भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
नंगी दीवारें, जेल के ख़यालात,
कितने अँधियारे और उदास हो तुम,
कितना मुश्किल है कि बन्दी हो निष्क्रिय रहना
और देखना सपने आज़ादी के दिनों के।
(मोरोज़ोव)
———o———
تجھے ذبح کرنے کی خوشی اور مجھے مرنے کا شوق
میری بھی مرضی وہی جو میرے صیاد کی ہے۔ 1
पृष्ठ 31 (28)
“हर चीज़ यहाँ है कितनी ख़ामोश, बेजान, फीकी
वर्षों गुज़र जाते हैं यों ही, कुछ पता नहीं चलता,
हफ़्ते और दिन कटते हैं बड़ी मुश्किल से,
देता है सिर्फ़ बोरियत इनका यह सिलसिला।
(मोरोज़ोव)
———o———
लम्बी क़ैद से हमारे ख़्याल हो जाते हैं मनहूस;
भारीपन महसूस होता है हमारी हड्डियों में;
यन्त्रणा की पीड़ा से, लम्हे लगते हैं अन्तहीन
चार डग चौड़ी इस कोठरी में।
———o———
हमें जीना है पूरी तरह अपने हमसफ़र भाइयों के लिए,
हमें देना होगा अपना सर्वस्व उनके लिए,
और उन्हीं की ख़ातिर लड़ना होगा बदनसीबी के ख़िलाफ़!
... ... ...
(मोरोज़ोव)
- मूल में उर्दू में यह शे'र लिखा हुआ है :
तुझे जबह करने की खुशी, मुझे मरने का शौक़,
मेरी भी मर्ज़ी वही है, जो मेरे सैयाद की है।
584 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आये मुझे आज़ाद करने :
आखिर लोग आये मुझे आज़ाद करने;
मैंने न पूछा क्यों और न सोचा कहाँ,
मेरे लिए तो कुल मिलाकर एक ही था,
बँधे रहना या बन्धनमुक्त होना,
मैंने निराशा से प्यार करना सीख लिया था,
और इस तरह अन्ततः जब वे प्रकट हुए,
और उतार डाले मेरे सारे बन्धन
ये भारी दीवारें बन चुकी थीं मेरे लिए
एक संन्यास-आश्रम – पूरी तरह अपना।
(द प्रिज़नर ऑफ़ चिलोन)
पृष्ठ 32 (29)
“और हम सम्मानित किये गये हैं एक मिशन देकर!
हमने एक कठिन स्कूल पास किया, लेकिन हासिल कर लिया
ऊँचा ज्ञान।
निर्वासन, जेल, और मुश्किल दिनों की बदौलत
हम जान गये हैं और क़ीमत समझते हैं सच्चाई और आज़ादी की
दुनिया की।”
(प्रिज़नर ऑफ़ श्लुसेलबर्ग)¹
एक शिशु की मृत्यु और पीड़ा
‘एक बच्चा पैदा हुआ। उसने सचेत तौर पर न तो कोई बुरा काम किया, न
अच्छा काम किया। वह बीमार पड़ गया, वह लम्बे समय तक काफ़ी तकलीफ़
झेलता रहा, तब तक जब तक कि उस असह्य वेदना से मर नहीं गया। क्यों? क्या
वजह थी? दार्शनिक के लिए यह एक शाश्वत पहेली है।’²
- लेनिनग्राद क्षेत्र में स्थित श्लुसेलबर्ग क़स्बे के पास एक द्वीप पर पीटर महान की सेना
द्वारा 1702 में बनाये गये क़िले को बाद में एक कारागार में बदल दिया गया था। इस कारागार
में अनेक दिसम्बरवादी क्रान्तिकारी, अराजकतावादी बाकुनिन, पोलिश देशभक्त लुकासोविस्लाग,
मार्शल दोलगोरुकी, और लेनिन के भाई अलेक्सान्द्र को क़ैद करके रखा गया था (लेनिन के
भाई को यहीं फाँसी दी गयी) - स्रोत अज्ञात
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 585
एक क्रान्तिकारी के दिमाग़ की बनावट :
“जो व्यक्ति कभी भी ईसा मसीह के जीवन से प्रभावित रहा है, जिन्होंने एक
आदर्श के नाम पर पीड़ा, अपमान और मृत्यु का वरण किया; जिसने उन्हें कभी
एक आदर्श तथा उनके जीवन को अनासक्त प्रेम की प्रतिमूर्ति माना है – वही उस
क्रान्तिकारी के दिमाग़ की बनावट को समझ सकता है जिसे सज़ा दी गयी है, और
जनता की आज़ादी के लिए काम करने के जुर्म में जीवित ही मक़बरे में डाल दिया
गया है।” (वेरा एन. फ़िग्नर)
अधिकार :
अधिकार माँगो नहीं। बढ़कर ले लो। और उन्हें किसी को भी तुम्हें देने मत
दो। यदि मुफ़्त में तुम्हें कोई अधिकार दिया जाता है तो समझो कि उसमें कोई न
कोई राज़ ज़रूर है। ज़्यादा सम्भावना यही है कि किसी ग़लत बात को उलट दिया
गया है।¹
<u>पृष्ठ 33 (30)</u>
कोई दुश्मन नहीं?
तुम कहते हो, तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं?
अफ़सोस! मेरे दोस्त, इस शेख़ी में दम नहीं,
जो शामिल होता है फ़र्ज़ की लड़ाई में,
जिसे बहादुर लड़ते ही हैं
उसके दुश्मन होते ही हैं। अगर नहीं हैं तुम्हारे
तो वह काम ही तुच्छ है जो तुमने किया है।
तुमने किसी गद्दार के कूल्हे पर वार नहीं किया है,
तुमने झूठी क़समें खाने वाले होंठ से प्याला नहीं छीना है,
तुमने कभी किसी ग़लती को ठीक नहीं किया है,
तुम कायर ही बने रहे लड़ाई में।
(चार्ल्स मैके, 747)²
बाल-श्रम :
गौरैये का बच्चा गौरैये को दाना नहीं चुगाता,
- रोजर एन. बाल्डविन : अमेरिकन सिविल लिबर्टी यूनियन के निदेशक रहे। फ्री स्पीच
फ़ाइट ऑफ़ द आई. डब्ल्यू. डब्ल्यू. (इण्डस्ट्रियल वर्कर्स ऑफ़ द वर्ल्ड) से - चार्ल्स मैके (1814-1889) : स्कॉट कवि, पत्रकार और गीतकार
586 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
चूज़ा मुर्ग़ी को चुग्गा नहीं कराता,
बिल्ली का बच्चा बिल्ली के लिए चूहे नहीं मारता –
यह महानता तो सिर्फ़ मनुष्य को नसीब है।
हम सबसे बुद्धिमान, सबसे बलवान नस्ल हैं –
हम क़ाबिले तारीफ़ हैं।
एकमात्र ज़िन्दा प्राणी
जो जीता है अपने बच्चों की मेहनत पर।
(शार्लोट पर्किन्स गिलमैन)¹
पृष्ठ 34 (31)
कोई वर्ग नहीं! कोई समझौता नहीं!!
