भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
( ७ )
खसोट—मुंगेर की सन्धि —मीर क़ासिम का चुंगी उठवा देना—बंगाल में
फिर से खुशहाली—दूसरा सूबेदार खड़ा करने की तजवीज़—मीर क़ासिम
से नई नई मांगें—मीर क़ासिम की प्रजा के साथ ज़ुल्म और ज़्यादतियां—
मीरजाफ़र के साथ दोबारा साज़िश—उदवानाला की लड़ाई—मीरक़ासिम
के ईसाई अफ़सरों की नमक हरामी—मीर क़ासिम की पराजय—मीर
क़ासिम के शासन का अन्त—मीर क़ासिम के शासन पर एक दृष्टि ।
पृष्ठ १४७-१६६
पाँचवाँ अध्याय
फिर मीर जाफ़र
मीर जाफ़र के साथ नई सन्धि—बंगाल की और बुरी हालत—मीर
जाफ़र की शिकायतें—मीर क़ासिम के अन्तिम प्रयत्न—अंग्रेज़ों के नाम
शुजाउद्दौला का प्रयत्न—शुजाउद्दौला और शाहआलम में फूट डालने की
कोशिश—शुजाउद्दौला की सेना में विश्वासघातक—बक्सर की लड़ाई—
मीर क़ासिम की मृत्यु—कम्पनी और शुजाउद्दौला में सन्धि—मीर जाफ़र
का करुणाजनक अन्त । पृष्ठ १६७-२१६
छठा अध्याय
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद
नवाब नजमुद्दौला के साथ कम्पनी की नई सन्धि—नन्दकुमार की
गिरफ़्तारी—क्लाइव का दोबारा भारत आना—क्लाइव की योजना—
( ८ )
क्लाइव का इलाहाबाद आना—शुजाउद्दौला के साथ नई सन्धि—कम्पनी
को दीवानी के अधिकार—नजमुद्दौला की हत्या—भयंकर लूट और दो
अमली—खुले डाके—नमक पर महसूल—क्लाइव का व्यक्तिगत चरित्र—दो
अमली द्वारा बंगाल का नाश—दरिद्रता, दुष्काल और महामारी—खून के
आंसू । पृष्ठ २१७-२३७
सातवाँ अध्याय
वारन हेस्टिंग्स
दो अमली का अन्त—निरपराध रईसों का संहार—महाराजा नन्द
कुमार को फाँसी—बनारस की लूट और बरबादी—अवध की बेगमों पर
अत्याचार—भारत से हेस्टिंग्स की कमाई—कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा
देशव्यापी लूट—गोरखपुर के किसानों और ज़मीदारों पर जुल्म—लगान
का बढ़ाया जाना—वारन हेस्टिंग्स पर मुक़दमा—क्षमा और इनाम ।
पृष्ठ २३८-२६३
आठवाँ अध्याय
पहला मराठा युद्ध
मराठा साम्राज्य की पराकाष्ठा—मराठा मण्डल—मराठा साम्राज्य की
अवनति—दक्खिन में कम्पनी की नीति—साष्टी और बसईं पर अंगरेज़ों के
दांत—मराठों, हैदर और निज़ाम में फूट डालने के प्रयत्न—नाना फड़नवीस
की दूरदर्शिता—अंगरेज़ दूत मास्टिन की करतूतें—पेशवा नारायन राव
( ६ )
की हत्या—विद्रोही राघोबा और अंगरेज़—पूना में दूसरे पेशवा की नियुक्ति
—पहले मराठा युद्ध की जड़—अंगरेज़ों की पहली हार—अंगरेज़ों और
गायकवाड़ में सन्धि—वारन हेस्टिंग्स की दोरुख़ी चालें—मराठों को सन्देह
—हेस्टिंग्स की युद्ध की तय्यारी—पुरन्धर की सन्धि—अंगरेज़ों की सन्धि
तोड़ने की कोशिशें—कलकत्ते से अंगरेज़ी सेना का कूच—बरार के राजा
को फोड़ने के प्रयत्न—बम्बई से कम्पनी की सेना—ताले गाँव की लड़ाई—
अंगरेज़ों की दोबारा हार और दूसरी सन्धि—दूसरी सन्धि का उल्लंघन—
महारानी अहल्याबाई—अंगरेज़ों का सींधिया से झूठा वादा—सींधिया
और राघोबा के साथ गुप्त सन्धि—सींधिया के साथ विश्वासघात—समस्त
भारतीय नरेशों को मिलाने की नाना की कोशिशें—दिल्ली सम्राट के नाम
नाना का पत्र—तीसरी बार अंगरेज़ों की हार—राना गोहद, मूदा जी
भोंसले और निज़ाम का अंगरेज़ों का साथ देना—हैदरअली के अंगरेज़ों पर
