भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
१५० पुस्तक प्रवेश
औरंगज़ेब का एलान
सन् १६७३ में सम्राट् औरंगज़ेब ने अपने साम्राज्य भर में एक एलान
प्रकाशित किया, जिसमें ५४ चीज़ों की एक सूची दी गई थी और लिखा
था कि इनमें से किसी के ऊपर प्रजा से किसी तरह का महसूल आदि न
लिया जाय । इसी एलान में सम्राट् ने राज कर्मचारियों और ज़मींदारों को
आज्ञा दी कि किसी किसान से किसी तरह की भी 'भेंट या बेगार' न ली
जाय । इन ५४ चीज़ों में मछली, तेल, घी, दूध, दही, उपले, तरकारियाँ,
घास, ईंधन, मिट्टी के बरतन, ऊँट, गाड़ियाँ, चरागाह, सड़कों की रहदारी
का महसूल, नदियों के घाटों का महसूल, रुई, गन्ना, रस, कपड़े की छपाई,
इत्यादि भी शामिल थीं। इसी एलान में लिखा था कि गंगा या अन्य
तीर्थों में नहाने वालों से या अपने मुर्दों की अस्थियाँ गंगा में ले जाने वाले
हिन्दुओं से किसी तरह का महसूल न लिया जाय ।
इस तरह की आज्ञाएँ सम्राट अकबर के समय से लेकर बराबर निकलती
रहती थीं । हर नए सम्राट को अपने तख़्त पर बैठने के समय या कभी कभी
अपने शासन काल में एक से अधिक बार उन्हें इसलिए दोहराते रहना या
कभी कभी बदलना पड़ता था ताकि कोई सामन्त या कर्मचारी इस विषय
में असावधान न हो जाय । जदुनाथ सरकार लिखता है—
“उस समय के इतिहासों और पत्रों से ज़ाहिर है कि मुग़ल
साम्राज्य के अधिराज की नीति सदा यही होती थी कि रय्यत पर
किसी तरह का अत्याचार न होने पाए । यह बात साबित की
जा सकती है कि यह नीति केवल एक शुभ कामना ही न थी,
बल्कि यही उस समय की सच्ची हालत थी । शाहजहाँ और
मुग़लों का समय १५१
औरंगज़ेब के समय की अनेक ऐसी घटनाएँ उस समय के इतिहास
में मिलती हैं, जिनमें कि ज्योंही माल के मोहकमे के किसी
कर्मचारी, या किसी प्रान्त के सूबेदार की सख़्ती या ज़बरदस्ती की
कोई शिकायत प्रजा की ओर से सम्राट के कानों तक पहुँची,
तुरन्त उस राजकर्मचारी को या उस सूबेदार तक को बरख़ास्त
कर दिया गया।”*
ऊपर के लेखक ने एक फ़ारसी दस्तावेज़ से मिसाल के तौर पर एक
घटना नक़ल की है, जिससे "साफ़ पता चलता है कि शाहजहाँ किसानों के
साथ इन्साफ़ करने, बल्कि उदारता का व्यवहार करने के लिए कितना
उत्सुक था।"
शाहजहाँ और किसान
एक दिन शाहजहाँ साम्राज्य के माल के काग़ज़ात का मुआयना कर
रहा था। उसने देखा कि किसी गाँव की उस साल की मालगुज़ारी पिछले
वर्षों की मालगुज़ारी से कई हज़ार अधिक दर्ज है। तुरन्त माल के मोहकमे
के प्रधान अफ़सर दीवाने आला सादुल्ला ख़ाँ को तलब किया गया। सम्राट
ने दीवान से मालगुज़ारी के बढ़ने की वजह पूछी। तहक़ीक़ात कराने पर
मालूम हुआ कि उस साल गाँव के पास की नदी कुछ पीछे को हट गई
- "The policy of the supreme head of the Mughal Government not to
commit any exaction on the ryot is manifest from the contemporary histories
and letters, and can be proved to have been a reality and not merely a pious
wish. Several instances are recorded in the reigns of Shah Jahan and
Aurangzeb in which harsh and exacting revenue collectors and even pro-
vincial viceroys were dismissed on the complaints of their subjects reaching
the Emperor's ears. "-Ibid, p. 108
१२२ पुस्तक प्रवेश
थी जिससे गाँव की ज़मीन बढ़ गई थी । इसीलिए लगान बढ़ाया गया
था । सम्राट ने फिर दरियाफ़्त किया कि जो ज़मीन बढ़ी है, वह मामूली
ज़मीन के पास की है या माफ़ी की ज़मीन के पास की । मालूम हुआ कि
पास की ज़मीन माफ़ी की ज़मीन है। यह बात सुनते ही शाहजहाँ गुस्से
में भर कर चिल्ला पड़ा—
"उस जगह के यतीमों, बेवाओं और ग़रीबों की आाहोज़ारी
पर वहाँ की ज़मीन का पानी सूख गया है । यह उनको ख़ुदा की
एक देन थी, तुमने उसे राज के लिए छीनने का साहस किया !
