भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 557, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंछापने की सुध नहीं ली।
छुटपुट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, अजय कुमार घोष, शिव वर्मा,
सोहन सिंह जोश, जितेन्द्र नाथ सान्याल आदि भगतसिंह के समकालीन
क्रान्तिकारियों की विभिन्न पुस्तकों-लेखों, भगतसिंह के अनुज की पुत्री वीरेन्द्र
सिन्धु की पुस्तकों तथा गोपाल ठाकुर, जी. देवल, मन्मथनाथ गुप्त, बिपन
चन्द्र, हंसराज रहबर, कमलेश मोहन आदि इतिहासकारों-लेखकों के विभिन्न
लेखों एवं पुस्तकों से भगतसिंह के विचारक व्यक्तित्व पर रोशनी अवश्य पड़ती रही
है, पर बहुसंख्यक शिक्षित आबादी भी इससे बहुत कम ही परिचित रही है।
भगतसिंह के कुछ ऐतिहासिक बयानों-दस्तावेज़ों को सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में
दिल्ली से कुछ क्रान्तिकारी वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की पहल पर प्रकाशित होने
वाली ‘मुक्ति’ पत्रिका ने प्रकाशित किया। इसके बाद कई पत्रिकाओं ने और
क्रान्तिकारी ग्रुपों ने पुस्तिकाओं के रूप में भगतसिंह के चुने हुए कुछ लेखों को
छापने का काम किया। भगतसिंह के साथी शिववर्मा ने उनके चुनिन्दा लेखों का
संकलन अंग्रेज़ी और हिन्दी में प्रकाशित किया।
सबसे पहले जगमोहन सिंह (भगतसिंह की बहन के पुत्र) और चमनलाल
ने भगतसिंह और उनके साथियों के अधिकांश वक्तव्यों, लेखों, पत्रों और दस्तावेज़ों
को एक जगह संकलित किया (हालाँकि यह संकलन भी सम्पूर्ण नहीं है) जो
1986 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ।
इस तथ्य की चर्चा भगतसिंह के कई साथियों और इतिहासविदों ने की
है कि जेल में उन्होंने चार और पुस्तकें लिखी थीं : ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद
का आदर्श’, ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’ तथा ‘मृत्यु के द्वार पर’।
दुर्भाग्यवश इनकी पाण्डुलिपियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं और माना यही जाता है कि
वे नष्ट हो चुकी हैं। हालाँकि इनके ग़ायब होने की कहानी भी रहस्यमय है और
इसमें भी किसी साज़िश से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, यह
भारतीय इतिहास के सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंगों में से एक है।
अब हम भगतसिंह की उस ऐतिहासिक जेल नोटबुक की चर्चा पर आते हैं
जो पहली बार 1993 में जयपुर से ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ से 'A Martyrs
Notebook' नाम से प्रकाशित हुई। इसका सम्पादन भूपेन्द्र हूजा ने किया था। इस
डायरी के प्रारम्भ में दी गयी परिचयात्मक टिप्पणी के अनुसार, इसकी हस्तलिखित/
डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि एक पैकेट के रूप में पहली बार जी.बी. कुमार हूजा
(गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार के तत्कालीन कुलपति) को 1981 में गुरुकुल, इन्द्रप्रस्थ
के दौरे के समय स्वामी अग्निवेश से मिली थी।
पर इससे भी पहले यह डायरी 1977 में एल.वी. मित्रोखिन ने फ़रीदाबाद में
रह रहे भगतसिंह के भाई कुलबीर सिंह के पास देखी थी और उसका विस्तृत
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 551