हमले—अंगरेज़ों की ओर से हैदर से सन्धि की कोशिशें—सालबाई में
मराठों से सन्धि—पहले मराठा युद्ध का अन्त । पृष्ठ २६४-३०७
नवाँ अध्याय
हैदरअली
हैदरअली का जन्म—मैसूर की सेना में उसका भरती होना—हैदर
का दैव नियुक्त होना—सम्राट की ओर से सीरा का सूबेदार—शासन प्रबन्ध
और सुधार—अंगरेज़ों के साथ हैदर की पहली लड़ाई—हैदर की विजय—
उदारता—अंगरेज़ों के व्यवहार के साथ तुलना—टीपू का मद्रास पर
( १० )
हमला—हैदर के साथ निज़ाम का विश्वासघात—हैदर की माँ—वनियम
बाड़ी और आम्बूर में हैदर की विजय—अंग्रेज़ों की हार पर हार—
मंगलोर में टीपू की विजय—हैदरअली मद्रास के फाटक पर—हैदर और
बादशाह तीसरे जार्ज में सन्धि—हैदर और नवाब अरकाट में सन्धि—
मद्रास क़िले के फाटक पर हैदर की विजय के उपलक्ष में एक सन्धि—
अंग्रेज़ों का सन्धि तोड़ना—हैदर और नाना में सन्धि—हैदर का कर्नाटक
विजय करना—पूरिमपाक की लड़ाई—अरकाट की विजय—हैदर की
उदारता—हैदर की लगातार जीत—अंग्रेज़ों का भय—हैदरअली की अचानक
मृत्यु—युद्ध का अन्त—हैदर का चरित्र—उसका पद—उसकी जलसेना—
उसकी धार्मिक उदारता—हैदरअली और शङ्कराचार्य—हैदरअली का न्याय
—उसकी वीरता—सादगी—प्रजापालकता—खुशहाली। पृष्ठ ३०८-३६३
दसवाँ अध्याय
सर जॉन मैकफ़रसन
करनाटक के नवाब मोहम्मदअली और अंगरेज़ों में सम्बन्ध—मोहम्मद अली
के साथ कम्पनी की ज़्यादती—मैक्फ़रसन के कृत्य और चरित्र। पृष्ठ ३६४-३६८
ग्यारहवाँ अध्याय
लॉर्ड कॉर्नवालिस
गवरनर जनरल के नए अधिकार—टीपू सुलतान से अंगरेज़ों को भय—
टीपू के साथ युद्ध की तय्यारी—उस पर हमला—अंगरेज़ों की लगातार हार—
( ११ )
निज़ाम और मराठों का अंगरेज़ों को मदद देना—टीपू की सेना में विश्वास
घातक—श्रीरङ्गपट्टन पर अंगरेज़ों की चढ़ाई—मीडोज़ की हार—श्रीरङ्गपट्टन
की सन्धि—टीपू की प्रतिज्ञा—कार्नवालिस और दिल्ली सम्राट—कार्नवालिस
और नवाब अवध—कार्नवालिस और निज़ाम—भारत की ग्राम पंचायतें—
उनका नाश—नई अंगरेज़ी अदालतें—वकालत की नई प्रथा—इस्तमरारी
बन्दोबस्त—उस समय की देश की शोचनीय अवस्था । पृष्ठ ३६६-३९७
बारवाँ अध्याय
सर जॉन शोर
माधोजी सींधिया के नाश की तदबीरें—मराठा मण्डल की अव्यवस्था—
माधोजी सींधिया की हत्या—माधोजी की हत्या से अंगरेज़ों को लाभ—
पेशवा माधोराव नारायण की मृत्यु—अन्तिम पेशवा बाजीराव—सर जॉन
शोर और निज़ाम—सर जॉन शोर और नवाब करनाटक—रुहेलखण्ड—
सर जॉन शोर और अवध—अवध की मसनद का नीलाम—भारत के ख़र्च
पर अन्य देशों की विजय । पृष्ठ ३९८-४२४
तेरवाँ अध्याय
अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा
मार्किस वेल्सली—यूरोप में आज़ादी की लहर—मैज़िनी के विचार—
अंगरेज़ों और फ़्रान्सीसियों के चरित्र में अन्तर—आयरलैण्ड की स्वाधीनता।
( १२ )
का अपहरण—भारत में मार्किस वेल्सली का उद्देश—सब्सिडीयरी
एलायन्स—ईसाई धर्म प्रचार । पृष्ठ ४२५-४३५
चौदवाँ अध्याय
वेल्सली और निज़ाम
इङ्गलिस्तान के मन्त्री के नाम वेल्सली का पत्र—निज़ाम को
सब्सिडीयरी एलायन्स के जाल में फाँसने की तजवीज़—हैदराबाद के दरबार
में दो अंगरेज़ दूत—अज़ीमुल उमरा के साथ गुप्त साज़िश—वेल्सली की