यदि ख़ुदा के बन्दों के लिए दया का भाव मुझे न रोकता तो मैं
उस दूसरे शैतान को यानी उस ज़ालिम फ़ौजदार को, जिसने इस
नई ज़मीन से लगान वसूल किया है, फाँसी का हुकुम देता ।
अब उसे केवल बरख़ास्त कर देना उसके लिए काफ़ी सज़ा होगी,
ताकि दूसरे लोग भी आगाह हो जायें, और इस तरह की
बेइन्साफ़ी के बदकार न करें । हुकुम जारी कर दो कि तुरन्त
जितना ज़्यादा लगान वसूल किया गया है वह सब जिन किसानों
से लिया गया है, उन्हें फ़ौरन वापस कर दिया जाय ।"*
सन् १६६२ में उड़ीसा प्रान्त के दीवान मोहम्मद हाशिम ने कुछ नए
'करोड़ी' (लगान वसूल करने वाले कर्मचारी) इसलिए नियुक्त किए क्योंकि
इन लोगों ने पुराने करोड़ियों की निस्बत अपने इलाक़ों से अधिक लगान
वसूल करके भेजने का वादा किया था । तुरन्त समाचार मिलते ही मोहम्मद
हाशिम को बरखास्त कर दिया गया ।
- India Office Library, Persian Manuscript, No. 370, interleaf facing folio 68.
मुग़लों का समय १५३
'अबवाब' की वसूली के ख़िलाफ़ आज्ञाएँ फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ (सन्
१३७२) के समय से सम्राट् अकबर (१५६०) के समय तक और उसके
बाद क़रीब क़रीब हर मुग़ल सम्राट् के समय में बराबर जारी होती रहती थीं।
मुग़ल सम्राट् अपनी विशाल प्रजा के सुख दुख से बेख़बर भी न रहते
थे। मुग़ल समय में 'वाक़े नवीसों', 'सवाने नवीसों', 'अख़बार नवीसों',
'ख़फ़िया नवीसों' इत्यादि का एक ज़बरदस्त मोहकमा था, जिसके ज़रिए
साम्राज्य के कोने कोने की ख़बरें दिल्ली सम्राट् के कानों तक पहुँचती
रहती थीं।
निस्सन्देह किसानों के सुख और उनकी समृद्धि का भारत के लिखे हुए
इतिहास में किसी समय भी इतना अच्छा और व्यवस्थित प्रबन्ध न था
जितना मुग़ल सम्राटों के समय में। यही वजह है कि उस समय के अनेक
यूरोपियन और अन्य यात्री भारतीय ग्रामों की खुशहाली की मुक्तकण्ठ से
प्रशंसा करते हैं और लिखते हैं कि संसार के अन्य किसी भी देश में उस
समय किसानों की हालत इतनी अच्छी न थी। *
कोतवाल के कर्त्तव्य
मुग़ल साम्राज्य के अन्दर हर शहर में अन्य कर्मचारियों के अलावा एक
कोतवाल होता था, जिसके कामों में से एक काम यह भी होता था—
“कोतवाल का यह काम है कि शराब का खिंचना बिलकुल
बन्द कर दे। वह इसके लिए ज़िम्मेदार होता है कि शहर में कोई
वेश्या न रहे × × ×”†
- e. g. Bengal in 1756-57, by S. C. Hill, vol. i.
† Manucci, vol ii, pp. 420, 421.
१५४ पुस्तक प्रवेश
यह बयान एक विद्वान् यूरोपियन यात्री का है, जिसने औरङ्गज़ेब के
समय में स्वयं मुग़ल साम्राज्य की हालत को देखा था। हर कोतवाल की
सनद में लिखा होता था कि तुम्हारी यह ज़िम्मेदारी है कि तुम्हारे शहर में
कोई चोरी न होने पाए, शहर के लोग सुरक्षित रहें, और अमन के साथ
अपने व्यापार आदिक कर सकें।
हर इलाके के लिए एक, 'मुहतसिब' होता था, जिसका ख़ास काम यह
होता था कि शहर की हर गली में जाकर शराब बनने और बिकने के स्थानों,
जुआख़ानों आदि को ज़बरदस्ती बन्द कर दे। शायद हिन्दू साधुओं की
प्रथा का ख़याल करते हुए सूखे मादक द्रव्यों जैसे गाँजा, भाँग इत्यादि की
इतनी कड़ी मनाही न थी। मुहतसिब की हिदायतों में लिखा होता था कि
“शहरों के अन्दर शराब इत्यादि मादक द्रव्यों के बिकने की इजाज़त न
दो और न 'तवायफ़ों' को शहरों के अन्दर रहने दो।”*
शराब बन्दी
इतिहास लेखक मोरलैण्ड लिखता है कि सम्राट अकबर ने साम्राज्य
भर के शहर कोतवालों को यह आज्ञा दे दी थी कि बिना किसी के घर में
ज़बरदस्ती घुसे, शराब का बनना जहाँ तक सम्भव हो बन्द करा दिया जाय,
इसके बाद सम्राट जहाँगीर ने शराब का बनाना क़ानूनन बन्द कर दिया,
किन्तु शाहजहाँ के समय में इस आज्ञा का बहुत अधिक कड़ाई के साथ
पालन कराया गया।† औरङ्गज़ेब के समय में भी यह कड़ाई जारी रही।
- Mughal Administration, by Jadunath Sarkar, p. 41.
† India at the Death of Akbar, by Moreland, p. 159.
