भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ३६
तरह तरह से अपमान करना शुरू कर दिया। निस्सन्देह वे अब
छेड़ छाड़ का बहाना ढूंढ रहे थे।
सब से पहला अपमान जो इन लोगों ने सिराजुद्दौला का किया
सिराजुद्दौला के वह यह था। प्राचीन प्रथा के अनुसार हर नए
साथ अंगरेज़ों सूबेदार के मसनद पर बैठने के समय तमाम मात-
का व्यवहार हत राजाओं, अमीरों और विदेशी क़ौमों के वकीलों
का दरबार में हाज़िर होकर नज़रें पेश करना
ज़रूरी था। इसका एक मात्र अर्थ यह होता था कि वे नए नवाब
को नवाब स्वीकार करते हैं। सिराजुद्दौला के मसनद पर बैठने के
समय अंगरेज कम्पनी की ओर से कोई नज़र पेश नहीं की गई।
इसके बाद जब कभी अंगरेज़ों को मुर्शिदाबाद के दरबार से कोई
काम पड़ता था, तो वे कभी सिराजुद्दौला से बात न करते थे, बल्कि
ऊपर ही ऊपर ले देकर दरबारियों से अपना काम चला लेते थे।
वे सिराजुद्दौला के साथ पत्र व्यवहार करने से भी बचते थे। उन्होंने
एक बार अपनी क़ासिमबाज़ार की कोठी में सिराजुद्दौला को आने
तक से रोक दिया। निस्सन्देह कोई शासक या नरेश इस तरह के
अपमान को गवारा न कर सकता था। किन्तु इस व्यक्तिगत अप-
मान के अलावा और भी कई ज़बरदस्त सबब थे, जिन्होंने अंत में
सिराजुद्दौला को अंगरेज़ कम्पनी की बढ़ती हुई ताक़त को रोकने के
लिए मजबूर कर दिया। इनमें तीन मुख्य सबब ये थे —
(१) साम्राज्य के क़ानून और नवाब की आज्ञाओं, दोनों के
ख़िलाफ़ अंगरेज़ों ने उस सूबे के अंदर कलकत्ते में और दूसरी जगह