तजवीज़—अज़ीमुलउमरा की घबराहट—कम्पनी और निज़ाम में सब्सी-
डीयरी सन्धि—वेल्सली और उसके साथियों को कम्पनी की ओर से इनाम—
हैदराबाद और पूना में अन्तर । पृष्ठ ४३६-४४८
चित्र सूची
पहली जिल्द
पुस्तक प्रवेश
नाम पृष्ठ
१. कबीर साहब ( चार रंगों में ) मुख चित्र
२. तुलसीदास ( तिरंगा ) ... १०१
३. गुरु नानक ( चार रंगों में ) ... ... ... ११५
४. सन्त तुकाराम ( तिरंगा ) .. ... ... १३४
५. दरबार नौ रतन अकबरी ( चार रंगों में ) ... ... १७४
६. दारा शिकोह ( चार रंगों में ) ... ... ... १८८
मूल पुस्तक
७. सम्राट जहांगीर से सर टामस रो की
भेंट ( चार रंगों में ) ... ... १
८. काली कट-नरेश सामुरी से वास्को
दे गामा की भेंट ... ... ... ५
९. अली वर्दी खाँ ... ... ... ... ३८
१०. सिराजुद्दौला ... ... ... ... ४८
११. मीर जाफ़र और मीरन ... ... ... १२६
( २ )
१२. मीर क़ासिम ( चार रंगों में ) ... ... १८४
१३. नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला ( चार रंगों में ) ... २०४
१४. सम्राट् शाहआलम क्लाइव को बङ्गाल, बिहार
और उड़ीसा की दीवानी प्रदान कर रहा है ... २२१
१५. नजमुद्दौला ... ... ... ... २२३
१६. काशी नरेश चेतसिंह ... ... ... २४६
१७. छत्रपति शिवाजी ( दोरुखा ) ... ... ... २६४
१८. पेशवा नारायन राव ( तिरछा ) ... ... २७४
१९. पेशवा नारायन राव की हत्या ... ... २७६
२०. महारानी अहल्या बाई होलकर ( तिरछा ) ... २९४
२१. हैदर अली ( तिरछा ) ... ... ३३४
२२. पूरिम पाक संग्राम के लिये टीपू की सैन्य
यात्रा ( तिरछा ) ... ... ... ३४२
२३. लार्ड कार्नवालिस टीपू सुलतान के दो बेटों
को बतौर बन्धक ले रहा है ... ... ३८२
२४. पेशवा माधोराव नारायन ( दोरुखा ) ... ... ४१०
२५. ⎧ करनल बेली के मुक़ाबले के लिये ⎫
२६. ⎩ टीपू की सैन्य यात्रा ⎪ जिल्द के लिफ़ाफ़े में
२७. ⎧ पूरिम पाक का संग्राम, अंगरेज़ी ⎬
२८. ⎩ तोप खाने में आग ⎭
———
पुस्तक प्रवेश
अंग्रेज़ी राज से पहले
लेखक की कठिनाइयां
इतिहास कला
इस समय की इतिहास कला बहुत दर्जे तक आजकल की यूरोपीय
सभ्यता की पैदा की हुई है । प्राचीन चीन, भारत, ईरान, मिस्र इत्यादि में भी
यह कला थोड़ी बहुत मौजूद थी । इनमें से हर देश में उस देश की पुरानी
सभ्यता का थोड़ा बहुत लिखा हुआ इतिहास मिलता है । प्राचीन यूनान और
रोम में इस कला ने और उन्नति की । अनेक यूनानी और रोमन विद्वानों
के उस समय के लिखे हुए इतिहास आज तक प्रमाण माने जाते हैं ।
इसके बाद अरबों का समय आया और, जहाँ तक इस कला को वैज्ञानिक
ढंग से उन्नति देने और इतिहास की सच्चाई को क़ायम रखने का प्रश्न है,
२ पुस्तक प्रवेश
शायद किसी भी प्राचीन क़ौम ने इस विषय में इतना अधिक परिश्रम नहीं
किया जितना अरबों ने। ईसा की ११ वीं सदी में प्रसिद्ध मुसलमान इतिहास
लेखक अलबेरूनी ने इतिहास कला पर बड़ी सुन्दर वैज्ञानिक विवेचना की है
और इतिहास के विद्यार्थियों को सावधान किया है कि हर इतिहास लेखक
की स्वाभाविक प्रवृत्तियों से कितनी तरह की भ्रान्तियाँ पैदा हो सकती हैं
जिनसे बच सकना उसके लिए अत्यन्त कठिन है। और भी अनेक प्रामाणिक
इतिहास लेखकों और इतिहास कला विशारदों के नाम उस समय के अरबों.
