भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
मुग़लों का समय १७३
प्राचीन भारतीय सभ्यताओं या अरब और ईरान की विदेशी सभ्यताओं
दोनों के सर्वोच्च गुण लिए हुए, उन सब से ऊँची थी । हिन्दू अपने प्राचीन
जात पाँत के भेदों, अनेक तरह के देवी देवताओं की पूजा, आडम्बरयुक्त
कर्मकाण्ड, पुरोहितों के प्रभुत्व, असंख्य अन्धविश्वासों और सदियों की
सङ्कीर्णता को तिलाञ्जलि दे, मानव समता, एक ईश्वरवाद और प्रेम और
सदाचार के महत्व की ओर बढ़ते हुए दिखाई दे रहे थे । भारत का इसलाम
अरब के प्रारम्भिक इसलाम से भिन्न एक नई ही सुन्दर वस्तु बन रहा था
और मुसलमान सूफ़ी हिन्दुओं के अनेक उच्च दार्शनिक सिद्धान्तों और योग
प्राणायाम जैसी विधियों को अपना कर उन्हें इसलाम का एक अङ्ग बना रहे
थे । कबीर, दादू, नानक और बाबा फ़रीद जैसे सैकड़ों हिन्दू और
मुसलमान फ़क़ीर महात्मा अलग अलग धर्मों और सम्प्रदायों की बनावटी
और हानिकर दीवारों को तोड़ कर मनुष्य मात्र को प्रेम का और एक
सार्वजनिक उच्चतम सच्चे मानव धर्म का उपदेश दे रहे थे । शिल्प, विज्ञान,
कला कौशल, साहित्य और सामाजिक रहन सहन में नए और उच्चतर
आदर्शों का प्रादुर्भाव हो रहा था । भारत की विविध प्रान्तीय भाषाएँ पहली
बार अपने अन्दर उच्च और स्फूर्तिदायक साहित्य को जन्म दे रही थीं ।
समस्त देश सुख चैन और ख़ुशहाली की ओर बढ़ रहा था । एक देश और
एक राष्ट्र के भाव मानव प्रेम के रंग में रङ्ग कर समस्त भारत को एक समान
उच्चतर और पवित्रतर जीवन की ओर ले जा रहे थे ।
सम्राट अकबर
लगातार कई सौ साल से बढ़ते हुए और लहलहाते हुए इस राष्ट्रीय
वृक्ष का सब से सुन्दर, सब से महान और सब से गौरवान्वित पुष्प सोलवीं
१७४ पुस्तक प्रवेश
सदी के मध्य में सुप्रसिद्ध सम्राट अकबर के रूप में आकर खिला । प्रसिद्ध
अंगरेज़ विद्वान एच० जी० वेल्स सम्राट अकबर के विषय में लिखता है—
“हर इस तरह के पक्षपात से शून्य—जो समाज के टुकड़े
टुकड़े करके मतभेद पैदा करते हैं, दूसरे धर्मों के लोगों की ओर
उदार, हिन्दू या द्रविड़ समस्त जातियों के लोगों की ओर
समदर्शी, वह एक इस तरह का मनुष्य था जो साफ़ साफ़ अपने
साम्राज्य भर की परस्पर विरोधी जातियों और श्रेणियों को मिलाकर
एक प्रबल, और समृद्ध राष्ट्र बना देने के लिए पैदा हुआ था ।”*
एक दूसरे स्थान पर एच० जी० वेल्स लिखता है—
“एक सच्चे नीतिज्ञ के समान उसमें समन्वय की
स्वाभाविक प्रवृत्ति मौजूद थी। उसने निश्चय किया कि मेरा साम्राज्य
न मुसलिम होगा न मुग़ल, न राजपूत होगा न आर्य, न द्रविड़
होगा न हिन्दू, न उच्च जातियों का होगा न नीच जातियों का,
मेरा साम्राज्य भारतीय साम्राज्य होगा ।”†
अकबर भारत की उन राष्ट्रीय लहरों का केवल मूर्तिमान फल था जो
- Free from all those prejudices which separate society and create
dissensions, tolerant to men of other beliefs, impartial to men of other races,
whether Hindoo or Dravidian, he was a man obviously marked out to weld
the conflicting elements of his kingdom into a strong and prosperous whole.
"—The Outline of History, by H. G. Wells, London, p 455.
† "His instinct was the true statesman's instinct for synthesis. His
Empire was to be neither a Moslem nor a Mughal one, nor was it to be
Rajput or Ariyan or Dravidian, or Hindoo or high or low caste, it was to be
Indian."—Ibid, p. 454.
دربار نو رتن اکبری
दरबार नौरतन
[...] of the curator [...]
