरन्धर की सन्धि पर क़ायम रहना चाहते
हैं और शीघ्र उसकी सब शर्तों को पूरा कर देंगे, और दूसरी ओर
वारन हेस्टिंग्स पुरन्धर की इस सन्धि के ख़िलाफ़ राघोबा को
पेशवा बनाने के लिए बम्बई, मद्रास और कलकत्ते से सेनाएँ भेजने
की ज़बरदस्त तैयारियाँ करता रहा।
वारन हेस्टिंग्स ने जो सेना कलकत्ते में तैयार की वह मई सन्
१७७८ में कर्नल लेस्ली के अधीन बंगाल से
[हाशिया: कलकत्ते से अंग्रेज़ी सेना का कूच] चली। इस सेना को भोंसले, होलकर, सींधिया
इत्यादि कई भारतीय नरेशों के इलाक़ों से होकर
पहला मराठा युद्ध २८७
गुज़रना था। इनमें से भौंसले, होलकर और सींधिया तीनों
महाराष्ट्र मण्डल के सदस्य थे। यदि इन नरेशों को अंगरेज़ी
सेना का असली उद्देश मालूम होता तो उस सेना का पूना तक
पहुँच सकना असम्भव होता। इसलिए वारन हेस्टिंग्स ने इन
तीनों को धोखे में रखने के लिए उनके साथ गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
कर दिया।
सबसे पहले उसने इन सब नरेशों पर यह ज़ाहिर किया कि
फ्रान्स की सेना भारत के पच्छिमी तट पर हमला करने वाली है
और बंगाल से कम्पनी की सेना केवल फ्रान्सीसियों से अपने इलाक़े
की हिफ़ाज़त करने के लिए भेजी जा रही है, उसका उद्देश किसी
भारतीय नरेश से युद्ध करना नहीं है। इसके अलावा बरार के
राजा मूदाजी भौंसले के साथ उसने एक और ख़ासी सुन्दर चाल
चली। हाल ही में सतारा के राजा की मृत्यु हो चुकी थी, उसके
कोई औलाद न थी। भौंसले कुल की उत्पत्ति शिवाजी के वंश से
थी। वारन हेस्टिंग्स ने मूदाजी भौंसले को उकसाया कि आप
सतारा की गद्दी पर अपना हक़ जमाइए, कम्पनी आपकी मदद
करेगी। वारन हेस्टिंग्स का मतलब यह था कि सतारा की अधिकार
शून्य गद्दी पर एक प्रबल नरेश को बैठाकर पेशवा दरबार के अधि-
कारों को तोड़ दिया जावे, मराठा मण्डल में फूट डाल दी जावे
और फिर मूदाजी को अवध के नवाब वज़ीर की तरह अपने हाथों
में रक्खा जावे।
२८८ भारत में अंगरेज़ी राज
इस काम के लिए एक अंगरेज़ दूत एलयाॅट को बरार के राजा
[बरार के राजा को] के पास भेजा गया। एक अंगरेज़ इतिहास लेखक
[फोड़ने के प्रयत्न] लिखता है :—
“मिस्टर एलयाॅट को इस काम के लिए नियुक्त
किया गया कि तुम जाकर बरार के राजा को मराठा मण्डल से फोड़ो।
एलयाॅट के द्वारा बरार के राजा से बातचीत की गई। एलयाॅट को यह अधिकार
दिया गया कि तुम राजा से कह दो कि गवरनर जनरल अपनी पूरी शक्ति से
सतारा के राजा का तमाम इलाक़ा और पेशवा की पदवी आपको दिलवाने के
लिए तैयार है ।”*
किन्तु मूदाजी ने किसी वजह से वारन हेस्टिंग्स की इस सलाह
को स्वीकार न किया। वारन हेस्टिंग्स की चाल पूरी तरह न चल
सकी। इस पत्र व्यवहार से उसे इतना लाभ अवश्य हुआ कि
बंगाल की सेना शान्ति के साथ बरार के इलाक़े से गुज़र सकी।
होलकर और सींधिया दोनों मालूम होता है फ़्रान्सीसी हमले
के धोखे में आगए। इसके अलावा वे उस समय पूना में थे, इस
लिए उन्होंने इस सेना को अपने राज्यों में से गुज़रने की इजाज़त
दे दी।
- “Overtures were made to the Raja of Berar through Mr. Elliot, who
was deputed, with the view of detaching him from the confederacy, and who
was empowered to offer him the full support of the Governor-General in his
claims to the possessions of the Raja of Sattara, and to the situation of
Peshwa.”—Origin of the Pindaries etc., by an Officer in the service of the
Honorable East India Company, 1818.