में मिलते हैं। किन्तु फिर भी हमें यह स्वीकार करना होगा कि विस्तृत
इतिहास लिखने का जो रिवाज आजकल के समय में प्रचलित है वह
प्राचीन देशों में कहीं न था। प्राचीन संसार में, और ख़ास कर प्राचीन
भारत में, आजकल के अर्थों में अपने अपने देशों या जातियों के इतिहास
लिखने का काम न इतना ज़रूरी समझा जाता था और न उसे इतना
महत्व दिया जाता था। यही वजह है कि प्राचीन भारत का कोई सिलसिले-
वार इतिहास नहीं मिलता, और अधिकांश पुरानी सभ्यताओं के इतिहास
का पता लगाने के लिए हमें पौराणिक कथाओं, तरह तरह के साहित्य,
परम्परागत गाथाओं और उस समय के शिला लेखों, खुदे हुए अवशेषों,
सिक्कों इत्यादि की ही मदद लेनी पड़ती है।
वास्तव में इतिहास लिखने की कला को जो इतना ज़्यादा महत्व आजकल
दिया जाता है उसकी ख़ास वजह आजकल की मुख़्तलिफ़ क़ौमों की मानसिक
स्थिति है, और शायद मानव जाति की वास्तविक उन्नति की दृष्टि से यह कला
इतने अधिक महत्व की नहीं है जितनी समझी जाती है। आजकल किसी
समय के इतिहास का अधिकतर सम्बन्ध उस समय की राजनैतिक अवस्था
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लेखक की कठिनाइयां ३
[Body]
से होता है। शायद कोई भी मनुष्य अपने समय की राजनैतिक अवस्था की
ओर से पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो सकता। जाने या अनजाने हर लेखक
के विचार किसी न किसी ओर अधिक झुकते ही हैं। कोई दो लेखक ऐसे
भी नहीं मिल सकते जो अपने समय की किसी एक घटना को या किसी
ख़ास तरह की घटनाओं को एकसा महत्व देते हों। व्यक्तिगत पक्षपात या
व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के अलावा हर मनुष्य के चित्त में सामाजिक, जातीय
या साम्प्रदायिक प्रवृत्तियाँ भी अपनी जगह रखती ही हैं, और उस मनुष्य
की लेखनी पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं। इसलिए आम
तौर पर पूरी तरह निष्पक्ष इतिहास का मिल सकना यदि बिल्कुल असम्भव
नहीं तो क़रीब क़रीब असम्भव ज़रूर है। इस तरह के पक्षपात से रँगे हुए
इतिहास पाठकों में भी उसी तरह के पक्षपात को बनाए रखने का एक
अनन्त ज़रिया होते हैं। इस सब के अलावा मनुष्य की परिमित मानसिक
शक्तियों पर अनन्त तिथियों और व्यक्तियों के हालात या चरित्रों का भार
डालने की भी ख़ास ज़रूरत नहीं है। अपने या दूसरों के दोषों को याद
रखने की निस्बत मनुष्य जाति के संचित पुण्य विचारों पर दृष्टि रखना ही
मनुष्य के लिए अधिक श्रेयस्कर है। ख़ास कर राजनीति में जहाँ कि मानव
प्रेम और आत्मोत्सर्ग की जगह द्वेष और स्वार्थ ही हमारे कृत्यों को अधिक
प्रभावित करते हों। यही वजह है कि पुराने ज़माने के विद्वान अपनी अपनी
क़ौमों के विस्तृत और पूरे पूरे इतिहास लिखने के बजाय कल्पित या अर्ध-
ऐतिहासिक कथाओं के ज़रिये अपने समय के उच्च से उच्च नैतिक, सामाजिक
और धार्मिक आदर्शों को चित्रित कर देना ज़्यादा अच्छा समझते थे।
यही वजह है कि अनेक उच्च से उच्च कोटि के प्राचीन ग्रन्थों में लेखक का
४ पुस्तक प्रवेश
नाम तक नहीं मिलता। यही वजह है कि भारत के प्राचीन साहित्य से
तिथियों का ठीक ठीक पता नहीं चलता। इसी बात में मामूली इतिहास के
ऊपर रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थों की श्रेष्ठता और कहीं बढ़ कर