(जॉर्ज डी. हेरसन)
समाजवादी आन्दोलन के दौरान एक ऐसा वक़्त आ रहा है, और सम्भव है,
वह वक़्त आ चुका है, जब सुधरी हुई दशाएँ या समायोजित उजरतें मज़दूरों की माँग
का जवाब नहीं रह जायेंगी, और तब ये चीज़ें सामान्य बुद्धि के लिए एक अपमान
के अलावा और कुछ नहीं सिद्ध होंगी। आज दुनियाभर में जो समाजवादी आन्दोलन
चल रहा है वह बेहतर उजरतों, सुधरी हुई पूँजीवादी दशाओं या पूँजीवादी मुनाफ़े
में हिस्सा बँटाने के लिए नहीं चल रहा है; यह चल रहा है उजरतों और मुनाफ़ों
के ख़ात्मे के लिए, और पूँजीवाद एवं निजी पूँजीपतियों की समाप्ति के लिए। सुधरी
हुई राजनीतिक संस्थाएँ, पूँजी और श्रम के बीच समझौता कराने वाली परिषदें,
परोपकार और विशेषाधिकार जो पूँजीपतियों की ख़ैरातों के अलावा और कुछ नहीं
हैं – इनमें से कोई भी चीज़ उस सवाल का जवाब नहीं दे सकती जो मन्दिरों,
सत्ता के सिंहासनों और संसदों को कँपकँपा रहा है। जो लोग दबे-कुचले हैं और
जो लोग उनकी पीठ पर सवार होकर आगे बढ़े हुए हैं, अब इन दोनों के बीच कोई
अमन-चैन नहीं रह सकता। अब वर्गों के बीच कोई मेल-मिलाप नहीं हो सकता;
अब तो वर्गों का सिर्फ़ अन्त ही हो सकता है। जब तक पहले न्याय न हो, तब
तक सद्भावना की बात करना अनर्गल प्रलाप है, और जब तक इस दुनिया का
निर्माण करने वालों का अपनी मेहनत पर अधिकार न हो, तब तक न्याय की बात
करना बेकार है। दुनिया के मज़दूरों की माँग का जवाब उनकी मेहनत की समूची
कमाई के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। (जॉर्ज डी. हेरसन)²
- शार्लोट पर्किन्स गिलमैन (1860-1935) : अमेरिकी उपन्यासकार, कहानीकार और
समाज सुधारक की कविता जिसे 1920 के दशक में अमेरिका में बालश्रम क़ानून में संशोधन
पर चली बहस में एक सांसद द्वारा उद्धृत किया गया। - सम्भवतः जॉर्ज डेविस हैरोन (1862-1925), जो एक ज़माने में क्रिश्चियन सोशलिस्ट
पादरी थे और अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य भी रहे।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 587
पृष्ठ 35 (32)
पूँजीवाद की बर्बादियाँ¹
ऑस्ट्रेलिया के बारे में आर्थिक अनुमान, थिओडोर हर्ट्ज़का² (1886) द्वारा :
प्रत्येक परिवार = 40 वर्ग फुट में 5 कमरों वाला मकान 50 वर्षों तक चलने
लायक।³
मज़दूरों की काम करने की उम्र = 16-50 (वर्ष – स.)
इस प्रकार हमारे पास हैं 5,000,000 (मज़दूर – स.)
615,000 मज़दूरों का श्रम = श्रम का 12.3 प्रतिशत 22,000,000 लोगों का
भोजन पैदा करने के लिए पर्याप्त है।
यातायात-परिवहन की श्रम लागत समेत, विलासिताओं हेतु सिर्फ़ 315,000
= 6.33 प्रतिशत मज़दूरों के श्रम की आवश्यकता पड़ती है।
इसका मतलब यह हुआ कि उपलब्ध श्रम का 20 प्रतिशत ही समूचे महाद्वीप
के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। शेष 80 प्रतिशत समाज की पूँजीवादी व्यवस्था
के कारण शोषित और बरबाद हो जाता है।
पृष्ठ 36 (33)
ज़ारशाही शासन और बोल्शेविक शासन
ब्रैज़ियर हण्ट⁴ का कहना है कि बोल्शेविकों ने अपने शासन के पहले चौदह
महीनों में, 4500 लोगों को मौत की सज़ा दी जिनमें से ज़्यादातर का जुर्म चोरी और
सट्टेबाज़ी था।
1905 की क्रान्ति के बाद, ज़ार के मन्त्री, स्तोलीपिन⁵ ने, बारह महीनों के
भीतर 32,773 लोगों को मौत की सज़ा दी थी।
*(पृष्ठ 390 ब्रास चेक)*⁶
- यह शीर्षक बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है
- थियोडोर हर्ट्ज़का (1845-1924) : हंगारी-ऑस्ट्रियाई अर्थशास्त्री और पत्रकार। फ़्री
लैण्ड : सोशल एण्टिसिपेशन के लेखक - मकान के क्षेत्रफल में कुछ गड़बड़ है, आँकड़े स्पष्ट नहीं
- अमेरिकी पत्रकार
- प्योत्र अर्कादिएविच स्तोलीपिन (1862-1911) : 1906 से 1911 तक ज़ार की
मन्त्रिपरिषद का अध्यक्ष और गृहमन्त्री - अप्टन सिंक्लेयर की पुस्तक जिसे बुर्जुआ पत्रकारिता की बखिया उधेड़ने वाली पहली
पुस्तक माना जाता है।
588 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 37 (34)
सामाजिक संस्थाओं का स्थायित्व
प्रत्येक पीढ़ी के भ्रमों में से एक भ्रम यह है कि वह जिन सामाजिक संस्थाओं
के तहत जी रही होती है वे, कुछ ख़ास अर्थ में, "प्राकृतिक", अपरिवर्तनीय और
स्थायी हैं। फिर भी, अनगिनत हज़ार वर्षों से, सामाजिक संस्थाएँ उत्तरोत्तर पैदा होती
रही हैं, विकास करती रही हैं, पतनशील होती रही हैं और समसामयिक
आवश्यकताओं के अनुरूप दूसरी बेहतर संस्थाओं द्वारा क्रमशः विस्थापित की जाती
रही हैं...। तब, सवाल यह नहीं है कि हमारी वर्तमान सभ्यता बदलेगी या नहीं,
बल्कि यह है कि वह कैसे बदलेगी?