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मुग़लों का समय १७५
अकबर के सैकड़ों साल पहले से भारत में चल रही थीं और जो अकबर के
बाद तक भी अपना काम करती रहीं। धार्मिक विषय में अकबर ने कबीर के
ज्वलन्त उपदेशों से शिक्षा और प्रोत्साहन लिया। सम्राट हर्ष अकबर से
कई सौ साल पहले प्रयाग में शिव, बुद्ध, और सूर्य तीनों के मन्दिरों में
जाकर बारी बारी पूजा किया करता था। बंगाल में सम्राट हुसेनशाह द्वारा
'सत्यपीर' की पूजा का प्रचार जिसे हज़ारों हिन्दू और मुसलमान एक समान
मानते थे, अकबर के धार्मिक विचारों का एक प्रारम्भिक रूप था। फिर
भी अकबर का व्यक्तित्व और उसका लक्ष्य दोनों निराले और अत्यन्त
महान थे।
धार्मिक क्षेत्र में अपने 'अल्लाह उपनिषद्' और 'दीने इलाही' द्वारा
उसने एक सरल सार्वजनिक धर्म की नींव रखने की कोशिश की। सामाजिक
जीवन में उसने हज़ारों साल की उस प्रथा को, जिसके अनुसार हर विजेता
अपने युद्ध के क़ैदियों को गुलाम बना लिया करता था, सन् १५७३ में
क़ानूनन् बन्द कर दिया। बलात् वैधव्य, बालविवाह, बहुविवाह, धर्म के नाम
पर पशुबलि और सतो को प्रथा को उसने यथाशक्ति बन्द करने का प्रयत्न
किया। किन्तु उसने अपने किसी सुधार को भी तलवार के ज़ोर से चलाने
की चेष्ट नहीं की। .फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि अकबर प्रति दिन
ग़रीबों में जितना भोजन वस्त्र इत्यादि तक़सीम किया करता था और
अपनी तीर्थ यात्राओं में जितना दान दिया करता था उसमें साम्राज्य की
आय का एक ख़ासा हिस्सा ख़र्च हो जाता था। स्त्री जाति की स्वतन्त्रता
का वह सच्चा पक्षपाती था। उसके हिन्दू मुसलिम विवाहों ने हिन्दू
मुसलिम सम्मिश्रण को और भी अधिक पक्की नींव पर क़ायम करने की
१७६ पुस्तक प्रवेश
चेष्टा की। अकबर ने एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र को अपनी आँखों के सामने
साक्षात करने का प्रयत्न किया। वास्तव में उसने एक नए भारत की रचना
करना चाहा। अकबर के स्वप्न सर्वथा पूरे न हो सके, किन्तु "उदारता और
खोज की जिस महान प्रवृत्ति" को उसने जन्म दिया वह अभी तक क़ायम
है और इसमें सन्देह नहीं कि जिस भारतीय राष्ट्रीयता को इस समय भारत
में जन्म देने का प्रयत्न किया जा रहा है उसका सब से पहला प्रवर्त्तक और
प्रचारक सम्राट अकबर ही था।
फ़्रेडरिक आगस्टस लिखता है—
"बहैसियत एक सेनापति के अकबर महान था, बहैसियत
राजनीतिज्ञ के वह नए समाज का निर्माणकर्ता था और सच्चे
मानवधर्म के एक क्रियात्मक व्याख्याता की हैसियत से आज तक
कोई उससे बढ़कर नहीं हुआ।" *
उस समय की हिन्दू मुसलिम संकीर्णता
सम्राट अकबर के बाद उसके दोनों उत्तराधिकारियों, जहाँगीर और
शाहजहाँ, ने एक दूसरे के बाद इसी नीति का अनुसरण किया और इसी
राष्ट्रीय प्रगति को बड़ी सुन्दरता के साथ जारी रखा। प्रगति और उसका
बल बढ़ता गया, यहाँ तक कि जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं, शाहजहाँ का
समय भारतीय इतिहास में सबसे अधिक समृद्ध समय और अनेक अर्थों में
भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग था। किन्तु एकता, समता, उदारता और
- "Akbar was great as a general, as a statesman creative and down to
the present day he is unsurpassed as a practical exponent of genuine
humanity."—The Emperor Akbar. etc., by Frederick Augustus. p. 296.