उपयोगिता है।
इतिहास लेखक की कठिनाइयाँ
जो कठिनाइयाँ मनुष्य को अपने समय का इतिहास लिखने में होती
हैं उससे ज़्यादा कठिनाइयाँ पुराने समय के इतिहास के लिखने में होती
हैं। पिछले समय का इतिहास लिखने वाले को भी इन्हीं पक्षपात से रँगे हुए
उल्लेखों के आधार पर अपनी रचना करनी पड़ती है। काल और वस्तुस्थिति
की दूरी के कारण उसे और भी अधिक अँधेरे में टटोलना पड़ता है। भारत
का और ख़ास कर अंगरेज़ी काल के भारत का इतिहास लिखने वाले के
लिए ये कठिनाइयाँ कई गुनी अधिक बढ़ जाती हैं। ब्रिटिश भारत का
इतिहास लिखने वाले को अधिकतर अंगरेज़ों के लिखे ग्रन्थों का सहारा
लेना पड़ता है। भारतवासियों के हाथ का लिखा कोई सिलसिलेवार
इतिहास इस समय का नहीं मिलता। जो अधूरे वृत्तान्त किसी किसी
भारतवासी के हाथ के लिखे मिलते हैं, उनमें से भी अनेक के लेखक
अंगरेज़ों के धनक्रीत थे, यह बात उन्हीं के लेखों से साबित है।
संसार के इतिहास में जब जब और जहाँ जहाँ एक क़ौम दूसरी क़ौम
के शासन में आई है, वहाँ वहाँ क़ुदरती तौर पर शासक क़ौम के लेखकों की
ग़रज़ अपनी रचनाओं द्वारा यही रही है कि अपनी क़ौम के लोगों में देश-
भक्ति, आत्मविस्वास, स्वाभिमान और साहस को जाग्रत किया जावे और
शासित क़ौम वालों में इन्हीं गुणों को कम किया जावे या पैदा न होने
लेखक की कठिनाइयां ५
दिख जावे। अंगरेज़ों के लिखे हुए भारतीय इतिहास क़रीब क़रीब शुरू से
आख़ीर तक इसी दोष से रंगे होते हैं। वास्तव में शायद संसार के किसी
भी देश का इतिहास इस क़ुदरती दोष द्वारा इतना अधिक विकृत नहीं किया
गया जितना हिन्दोस्तान का। हिन्दोस्तान और इङ्गलिस्तान का सम्बन्ध ही
इस तरह का है कि इस सम्बन्ध के एक बार शुरू हो जाने के बाद निष्पक्ष
भारतीय इतिहास का लिखा जाना क़रीब क़रीब नामुमकिन हो गया। एक
ओर अंगरेज़ लेखकों की साम्राज्य प्रिय दृष्टि और दूसरी ओर अंगरेज़ी काल
के ज़्याद़ातर भारतीय लेखकों की विदेशी शिक्षा, मानसिक दासता और
आजीविका की विकट परिस्थिति। नतीजा यह है कि भारतीय इतिहास की
जो पुस्तकें आजकल हमें मिलती हैं, उनमें से अधिकांश में निरर्थक तुच्छ
बातों पर ज़ोर दिया जाता है और इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं की
अवहेलना की जाती है, उन्हें दबाया जाता है, ऐतिहासिक घटनाओं के
सिलसिले के सिलसिले ग़लत बयान किए जाते हैं और अनेक व्यक्तियों के
चरित्र को सफ़ेद की जगह काला और काले की जगह सफ़ेद रंग कर हमारे
सामने पेश किया जाता है, अनेक सच्ची घटनाओं का इतिहास में पता तक नहीं
चलता और अनेक कल्पित घटनाएँ सच्ची कह कर बयान की जाती हैं। इसी
लिए इक्का दुक्का बिरले अपवादों को छोड़कर हिन्दोस्तानियों और ख़ास कर सर-
कारी विश्वविद्यालयों के हिन्दोस्तानी प्रोफ़ेसरों के लिखे इतिहास इस विषय
में और भी अधिक दूषित और लज्जास्पद दिखाई देते हैं। यह सब हिन्दोस्तान
की इस समय की ख़िलाफ़ क़ुदरत परिस्थिति का क़ुदरती नतीजा है।
इन सब विचारों के समर्थन में हम केवल थोड़े से यूरोपीय विद्वानों की
सम्मति नक़ल करते हैं।
पुस्तक प्रवेश
प्रसिद्ध फ्रान्सीसी विद्वान हरवे लिखता है—
“सब तरह के साहित्य में अभी तक इतिहास ही मनुष्य
को सब से अधिक दुराचार की ओर ले जाने वाला और उसके