यह, सुविचारित अनुकूलन के जरिये, क्रमशः और चुपचाप एक नया रूप ले
सकती है। या, यदि अनुकूलन के बजाय कोई उग्र प्रतिरोध उठ खड़ा होता है, तो
यह धमाके के साथ ध्वस्त हो सकती है, और मानवजाति को सामाजिक अराजकता
और अव्यवस्था की अवस्था के निचले स्तर से एक नयी सभ्यता के निर्माण का
कष्टसाध्य कार्यभार सौंप सकती है, जिसमें पिछली व्यवस्था की सिर्फ़ बुराइयाँ ही
नहीं, बल्कि उसकी भौतिक, बौद्धिक और नैतिक उपलब्धियाँ भी नहीं रहेंगी।
– पी.आई. डिके ऑफ़ कैप. सिविलाइज़ेशन¹
पृष्ठ 38 (35)
पूँजीवाद और वाणिज्यवाद :
जापानी छात्रों की एक सभा में रवीन्द्रनाथ² का भाषण :
जापान में आपका अपना उद्योग था; वह कितने कर्तव्यनिष्ठ भाव से ईमानदार
और सच्चा था, इसे आप इसके उत्पादों से – उनकी स्तरीयता और तादाद से,
छोटी-छोटी चीज़ों के प्रति उनके ध्यान देने से जान सकते हैं, जिन पर शायद ही
कोई टीका-टिप्पणी की जा सके। परन्तु आपकी भूमि पर झूठ की एक लहर दुनिया
के उस भाग से बहकर आ चुकी है जहाँ व्यापार सिर्फ़ व्यापार है और ईमानदारी
को सिर्फ़ सबसे अच्छी नीति माना जाता है। क्या आपको कभी शर्म नहीं महसूस
होती, जब आप उन व्यापारिक विज्ञापनों को देखते हैं, जो सिर्फ़ समूचे शहरी क्षेत्र
- सम्भवतः प्युट्रिफ़ैक्शन एण्ड इण्टर्नल डिके ऑफ़ कैपिटलिस्ट सिविलाइज़ेशन – पर
ठीक-ठीक स्रोत एवं सन्दर्भ का पता नहीं। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) भाषण का स्थान, समय तथा अन्य ब्योरे उपलब्ध
नहीं हैं।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 589
को ही झूठ और अतिशयोक्तियों से नहीं पाट रहे हैं, बल्कि उन हरित क्षेत्रों पर भी
धावा बोलते जा रहे हैं, जहाँ किसान ईमानदारी से मेहनत करते हैं, और उन
पर्वत-शिखरों को भी अपने हमले का निशाना बनाते जा रहे हैं, जो भोर के प्रथम
निर्मल प्रकाश का स्वागत करते हैं?...। अपनी भद्दी सजावटों की बर्बरता के साथ
यह वाणिज्यवाद समूची मानवता के लिए एक भयानक महाविपदा है, क्योंकि यह
प्रवीणता के ऊपर ताक़त के आदर्श का आरोपण कर रहा है। यह अपनी नग्न बेशर्मी
के साथ अपने में ही मगन रहने के चलन को गौरवान्वित कर रहा है। इसकी हरकतें
हिंसक हैं, और इसका शोर-शराबा बेसुरा और कर्कश है। यह अपने ही सर्वनाश
की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि यह उसी मानवता को कुचल कर विकृत कर रहा
है...जिस पर यह स्वयं खड़ा है। [पृष्ठ 39 (36) पर जारी] यह आनन्द की क़ीमत
पर धन पैदा करने की कड़ी मशक्कत में लगा हुआ है...। यूरोप की वर्तमान सभ्यता
की मुख्य महत्त्वाकांक्षा यही है कि शैतान पर उसी का एकछत्र अधिकार हो।
पूँजीवादी समाज
“राजनीतिक अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हर कोई यथासम्भव
कम से कम त्याग करके व्यक्तिगत सम्पदा प्राप्त कर लेना चाहता है।”
“नासाउ सीनियर”¹
पृष्ठ 40 (37)
धर्म के बारे में कार्ल मार्क्स का दृष्टिकोण
मनुष्य धर्म को बनाता है; धर्म मनुष्य को नहीं बनाता। धर्म वास्तव में, मनुष्य
की ही आत्मचेतना और आत्मभावना है, जिसने या तो अभी तक अपनेआप को पाया
नहीं है, या (यदि अपनेआप को पाया भी है तो) अपनेआप को फिर से खो दिया
है। लेकिन आदमी कोई ऐसी अमूर्त सत्ता नहीं है जो दुनिया से बाहर कहीं पालथी
मारे बैठी हुई हो। मनुष्य की दुनिया मनुष्यों, राज्य, समाज की दुनिया है। यह राज्य,
यह समाज धर्म पैदा करता है, एक उल्टी विश्व चेतना पैदा करता है, क्योंकि ये
खुद एक उल्टी दुनिया है। धर्म इसी दुनिया का एक सामान्यीकृत सिद्धान्त है,
इसका विश्वकोशीय सार-संग्रह है, एक लोकप्रिय रूप में इसका तर्क है...। इसलिए
धर्म के विरुद्ध संघर्ष उस दुनिया के विरुद्ध एक प्रत्यक्ष अभियान है जिसकी
आत्मिक सुगन्ध धर्म है। [पृष्ठ 41 (38) पर जारी]
- नासाउ विलियम सीनियर (1790-1864) : अंग्रेज़ अर्थशास्त्री
590 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन दुनिया का अहसास है, ठीक
वैसे ही जैसेकि यह आत्महीन दशाओं की आत्मा है। यह जनता के लिए अफ़ीम
है।
लोग वास्तव में तब तक सुखी नहीं हो सकते जब तक कि वे धर्म का उन्मूलन
कर, इसके मिथ्या सुख से निजात नहीं पा लेते। यह अपेक्षा कि लोग इस मरीचिका
से अपनेआप को स्वयं अपनी ही दशा की ख़ातिर मुक्त करें, यह अपेक्षा है कि वे
उस दशा का ही त्याग करें जिसे इस मरीचिका की ज़रूरत होती है।
आलोचना का हथियार हथियारों की आलोचना का स्थान नहीं ले सकता।
भौतिक शक्तियों को निश्चित रूप से भौतिक शक्तियों द्वारा ही उखाड़ फेंका जाना
चाहिए; लेकिन सिद्धान्त भी जब जनसमुदायों में रच-बस जाता है, तो एक भौतिक
शक्ति बन जाता है।¹
<u>पृष्ठ 42 (39)</u>
क्रान्ति यूटोपियाई नहीं
एक आमूल परिवर्तनवादी क्रान्ति, यानी मानवजाति की आम मुक्ति, जर्मनी के
लिए कोई यूटोपियाई स्वप्न नहीं है; यूटोपियाई तो एक आंशिक, एक विशुद्ध