मुग़लों का समय १२४
किन्तु बाद के निर्बल सम्राटों के समय में इस शाही आज्ञा पर ठीक ठीक
अमल न हो सका ।
न्याय शासन
अब हम मुग़ल समय के न्यायशासन को थोड़े से शब्दों में बयान
करते हैं । अत्यन्त प्राचीन काल से भारत के हर गांव में एक ग्राम पञ्चायत
होती थी जिसके पञ्चों का चुनना ग्रामवासियों के हाथों में होता था । इस
ग्राम पञ्चायत को अपने गाँव के सब म्युनिसिपल अधिकार प्राप्त होते थे,
और इनके अलावा गाँव वालों की जान माल की रक्षा और आस पास की
सड़कों पर यात्रियों और व्यापारियों की हिफ़ाज़त का काम भी इन्हीं के
सुपुर्द होता था । हर पञ्चायत के मातहत चौकीदार होते थे, जो पञ्चायत से
तनख़्वाह पाते थे और जिन पर राज को किसी तरह का अधिकार न
होता था । अपने यहाँ के दीवानी और फ़ौजदारी के मुक़द्दमों को तय करने
और अपराधियों को दण्ड देने का भी इस पञ्चायत को अधिकार होता था ।
यह पञ्चायत ही गाँव के बालकों और बालिकाओं की शिक्षा का प्रबन्ध
करती थी, जिसका अधिक ज़िक्र हमने इस पुस्तक में एक दूसरे स्थान पर
किया है । अधिकांश नगरों और ख़ास कर छोटे नगरों में भी इसी तरह की
पञ्चायतें थीं जिन्हें इसी तरह के विस्तृत अधिकार प्राप्त थे ।
मुग़ल सम्राटों ने इन हज़ारों भारतीय ग्राम पञ्चायतों के प्राचीन
अधिकारों में किसी तरह का भी दख़ल नहीं दिया, उन्होंने उन्हें ज्यों का
त्यों क़ायम रक्खा, जिसका मतलब यह है कि अंगरेज़ों के आने से पहले
सिवाय राज का लगान अदा कर देने के भारतीय ग्रामवासियों को स्वराज्य
के अन्य क़रीब क़रीब सब अधिकार प्राप्त थे ।
१४६ पुस्तक प्रवेश
इन पञ्चायतों को मामूली पुलिस के काम में मदद देने के लिए हर
ज़िले में एक फ़ौजदार होता था, जिसका काम केवल बड़ी बड़ी डकैतियों,
उपद्रवों आदि में पञ्चायतों की मदद करना होता था। न्यायशासन में
पञ्चायतों को सहायता देने और उनके काम को पूरा करने के लिए हर इलाक़े
में फ़ौजदारी के मुक़दमों को तय करने के लिए एक 'क़ाज़ी' और दीवानी के
मुक़दमों के लिए एक 'सद्र' होता था। साम्राज्य भर के क़ाज़ियों का अफ़-
सर एक 'क़ाज़िउलकुज़्ज़ात' होता था, जो राजधानी में रहता था। इसी
तरह तमाम सद्रों के ऊपर एक 'सद्रुस्सुदूर' होता था। हर नए क़ाज़ी की
नियुक्ति के समय राज की ओर से उसे नीचे लिखी हिदायत की जाती थी—
“सदा इन्साफ़ करना, ईमानदार रहना और किसी की रू
रियायत न करना। मुक़दमे या तो अदालत की जगह और या
सरकारी दफ़्तर में हमेशा दोनों फ़रीक़ की मौजूदगी में करना।
“जिस जगह तुम्हारी नियुक्ति हो वहाँ के किसी आदमी से
किसी तरह का उपहार स्वीकार न करना, और न किसी के जलसे
इत्यादि में जाना।
“अपने फ़ैसले, दस्तावेज़ इत्यादि बड़ी सावधानी से
लिखना ताकि कोई विद्वान उनमें नुक्स निकाल कर तुम्हें
शरमिन्दा न करे।
“ग़रीबी (फ़क्र) को ही अपने लिए गौरव (फ़ख्र) जानना।”*
केवल सुचरित्र और विद्वान लोगों को ही क़ाज़ी और सद्र की पदवियों
- Mughal Administration, by Jadunath Sarkar, p. 37.
मुग़लों का समय १५७
पर नियुक्त किया जाता था। इतिहास लेखक फ़्रेडरिक आगस्टस इस बात
की गवाही देता है कि भारतीय मुग़ल साम्राज्य के “अधिकांश मुलाज़िम
और कर्मचारी ईमानदार और योग्य होते थे ।”*
मुक़दमों का फ़ैसला करने में देश के प्राचीन रस्मोरिवाज और धर्म-
शास्त्रों का पूरा ख़्याल रखा जाता था। सम्राट अकबर ने अनेक योग्य
ब्राह्मणों को न्यायाधीश के अधिकार प्रदान किए और आज्ञा दे दी कि
न्यायालयों में मनुस्मृति और अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों की आज्ञाओं का
पालन किया जाय। हर सम्राट सप्ताह में कम से कम एक दिन (प्रायः मङ्गल
या बुध का दिन) ख़ास ख़ास मुक़दमों और अपीलों को सुनने में व्यय
करता था। प्रजा के हर छोटे से छोटे मनुष्य को अपनी शिकायत लेकर
सम्राट तक जाने का अधिकार होता था। सम्राट जहाँगीर ने, जो अपने
इन्साफ़ के लिए मशहूर था, आगरे में अपने क़िले की दीवार के ऊपर से
एक सोने की ज़ञ्जीर लटका रक्खी थी जो ज़मीन तक लटकती थी। किसी
भी छोटे से छोटे फ़रियादी को उस ज़ञ्जीर को खींचने और अपनी अर्ज़दाश्त
उसमें बाँध देने का अधिकार होता था और तुरन्त उसे सम्राट के सामने
लाकर पेश कर दिया जाता था।
धार्मिक उदारता
धार्मिक उदारता के विषय में अकेले औरङ्गज़ेब को छोड़ कर भारतीय
मुग़ल सम्राटों का समय वास्तव में आदर्श समय था। बाबर, हुमायूँ,
- "... the mass of the employees were both scrupulous and
capable." — The Emperor Akbar, A Contribution Towards the History of
India in the 16th Century, by Frederick Augustus, Count of Noer, translated
by Annette S. Beveridge, 1890, p. 293.