चरित्र को सब से अधिक भ्रष्ट करने वाला साहित्य रहा है। जब
कभी क़ौमों के नाम पर धन लोलुपता और रक्त पिपासा को शान्त
किया जाता है, इतिहास इस तरह की लोलुपता और सार्वजनिक
हत्या को सराहनीय ठहराता है। इतिहास के पृष्ठों में छल और
कपट को चतुर राजनैतिकता का सबूत माना जाता है। जो चीज़
मामूली मनुष्यों में पाप समझी जाती है वह राज दरबारों में और
सिंहासनों पर प्रशंसनीय मानी जाती है।”*
प्रसिद्ध इतिहास लेखक लैकी लिखता है—
“राजनीतिज्ञों की ग़रज़ सदा अपना काम निकालना रहती
है । X X X सत्य से निस्वार्थ प्रेम और ज़ोरों की राजनैतिक
भावना ये दोनों साथ साथ नहीं चल सकतीं। उन तमाम देशों
में, जहाँ कि लोगों के विचार और उनके सोचने के तरीक़े
अधिकतर राजनैतिक जीवन के आधार पर बने हों, हमें यह
दिखाई देता है कि लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि को ही सत्य की
कसौटी बना बैठते हैं।”†
- "History, so far, has been the most immoral and perverting branch
of literature. It exalts greed and wholesale murder when greedy and murder-
ous lusts are satisfied in the names of nations. Fraud is taken as evidence of
clever diplomacy. What is counted immoral down low is held admirable
in Courts and on Thrones.”—M. Herve.
† “The object of the politician is expediency . . . a disinterested
लेखक की कठिनाइयां ७
प्रसिद्ध अंगरेज़ तत्ववेत्ता हरबर्ट स्पेन्सर ने लिखा है कि फ्रान्स का
एक बादशाह जब इतिहास की कोई पुस्तक पढ़ना चाहता था तो अपने
'लाइब्रेरियन से कहता था,—"मेरे झूठ बोलने वाले को ले आओ।" स्पेन्सर
लिखता है कि फ्रान्सीसी बादशाह का यह कहना बेजा न था। इसके बाद
आजकल के इतिहासों का ज़िक्र करते हुए स्पेन्सर लिखता है—
"राजाओं के शासन कालों, लड़ाइयों और इस तरह की
मामूली घटनाओं के अलावा जो आजकल की तमाम क़ौमों के
इतिहास में मिलती हैं, हमें सिवाय उन सन्धियों के जो तोड़ने
ही की ग़रज़ से की जाती हैं, उन सरकारी पत्रों के जो बेईमान
और झूठे अफ़सरों के हाथ के लिखे होते हैं, उन गप्पों से भरे
हुए ख़तों के जो दरबारियों द्वारा भेजे जाते हैं, और इसी तरह की
और चीज़ों के, कोई ऐसी बात नहीं मिलती जिस पर हम विश्वास
कर सकें। इस तरह की सामग्री से कोई भी सत्य का खोजी सत्य
का पता कैसे लगा सकता है ? × × × "*
सरकारी काग़ज़ों में झूठ
भारत में अंगरेज़ी राज का इतिहास ज़्यादातर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की
love of truth can hardly co-exist with a strong political spirit. In all count-
ries where the habits of thought have been mainly formed by political life,
we may discover a disposition to make expediency the test of truth."—Lecky
in his Rationalism in Europe.
- "Beyond accounts of kings' reigns, of battles, and of incidents
named in the chronicles of all the nations concerned, we have nothing to
depend on but treaties made to be broken, despatches of corrupt and lying
officials, gossiping letters of courtiers and so forth. How from these ma-
terials shall we distil the truth? . . ."-Herbert Spencer's Facts and
Comments.