मुग़लों का समय १७७
मानव प्रेम की जो लहरें उस समय भारत के अन्दर काम कर रही थीं वे
अभी तक भारतीय जीवन के समस्त क्षेत्र को पूरी तरह अपने वश में न कर
पाई थीं। निस्सन्देह उस समय इन शक्तियों का ज़ोर था और वह ज़ोर
दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा था। किन्तु दूसरी ओर हिन्दू धर्म और
इसलाम की प्राचीन संकीर्ण प्रवृत्तियाँ भी अभी तक समाप्त न हुई थीं।
रामानन्द ही के चेलों में यदि एक कबीर था तो दूसरा तुलसीदास । दोनों
महान थे, दोनों ईश्वर भक्त थे, दोनों का भारत को गर्व है, दोनों ने अपने
अपने ढङ्ग से भावी भारत की रचना में कम या ज़्यादा भाग भी लिया,
किन्तु एक ने अलग अलग धर्मों की दीवारों को तोड़ कर निःशङ्क भावी
सार्वजनिक मानव धर्म का उपदेश दिया और दूसरे का झुकाव अभी तक
जात पाँत युक्त मध्यमकालीन हिन्दुत्व की ओर था। वल्लभाचार्य इत्यादि
अनेक इस तरह की शक्तियाँ और ख़ास कर शैव और वैष्णव आचार्य समस्त
भारत में मौजूद थे जो राष्ट्र को भविष्य की ओर ले जाने के बजाय उसे
अभी तक भूतकाल की संकीर्णताओं में फँसाए रखने की ओर लगे हुए थे ।
मुसलमानों में भी जब कि एक ओर शरीयत के कर्मकाण्ड की परवा न करने
वाले सूफ़ी और दरवेश मौजूद थे, जो कबीर के समान एक मानवधर्म के प्रचारक
थे, दूसरी ओर इस तरह के अदूरदर्शी मुल्लाओं का भी अभी तक अभाव न
हुआ था जो अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ तीनों को काफ़िर बतलाते
थे। इन्हीं सङ्कीर्ण मुल्लाओं के पूर्वजों ने मनसूर को सूली पर चढ़ाया था
और शम्स तबरेज़ की ख़ाल खिंचवाई थी। निस्सन्देह संसार को किसी भी
दूसरी श्रेणी के लोगों से इतनी हानि न पहुंची जितनी विविध धर्मों के उन
पुरोहितों, पादरियों या मुल्लाओं से जो अपने धर्म के अन्तर्गत सच्चे भावों,
१२
१७८ पुस्तक प्रवेश
सदाचार और मानव प्रेम की अवहेलना कर कर्मकाण्ड और रूढ़ियों में जन
सामान्य को फँसाए रखना और विविध मतों और सम्प्रदायों को एक दूसरे
से पृथक करने वाली, मानव समाज के टुकड़े करने वाली, कृत्रिम दीवारों
को बनाए रखना अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझते हैं। दुर्भाग्यवश अलग
अलग मतों के पुरोहितों या मुल्लाओं का व्यक्तिगत हित भी इसी में होता
है। जिस समय भारत में कबीर और अकबर जैसों की चलाई हुई लहरें
इन सङ्कीर्ण प्रवृत्तियों को सदा के लिए अन्त करने वाली ही थीं, ठीक उस
समय, आज से पौने तीन सौ साल पहले, वह दुर्घटना हुई जिसने इस
समस्त राष्ट्रीय प्रगति को उलट पुलट कर दिया।
दाराशिकोह और औरङ्गज़ेब
शाहजहाँ का बड़ा लड़का दाराशिकोह अपने पिता, पितामह और
प्रपितामह के समान भारत की इस राष्ट्रीय प्रगति का सच्चा प्रतिनिधि, उसका
भक्त और अनुयाई था। दाराशिकोह प्रसिद्ध हिन्दू सन्त बाबालाल का
शिष्य था। दाराशिकोह की फ़ारसी पुस्तक 'नादिरुन्निकात', जिसमें दारा ने
अपने गुरु बाबालाल के साथ अपने वार्तालाप को बयान किया है, वेदान्त
के ऊपर फ़ारसी के सर्वोत्तम ग्रन्थों में गिनी जाती है। दारा के लिए ईश्वर
का सबसे प्यारा नाम 'प्रभु' था, जो उसकी मोहर तक में खुदा हुआ था।
दारा के छोटे भाई औरङ्गज़ेब ने दारा को हटा कर पिता की गद्दी पर बैठना
चाहा। देश की समस्त उन्नत शक्तियाँ स्वभावतः दारा की ओर थीं। विशेष
कर समस्त हिन्दू समाज दारा के पक्ष में था। दारा को शिकस्त देने के
लिए औरङ्गज़ेब को कट्टर मुल्लाओं और इसलाम की सङ्कीर्ण प्रवृत्तियों को
अपनी ओर करना पड़ा। देश की उन्नति में बाधा डालने वाली इन