राजनीतिक क्रान्ति की धारणा होती है, जो (पूँजीवादी व्यवस्था की – स.) इमारत
के खम्भों को खड़ा छोड़ देगी।²
“महान इसलिए महान हैं क्योंकि
हम घुटनों पर हैं
आओ उठ खड़े हों!”³
<u>पृष्ठ 43 (40)</u>
राज्य के बारे में हर्बर्ट स्पेंसर⁴ का दृष्टिकोण :
“भले ही यह सच हो या न हो कि मनुष्य निष्कलंक पैदा हुआ और पाप में
सन गया, लेकिन यह निश्चित रूप से सच है कि सरकार का जन्म आक्रामकता
से और आक्रामकता के द्वारा हुआ।”
- कार्ल मार्क्स, हेगेल के न्याय-दर्शन की समालोचना का प्रयास से उद्धृत
- वही
- मूल में ये पंक्तियाँ पृष्ठ पर तिरछे लिखी हुई हैं
- हर्बर्ट स्पेंसर (1820-1903) : अंग्रेज़ दार्शनिक; महत्त्वपूर्ण कृतियाँ : द प्रिंसिपल्स ऑफ़
साइकोलाजी और फ़र्स्ट प्रिंसिपल्स
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 591
मनुष्य और मनुष्यजाति :
“मैं एक मनुष्य हूँ,
और उन सभी चीज़ों से मेरा सरोकार है जो मनुष्य-जाति को प्रभावित करती
हैं।”
“रोमन नाटककार”¹
इंग्लैण्ड की स्थिति की समीक्षा :
“अच्छे लोगो, इंग्लैण्ड में स्थितियाँ तब तक अच्छी नहीं हो सकतीं, जब तक
अच्छाइयाँ आम नहीं हो जातीं, और जब तक सज्जन लोगों के साथ दुर्जन लोग भी
बने रहते हैं। वे जिन्हें हम लॉर्ड कहते हैं, किस अधिकार से हमसे महान हैं? किस
आधार पर वे इसके क़ाबिल बने हुए हैं? वे क्यों हमें भू-दास बनाये हुए हैं? अगर
हम सभी एक ही बाप और माँ, आदम और हव्वा की सन्तानें हैं, तो वे यह कैसे
कहते या साबित करते हैं कि वे हमसे महान या बेहतर हैं? अगर वे अपने फ़ायदे
के लिए हमसे मेहनत नहीं करवाते तो वे अपनी शान-शौक़त में क्या ख़र्च करते?
वे खुद तो मख़मल पहनते हैं और अपनेआप को फ़रकोटों और शाही लबादों से गर्म
रखते हैं, जबकि हम चिथड़े लपेटे रहते हैं। उनके पास तो शराब, लज़ीज़ खाना और
डबलरोटी है, और हमारे पास जई की लिट्टी, घासपात और पानी। उनके पास
फुरसत ही फुरसत है और बढ़िया घर भी, और हमारे पास है तकलीफ़ और मेहनत,
खेतों में बारिश और आँधी; फिर भी यह हमारी मेहनत ही है जिसके बूते पर वे
राज कर रहे हैं।
फ्ऱायर ऑफ़ वॉट टाइलर्स रिबेल²
पृष्ठ 44 (41)
क्रान्ति और वर्ग
सारे के सारे वर्ग सत्ता पाने की कोशिश में क्रान्तिकारी ही होते हैं, और समानता
की बातें करते हैं। और सारे के सारे वर्ग जब सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो
संकीर्णतावादी हो जाते हैं और मान लेते हैं कि समानता सिर्फ़ एक रंगीन सपनाभर
है। सारे के सारे वर्ग, सिर्फ़ एक को – मज़दूर वर्ग को छोड़कर, क्योंकि जैसाकि
- अज्ञात
- कुछ शब्द स्पष्ट नहीं; आगे पन्ना फटा हुआ; उपरोक्त शब्द जॉन बॉल के हैं। जॉन बॉल
और वॉट टाइलर्स इंग्लैण्ड में हुए 1381 के किसान विद्रोह के नेता थे।
592 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कॉम्टे¹ ने कहा है, “सच कहा जाये तो मज़दूर वर्ग एक वर्ग होता ही नहीं, बल्कि
वह तो समाज के निकाय का संघटक होता है।” लेकिन मज़दूर वर्ग का वक़्त, यानी
सभी लोगों के एक हो जाने का वक़्त अभी भी नहीं आया है।
“वर्ल्ड हिस्ट्री फ़ॉर वर्कर्स” पृष्ठ 47, अल्फ़्रेड बार्टन कृत²
पृष्ठ 45 (42)
सर हेनरी मेन³ ने कहा है :
“इंग्लैण्ड की अधिकांश भूमि वकीलों की ग़लती से इसके वर्तमान स्वामियों
के हाथ में चली गयी है – जिन ग़लतियों के परिणामस्वरूप छोटे-छोटे अपराधियों
को भी फाँसी की सज़ा दे दी गयी।”
“कानून मुजरिम क़रार कर देता है उस पुरुष या स्त्री को
जो चुराते हैं आम आदमी की मुर्गियाँ,
लेकिन छोड़ देता है बड़े अपराधियों को
जो चुरा लेते हैं मुर्गियों से आम आदमी को ही।”⁴
पृष्ठ 46 (43)
जनतन्त्र
जनतन्त्र, सैद्धान्तिक तौर पर, राजनीतिक और क़ानूनी समानता की एक
प्रणाली है। लेकिन ठोस और व्यावहारिक कार्रवाई में, यह मिथ्या है, क्योंकि कोई
समानता तब तक नहीं हो सकती, यहाँ तक कि राजनीति में और क़ानून के
समक्ष भी नहीं, जब तक कि आर्थिक शक्ति में असमानता मुँह बाये बरक़रार
रहेगी; जब तक कि सत्ताधारी वर्ग मज़दूरों के रोज़गार पर, देश के प्रेस और
स्कूलों पर तथा जनमत तैयार करने और अभिव्यक्त करने के सभी साधनों पर
अपना अधिकार जमाये रखेगा, जब तक कि यह सभी प्रशिक्षित सार्वजनिक
कार्यकारी निकायों पर अपना एकाधिकार बनाये रखेगा, और चुनावों को प्रभावित
करने के लिए बेशुमार धन ख़र्च करता रहेगा, जब तक कि क़ानून सत्ताधारी वर्ग
- आगस्त कॉम्टे (1798-1857) : फ्रांसीसी विचारक
- अन्य विवरण अनुपलब्ध
- सम्भवतः ब्रिटिश इतिहासकार और विधिवेत्ता सर हेनरी समर मेन (1822-1888), भारत
में 1863 से 1869 तक काउंसिल के सदस्य, और कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर
भी रहे - इंग्लैण्ड में 19वीं सदी में एक अज्ञात कवि के द्वारा लिखी कविता का अंश
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 593
द्वारा बनाये जाते रहेंगे और अदालतों में इसी वर्ग के सदस्य अध्यक्षता करते रहेंगे,