१५८ पुस्तक प्रवेश
र, जहाँगीर, शाहजहाँ और उनके अधिकांश उत्तराधिकारियों के समय
में हिन्दू और मुसलमानों के साथ राज की ओर से एक समान व्यवहार
किया जाता था, दोनों धर्मों को एक समान आदर की दृष्टि से देखा जाता
था और किसी के साथ किसी तरह का भी पक्षपात न किया जाता था।
अंगरेज़ एलची सर टॉमस रो ने सन् १६१६ ईसवी में सम्राट जहाँगीर के
शासन काल में उस समय की हालत को देखते हुए लिखा था—
"तैमूरलङ्ग की सन्तान अपने साथ मोहम्मद का मज़हब
भारत में लाई, किन्तु उन्होंने अपनी विजय के बल किसी को
ज़बरदस्ती उस मज़हब में शामिल नहीं किया, और धर्म के मामले
में सबको आज़ाद छोड़ दिया।"*
औरंगज़ेब और उसके उत्तराधिकारियों के समय की (१६८८-१७२३)
बंगाल की हालत को बयान करते हुए एक दूसरा अंगरेज़ कप्तान अलेक्ज़ेण्डर
हैमिल्टन लिखता है—
"यहाँ पर एक सौ से ऊपर मत मतान्तरों के लोग हैं,
किन्तु वे अपने उसूलों या उपासना विधियों के विषय में कभी
नहीं लड़ते झगड़ते। हर शख़्स को आज़ादी है कि अपने तरीक़े
के अनुसार ईश्वर की सेवा और पूजा करे। मज़हब के नाम पर
दूसरे को किसी तरह की यातनाएँ देने का यहाँ कोई नाम भी
नहीं जानता x x x
- "Tamerlain's offspring brought in the knowledge of Mohammad,
but imposed it on none by the law of conquest, leaving consciences at
liberty."—A General Collection of the Best and Most Interesting Voyages etc.,
edited by John Pinkerton, London 1811, vol viii. p. 46.
मुग़लों का समय १२६
"बङ्गाल के शासकों का मज़हब इसलाम है, किन्तु हर
मुसलमान पीछे वहाँ सौ से ऊपर हिन्दू हैं और तमाम सरकारी
नौकरियाँ और ओहदे बिना किसी भेद भाव के दोनों मज़हब के
लोगों को दिए जाते हैं।"*
डॉक्टर बेनीप्रसाद ने अपनी पुस्तक जहाँगीर के इतिहास में लिखा है
कि भारतीय मुग़ल सम्राटों के दरबारों में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों
के मुख्य मुख्य त्योहार एक समान उत्साह और वैभव के साथ मनाए जाते
थे। दशहरे के दिन सम्राट के हाथी और घोड़े सज धज कर जुलूस में निकाले
जाते थे। रक्षाबन्धन के दिन ब्राह्मण लोग और हिन्दू सामन्त सरदार
सम्राट की कलाई में आकर राखी बाँधते थे, दीपावली की रात को महल में
रोशनी होती थी और जुआ तक खिलता था। शिवरात्रि को महलों के
अन्दर ख़ास रौनक़ दिखाई देती थी। ठीक इसी तरह मुसलमानों की ईद
और शबबरात भी उतने ही उत्साह के साथ मनाई जाती थी।* हर सम्राट
की सालगिरह साल में दो बार मनाई जाती थी, एक मुसलमान चाँद की
तारीख़ों के अनुसार और दूसरे हिन्दू तिथियों के अनुसार।
- There are above one hundred different sects . . . but they never
have any hot disputes about their doctrine or way of worship. Every one
is free to serve and worship God in their own way, and persecutions for
religion's sake are not known among them."
Further, "The religion of Bengal is established, is Mohammadan, yet
for one Mommadan there are above one hundred pagans and the public
offices and posts are filled promiscuously with men of both persuasions."--
Ibid, pp. 321, 415. - History of Jehangir, by Beniprasad, M. A., D. Sc., Ph. D., p. 100.
