भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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किन्तु बरसात सर पर थी, इसलिए बाग़ियों का पीछा करके
उनका सर्वनाश किए बिना ही हरिपन्त फड़के को अपनी सेना
सहित पूना लौट आना पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि राघोबा और अंगरेज़ों को गुजरात में
अपनी साज़िशों के पक्का करने का अब और अच्छा मौक़ा मिला।
भारतीय नरेशों की आपसी ईर्ष्या की वजह से इस तरह की
साज़िशों के लिए मैदान उन दिनों भारत के
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़ों और] प्रायः हर प्रान्त में मिल सकता था। सन् १७६८
[पार्श्व-शीर्षक: गायकवाड़ में] में गुजरात के अन्दर महाराजा दमनाजी गायक
[पार्श्व-शीर्षक: सन्धि] वाड़ की मृत्यु हुई। तीन रानियों से उसके चार बेटे
थे—सयाजी, गोविन्दराव, मानिकजी और फ़तहसिंह। कई साल से
सयाजी और गोविन्दराव में गद्दी के लिए लड़ाइयाँ हो रही थीं।
फ़तहसिंह चारों में सबसे चलता हुआ और सयाजी के पक्ष में था।
करनल कीटिंग्ज जब राघोबा की सहायता के लिए सेना लेकर
बम्बई से गुजरात आया, उसने गोविन्दराव के विरुद्ध सयाजी
के साथ सन्धि करने की कोशिश की। २२ अप्रैल सन् १७७५ को
उसका एक दूत लैफ़्टिनेन्ट जॉर्ज लवीबॉण्ड बातचीत के लिए
फ़तहसिंह के पास पहुँचा। नौजवान फ़तहसिंह ने अंगरेज़ों के साथ
सन्धि करने से इनकार कर दिया और तिरस्कार के साथ
लवीबॉण्ड को अपने यहाँ से निकाल दिया।
बम्बई की कौन्सिल ने जब यह समाचार सुना तो फ़ौरन अपने
खुर्राट दूत मॉस्टिन को कीटिंग्ज की मदद के लिए पूना से गुजरात