भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ भारत में अंगरेज़ी राज
एलान कर दिया। मॉस्टिन और उसके साथियों ने राघोबा को
पेशवा बनने में पूरी सहायता दी। पेशवा
विद्रोही राघोबा नारायनराव के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए
और अंगरेज़ ग्रॉन्ट डफ़ अन्त में लिखता है कि—"सिवाय
उसके शत्रुओं के बाक़ी सब उससे प्रेम करते थे।"* किन्तु अंगरेज़ों
ने अब नारायनराव की ख़ूब बुराई और राघोबा की तारीफ़ें करनी
शुरू कर दीं।
पूना के अधिकांश दरबारी और वहाँ की प्रजा सब राघोबा के
विरुद्ध थे। राघोबा हर तरह से मॉस्टिन के हाथों की कठपुतली
था। मॉस्टिन ने अब उसे समझा बुझाकर निज़ाम और हैदरअली
के साथ उसका बाज़ाब्ता युद्ध छिड़वा दिया और इस युद्ध के
लिए उसे सेना सहित पूना से रवाना कर दिया। किन्तु इस लड़ाई
में राघोबा को सिवाय कष्ट और अपमान के और कुछ न मिला।
नाना फड़नवीस और उसके साथियों ने, जो अच्छी तरह देख
रहे थे कि राघोबा विदेशियों के हाथों में खेल कर मराठा साम्राज्य
की जड़ें खोखली कर रहा है, राघोबा की इस ग़ैर मौजूदगी में
अपना बल और बढ़ा लिया, यहाँ तक कि राघोबा को पूना लौटने
का साहस न हो सका। वह जान बचा कर गुजरात की ओर
भाग गया।
इसी बीच पूना में १८ अप्रैल सन् १७७४ को पेशवा नारायनराव
*"...... all but his enemies loved him."—Grant Duff, History of