१६० पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह धार्मिक उदारता ही भारतीय मुग़ल साम्राज्य की आधार
शिला थी। सम्राट बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के नाम अपने अन्तिम
आदेश में इस धार्मिक उदारता की नींव रक्खी। हुमायूँ ने ईमानदारी के
साथ उस पर अमल किया। सम्राट अकबर ने इस उदारता को उस अलौ-
किक पराकाष्ठा तक पहुँचाया जो संसार के धार्मिक इतिहास में सदा के
लिए एक सीमा चिन्ह रहेगी। जहाँगीर और शाहजहाँ ने आश्चर्यजनक
सफलता के साथ उसका पालन किया।
उस समय का ईसाई यूरोप
हमें याद रखना चाहिए कि यह ठीक वह समय था जब कि यूरोप के
अन्दर धर्म के नाम पर अत्याचार और ज़बरदस्तियाँ एक आए दिन की
मामूली घटना थी। आयरलैण्ड में उस समय न किसी रोमन कैथलिक को
अपने पूर्वजों की जागीर मिल सकती थी, न कोई कैथलिक फ़ौज का अफ़सर
हो सकता था और न जजी की बेञ्च पर बैठ सकता था। फ़्रान्स में ह्यूगेनाट
सम्प्रदाय के एक एक आदमी को देश से समुद्र पार निर्वासित कर दिया
गया था। स्वीडन में सिवाय लूथर की सम्प्रदाय के और किसी ईसाई को
जूरी का मेम्बर होने का अधिकार न था। स्पेन में प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय के
लोगों के मरने के समय किसी पादरी को उनकी अन्त्येष्टि क्रिया करने की
इजाज़त न थी। इतना ही नहीं, बल्कि यूरोप के एक एक देश में उस समय
‘ऐक्टस् ऑफ़ यूनिफ़ॉर्मिटी’ पास हो रहे थे जिसका अर्थ यह था कि सिवाय
ईसाई मत की उस सम्प्रदाय विशेष के मानने वालों के, जिस सम्प्रदाय के
कि वहाँ के शासक होते थे, किसी दूसरी सम्प्रदाय के लोग देश में सुख
चैन से न रहने पाएँ। इन्हीं अत्याचारी क़ानूनों के फलस्वरूप यूरोप के हर
मुग़लों का समय १६१
देश में हज़ारों कैथलिक, हज़ारों एङ्गलिकन, हज़ारों लूथरेन, हज़ारों प्युरिटेन,
हज़ारों प्रेसबिटेरियन, हज़ारों लेबेटर, हज़ारों एनेबेप्टिस्ट, और हज़ारों
कवेनेण्टर ज़िन्दा जला दिए गए, तलवार के घाट उतारे गए, या यातनाएँ
दे देकर मार डाले गए, और ये सब के सब ईसाई थे, उतने ही कट्टर ईसाई
जितने कि उन पर अत्याचार करने वाले उनके दूसरे देशवासी थे ।
भारत और यूरोप की तुलना
उस समय के भारत और यूरोप की तुलना करते हुए अंग्रेज़ इतिहास
लेखक टॉरेन्स लिखता है—
"दिल्ली के शुरू के सम्राटों के दिनों में, सत्रहवीं सदी के मध्य
तक, सब धर्मों के लोगों के साथ पूरी उदारता का व्यवहार किया
जाता था । ठीक उसी समय यूरोपनिवासी धर्म के नाम पर
अत्याचारों द्वारा अपने महाद्वीप को एक विशाल श्मशान भूमि
बनाने की ज़ोरदार कोशिशों में लगे हुए थे, अपने अपने धर्म की रक्षा
के लिए लोग यूरोप के विविध देशों से भाग भागकर अमरीका
में जा जाकर बस रहे थे । क्या आज उन्हीं लोगों के वंशज,
उनकी क़ब्रें बनाने वाले, भारत पर दोष लगाने का साहस कर
सकते हैं ? क्या वे बेशर्मी के साथ इस बात का दम भर कर
इतिहास को कलङ्कित कर सकते हैं कि उस समय उनकी सभ्यता
भारत की सभ्यता से अधिक सच्ची थी ? यदि उन्हीं के लिखे
इतिहास पर विश्वास करके उन्हीं की गवाही ली जाय, और जो
कट्टर ईसाई उस तमाम समय में धर्म के नाम पर फाँसियाँ खड़ी
११
१६२ पुस्तक प्रवेश
कर रहे थे, बेड़ियाँ कस रहे थे और दूसरी सम्प्रदाय के ईसाइयों
को दण्ड देने के लिए 'ऐक्टस ऑफ़ यूनिफ़ार्मिटी' पास कर रहे
थे, जिनकी उँगलियों से कवेनेएटर सम्प्रदाय के लोगों का ख़ून,
कैथलिक लोगों का ख़ून और प्यूरिटन लोगों का ख़ून लगातार
टपक रहा था, यदि उन्हीं को बुला कर उनकी गवाही ली जाय,
तो वे क्या मुँह दिखला सकेंगे ?'' ꕤ
इस पुस्तक में कई स्थान पर यह दिखलाया गया है कि मुसलमानों
और ख़ास कर मुग़लों के शासनकाल में राज की ऊँची से ऊँची पदवियाँ
हिन्दुओं को मिली हुई थीं। हर सम्राट की ओर से बेशुमार हिन्दू मन्दिरों
को जागीरें और माफ़ियाँ दी गईं। औरङ्गज़ेब मुतास्सिब और अनुदार था,
फिर भी औरङ्गज़ेब के दरबार में भी हिन्दू मन्त्री और उसकी सेना में हिन्दू
सेनापति मौजूद थे। औरङ्गज़ेब की मृत्यु को आज दो सौ साल से ऊपर हो
चुके, किन्तु अभी तक अनेक हिन्दू मन्दिरों के पास, मिसाल के तौर पर
इलाहाबाद के पास अरैल में सोमेश्वरनाथ के मन्दिर के हिन्दू पुजारियों के
- "During the reigns of the earlier Emperors of Delhi, to the middle
of the seventeenth century, complete tolerance was shown to all religions.