दारा शिकोह
By courtesy of the Curator, Victoria Memorial
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मुग़लों का समय १७६
शक्तियों को नया जीवन मिल गया। वास्तव में भारत की क़िस्मत का
फ़ैसला कम से कम आइन्दा तीन सौ साल के लिए ३० मई सन् १६५८
को सामूगढ़ के मैदान में उस समय हुआ जब कि अनुदार, और अदूरदर्शी
औरङ्गज़ेब ने उदार, और दूरदर्शी दाराशिकोह पर विजय प्राप्त की।
सम्भव है कि औरङ्गज़ेब के स्वभाव में ही सङ्कीर्ण धार्मिकता छिपी रही
हो। कहीं अधिक सम्भव है कि, जैसा हमने ऊपर लिखा है, यह सङ्कीर्ण
धार्मिकता उसके लिए एक राजनैतिक आवश्यकता रही हो। किन्तु हमारे
इस समय के प्रसङ्ग या भारत के भाग्य में इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
सिंहासन पर बैठते ही औरङ्गज़ेब ने देश की समस्त उन्नति बाधक,
कट्टर मुसलिम प्रवृत्तियों को अपनी ओर जमा करना शुरू किया। शासक
की हैसियत से औरङ्गज़ेब अन्यायी न था। साम्राज्य की ऊँची से ऊँची
पदवियाँ उसने बिना भेद भाव हिन्दू और मुसलमानों को एक समान दे
रखी थीं। बिना किसी ख़ास वजह के वह अपनी हिन्दू प्रजा के दिल को
दुखाना भी न चाहता था। गोबध के ख़िलाफ़ जो कड़ी आज्ञाएँ सम्राट अकबर
के समय से चली आती थीं, औरङ्गज़ेब ने उन्हें जारी रखा, और अपने ५०
वर्ष के शासन काल में साम्राज्य भर के अन्दर कड़ाई के साथ उनका पालन
कराया। किसानों के हित का वह ख़ास ख़याल रखता था। औरंगज़ेब के
धार्मिक पक्षपात के जो बेशुमार क़िस्से देश भर में प्रचलित हैं और जिनमें
से अनेक इतिहास की पुस्तकों में भी प्रवेश कर गये हैं वे अधिकांश में
झूठे हैं। किन्तु औरङ्गज़ेब कट्टर शरई मुसलमान था। वह इसलाम की
समस्त संकीर्ण रूढ़ियों का मानने वाला था और उन पर अमल करता था।
अकबर और शाहजहाँ के दरबारों के विषय में कहा जा सकता था कि वे
१८० पुस्तक प्रवेश
दरबार न हिन्दू दरबार थे और न मुसलिम दरबार, वे शुद्ध भारतीय दरबार
थे । औरङ्गज़ेब के दरबार के बारे में यह न कहा जा सकता था । अकबर
और शाहजहाँ को मुसलमान जितना अपना कह सकते थे उतना ही हिन्दू
अपना कह सकते थे । औरङ्गज़ेब के विषय में यह बात नामुमकिन थी ।
शाही दरबार के अन्दर दशहरे, दीवाली, रक्षा बन्धन और शिवरात्रि का
मनाया जाना और भारतीय सम्राट का उनमें हिस्सा लेना औरङ्गज़ेब ने
बन्द कर दिया । यह सब बातें फिर एक पुरानी कहानी रह गईं । .
राष्ट्र के अधिक समझदार लोगों ने, जो पहले की हितकर राष्ट्रीय
प्रगति से परिचित थे, इसका विरोध किया । उन्हें दिखाई दे गया कि
औरङ्गज़ेब की नीति बने बनाए राष्ट्रीय जीवन के टुकड़े कर देश को नाश की
ओर ले जाने वाली है । इन लोगों ने औरङ्गज़ेब को समझाने की कोशिश
की । जिस समय औरङ्गज़ेब ने 'जज़िए' के उस निरर्थक किन्तु विवादास्पद
कर को, जिसे सम्राट अकबर ने बन्द कर दिया था, फिर से जारी करना
चाहा, तो महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् १६७८ में औरङ्गज़ेब से कहा—
"ख़ुदा केवल मुसलमानों ही का ख़ुदा नहीं, बल्कि तमाम
इनसानों का ख़ुदा है । उसके सामने हिन्दू और मुसलमान सब
एक समान हैं। हिन्दुओं के धार्मिक रिवाजों का अनादर करना
उस सर्वशक्तिमान परमात्मा की इच्छा की अवहेलना करना है ।"*
अदूरदर्शी औरङ्गज़ेब ने इस सलाह की परवा न की । स्वभाबतः राजपूत,
मराठे, सिख और अन्य हिन्दू राजे, महाराजे एक एक कर औरङ्गज़ेब के
- Rise of the Maratha Power, by Ranade, p. 81.