जब तक वकील प्राइवेट प्रैक्टिशनर बने रहेंगे और अपनी विधि विशेषज्ञता का
कौशल सबसे अधिक फ़ीस देने वाले को बेचते रहेंगे, तथा अदालती कार्रवाई
तकनीकी और महँगी बनी रहेगी, तब तक क़ानून के समक्ष यह नाममात्र की
समानता भी एक खोखला मज़ाक़ ही बनी रहेगी।
एक पूँजीवादी व्यवस्था में, जनतन्त्र की पूरी मशीनरी बहुसंख्यक मज़दूर वर्ग
को पीड़ित कर, सत्ताधारी अल्पसंख्यक वर्ग को सत्ता में बनाये रखने का काम
करती है, और जब बुर्जुआ सरकार को जनतान्त्रिक संस्थाओं से ख़तरा महसूस
होता है, तब ऐसी संस्थाओं को अक्सर बड़ी बेरहमी के साथ कुचल दिया जाता
है।
“फ़्रॉम मार्क्स टु लेनिन”
(मॉरिस हिलक्विट¹ कृत) (पृष्ठ 58)
जनतन्त्र “हरेक वर्ग या पार्टी से सम्बन्धित हरेक व्यक्ति के लिए समान
अधिकार और सभी राजनीतिक अधिकारों में भागीदारी” सुनिश्चित नहीं करता
(काउत्स्की)। यह तो मौजूदा आर्थिक असमानताओं के लिए खुले राजनीतिक और
क़ानूनी खेल की अनुमति देता है...। इस प्रकार पूँजीवाद के अन्तर्गत जनतन्त्र
सामान्य, अमूर्त जनतन्त्र नहीं, बल्कि विशिष्ट बुर्जुआ जनतन्त्र...या जैसाकि लेनिन
ने इसका नाम दिया है – बुर्जुआ वर्ग के लिए जनतन्त्र होता है।²
पृष्ठ 47 (44)
क्रान्ति शब्द की परिभाषा
“क्रान्ति की अवधारणा को इस शब्द की पुलिसिया व्याख्या के अर्थ में, यानी
सशस्त्र विद्रोह के अर्थ में नहीं लेना चाहिए। यदि किसी पार्टी के पास दूसरे, कम
ख़र्चीले, और अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित तरीक़े इस्तेमाल करने की गुंजाइश है, और
तब भी वह सिद्धान्त के नाते विद्रोह का ही तरीक़ा अपनाती है, तो उसे पागल ही
कहा जायेगा। इस अर्थ में, सामाजिक जनवाद कभी भी सिद्धान्त के नाते क्रान्तिकारी
नहीं रहा। ऐसा यह सिर्फ़ इसी अर्थ में है कि यह इस बात को मानता है कि जब
इसे राजनीतिक सत्ता हासिल हो जायेगी, तो यह इसका इस्तेमाल वर्तमान व्यवस्था
- मॉरिस हिलक्विट (1869-1933) : अमेरिकी समाजवादी
- पैरे का स्रोत और सन्दर्भ वाला हिस्सा फटा हुआ। सम्भवतः मॉरिस हिलक्विट की ही
पुस्तक से उद्धृत
594 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
को टिकाये रखने वाली उत्पादन-प्रणाली को ख़त्म करने के अलावा और किसी
मक़सद के लिए नहीं करेगा।”
“कार्ल काउत्स्की”¹
संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में कुछ तथ्य और आँकड़े²
5 आदमी 1000 लोगों के लिए रोटी पैदा कर सकते हैं
1 आदमी 250 लोगों के लिए सूती कपड़ा पैदा (कर सकता) है
1 आदमी 300 लोगों के लिए ऊनी कपड़ा पैदा कर सकता है
1 आदमी 1000 लोगों के लिए बूट और जूते पैदा कर सकता है
– आयरन हील³ (पृष्ठ 78)
15,000,000 लोग बेपनाह ग़रीबी (में) जी रहे हैं जो अपनी श्रम-दक्षता को
भी बनाये नहीं रख सकते।
3,000,000 बाल-श्रमिक।
पुनश्च: इंग्लैण्ड⁴
युद्ध-पूर्व अनुमान (!)
इंग्लैण्ड का कुल उत्पादन £ 2000,000,000
(प्रतिवर्ष)
विदेशी निवेशों से लाभ £ 200,000,000
£ 2200,000,000
जनसंख्या के 1/9वें भाग ने
ले लिया ½ = £ 1100,000,000
जनसंख्या के 2/9वें भाग ने
ले लिया शेष = £ 1100,000,000
का 1/3 अर्थात = £ 300,000,000
(विवरण का बाक़ी हिस्सा फटा हुआ – स. ...)
- कार्ल काउत्स्की (1854-1938) : जर्मन सामाजिक-जनवादी आन्दोलन तथा दूसरे
इण्टरनेशनल के एक नेता। शुरू में मार्क्सवादी थे पर बाद में मार्क्सवाद के साथ ग़द्दारी की और
मज़दूर आन्दोलन में मौजूद एक अवसरवादी प्रवृत्ति (काउत्स्कीवाद) के सिद्धान्तकार बन गये। - यह तथा नीचे आया इंग्लैण्ड सम्बन्धी शीर्षक मोटे अक्षरों में लिखे हुए हैं।
- जैक (जॉन) ग्रिफ़िथ लण्डन (1876-1916) का उपन्यास आयरन हील, जो 1908 में
प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में पूँजीवाद के रक्तपिपासु और दमनकारी चरित्र तथा इसके विरुद्ध
मज़दूरों के संघर्ष का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण है। - स्रोत का पता नहीं
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 595
पृष्ठ 48 (45 )
इण्टरनेशनल¹
उठ जाग प्रताड़ित धरती के
उठ जाग भूख के बन्दी
न्याय की बजती रणभेरी,
एक बेहतर दुनिया जन्मे।
अब बाँध सके ना हमको परम्परा की बेड़ी
अरे! उठो! गुलामो जागो! अब करनी नहीं गुलामी!
अब नयी नींव पर बनेगी दुनिया,
हम अब तक रहे न कुछ भी, अब सब कुछ होंगे। (टेक)
यह है अन्तिम संघर्ष
आओ होलें अविकल
कल मानवजाति बनेगी
इण्टरनेशनल।
देखो उनको जो बैठे हैं महिमामण्डित
रेलों, ख़ानों, धरती के राजा!
श्रम को ही रहे लूटते ये
बस इसके सिवा किया क्या है?
दफ़न हैं जनता की मेहनत के फल
कुछ की मज़बूत तिजोरियों में;
देना होगा इसे वापस
है यह जनता का हक़। (वही टेक)
एकजुट हों कारख़ानों-खेतों के मेहनतकश
पार्टी हम सबकी जो काम करें;
यह धरती है हमारी, जनता की,
यहाँ न जगह कामचोर की,
हमारे मांस पर हुए हैं कितने मोटे?