Shall they who build the tombs of those who at that very time, were busily
employed in making Europe one mighty charnel-house of persecution, and
in colonising America with fugitives for conscience' sake, rise up in judgment
against India, or load the breath of history with the insolent pretence of
having then enjoyed a truer civilization ? What if they were taken at their
word, and called forth with the Covenanters' blood, and the Catholic's
blood, and the Puritan's blood dripping quick from the orthodox hands
that all that time were building scaffolds, riveting chains, and penning penal
'Acts of Uniformity' ?"—Empire in Asia, How We Cam by It. A book of
Confessions by W. M. Torrens, M. P., Panini Office reprint, pp. 96, 97.
मुग़लों का समय १६३
पास, औरंगज़ेब के दस्तख़ती परवाने मौजूद हैं जिनमें उन मन्दिरों को राज
की ओर से जागीरें दी गई हैं।
अमन और ख़ुशहाली के लिहाज़ से मुग़ल साम्राज्य का समय भारत
के इतिहास में निस्सन्देह स्वर्ण युग था। असंख्य यूरोपियन और एशियाई
यात्रियों की गवाहियाँ और उस समय के ऐतिहासिक उल्लेख इस विषय में
नक़ल किए जा सकते हैं। धन धान्य, और सुख सम्पत्ति की जो रेल पेल
भारत के अन्दर सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल में देखने में आती थी वह
संसार के इतिहास में शायद ही कभी किसी दूसरे देश को नसीब हुई हो।
इतिहास लेखक मोरलैण्ड लिखता है कि विदेशी व्यापारी और यात्री
उन दिनों इस बात को देख कर चकित रह जाते थे कि भारत के नगरों में
लोगों के माल की रक्षा का कितना सुन्दर प्रबन्ध था। अनेक यात्री इस
बात की गवाही देते हैं कि अव्वल तो चोरियाँ होती ही बहुत कम थीं,
और यदि किसी नगर में चोरी हो जाती थी और माल बरामद न हो पाता
था तो नगर के कोतवाल को अपने पास से माल की क़ीमत भर देनी
पड़ती थी।*
हुमायूँ के दो शासनकालों के बीच के कुछ साल तक दिल्ली में शेरशाह
का शासन रहा। किन्तु फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि “शेरशाह का
चन्दरोज़ा शासन भी हिन्दोस्तान की उन्नति के लिए अहितकर साबित न
हुआ, सड़कों के ऊपर आने जाने, माल के लाने ले जाने और व्यापारियों
की रक्षा का उसने इतना सुन्दर प्रबन्ध कर दिया कि जितना पहले न था।”†
- India at the Death of Akbar, by Moreland, pp. 38, 39.
† The Emperor Akbar, etc., by Frederick Augustus, p. 277.
१६४ पुस्तक प्रवेश
सम्राट जहाँगीर ने तख्त पर बैठते ही सब से पहले जो आज्ञाएँ जारी
कीं उनमें से एक यह थी कि साम्राज्य भर में सड़कों और सड़कों के ऊपर
सरकारी कुओं, सरायों आदि की मरम्मत की जाय और यात्रियों की
हिफ़ाज़त का पूरा प्रबन्ध किया जाय, और दूसरी यह थी कि कोई भी
राजकर्मचारी या ज़मींदार किसी वजह से भी किसी किसान की ज़मीन से
उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ उसे बेदख़ल न करे, ✻ तीसरी यह थी कि किसी
व्यापारी का माल चुङ्गी इत्यादि के लिए चौकियों और सड़कों पर खोल कर
न देखा जाय । जहाँगीर ने साम्राज्य भर में अनेक मुसाफ़िरखाने, मदरसे
और अस्पताल, तालाब, कुएँ और पुल बनवाए, तमाम बड़े बड़े नगरों में
राज के ख़र्च पर हकीम और वैद्य नियुक्त किए, शराब और तम्बाकू का बनना
और पिया जाना क़ानूनन् बन्द किया । संसार के किसी भी देश में उस
समय राज की ओर से प्रजा की शिक्षा का बाज़ाब्ता इन्तज़ाम न था ।
मुग़ल सम्राटों ने इस कमी को पूरा करने के लिए साम्राज्य भर में हज़ारों
विद्वान पण्डितों और मौलवियों को पाठशालाएँ और मकतब जारी रखने
के लिए माफ़ियाँ और वज़ीफ़े अता किए ।† अनेक अंगरेज़ यात्री स्वीकार
करते हैं कि मुग़ल सम्राटों के उदार प्रोत्साहन के प्रताप से उस समय के
भारत में शिक्षितों की संख्या आबादी के हिसाब से संसार भर में सब से
अधिक थी ।
उद्योग धन्धों में भारत उस समय न केवल अपनी समस्त आवश्य-
कताओं को ही पूरा करता था, बल्कि शेष अधिकांश संसार की मण्डियों
- India at the Death of Akbar, by Moreland, p. 46 and 129.
