भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
तरफ़ से उपयुक्त व्यक्तियों को लगाया जाना चाहिए और उनके दिलो-दिमाग़ में
इस बात को बैठा देना होगा कि वे क्रान्ति के लिए नहीं हैं वरन यह कि क्रान्ति
उनके लिए है। इसी प्रकार से किसानों को भी संगठित करना होगा।
3. स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र के विचार को प्रचारित करने के लिए प्रत्येक प्रान्त
में साप्ताहिक अख़बार शुरू करने होंगे।
4. समसामयिक घटनाक्रम और विदेशों में प्रचलित विचारों के प्रवाह से
जनसाधारण को अवगत कराने के लिए पुस्तिकाओं और परचों का प्रकाशन।
5. कांग्रेस और दूसरी सार्वजनिक गतिविधियों को जहाँ तक हो सके प्रभावित
करना और उसे अपने उपयोग में लाना।
निजी :
(ए) गुप्त प्रेस की स्थापना करना और उसके जरिये ऐसे साहित्य को प्रकाशित
करना जिसे कि आसानी से खुले में न प्रकाशित किया जा सकता हो।
(बी) इस प्रकार के साहित्य को प्रसारित करना।
(सी) देश के प्रत्येक भाग में ज़िलेवार ढंग से इस एसोसिएशन की शाखाएँ
स्थापित करना।
(डी) जिस भी तरीक़े से सम्भव हो पैसों की व्यवस्था करना।
(ई) उपयुक्त लोगों को दूसरे देशों में भेजना जहाँ पर वे सैनिक या वैज्ञानिक
प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हों ताकि वे खुले विद्रोह के समय पर सेनाओं एवं आयुध
फ़ैक्टरियों की कमान सँभालने के लिए सैन्य या वैज्ञानिक विशेषज्ञ हासिल कर
सकें।
(एफ़) हथियारों एवं गोला-बारूद का आयात करना और इसके अलावा जहाँ
तक सम्भव हो उनका देश के भीतर ही निर्माण करना।
(जी) भारत के बाहर के भारतीय क्रान्तिकारियों के साथ निकट सम्पर्क बनाये
रखना और उनके साथ सहयोग करना।
(एच) एसोसिएशन के सदस्यों को मौजूदा सेना में सूचीबद्ध करना।
(आई) कभी-कभार के प्रतिकारी उपायों और प्रचार के द्वारा अपने ध्येय के
प्रति जनता की हमदर्दी हासिल करना और इस प्रकार हमदर्दों के दल का निर्माण
करना।
सभी सदस्यों को प्रत्येक प्रान्त के विभिन्न ज़िलों के प्रभारी संगठनकर्ताओं द्वारा
भरती किया जायेगा। प्रत्येक सदस्य को अपना पूरा समय एसोसिएशन के कामों को
देने और ज़रूरत पड़ने पर अपनी जान को जोखिम में डालने के लिए तैयार रहना
होगा।
उसे ज़िला संगठनकर्ता के आदेशों का अक्षरशः पालन करना होगा।
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उसे अपनी स्वयं की पहलक़दमी का विकास करना चाहिए और यह याद
रखना चाहिए कि एसोसिएशन की सफलता उसके एक-एक सदस्यों की सूझबूझ,
पहलक़दमी और दायित्वबोध पर काफ़ी कुछ निर्भर करती है।
उसका व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए कि जोकि उसे ध्येय के बारे में
पूर्वाग्रह न क़ायम करे जिसके लिए उसका एसोसिएशन लगा हुआ है और इस
संगठन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नुक़सान पहुँचाने वाले व्यवहार से दूर रहना
चाहिए।
ज़िला संगठनकर्ता की सहमति के बग़ैर इस एसोसिएशन का कोई भी सदस्य
किसी भी दूसरे संगठन से सम्बन्ध नहीं रख सकेगा।
कोई भी सदस्य ज़िला संगठनकर्ता को बताये बग़ैर अपनी जगह को नहीं
छोड़ेगा।
प्रत्येक सदस्य को इस बात की भरसक कोशिश करनी होगी कि वह पुलिस
या जनता की निगाह में क्रान्तिकारी जमात से सम्बन्ध रखने के लिए सन्देह के घेरे
में न आ जाये।
प्रत्येक सदस्य को यह याद रखना होगा कि उसका अपना व्यवहार और
ग़लतियाँ समूचे संगठन को विनष्ट करने की ओर ले जा सकती हैं।
कोई भी सदस्य जहाँ तक उसके सार्वजनिक जीवन का सम्बन्ध है, ज़िला
संगठनकर्ता से कुछ भी नहीं छिपायेगा।
ग़द्दारी करने वाले सदस्यों को निष्कासन या मौत के द्वारा दण्डित किया जायेगा।
दण्ड देने का अधिकार पूरी तरह से “प्रा. स.” के पास होगा।
परिशिष्ट / 509
परिशिष्ट : तीन
गाँधीजी के नाम
शचीन्द्रनाथ सान्याल का खुला पत्र
मैं समझता हूँ कि यह मेरा दायित्व है कि मैं आपको उस वादे की याद दिलाऊँ
जिसे कि आपने कुछ समय पहले किया था कि जब क्रान्तिकारी एक बार फिर
अपनी चुप्पी तोड़कर भारतीय राजनीति के क्षेत्र में दाखि़ल होंगे तो आप राजनीति
के क्षेत्र से संन्यास ले लेंगे।। अहिंसावादी असहयोग आन्दोलन का प्रयोग अब ख़त्म
हो चुका है। आप अपने प्रयोग के लिए पूरा एक साल चाहते थे, लेकिन प्रयोग अगर
पाँच नहीं तो कम से कम पूरे चार सालों तक चला, और क्या अभी भी आप यह
कहना चाहते हैं कि यह काफ़ी लम्बे समय तक नहीं चला है?
