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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 788 में से

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पृष्ठ 556

क्रान्ति द्वारा ही शिकस्त दी जा सकती है, मुख्यतः पेशेवर क्रान्तिकारियों पर
आधारित सर्वहारा वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के मार्गदर्शन में व्यापक मेहनतकश
जनता व मध्यवर्ग के जनसंगठन खड़ा करके जनान्दोलन का मार्ग अपनाया जाना
चाहिए और यह कि, इसके बाद ही सशस्त्र क्रान्ति द्वारा सत्ता पलटकर सर्वहारा
अधिनायकत्व की स्थापना की जा सकती है। एच.एस.आर.ए. के सिद्धान्तकारों में
भगतसिंह सर्वोपरि थे और उनकी पूरी विचार-यात्रा को 1929 से मार्च 1931 तक
(यानी फाँसी चढ़ने तक) के उनके दस्तावेज़ों, लेखों, पत्रों और वक्तव्यों में देखा
जा सकता है। भगतसिंह के सर्वोन्नत विचार फ़रवरी 1931 के दो भाग के उस
मसविदा दस्तावेज़ में देखने को मिलते हैं जो 'क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा'
नाम से 'भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़' (सं. – जगमोहन सिंह,
चमनलाल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) में संकलित है।
भगतसिंह की जेल नोटबुक मिलने के बाद भगतसिंह के चिन्तक व्यक्तित्व
की व्यापकता और गहराई पर और अधिक स्पष्ट रोशनी पड़ी है, उनकी विकास
की प्रक्रिया समझने में मदद मिली है और यह सच्चाई और अधिक पुष्ट हुई है
कि भगतसिंह ने अपने अन्तिम दिनों में, सुव्यवस्थित एवं गहन अध्ययन के बाद
बुद्धिसंगत ढंग से मार्क्सवाद को अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाया था। एकबारगी
तो यह बात अविश्वसनीय-सी लगती है कि क्रान्तिकारी जीवन और जेल की
बीहड़ कठिनाइयों में भगतसिंह ने ब्रिटिश सेंसरशिप की तमाम दिक्क़तों के बावजूद
पुस्तकें जुटाकर इतना गहन और व्यापक अध्ययन कर डाला। महज 23 वर्ष की
छोटी-सी उम्र में चिन्तन का जो धरातल उन्होंने हासिल कर लिया था, वह उनके
युगद्रष्टा युगपुरुष होने का ही प्रमाण था। ऐसे महान चिन्तक ही इतिहास की दिशा
बदलने और गति तेज़ करने का माद्दा रखते हैं। भगतसिंह की शहादत भारतीय जनता
को आज भी क्षितिज पर अनवरत जलती मशाल की तरह प्रेरणा देती है, पर यह
भी सच है कि उनकी फाँसी ने इतिहास की दिशा बदल दी। यह सोचना ग़लत
नहीं है कि भगतसिंह को 23 वर्ष की अल्पायु में यदि फाँसी नहीं हुई होती तो
राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का इतिहास और भारतीय सर्वहारा क्रान्ति का इतिहास शायद
कुछ और ही ढंग से लिखा जाता।
बहरहाल, इतिहास की उतनी ही दुखद विडम्बना यह भी है कि आज भी इस
देश के शिक्षित लोगों का एक बड़ा हिस्सा भगतसिंह को एक महान वीर तो मानता
है, पर यह नहीं जानता कि 23 वर्ष का वह युवा एक महान चिन्तक भी था।
राजनीतिक आज़ादी मिलने के पचास वर्षों बाद भी सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय, नेहरू
वाङ्मय से लेकर सभी राष्ट्रपतियों के अनुष्ठानिक भाषणों के विशद्ग्रन्थ तक
प्रकाशित होते रहे पर किसी भी सरकार ने भगतसिंह और उनके साथियों के सभी
दस्तावेज़ों को अभिलेखागार, पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तिगत संग्रहों से निकालकर
550 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़