८ पुस्तक प्रवेश
रिपोर्टों और काग़ज़ों से ही संग्रह करना पड़ता है, किन्तु कम्पनी के तमाम
प्रकाशित पत्रों के विषय में अंगरेज़ इतिहास लेखक जेम्स मिल, जो
इङ्गलिस्तान में कम्पनी के 'पत्र-व्यवहार विभाग' का प्रमुख रह चुका था
और जिसका ब्रिटिश भारत का इतिहास सब से अधिक प्रमाण माना
जाता है, लिखता है—
“कम्पनी के डाइरेक्टरों ने इस तरह की बातों और ख़बरों
को दबा देने में, जिन्हें वे प्रकाशित करना न चाहते थे, शुरू से
आख़ीर तक बड़ी चतुरता दिखाई है।”*
कप्तान कनिङ्गम की मशहूर किताब “सिखों के इतिहास” की सन्
१८४३ की एडीसन के विज्ञापन में पीटर कनिङ्गम लिखता है—
“हाल के ज़माने की हिन्दोस्तान की तारीख़ के लिए जो
छपी हुई सामग्री मिलती है वह इस तरह की नहीं है जिस पर
कोई इतिहास लेखक विश्वास कर सके। पार्लिमेण्ट के दोनों
हिस्सों, हाउस ऑफ़ कॉमन्स और हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स से जो
सरकारी काग़ज़ात जनता के सामने पेश किए जाते हैं, उनमें भी
उस समय की राजनैतिक दलबन्दी के हितों की दृष्टि से तब्दीलियाँ
कर दी गई हैं, या इस ग़लत ख़याल से कि सच्ची बात के खुल
जाने से लोगों के भावों को आघात न पहुँचे, काट छाँट कर दी
गई है।”†
- "Under the skill which the Court of Directors have all along
displayed in suppressing such information as they wished not to appear."—
James Mill.
† "The printed materials for the recent History of India are not of
लेखक की कठिनाइयां ६
इतिहास लेखक सर जॉन के, जो इङ्गलिस्तान के इण्डिया ऑफ़िस
के 'राजनैतिक और गुप्त विभाग' का सेक्रेटरी रह चुका था, अफ़ग़ान युद्ध
का ज़िक्र करते हुए एक जगह लिखता है—
“पार्लिमेण्ट के सरकारी काग़ज़ों के संग्रह में अलेक्ज़ेण्डर
बर्न्स के चरित्र और उसकी ज़िन्दगी दोनों को ग़लत बयान किया
गया है। लोग समझते हैं कि ये पार्लिमेण्ट के काग़ज़ इतिहास
के लिए सबसे अच्छी सामग्री हैं। किन्तु सच यह है कि आम तौर
पर ये सरकारी काग़ज़ केवल काट छाँट की हुई दस्तावेज़ों और
जाली काग़ज़ों का एक ऐसा यकतरफ़ा संग्रह होते हैं जिसे राज
मन्त्रियों की मोहर सच्चा कह कर चलता कर देती है, जिससे
मौजूदा नस्ल के लोग धोखे में आ जाते हैं, और आइन्दा नस्लों
को ख़तरनाक झूठों का एक सिलसिला वसीयत में मिलता है।”*
पार्लिमेण्ट के काग़ज़ों की इस ख़ास जालसाज़ी का अधिक हाल पाठकों
को इस पुस्तक के अन्दर अफ़ग़ान युद्ध के बयान में पढ़ने को मिलेगा।
that character on which historians can rely. State Papers, presented to the
people by both Houses of Parliament, have been altered to suit the tempo-
rary views of political warfare, or abridged out of mistaken regard to the
tender feelings of survivors.”—P. Cunningham in the advertisement to the
2nd edition of History of the Sikhs, by Captain J. D. Cunningham. 1853.
- “The character and career of Alexander Burnes have both been
mis-represented in those collections of State Papers which are supposed to
furnish the best materials of history but which are often only one-sided
compilations of garbled documents, counterfeits, which the ministerial
stamp forces into currency, defrauding a present generation, and handing
down to prosterity a chain of dangerous lies.”—History of the Afghan War,
by Kaye, vol. ii, p. 13.
१० पुस्तक प्रवेश
जब कि स्वयं ब्रिटिश पार्लिमेण्ट के काग़ज़ों की यह हालत है तो अंगरेज़ों
के लिखे हुए मामूली ऐतिहासिक उल्लेखों पर कहाँ तक विश्वास किया
जा सकता है ।
इतिहास लेखक फ़्रीमैन स्वीकार करता है कि सरकारी एलानों, पत्रों
और राजनैतिक दस्तावेज़ों का सारा क्षेत्र “झूठ का मनोवाञ्छित क्षेत्र है ।”
वह लिखता है—
“फिर भी ये झूठ शिक्षाप्रद झूठ हैं,—ये उन लोगों के कहे
हुए झूठ हैं, जो सच्चाई से वाक़िफ़ थे । कई तरह के उपायों से
झूठ के अन्दर से भी सच्चाई का पता लगाया जा सकता है,
किन्तु किसी झूठ पर विश्वास कर लेना उससे सच्चाई का पता
लगाने का तरीक़ा नहीं है । वास्तव में वह मनुष्य बालक की तरह
भोला है, जो हर शाही एलान पर या पार्लिमेण्ट के हर एक्ट
की भूमिका पर विश्वास करले, और उनसे यह अन्दाज़ा लगावे
कि अमुक अमुक बड़े लोगों ने क्या क्या किया और उसके करने
में उनकी क्या ग़रज़ थी ।”*
इतिहास से झूठ की कुछ मिसालें
इस पुस्तक के लेखक को आज १९२८ ई० से चार साल पहले तक
- “. . . Here we are in the very chosen region of lies . . . yet
they are instructive lies ; they are lies told by people who know the truth;
truth may even, by various processes, be got out of the lies ; but it will not
be got out of them by the process of believing them. He is of childlike
simplicity indeed who believes every royal proclamation or the preamble
of every Act of Parliament, as telling us, not only what certain august
persons did, but the motives which led them to do it.”—Freeman.