आप वर्तमान युग के महानतम व्यक्तित्वों में से एक हैं और आपके प्रत्यक्ष
मार्गदर्शन एवं प्रेरणा के तहत आपके कार्यक्रम को वास्तव में एक या दूसरे कारण
से देश के सर्वश्रेष्ठ लोगों द्वारा आगे बढ़ाया गया। हज़ारों नौजवानों, हमारे देश के
युवाओं ने आपके कल्ट (व्यक्ति-पूजा) को अपने समूचे उत्साह से गले लगाया।
व्यवहार में समूचे राष्ट्र ने आपके आह्वान का उत्तर दिया। यह कहना ग़लत नहीं
होगा कि जनता की यह प्रतिक्रिया चमत्कारिक नहीं तो असाधारण अवश्य थी।
इससे अधिक आप क्या चाहते? आपके अनुयायियों में बलिदान और ईमानदारी
की कमी न थी, सर्वाधिक स्वार्थी पेशेवर लोगों ने अपने पेशों का त्याग कर
दिया, देश के युवाओं ने अपनी समस्त सांसारिक सम्भावनाओं का त्याग करके
आपके झण्डे तले एकत्रित शक्तियों में शामिल हो गये, रुपये-पैसे की आमद नहीं
होने से हज़ारों परिवार कंगाल हो गये। पैसे की कमी न थी। आप एक करोड़
रुपया चाहते थे और आपको उससे अधिक मिला जितना कि आप चाहते थे।
वस्तुतः अगर मैं कहूँ कि आपके आह्वान का प्रत्युत्तर स्वयं आपकी उम्मीद से भी
अधिक था तो सम्भवतः मैं बहुत ग़लत नहीं होऊँगा। मैं यह कहना चाहूँगा कि
भारत ने अपनी योग्यता के अनुसार भरसक आपका अनुसरण किया और मैं
समझता हूँ कि इस बात से शायद ही इन्कार किया जा सके और अभी भी आप
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यह कहना चाहते हैं कि प्रयोग पर्याप्त समय तक नहीं चला?