[Header] मुग़लों का समय १८१
ख़िलाफ़ खड़े हो गए । जिस तरह औरङ्गज़ेब ने सङ्कीर्ण मुसलिम शक्तियों
को अपनी ओर किया, उसी तरह मराठों और सिखों ने, हिन्दू सङ्कीर्णता
का आश्रय लिया । सारा देश दो विरोधी दलों में बँट गया । कुछ वर्षों के
अन्दर ही कबीर और अकबर जैसों के महान प्रयत्नों और सदियों की
राष्ट्रीय प्रगति का सत्यानाश हो गया । औरङ्गज़ेब संयमी और बलवान था ।
वह अपनी ज़िन्दगी भर केवल उस सङ्गठित शक्ति के सहारे, जो बाबर से
लेकर शाहजहाँ तक के शासनकालों में मुग़ल साम्राज्य ने प्राप्त कर ली थी,
चारों ओर के विद्रोहों को दमन करता रहा । किन्तु जिस साम्राज्य की नींव
देश वासियों के हित और उनकी सहानुभूति पर क़ायम की गई थी वह
अब केवल हथियारों के बल के सहारे चलाया जाने लगा । दुर्भाग्यवश
औरङ्गज़ेब का शासनकाल भी बहुत लम्बा था ! अलग अलग धार्मिक
सङ्कीर्णता को दोनों ओर बल प्राप्त करने और समता, उदारता, प्रेम और
एकता की शक्तियों को तितर बितर होने का काफ़ी मौक़ा मिल गया ।
औरङ्गज़ेब के मरते ही भारतीय साम्राज्य के टुकड़े टुकड़े होने लगे । देश की
प्रधान राजनैतिक सत्ता के निर्बल होने के साथ साथ देश के समस्त
उद्योग धन्धों, व्यापार, साहित्य और सुख समृद्धि के भी नाश के बीज
बोए गए ।
औरङ्गज़ेब के बाद
बहुत सम्भव है कि औरङ्गज़ेब के बाद देश फिर अपनी ग़लती को
अनुभव कर उस ग़लती के बुरे नतीजों को दूर कर लेता और शीघ्र ही फिर
एक बार पहले की तरह ऐक्य, स्वस्थता और उन्नति के पथ पर चलने लगता,
बहुत दरजे तक देश ने ऐसा किया भी । जज़िया औरङ्गज़ेब ही के समय में
१८२ पुस्तक प्रवेश
चार दिन चल कर बन्द हो गया था। औरङ्गज़ेब के अनेक उत्तराधिकारियों
ने औरङ्गज़ेब की सङ्कीर्ण नीति को छोड़ कर फिर उदारता और विशालता
का सबूत देना शुरू कर दिया। दिल्ली दरबार में फिर से दशहरा और रक्षा
बन्धन उत्साह के साथ मनाए जाने लगे। सम्राट शाहआलम ने शिवाजी
के उत्तराधिकारी पूना के पेशवा को अपनी सल्तनत का 'वकील' क़रार
दिया, और माधोजी सिंधिया को अपना 'फ़रज़न्द जिगर बन्द' कहकर स्वयं
देहली और आगरे का सूबेदार और राजधानी का शासक नियुक्त किया।
शाहआलम के पुत्र अकबरशाह ने ब्रह्मसमाज के जन्मदाता प्रसिद्ध राममोहन
राय को राजा का ख़िताब देकर और अपना विश्वस्त वक़ील नियुक्त करके
इङ्गलिस्तान भेजा। अन्तिम सम्राट बहादुरशाह के जीवन की अनेक घटनाएँ
और उसके अनेक कथन इस तरह के मौजूद हैं जिनसे ज़ाहिर है कि वह
हिन्दू और मुसलमानों को एक आँख से देखता था और स्वयं सूफ़ी
विचारों का था। साम्राज्य के केन्द्र की इस हितकर नीति का प्रभाव भारत के
दूसरे प्रान्तों में भी जगह जगह साफ़ देखने में आता था। प्लासी के युद्ध के बाद
तक बङ्गाल के मुसलमान सूबेदारों के अधीन बड़े से बड़े प्रान्तों की दीवानी
हिन्दुओं को मिली हुई थी, और सूबेदार के दरबार में हिन्दू और मुसल-
मानों के साथ व्यवहार में किसी तरह का भेद भाव न किया जाता था।
सिराजुद्दौला का सब से विश्वस्त अनुयाई राजा मोहनलाल था जिसने
प्लासी के मैदान में सिराजुद्दौला के लिए अपने प्राण दिए। मीरजाफ़र ने
दीवान रज़ा ख़ाँ के स्थान पर महाराजा नन्दकुमार को अपना दीवान
नियुक्त करने की ज़िद की। नन्दकुमार ने ही मीर जाफ़र के मरने पर एक
हिन्दू मन्दिर से गंगा जल लाकर उसे अपने हाथ से गंगाजल से अन्तिम