† History of Jehangir, by Beniprasad, M. A., D. Sc., Ph. D., pp. 92-94.
मुग़लों का समय १६५
में भी अधिकतर भारत का बना हुआ माल ही दिखाई देता था। आज से
क़रीब सवा सौ साल पहले तक यानी उन्नीसवीं सदी के शुरू तक भारत के
बने हुए जहाज़ उस समय के इङ्गलिस्तान और अन्य यूरोपियन देशों के बने
हुए जहाज़ों से कहीं अधिक सुन्दर, कहीं अधिक मज़बूत और कहीं अधिक
टिकाऊ होते थे। ❀
ईसा की पन्द्रवीं सदी में यूरोपियन यात्री काउण्टी लिखता है कि
जितने बड़े जहाज़ भारत में बनते थे उतने यूरोप में कहीं देखने को न
मिलते थे। मुग़ल साम्राज्य के शुरू के दिनों में जो अङ्गरेज़ भारत आए
उन्होंने और भी अधिक बड़े बड़े सुन्दर और मज़बूत भारतीय जहाज़ों का
हाल अपने यात्रा वृत्तान्तों में लिखा है। मुग़ल साम्राज्य के दिनों में चीन
और जापान से लेकर अफ़रीका के दखिन तक जितने जहाज़ आते जाते थे,
उनमें से अधिकांश भारत के और ख़ास कर गुजरात के बने हुए होते थे।
बङ्गाल से सिन्ध तक का सारा व्यापार केवल भारतीय जहाज़ों द्वारा किया
जाता था। मुसाफ़िरों के आने जाने के लिए जितने बड़े जहाज़ भारत में
बनते थे उतने और कहीं न बनते थे। पूरब में मेक्सिको ( अमरीका ) तक
और पच्छिम में इङ्गलिस्तान तक भारत का बना हुआ माल भारतीय
जहाज़ों में लद कर दूसरे देशों को जाता था। हज के लिए जाने वाले भार-
तीय मुसलमान भारतीय जहाज़ों ही में भारत से अरब तक आते जाते थे।†
बारबोसा लिखता है कि सत्रवीं सदी के शुरू में गुजरात के बने हुए
रेशम के कपड़े अफ़रीका और पगू तक जाते थे। वारथेमा लिखता है कि
- Prosperous British India, by William Digby, pp. 86, 88.
† India at the Death of Akbar, pp. 67-71.
१६६ पुस्तक प्रवेश
उन दिनों गुजरात "समस्त ईरान, तातार, टर्की, शाम, बारबरी, अरब,
ईथियोपिया (अबीसीनिया, अफ्रीका) और अन्य कई देशों" को अपने यहाँ
के बने हुए "रेशमी और सूती कपड़े" मुहय्या करता था। उस समय के
यात्री लिखते हैं कि स्वयं भारत के अन्दर कपड़े की खपत उस समय मामूली
न थी। क़रीब क़रीब सब ऊपर की और बीच की श्रेणी के लोग रेशम
पहनते थे और बड़े बड़े चोगे पहनते थे।
ख़ास कर रेशम के धंधे ने सम्राट अकबर के समय में अपूर्व उन्नति
की। अबुलफ़ज़ल लिखता है कि अकबर ने ख़ुद रेशम के धंधे का परिश्रम
के साथ अध्ययन किया, चीन और अन्य देशों से कारीगर बुला कर नौकर
रक्खे और लाहौर, आगरा, फ़तहपुर, अहमदाबाद इत्यादि में राज के ख़र्च
पर बड़े बड़े कारख़ाने खुलवाए। अकबर के समय में जब कि गेहूँ आजकल
के वज़न के हिसाब से एक रुपए का एक मन बारह सेर आता था, चार आने
में एक सुन्दर ख़ालिस ऊन का कम्बल ख़रीदा जा सकता था। अबुलफ़ज़ल
लिखता है कि लाहौर के अन्दर उस समय शाल बनाने के एक हज़ार सर-
कारी कारख़ाने थे, काशमीर और अन्य स्थानों में अलग रहे। आगरे और
लाहौर में दरियों और क़ालीनों के अनेक सरकारी कारख़ाने थे।
सौ सवा सौ साल पहले तक के ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रतिनिधि बार
बार अपने पत्रों में इंगलिस्तान लिखकर भेजते थे कि इङ्गलिस्तान के बने
हुए कपड़ों की भारतीय कपड़ों के मुक़ाबले में भारत में कोई खपत नहीं हो
सकती।
पुर्तगाली यात्री पिरार्ड लिखता है कि सत्रवीं सदी के शुरू में बङ्गाल
के अन्दर जो अत्यन्त घना बसा हुआ देश था, सूती वस्त्रों का धंधा घर
भर फैला हुआ था और “आशा अन्तरीप ( अफ़रीका ) से लेकर चीन तक
हर स्त्री और पुरुष सिर से पाँव तक कपड़े पहनता है और ये सब कपड़े
भारतीय करघों के बने हुए होते थे।” अरब के सौदागर मिश्र में और
यूरोप में भारत के बने हुए कपड़े ले जाकर बेचते थे। लङ्का, बरमा, मलाका,
चीन, जापान, फ़िलिप्पाइन और मेक्सिको में उन दिनों भारत के कपड़ों