दरअसल, आपका कार्यक्रम विफल रहा है जिसमें भारतीयों की कोई ग़लती
नहीं है। आपके पास देश के लिए केवल एक कार्यक्रम है लेकिन आप विजयी
लक्ष्य तक राष्ट्र को नहीं ले जा सकते। यह कहना कि अहिंसक असहयोग इसलिए
विफल रहा कि लोग पर्याप्त मात्रा में अहिंसक नहीं थे, वकील की भाँति तर्क
करना है न कि पैग़म्बर की भाँति। लोग उससे अधिक अहिंसक नहीं हो सकते
जितना कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान रहे हैं। मैं यह कहना चाहूँगा कि वे उस
हद तक अहिंसक थे, जहाँ से कायरता की बू आती है। आप सम्भवतः यह कहेंगे
कि यह वह अहिंसा, कायरों की अहिंसा नहीं थी जोकि आपका अभीष्ट थी।
बल्कि आपके कार्यक्रम में वह बात ही नहीं थी जोकि कायरों को नायकों में
रूपान्तरित कर पाती या जो नायकों के समूहों के बीच से कायरों का पता लगाकर
अन्ततोगत्वा उन्हें ख़ारिज कर देती। इसमें जनता की कोई ग़लती नहीं थी। और यह
कहना कि असहयोग आन्दोलन में शामिल लोगों की बहुसंख्या नायकों की नहीं
वरन कायरों की थी, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना है। यह कहना राष्ट्र के पौरुष
के साथ खिलवाड़ करने जैसा कहीं अधिक है। भारतीय कायर नहीं हैं। उनकी
बहादुरी की तुलना हमेशा ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ नायकों की बहादुरी के साथ की
जा सकेगी। इस बात से इन्कार करना इतिहास से इन्कार करना है। जब मैं भारतीयों
की वीरता की बात करता हूँ तो मेरा मतलब गौरवशाली अतीत की जाज्वल्यमान
वीरता से ही नहीं होता वरन मैं उस वीरता को भी शामिल करता हूँ जोकि स्वयं
को वर्तमान में प्रकट कर रही है क्योंकि भारत में अभी भी मुरदे नहीं बसते।
भारत को गुरु गोबिन्द सिंह या गुरु रामदास और शिवाजी जैसे नेता की तरह
असली नेता की आवश्यकता है। भारत को एक कृष्ण की आवश्यकता है जोकि
उचित आदर्श प्रदान कर सके; जिसका अनुसरण अकेले भारत ही नहीं वरन सारी
मानवता द्वारा इस मानवता के विविध मिज़ाजों एवं क्षमताओं वाले सभी सदस्यों द्वारा
किया जाना वाला हो।
अहिंसक असहयोग आन्दोलन इसलिए नहीं विफल हुआ कि यत्र-तत्र दबी हुई
भावनाएँ फूट पड़ीं वरन इसलिए विफल हुआ कि आन्दोलन के पास उचित आदर्श
का अभाव था। आपके द्वारा बताया जाने वाला आदर्श भारतीय संस्कृति एवं
परम्पराओं के अनुरूप नहीं है। उसमें नक़ल की बू आती है। अहिंसा का आपका
दर्शन, कम से कम वह दर्शन जिसे आप लोगों को स्वीकार करने के लिए कहते
हैं, हताशा से उपजा हुआ दर्शन है। यह भारतीय ऋषियों की अहिंसा की भावना
नहीं है। यह टॉलस्टायवाद और बौद्ध-धर्म का अपूर्ण भौतिक मिश्रण है न कि पूरब
और पश्चिम का रासायनिक मिश्रण। आपने कांग्रेसों एवं सम्मेलनों की पश्चिमी
पद्धति को अपनाया और देश-काल से निरपेक्ष रहकर अहिंसा की भावना को
परिशिष्ट / 511
स्वीकार करने के लिए समूचे राष्ट्र को तैयार करने की कोशिश की। लेकिन यह
भावना भारतीयों के लिए में व्यक्तिगत साधना का मामला था। और सर्वोपरि तौर
पर भारत के अन्तिम राजनीतिक लक्ष्य की बाबत आपकी समझ साफ़ नहीं थी और
भी अस्पष्ट बनी हुई है। यह दुखद स्थिति है। स्वतन्त्रता का आपका विचार भारतीय
आदर्शों से मेल नहीं खाता है। भारत सर्वम परवशम दुखम् सर्वमत्वमसम सुखम और
इस आदेश की हिमायत करता है कि व्यक्ति का अस्तित्व पूर्णतया मानवता के
उद्देश्य के लिए होता है और मानवता के जरिये ईश्वर की सेवा होती है,
जगताथितमच, कृष्णमा च। वह अहिंसा जिसका भारत उपदेश देता है अहिंसा के
लिए अहिंसा नहीं है, वरन मानवता की भलाई के लिए अहिंसा है और जब मानवता
की भलाई हिंसा और रक्त-पात की माँग करेगी तो भारत ख़ून बहाने से उसी प्रकार
नहीं हिचकिचायेगा जिस प्रकार से शल्यक्रिया से ख़ून बहाने की आवश्यकता
उत्पन्न कर देती है। आदर्श भारतीय के लिए हिंसा या अहिंसा का एक जैसा महत्त्व
होता है, बशर्ते कि उनसे अन्ततोगत्वा मानवता की भलाई होती हो। विनाशाय च
दुष्कृताम् व्यर्थ में ही नहीं कहा गया है।
अतएव मेरे विचार में आपके द्वारा राष्ट्र के सम्मुख रखा गया आदर्श या आपके