लेकिन यदि ये घृणित शिकारी पक्षी,
हमारे आसमान से एक सुबह हो जायें ग़ायब
सूरज की आभा तब भी बनी रहेगी।
(वही टेक फिर)
- यूजीन पोतिए द्वारा पेरिस कम्यून (1871) के दौरान फ्रेंच में लिखा गया यह गीत
इण्टरनेशनल नाम से विश्व सर्वहारा का संघर्षगीत बन गया।
596 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 49 (46)
मार्सइयेज¹
ओ मेहनत के बेटो, जागो, गौरव हासिल करो!
सुनो, सुनो, वे कोटि-कोटि आवाजें कि तुम जागो,
बच्चे, बीवी, और पुरातन पितर तुम्हारे,
देखो तुम उनके आँसू, और सुनो तुम उनकी चीखें!
क्या घृणित निरंकुश शासक करते रहें शरारत
ले भाड़े के टट्टू, और गुण्डों के जत्थे –
करते रहें धरा को सन्त्रस्त और वीरान
जबकि शान्ति और आज़ादी का बहता रहे खून? (कोरस)
आओ शस्त्र सँभालें, पंक्तिबद्ध हो जायें
खेत सींचते उनके खूँ से आगे बढ़ते जायें
बेपनाह ऐयाशी और शान-शौक़त की
जुर्रत करते हैं अधम अतृप्त निरंकुश,
स्वर्ण और सत्ता की उनकी भूख अपरिमित
भोगते और बेचते धूप-हवा भी;
हम ढोते उनका भार बन के लद्दू घोड़े
वे कहें कि उनके दास उन्हें देवता मानें,
लेकिन इन्सान से बढ़कर और कौन है?
फिर वे कब तक टिके रहेंगे, कब तक मारेंगे हमको? (फिर वही कोरस)
अरे आज़ादी! मानव क्या त्याग सकेगा तुमको,
अनुभव कर लेने के बाद तुम्हारी दिलकश लौ को?
क्या रोक सकेंगी तुमको तहख़ानों के फाटक और सलाखें
या क्या कोड़े बाँध सकेंगे तेरे उदात्त जीवट को?
लम्बे अर्से से बिलख रही है दुनिया,
चला रहे हैं झूठ की कटार निरंकुश,
लेकिन आज़ादी है तलवार और ढाल हमारी,
और व्यर्थ है उनकी सारी कलाकारी। (फिर वही कोरस)
- ला मार्सइयेज : फ़्रांस का राष्ट्रगान। 24 अप्रैल, 1792 को रचा गया। फ़्रांसीसी क्रान्ति
की हिफ़ाज़त करने के लिए युद्धरत सैनिकों के लिए इसे एक फ़्रांसीसी कप्तान क्लोद जोज़ेफ़
द लिल ने संगीतबद्ध किया। मार्सइयेज शहर से पेरिस की ओर मार्च करते सैनिकों ने जब इसे
पहली बार गाया तो ऐसा आवेग और जोश पैदा हुआ कि लोग उमड़ पड़े। एक फ्रेंच जनरल
ने एक बार सन्देश भेजा था कि उसके पास तत्काल मार्सइयेज भेजा जाए क्योंकि इसकी ताक़त
कई बटालियनों के बराबर है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 597
पृष्ठ 50 (47)
अवसरवाद का जन्म
क़ानून के दायरे में रहकर काम करने की सम्भावना ने ही दूसरे इण्टरनेशनल
के समय में मज़दूर पार्टियों के भीतर अवसरवाद को जन्म दिया।
(लेनिन, कोलैप्स ऑफ़ II इंट. ने.)¹
ग़ैर-क़ानूनी काम :
“किसी देश में जहाँ बुर्जुआ वर्ग या प्रतिक्रान्तिकारी सामाजिक जनवाद सत्ता
में है, कम्युनिस्ट पार्टी को अपने क़ानूनी और ग़ैर-क़ानूनी कामों के बीच एक
तालमेल रखना अवश्य सीख लेना चाहिए, तथा क़ानूनी काम को हमेशा और
निश्चित रूप से ग़ैर-क़ानूनी पार्टी के प्रभावी नियन्त्रण में ही रहना चाहिए।
– बुख़ारिन ²
दूसरे इण्टरनेशनल के लक्ष्य के साथ विश्वासघात :
समाजवाद और श्रम के इस विराट संगठन को ऐसी शान्तिकालीन गतिविधियों
के लिए अनुकूलित कर दिया गया, और जब संकट आया, तो बहुत से नेता और
जनसमुदायों के भारी हिस्से अपनेआप को इस नयी स्थिति के अनुरूप बनाने में
असमर्थ हो गये...। यही वह अपरिहार्य स्थिति है जो बहुत हद तक दूसरे
इण्टरनेशनल के विश्वासघात का कारण है।
मार्क्स टु लेनिन, पृष्ठ 140 (मॉरिस हिलक्विट)
“द सिनिक्स वर्ड बुक” (1906)³
एम्ब्रोस प्रियर्स लिखता है :
- लेनिन की पुस्तक, द्वितीय इंटरनेशनल का पतन
- निकोलाई हवानोविच बुख़ारिन (1888-1938) – रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी
के सदस्य। राज्य, सर्वहारा अधिनायकत्व, राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार तथा ऐसे
ही अन्य प्रश्नों पर लेनिन विरोधी दृष्टिकोण अपनाते रहे। अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति के बाद
बार-बार लेनिनवादी पार्टी नीति का विरोध किया। 1937 में अपनी पार्टी विरोधी गतिविधियों
के कारण पार्टी से निकाले गये। - व्यंग्यात्मक परिभाषाओं की पुस्तक, जो बाद में डेविल्स डिक्शनरी के नाम से प्रकाशित
हुई। एम्ब्रोस बियर्स (1842-1914) अमेरिकी पत्रकार, कथाकार और व्यंग्यकार थे।
598 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
“ग्रेप शॉट¹ – (संज्ञा) – एक तर्क जिसे भविष्य अमेरिकी समाजवाद की
माँगों के जवाब में तैयार कर रहा है।”
<u>पृष्ठ 51 (48)</u>
धर्म, स्थापित व्यवस्था का समर्थक :
दासता :
1835 में, प्रेस्बिटेरियन चर्च की जनरल असेम्बली ने प्रस्ताव पारित किया
कि : “दासता पुराने और नये दोनों ही टेस्टामेण्टों में स्वीकृत है, और इसे
ईश्वरीय सत्ता ने वर्जित नहीं किया है।”
द चार्ल्सटन बैप्टिस्ट एसोसिएशन ने 1835 में निम्नलिखित फ़रमान जारी
किया :
“मालिकों द्वारा अपने गुलामों के समय का इस्तेमाल करने के अधिकार को
सभी चीज़ों के सृष्टा ने स्पष्टतः मान्यता दे रखी है, जो अपनी मर्जी से जिस भी
चीज़ पर चाहे सम्पत्ति का अधिकार लागू कर सकता है।”
वर्जीनिया के मेथॉडिस्ट कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर रेवरण्ड ई. डी. साइमन,
डॉक्टर ऑफ़ डिवाइनिटी, ने लिखा :
“होली रिट (ईसाई धर्मशास्त्र – स.) के अवतरणों में साफ़ तौर पर गुलामों