[Page 183]
मुग़लों का समय १८३
स्नान कराया । यही हालत महाराजा रणजीत सिंह, होळकर, सींधिया, हैदर
अली और टीपू सुलतान के दरबारों की थी । प्रसिद्ध मराठा नीतिज्ञ नाना
फड़नवीस हैदरअली को अपना दाहिना हाथ कहा करता था और दोनों में
गहरी मित्रता थी। हमने इस पुस्तक में आगे चलकर दिखलाया है कि
हैदरअली की सारी नीति ही इस विषय में ठीक सम्राट् अकबर की नीति
की नक़ल थी। जगद्गुरु शङ्कराचार्य और टीपू सुलतान में एक दूसरे के लिए
गहरा प्रेम था । अवध के मुसलमान नवाबों के अधीन अधिकांश बड़े बड़े
तालुक़ेदार और मुख्य मुख्य मन्त्री तक हिन्दू होते थे, और लखनऊ दरबार
उदारता, एकता और प्रेम में रंगा रहता था। इसी तरह की और भी
मिसालें उस समय के इतिहास से दी जा सकती हैं। इसमें कुछ भी सन्देह
नहीं कि यदि भारत को मौक़ा मिलता तो वह शीघ्र एक औरङ्गज़ेब की
ग़लती के नतीजों से पनप कर अपना पहले का परस्पर विश्वास और पहले
का गौरव प्राप्त कर लेता ।
किन्तु भारत के दुर्भाग्य से ठीक उस समय जब कि औरङ्गज़ेब की
ग़लती के नतीजे अभी ताज़े थे और दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता एकबार निर्बल
हो चुकी थी, एक ऐसी तीसरी शक्ति ने भारत के राजनैतिक मञ्च पर प्रवेश
किया जिसे भारत की उस ग़लती से पैदा हुए परस्पर के अविश्वास और
उनके बुरे नतीजों को स्थाई कर देने में ही अपना सब से बड़ा लाभ दिखाई
दिया और जिसका हित हर तरह भारतवासियों के हित के विरुद्ध था, और
जिसने भारत की उस, समय की अस्तव्यस्त हालत से पूरा पूरा फ़ायदा
उठाया ।
१८४ पुस्तक प्रवेश
अंगरेज़ों का आना
उस समय के अङ्गरेज़ व्यापारी
अंगरेज़ों के भारत आने और उस समय के इङ्गलिस्तान और भारत
दोनों की हालत का चित्र ऊपर दिया जा चुका है । भारत में उनकी १००
साल से ऊपर की कोशिशों और काररवाइयों का विस्तृत हाल प्रामाणिक
अंगरेज़ लेखकों ही के आधार पर पाठकों को इस पुस्तक में मिलेगा ।
औरङ्गज़ेब के समय तक भारत के अन्दर अंगरेज़ व्यापारियों की हालत
क़रीब क़रीब वैसी ही थी जैसी आजकल के भारत में हींग बेचने वाले
काबुलियों या काग़ज़ के खिलौने बेचने वाले चीनियों की । औरङ्गज़ेब की
अनुदार और अदूरदर्शी नीति ने थोड़े दिनों में चारों ओर छोटी छोटी और
एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी रियासतें पैदा कर दीं, साम्राज्य की केन्द्रीय शक्ति
को निर्बल कर दिया, और देश के अन्दर हिन्दू और मुसलमानों के परस्पर
प्रेम और एकता की उन अलौकिक राष्ट्रीय लहरों को एक समय के लिए
पीछे हटा दिया जो कबीर के समय से लेकर क़रीब तीन सौ साल की लगा-
तार कोशिशों से देश को चिरस्थाई सुख और समृद्धि की ओर ले जाती
हुई दिखाई दे रही थीं । देश के शत्रुओं को अपनी कोशिशों के लिए खुला
मैदान मिल गया ।
औरङ्गज़ेब की मृत्यु के चन्द साल के अन्दर ही मद्रास और बंगाल में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की साज़िशें शुरू हो गईं जो बढ़ते बढ़ते औरङ्गज़ेब की
मृत्यु के पचास साल बाद प्लासी के मैदान में अपना रंग लाईं। कुदरती तौर
पर अंगरेज़ों का हित इसी में था कि भारतीय जीवन की उस समय की
अव्यवस्था को जिस तरह हो सके चिरस्थाई बना दें और राष्ट्रीय ऐक्य की
अंगरेज़ों का आना १८५
उन कल्याणकर प्रवृत्तियों को, जिनका बढ़ना औरङ्गज़ेब के समय में रुक गया