पहला मराठा युद्ध २८६
वारेन हेस्टिंग्स ने ठीक यही धोखा नाना फड़नवीस को देना
चाहा और उससे यह इजाज़त मांगी कि पेशवा
[नाना फड़नवीस का अंगरेज़ी सेना को रोकना] के इलाके में से कम्पनी की सेना को जाने दिया
जावे। किन्तु नाना फड़नवीस ताड़ गया,
उसने कम्पनी की सेना के आगे बढ़ने पर एत-
राज़ किया, और जब देखा कि एतराज़ों का कोई फल नहीं हुआ
और अंगरेज़ी सेना बढ़ती चली आ रही है तो मजबूर होकर युद्ध की
तैयारी शुरू कर दी।
मार्ग में इस सेना को कई छोटी मोटी रुकावटें हुईं। बुन्देल-
खण्ड के स्वतन्त्र राजाओं ने उसे अपने इलाके में से गुज़रने से
रोका। किन्तु किसी से लड़कर और किसी से मिलकर, किसी को
चाल से और नवाब भोपाल जैसे को धन से शान्त करते हुए कम्पनी
की सेना आगे बढ़ती रही। मार्ग में ३ अक्तूबर सन् १७७८ को
करनल लेसली की मृत्यु हो गई और करनल गॉडर्ड उसकी जगह
सेनापति नियुक्त हुआ।
बम्बई के अंगरेज़ों ने इस सेना के पहुँचने का इन्तज़ार न
किया। उन्होंने राघोबा को युद्ध के ख़र्च के लिए
[बम्बई से कम्पनी की सेना] एक ख़ासी रक़म बतौर क़र्ज़ के दी, जिसके लिए
उससे पट्टा लिखा लिया और २२ नवम्बर सन्
१७७८ को राघोबा तथा करनल इजर्टन के अधीन एक विशाल सेना
राघोबा को पेशवा की मसनद पर बैठाने के लिए बम्बई से पूना
की ओर रवाना कर दी। यह सेना राघोबा के नाम पर आगे बढ़ती
१६
२६० भारत में अंगरेज़ी राज
जाती थी और उसके साथ साथ मार्ग भर में एलान बँटते जाते थे,
जिनमें महाराष्ट्र की प्रजा से राघोबा की सहायता करने के लिए
प्रार्थना की गई।
इसी बीच मॉस्टिन पूना में अचानक बीमार पड़ गया, उसे
बम्बई लौट आना पड़ा और १ जनवरी सन् १७७६ को उसकी मृत्यु
हो गई।
खरडाला तक बम्बई की इस सेना को किसी ने न रोका, किन्तु
नाना असावधान न था। उसके गुप्तचरों का सगंठन इतना अच्छा
था कि पूना में बैठे हुए उसे भारत भर की राजनैतिक हालत का
ठीक ठीक पता रहता था। सींधिया और होलकर दोनों उस समय
पूना में थे। नाना ने उन्हें सेनापति नियुक्त करके उनके अधीन अंग-
रेज़ों के मुक़ाबले के लिए सेना रवाना की।
मराठे युद्ध विद्या में अत्यन्त होशियार थे। वे धीरे धीरे पीछे
[हाशिया: तालेगाँव की लड़ाई] हटते हुए अंगरेज़ी सेना को पूना से १८ मील दूर
तालेगाँव के मैदान तक ले आए। ६ जनवरी
सन् १७७६ को अंगरेज़ी सेना तालेगाँव पहुँची।
वहाँ पहुँचते ही अंगरेज़ों ने अचानक अनुभव किया कि एक विशाल
मराठा सेना ने उन्हें तीन ओर से घेर रक्खा था। इस पर वे इतने
भयभीत हो गए कि उन्हें फ़ौरन पीछे हटने के सिवा कोई चारा
दिखाई न दिया।
११ जनवरी के ११ बजे रात को अंगरेज़ी सेना ने पीछे हटना