लेखक की कठिनाइयां ११
इस बात का अनुमान न हो सकता था कि अंगरेज़ विद्वानों के लिखे हुए
भारत के अधिकांश इतिहासों में झूठ की मात्रा कितनी अधिक और कितनी
भयङ्कर है।
सिन्ध के अंगरेज़ विजेता सर चार्ल्स नेपियर के भाई मेजर जनरल
विलियम नेपियर की पुस्तक "दी कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ सिन्ध" की शुमार सिन्ध के
ऊपर सबसे अधिक प्रामाणिक अंगरेज़ी पुस्तकों में की जाती है। अंगरेज़ों की
सिन्ध विजय को मनुष्य जाति के ऊपर एक बहुत बड़ा उपकार साबित करने
के लिये विलियम नेपियर ने सिन्ध निवासियों और उनके मुसलमान
शासकों के चरित्र पर जो अनेक कलङ्क लगाए हैं उनमें से एक कलङ्क शिशु
हत्या भी है। नेपियर लिखता है—
“और ये राक्षस खुद अपने बच्चों की किस तरह हत्या करते
थे ? पहले तो वे भ्रूणहत्या के लिए दवाइयां पिलाते थे; यदि
इससे काम न चलता था तो कभी कभी वे बच्चों के पैदा होते ही
अपने हाथों से काट कर उनके टुकड़े टुकड़े कर डालते थे; किन्तु
अधिकतर वे यह करते थे कि इन बच्चों को गद्दों के नीचे डाल कर
उन पर खुद बैठ जाते थे, और जब कि उनके बच्चों का उनके नीचे
घुट कर दम निकलता था, वे उनके ऊपर बैठे हुए तम्बाकू पीते
रहते थे, शराब पीते रहते थे और अपने इस नारकीय कृत्य पर
एक दूसरे से मज़ाक़ करते रहते थे।" ✽
✽ "And how did these monsters destroy their own children? First they
gave potions, called Odalisques, to procure abortion; if these failed, they
sometimes chopped the children to pieces with their own hands immediately
१२ पुस्तक प्रवेश
कप्तान ईस्टविक, जिसे ठीक उन्हीं दिनों कई साल सिन्ध में रहने और
सिन्ध के देशी शासकों और वहाँ की प्रजा दोनों से मिलने जुलने का अव-
सर मिला और जो सिन्ध की भाषाओं और वहाँ के रस्मोरिवाज से अच्छी
तरह परिचित था, इस लज्जाजनक झूठ की आलोचना करते हुए एक दूसरे
यूरोपियन विद्वान ग्रैटन का नीचे लिखा वाक्य नक़ल करता है—
“इतिहास में अनेक बातें ऐसी लिखी मिलती हैं, जिनको
सच साबित करने या जिनका खण्डन करने का कोई ख़ास मूल्य
नहीं है । सदाचार की इस तरह की ऊँची (किन्तु असत्य) मिसालें
इतिहास में मिलती हैं, जिन्हें यदि एक बार लोगों ने सच्चा मान
लिया है तो उनसे दुनियां का भला ही हुआ है । किन्तु जब
किसी व्यक्ति या जाति के चरित्र पर कलङ्क लगाए जाते हैं और
जब हम यह देखते हैं कि कितनी आसानी से उन झूठे कलङ्कों का
प्रचार किया जाता है, कितने शौक़ के साथ लोग उन्हें पढ़ते और
सुनते हैं, और जिन बातों को गढ़ लेने या फैलाने में कुछ भी
ख़र्च नहीं होता, किन्तु जिनका पूरी तरह खण्डन करने में ज़िन्दगी
भर मेहनत और इस तरह की परिस्थिति की ज़रूरत होती है,
जिसका मिलना क़रीब क़रीब नामुमकिन हो जाता है, उन बातों
पर लोग सहज ही में और बेपरवाही के साथ विश्वास कर लेते हैं,
after birth; but more frequently placed them under cushions and sat down,
smoking and drinking and jesting with each other about their hellish work,
while their children were being suffocated beneath them."—The Conquest of
Sindh, part ii, p. 348.