के ऊपर सम्पत्याधिकार और इस अधिकार से सम्बन्धित रोज़मर्रा की बातों का
उल्लेख किया गया है। तब, कुल मिलाकर, बात यही है, चाहे हम स्वयं ईश्वर द्वारा
स्थापित यहूदी नीति को देखें, या सभी युगों में मानवजाति के एक समान विचार
और व्यवहार को लें, या न्यू टेस्टामेण्ट और नैतिक नियम के विधि-निषेध सम्बन्धी
निर्देशों को देखें; हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दासता अनैतिक नहीं है। जब
यह बात सिद्ध हो चुकी है कि अफ्रीकी दास क़ानूनी तौर पर ख़रीदकर बँधुआ
बनाये जाते थे, तब उनके बच्चों को बँधुआ बनाकर रखने की बात भी अपरिहार्यतः
सिद्ध ही हो जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिका में जो दासता मौजूद
है, उसकी स्थापना सही थी।”
पूँजीवाद का समर्थन :
हेनरी वॉन डाईक² “एस्से इन एप्लीकेशन” (1905) में लिखता है :
“बाइबिल की शिक्षा है कि ईश्वर दुनिया का मालिक है। वह अपनी शुभंकर
इच्छा से, सामान्य नियमों के अनुरूप, प्रत्येक आदमी को उसका भाग देता है।”
- बन्दूक़ के छर्रे
- हेनरी वॉन डाईक (1852-1933) : अमेरिकी धार्मिक विचारक और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 599
पृष्ठ 52 (49)
संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में आँकड़े :
सैन्य-संख्या 50,000 थी }
अब यह 300,000 है।
धनकुबेरों के पास 67 अरब की सम्पदा है।
व्यवसायों में लगे कुल व्यक्तियों में से
केवल 9/10 प्रतिशत ही धनिकतन्त्र में शामिल हैं।
फिर भी उनके पास कुल सम्पदा का 70 प्रतिशत है।
व्यवसायों में लगे कुल व्यक्तियों में से
29 प्रतिशत मध्यम वर्ग से सम्बन्धित हैं
उनके पास कुल सम्पदा का 25 प्रतिशत है = 24 अरब
व्यवसायों में लगे लोगों में से शेष 70 प्रतिशत
सर्वहारा वर्ग से सम्बन्धित हैं और उनके पास
कुल सम्पदा का सिर्फ़ 4 प्रतिशत अर्थात 4 अरब है।
लूसियन सैनियल के अनुसार, 1900 में
व्यवसाय में लगे कुल लोगों में से
= 250,251 धनिकतन्त्र से सम्बन्धित थे
= 8,429,845 मध्यम वर्ग से सम्बन्धित थे
= 20,395,137 सर्वहारा वर्ग से सम्बन्धित थे।
– आयरन हील¹
रायफ़लें :
“तुम कहते हो कि संसद और राजकीय पदों पर तुम्हारा बहुमत होगा, लेकिन
“तुम्हारे पास रायफ़लें कितनी हैं? क्या तुम्हें मालूम है कि पर्याप्त सीसा तुम्हें कहाँ
से मिल सकता है? जहाँ तक बारूद की बात है, रासायनिक मिश्रण, यान्त्रिक
मिश्रणों से बेहतर होते हैं, ये बात मेरी मान लो।”
– आयरन हील, पृष्ठ 198²
- और 2. जैक लण्डन का उपन्यास
600 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 53 (50)
सत्ता...¹
एक समाजवादी नेता ने धनिकतन्त्र की एक मीटिंग को सम्बोधित किया और
उन पर समाज के कुप्रबन्ध का दोष लगाया और इस प्रकार पीड़ित मानवता के
सम्मुख उपस्थित सभी विकरालताओँ और दुख-तकलीफ़ों की सारी की सारी
ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थोप दी। बाद में एक पूँजीपति (मि. विक्सन) उठ खड़ा हुआ
और उसे इस प्रकार सम्बोधित किया :²
“इस पर हमारा जवाब यह है। हमारे पास तुम्हारे ऊपर बरबाद करने के लिए
शब्द नहीं हैं। जब तुम अपने गर्वीले मज़बूत हाथ हमारे महलों और वैभव की ओर
बढ़ाओगे, तब हम तुम्हें दिखा देंगे कि हमारी क्या ताक़त है। बमगोलों की
गड़गड़ाहट और मशीनगनों की तड़तड़ाहट से हम अपना जवाब देंगे। हम तुम
क्रान्तिवादियों को अपनी एड़ियों तले पीस डालेंगे, और तुम्हारे चेहरों को कुचल
डालेंगे। यह दुनिया हमारी है। हम इसके मालिक हैं और यह हमारी ही रहेगी। जहाँ
तक श्रम की बात है, यह तो जब से इतिहास शुरू हुआ तभी से धूल चाटता रहा
है, और मैंने इतिहास को ठीक से पढ़ा है। और यह तब तक धूल चाटता रहेगा जब
तक हमारे और हमारे उत्तराधिकारियों के हाथ में सत्ता रहेगी।
“एक शब्द है – सत्ता। यह सभी शब्दों का राजा है। ईश्वर नहीं, धन-वैभव
नहीं, बल्कि सत्ता। अपनी ज़बान पर रख लो और तब तक रखे रहो जब तक कि
यह उसे झनझनाने न लगे।”
“मुझे उत्तर मिल गया”, अर्नेस्ट (उस समाजवादी नेता)³ ने निर्विकार भाव
से कहा। “एकमात्र यही उत्तर दिया भी जा सकता था। सत्ता। हम मज़दूर वर्ग
के लोग इसी का तो प्रचार करते हैं। हम जानते हैं और अपने कटु अनुभव से
भलीभाँति जानते हैं, कि सत्य की, न्याय की, मानवता की, कोई भी अपील
कभी तुम्हें छू नहीं सकती। तुम्हारे दिल भी तुम्हारी उन एड़ियों की तरह ही
कठोर हैं जिनसे तुम ग़रीबों के चेहरे कुचलते हो। इसीलिए तो हमने सत्ता का
प्रचार किया है। लेकिन, चुनाव के दिन हमारे मतपत्रों की ताक़त तुमसे तुम्हारी
सरकार छीन ले जायेगी...।”
“अगर चुनाव के दिन तुम्हें बहुमत, भारी बहुमत मिल ही जाये, तो भी
उससे क्या फ़र्क पड़ने वाला है”, मि. विक्सन तपाक से बोला।
- शीर्षक का शेष हिस्सा फटा हुआ है
- भगतसिंह के शब्द
- कोष्ठक में भगतसिंह के शब्द
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 601
“मान लो यदि मतपेटिकाओं में तुम्हारी जीत के बावजूद हम तुम्हें सत्ता सौंपने
से इन्कार कर दें तो?” [पृष्ठ 54 (51) पर जारी]
“हमने उस पर भी सोच रखा है”, अर्नेस्ट ने जवाब दिया। “और इसका जवाब
हम तुम्हें गोलियों से देंगे। सत्ता, तुम्हीं ने इसे शब्दों का राजा कहा है। बहुत अच्छा!