की बेहद खपत थी। इस पुस्तक के अन्दर ‘भारतीय उद्योग धंधों का नाश’
शीर्षक अध्याय में हमने अङ्गरेज़ों के आने से पहले की भारतीय उद्योग धंधों
की अवस्था को बयान किया है।
उस समय के इतिहास और यूरोपियन और अन्य यात्रियों के वृत्तान्तों
से यह भी पता चलता है कि मुग़ल समय का भारत न केवल उस समय
के यूरोपियन देशों से ही कहीं अधिक घना बसा हुआ था, बल्कि इस समय
के भारत से भी उस समय के भारत की आबादी कम से कम ख़ास ख़ास
प्रान्तों में कहीं अधिक घनी थी। कलकत्ता, बम्बई और कराची का उस
समय निशान न था। किन्तु आगरा, कन्नौज, विजयनगर, गोलकुण्डा,
१६८ पुस्तक प्रवेश
की आबादी उस समय "इतनी अधिक थी की जिस पर विश्वास करना
कठिन है।" विजयनगर के हिन्दू राजाओं के पास बीस लाख फ़ौज तैयार
रहती थी। इतनी ही घनी आबादी दखन, गुजरात, पञ्जाब और बाक़ी
उत्तर भारत की बताई जाती है। आगरे शहर से लिखा है कि किसी भी
समय दो लाख सशस्त्र योधा जमा किए जा सकते थे । बङ्गाल की राजधानी
गौड़ के मकानों की संख्या बारह लाख थी, जिसका अर्थ यह है कि उस
समय के गौड़ की आबादी इस समय के लन्दन की आबादी से बहुत कम
न थी । सूरत से लाहौर तक, लाहौर से आगरे तक और आगरे से गौड़ तक
जिन घने बसे हुए ग्रामों और नगरों से होकर यूरोपियन यात्रियों को जाना
पड़ता था उन्हें देख कर वे चकित रह जाते थे । निस्सन्देह आबादी और
ख़ुशहाली दोनों के लिहाज़ से मुग़ल समय का भारत, केवल एक चीन को
छोड़ कर, संसार के अन्य समस्त देशों से कहीं अधिक बढ़ा चढ़ा था ।
देशी भाषाओं की उन्नति
मुग़लों और उन दूसरे मुसलमानों के ऊपर भी जो बाहर से आकर
भारत में बसे भारतीय जीवन, भारतीय रहन सहन, और भारतीय विचारों
की छाप लगे बग़ैर न रह सकी । यहाँ तक कि भारत के मुसलमान दूसरे
देशों के मुसलमानों से अलग बिल्कुल भारतीय मुसलमान बन गए । भारत
वासियों से मुग़लों ने पान खाना सीखा । हिन्दोस्तानी भाषा को जिसे वे
पहले ज़बानेहिन्दवी कहते थे, उन्होंने अपनी भाषा बनाया । बाबर और
उसके साथी आरम्भ में ईरानी ज़बान बोलते थे । थोड़े ही दिनों में उन्होंने
अपने घरों में, दफ़्तरों में और दरबारों में हिन्दोस्तानी बोलनी शुरू की,
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मुग़लों का समय १६६
हिन्दोस्तानी उनकी मातृभाषा बन गई, किन्तु उनका साहित्य और सरकारी
पत्र व्यवहार फ़ारसी में जारी रहा । सन् १७२० के क़रीब उन्होंने साहित्य
के लिए भी हिन्दोस्तानी ही को अपनाना शुरू कर दिया । क़ुदरती तौर पर
इस हिन्दोस्तानी में फ़ारसी और तुरकी के अधिक शब्द आ गए, और शाही
दरबार में यह भाषा इस्तेमाल होने और दिन प्रति दिन मंजने लगी । इसी
से मुग़ल शासन के दिनों में उर्दू की नींव रखी गई । अन्तिम सम्राट
बहादुरशाह उर्दू का सुन्दर कवि था ।
दूसरी भारतीय भाषाओं ने भी मुग़ल समय में अपूर्व उन्नति की ।
जदुनाथ सरकार लिखता है—
“अकबर ही के अधीन हिन्दी में तुलसीदास और बङ्गला
में वैष्णव लेखकों के प्रताप एक ज़बरदस्त हिन्दू साहित्य देश की
भाषाओं में पैदा हुआ । सम्राट अकबर ही ने इस देश में एक
सच्चे राष्ट्रीय दरबार को जन्म दिया और अकबर के अधीन
भारतीय मस्तिष्क का बहुत बड़ा उत्थान हुआ ।”*
मुग़ल साम्राज्य से पहले भी बङ्गाल और दक्खिन के मुसलमान
शासकों के अधीन वहाँ के देशी साहित्य ने बहुत उन्नति की थी । दिनेश-
चन्द्र सेन, जिसकी पुस्तक बङ्गला भाषा और बङ्गला साहित्य के इतिहास
पर अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है, लिखता है—
“बङ्गला भाषा को साहित्य के पद तक पहुंचाने में कई
प्रभावों ने काम किया है, जिनमें निस्सन्देह एक सब से अधिक
महत्वपूर्ण प्रभाव मुसलमानों का बङ्गाल विजय करना था । यदि
- Mughal Administration, p. 146.