था, फिर से पनपने न दें ।
उनकी सफलता के कारण
किन्तु एक गम्भीर प्रश्न हमारे सामने यह पैदा होता है कि क्या कारण
हुए जिनसे अधिक सभ्य, अधिक बलवान और अधिक उन्नत भारतवासी
अपने से कम सभ्य, कम बलवान और अनुन्नत इङ्गलिस्तान निवासियों की
चालों में लगातार इस आसानी से आते चले गए, यहाँ तक कि अन्त में
अपना सर्वस्व खो बैठे । यही प्रश्न इस पुस्तक को पढ़ने से हर पाठक के दिल
में पैदा होगा । वास्तव में इतिहास की यह एक कठिनतम पहेलियों में से है ।
सबसे पहले कुशाग्रधी फ़्रांसीसी सेनापति दूपले ने मालूम किया कि
यूरोपीय अर्थों में 'राष्ट्रीयता' या 'देशभक्ति' का उस समय भारत में अभाव
था । दूपले के अनुसार यूरोपनिवासियों के लिए भारतवासियों को एक
दूसरे से लड़ा देना निहायत आसान था और इसी लिए भारत अपनी
आज़ादी खो बैठा । निस्सन्देह दूपले की बात एक दरजे तक सत्य अवश्य
है, किन्तु हमें इस पर और अधिक गम्भीरता के साथ विचार करना
होगा । अंगरेज़ विद्वान करनल मालेसन लिखता है कि अपने क़ौमी चरित्र
की जिन कमज़ोरियों के कारण भारतवासी पराधीन किए जा सके उनमें एक
यह थी कि उन्हें “स्वभाव से ही ग़ैरों पर विश्वास कर लेने और उनके साथ
ईमानदारी का व्यवहार करने की आदत,” थी । * कर्नल मालेसन का कथन
दूपले के कथन की निस्बत सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक है ।
- “. . . the trusting and faithful nature . . .”—The Decisive
Battles of India, by Colonel Malleson, chapter i.
१८६ पुस्तक प्रवेश
सबसे पहली बात इस सम्बन्ध में हमें यह समझनी होगी कि किसी
एक कम सभ्य कौम का अपने से अधिक सभ्य कौम पर विजय प्राप्त कर
लेना या उसे पराजित कर लेना कोई नई घटना नहीं है। संसार के
इतिहास में अनेक बार अधिक सभ्य कौमें अपने से कम सभ्य कौमों का
इस तरह शिकार होती रही हैं। यूरोप में गॉल और वेण्डाल कौमों के
जिन लोगों ने उत्तर और पूरब से जाकर विशाल रोमन साम्राज्य पर
हमला किया और उस साम्राज्य के सदा के लिए टुकड़े टुकड़े कर डाले, वे
रोमन लोगों की निस्बत कहीं कम सभ्य थे। जिन तातारियों और मुगलों
ने आज से हज़ार डेढ़ हज़ार साल पहले पूरब और मध्य एशिया से निकल
कर बगदाद और ईरान के गौरवान्वित साम्राज्यों का अन्त किया वे उस
समय के अरबों और ईरानियों के मुकाबले में सर्वथा असभ्य थे। मध्य
एशिया की असभ्य जातियों ने ही समृद्ध यूनानी साम्राज्य का ख़ात्मा कर
डाला। भारतवासियों का भी अपने से किसी कम सभ्य जाति के इस तरह
अधीन हो जाना इसी तरह की एक घटना थी। इस विचित्र ऐतिहासिक घटना
के आम तौर पर दो सबब हो सकते हैं। एक तो अधिक उच्च सभ्यता लोगों
में थोड़ी बहुत आरामतलबी की आदत पैदा कर देती है और असभ्य कौमों
की उद्दण्ड पराक्रमशीलता उनमें नहीं रह जाती। दूसरे यह कि असभ्य या
कम सभ्य लोग जिस निस्सङ्कोच भाव के साथ अपनी पाशविक प्रवृत्तियों
और शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं, अधिक सभ्य लोग अपने यहाँ के
नैतिक आदर्शों के अधिक स्थिर हो जाने के कारण उस तरह नहीं कर सकते।
पराजय के तीन कारण
भारत की इस दुर्घटना के हमें तीन मुख्य कारण साफ़ दिखाई देते हैं—
अंगरेज़ों का आना १८७
( १ ) अपने और पराए का भाव जिसे आज कल 'राष्ट्रीयता' का भाव
कहा जाता है उदार भारतवासियों के चित्तों में कभी भी अधिक स्थान न