सत्ता, देखेंगे इसे। और जिस दिन हम चुनाव में विजय हासिल कर लेंगे, और तुम
हमारी इस संवैधानिक और शान्तिपूर्ण ढंग से हासिल की गयी सत्ता को हमें सौंपने
से इन्कार कर दोगे, तो तुम्हारे इस सवाल के जवाब में कि हम क्या करेंगे – उस
दिन, मैं बता दूँ, कि हम तुम्हें इसका जवाब देंगे, हम बमगोलों की गड़गड़ाहट और
मशीनगनों की तड़तड़ाहट से अपना जवाब देंगे।
“तुम हमसे बच नहीं सकते। यह सही है कि तुमने इतिहास को ठीक से पढ़ा
है। यह सही है कि श्रम इतिहास के आरम्भ से ही धूल चाटता आ रहा है। और
यह भी सही है कि जब तक तुम्हारे और तुम्हारे उत्तराधिकारियों के हाथ में सत्ता
रहेगी, तब तक श्रम धूल ही चाटता रहेगा। मैं तुमसे सहमत हूँ। तुमने जो कुछ कहा
है उन सारी बातों से मैं सहमत हूँ। सत्ता ही निर्णायक होगी, जैसाकि हमेशा होता
आया है; यही तो वर्गों का संघर्ष है। जैसे तुम्हारे वर्ग ने पुराने सामन्ती तन्त्र को ध्वस्त
किया, ठीक वैसे ही मेरा वर्ग, मज़दूर वर्ग, तुम्हारे वर्ग को ध्वस्त कर डालेगा। अगर
तुम अपने प्राणिविज्ञान और अपने समाज विज्ञान को भी उतनी ही स्पष्टता से पढ़ो,
जितनी स्पष्टता से तुम इतिहास पढ़ते हो, तो तुम देखोगे कि मैंने जिस हश्र का वर्णन
किया है वह अपरिहार्य है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इसमें एक वर्ष लगेगा,
दस वर्ष लगेंगे या हज़ार वर्ष लगेंगे – यह तय है कि तुम्हारा वर्ग मिट्टी में मिल
जायेगा। और यह सत्ता के जरिये ही होगा। हम मेहनतकश इस शब्द को इतना रट
चुके हैं कि हमारे दिमाग़ इससे झनझना रहे हैं। सत्ता। यह एक राजोचित शब्द है।”
– जैक लण्डन कृत आयरन हील (पृष्ठ 88)
पृष्ठ 55 (52)
आँकड़े¹
इंग्लैण्ड :
1922 – बेरोज़गारों की संख्या = 1,135,000
1926 – यह 1¼ से 1½ मिलियन के बीच
अर्थात 1,250,000 से 1,500,000 के बीच रही है।
- स्रोत का पता नहीं
602 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अंग्रेज़ मज़दूर नेताओं का विश्वासघात
1911 से 1913 तक के वर्ष आमतौर पर खदान मज़दूर, रेलकर्मियों और परिवहन
मज़दूरों के बेमिसाल वर्ग-संघर्षों का समय था। अगस्त 1911 में, रेलवे की राष्ट्रीय,
दूसरे शब्दों में, आम हड़ताल, फूट पड़ी थी। उन दिनों ब्रिटेन के ऊपर क्रान्ति की एक
धुँधली छाया मँडरा रही थी। लेकिन नेतागण ने इस आन्दोलन को पंगु कर डालने के
लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी। उनका इरादा "देशभक्ति" का था; यह हरकत
अगादिर की उस घटना के समय की जा रही थी, जिसने जर्मनी के साथ युद्ध का
ख़तरा उपस्थित कर दिया था। जैसाकि आज भलीभाँति मालूम है, प्रधानमन्त्री ने
मज़दूर-नेताओं को एक गुप्त बैठक में बुलाया और उनसे पितृभूमि की रक्षा की अपील
की। और नेताओं ने, बुर्जुआ वर्ग को मज़बूत करने के लिए अपने बूतेभर सब कुछ
दिया, और इस प्रकार साम्राज्यवादी नरसंहार के लिए रास्ता साफ़ किया।
(पृष्ठ 3) ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग?$^1$
त्रात्स्की$^2$
<u>पृष्ठ 56 (53)</u>
विश्वासघात :
केवल 1920, यानी 'काले शुक्रवार' के बाद ही, आन्दोलन सीमाओं में वापस
लौटा, जब ख़ानकर्मियों, रेलकर्मियों और परिवहनकर्मियों के त्रिपक्षीय संश्रय के
नेताओं ने आम हड़ताल के साथ विश्वासघात कर दिया।
(पृष्ठ 3)$^3$
सुधार के लिए क्रान्ति का ख़तरा ज़रूरी है :
...ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग ने यह समझ लिया था कि ऐसे उपाय (सुधार) के जरिये
क्रान्ति को टाला जा सकता है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि सुधारों तक
- त्रात्स्की की कृति ह्वेयेर इज़ ब्रिटेन गोइंग?
- लिओन त्रात्स्की : लेव दवीदोविच त्रात्स्की (1879-1940) – लेनिनवाद के घोर
विरोधी। रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी (बोल्शेविक) की छठी कांग्रेस में (1917)
बोल्शेविक पार्टी के सदस्य बन गये। अक्टूबर क्रान्ति में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी। क्रान्ति के
बाद कई सरकारी पदों पर रहे। 1923 में पार्टी की आम नीति और समाजवाद के निर्माण
के लेनिन के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ गुटबाज़ी भरा संघर्ष चलाया तथा इस बात का प्रचार
किया कि सोवियत संघ में समाजवाद की विजय असम्भव है। कम्युनिस्ट पार्टी ने
त्रात्स्कीवाद को पार्टी में निम्न पूँजीवादी प्रवृत्ति के रूप में बेनकाब किया और उसे संगठन
व विचारधारा के दृष्टिकोण से पराजित किया। त्रात्स्की 1927 में पार्टी से निकाल दिये गये
ओर 1929 में सोवियत विरोधी गतिविधियों के कारण उन्हें देश निकाला दे दिया गया।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 603