कर पाया था । हम ऊपर लिख चुके हैं कि १८ वीं सदी के शुरू में भारत के
अन्दर कोई प्रबल केन्द्रीय शक्ति न रही थी । अनेक छोटी बड़ी शक्तियाँ उस
समय देश के अन्दर प्राधान्य प्राप्त करने के लिए उत्सुक और प्रयत्नशील
थीं। मुसलमानों और हिन्दुओं में भी ऊपर के कारणों से जगह जगह एक
तरह की पृथकता पैदा हो गई थी। ऐसी हालत में एक तीसरी बाहर की
ताक़त अनेक लोगों को निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह दिखाई दी। इससे पहले
जितने लोगों ने बाहर से आकर भारत में प्रवेश किया उनमें से, उन थोड़े सों
को छोड़ कर, जो महमूद ग़ज़नवी या नादिरशाह की तरह लूट मार कर
चार दिन के अन्दर वापस चले गए, और किसी से भारतवासियों को किसी
तरह का कड़ुवा अनुभव न हुआ था। हम ऊपर दिखा चुके हैं कि इन सब
लोगों ने भारत में बस कर भारत को अपना घर बना लिया और समस्त
भारतवासियों की उन्नति और विकास में पूरा पूरा भाग लिया। ऐसी सूरत
में अपने और और का भेद भारतवासियों के लिए कोई विशेष अर्थ ही न रखता
था । भारतवासियों के धार्मिक और नैतिक आदर्श भी उनके अन्दर इस तरह
का विचार पैदा होने न दे सकते थे। कुदरती तौर पर भारतवासियों ने सात
समुद्र पार के यूरोपनिवासियों के साथ उसी तरह के प्रेम और सत्कार का
व्यवहार किया जिस तरह का वे आपस में एक दूसरे के साथ करने के आदी
थे। ऐसी सूरत में अंगरेज़ों का विविध भारतीय नरेशों के परस्पर संग्रामों
में कभी एक और कभी दूसरे का साथ देना या अपनी साज़िशों द्वारा इस
तरह के संग्राम खड़े करके उनसे पूरा लाभ उठाना अत्यन्त सरल हो गया ।
१६० पुस्तक प्रवेश
आदमियों को डाँटा और कहा—"मुमकिन है, मेरी आस पास की देसी
रिआया ने हसद के सबब फ़िरंगियों से कुछ झगड़ा किया हो। क्यों न फ़िरंगी
जिस तरह हो सके, अपनी हिफ़ाज़त का इन्तज़ाम करें ? ये बेचारे परदेसी
बहुत दूर से आए हैं और बहुत मेहनती हैं। मैं हरगिज़ दख़ल न दूँगा ।”*
भारत के व्यापारियों को भी उस समय तक कभी किसी दूसरे देश के
व्यापारियों से किसी तरह का कडुवा अनुभव न हुआ था। व्यापारी या
आक्रमक, अंगरेज़ों से पहले के किसी भी विदेशी के ज़रिये भारतीय
व्यापारियों को किसी तरह की हानि न पहुँची थी। इसके विपरीत विविध
देशों के व्यापारियों के मेल जोल से सदा एक दूसरे को लाभ ही पहुँचता
रहा था। इसलिए यह भी असम्भव था कि भारतीय व्यापारी, जिनको
अन्त में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कारण सबसे अधिक हानि पहुँची, कम्पनी
के कुचक्रों का मुक़ाबला करने या उसे देश से बाहर निकालने का मिल
कर कोई प्रयत्न करने की सोचते। इसके विपरीत उस समय के अंगरेज़
व्यापारी आयरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड के व्यापारों का हाल ही में नाश करके
इन परस्पर नाशकारी तरीक़ों का पूरा अनुभव प्राप्त कर चुके थे। यहाँ तक
कि स्कॉटलैण्ड तक को, 'बिल ऑफ़ सिक्यूरिटी' पास करके इंगलिस्तान के
इन नाशकर प्रयत्नों से अपने व्यापार की रक्षा करनी पड़ी थी।
(३) भारतवासियों को इससे पहले किसी विदेशी के वचनों पर
अविश्वास करने का कोई कारण न था। भारत में सन्धिपत्रों और राजकीय
एलानों को सदा से पवित्र माना जाता था और यूरोपियनों के आने से
पहले एशियाई नरेशों के सन्धिपत्र और एलान अधिकतर सच्चे होते
- Our Empire in Asia, by Torrens, pp. 14, 15