द्वारा उसके सामने प्रस्तुत किया गया कार्रवाई का कार्यक्रम न तो भारतीय संस्कृति
के अनुरूप है और न ही राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर अमल में लाने योग्य।
यह सोचना बस अकल्पनीय और अबोधगम्य है कि आप अभी भी
थोड़ी-बहुत यह आशा पाले हुए हैं कि इंग्लैण्ड अपनी स्वयं की इच्छा से न्यायपूर्ण
और उदार हो सकता है – यह इंग्लैण्ड 'जोकि आत्मरक्षा के वैध उपाय के तौर
पर जलियाँवाला बाग़ नरसंहार' में यक़ीन करता है,' यह जिसने इंग्लैण्ड ओडायर
– नायर मामले की सुनवाई की और बर्बरता के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। अगर आप
के मन में ब्रिटिश सरकार की सद्बुद्धि में लेशमात्र भी आस्था बची हुई है तो
आपके अनुसार किसी कार्यक्रम की आवश्यकता ही आख़िर क्या है? अगर ब्रिटिश
सरकार को होश में लाने के लिए किसी आन्दोलन की आवश्यकता है, तो फिर
ब्रिटिश सरकार की ईमानदारी और नेक इरादों की बात क्यों की जाये? मुझे लगता
है कि आपके भीतर का पैग़म्बर मर चुका है और आप एक बार फिर कमज़ोर
मामले की पैरवी करने वाले वकील हैं; या सम्भवतः आप हमेशा से भाष्यकार रहे
हैं – केवल अर्द्ध-सत्यों के – ज़ोरदार व्याख्याकार। दुनिया के दूसरे स्वतन्त्र राष्ट्रों
के साथ गठजोड़ या महासंघ में समप्रभु स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र एक बात है और
इस साम्राज्यवादी ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासित भारत पूर्णतया दूसरी बात है।
ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर बने रहने की आपकी भावना बहुतेरी भयंकर भूलों में से
एक की याद दिलाती है, कि आपने मिथ्या औचित्य की वर्तमान ज़रूरतों के साथ
बेशक़ीमती आदर्श का समझौता किया है, और यही वह कारण है कि आप देश
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के युवाओं की कल्पनाशीलता आकृष्ट करने में विफल रहे हैं – ये वे युवा हैं जो
दिलेरी दिखा सकते थे और जो अभी भी आपकी इच्छाओं के ख़िलाफ़ जाने की
दिलेरी दिखा रहे हैं। हालाँकि वे बेहिचक इस बात को स्वीकार करते हैं कि आप
आधुनिक युग की महानतम शख़्सियतों में से एक हैं। ये भारतीय क्रान्तिकारी हैं।
उन्होंने अब और अधिक ख़ामोश नहीं रहने का फ़ैसला किया है, अतएव वे आपसे
राजनीति के क्षेत्र से अवकाश लेने का अनुरोध करते हैं, अथवा राजनीतिक
आन्दोलन को इस प्रकार से निर्देशित करें जिससे कि क्रान्तिकारी आन्दोलन को
उससे मदद हासिल हो न कि उसके मार्ग में रुकावट पैदा हो। अभी तक उन लोगों
ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आपके अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपनी गतिविधियों
को स्थगित रखा है पर अब वे आगे बढ़ चुके हैं। वास्तव में उन लोगों ने अपनी
ओर से आपको अपने कार्यक्रम को अमल में लाने में भरसक सहायता प्रदान की
है। लेकिन अब प्रयोग ख़त्म हो चुका है, लिहाज़ा क्रान्तिकारी लोग अपने वादे से
आज़ाद हैं। वस्तुतः उन्होंने केवल सालभर के लिए चुप रहने का वादा किया था,
इससे अधिक समय के लिए नहीं।
आगे, मैं इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि जब आपने 39वीं कांग्रेस में
अपने हालिया अध्यक्षीय सम्बोधन में क्रान्तिकारियों पर दोषारोपण किया था तो
आपने कई पहलुओं से उनका ग़लत मूल्यांकन किया था। आपने कहा कि
क्रान्तिकारी भारत की प्रगति में बाधा डाल रहे हैं। मुझे नहीं पता कि ‘प्रगति’ शब्द
से आपका मतलब क्या है। अगर आपका मतलब राजनीतिक प्रगति से है तो क्या
आप इससे इन्कार कर सकते हैं कि भारत द्वारा पहले ही हासिल की जा चुकी
प्रत्येक राजनीतिक प्रगति, फिर वह चाहे मामूली ही क्यों न हो, मुख्यतया
क्रान्तिकारी पार्टी की क़ुर्बानियों एवं प्रयत्नों के द्वारा हासिल हुई है? क्या आपको
इससे इन्कार है कि बंगाल का विभाजन बंगाल के क्रान्तिकारियों के प्रयासों से रद्द
हुआ? क्या आपको इस बात में सन्देह है कि मोर्ले-मिण्टो सुधार भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन का फल है, जैसाकि मोण्टफ़ोर्ड सुधार को अमल में लाने
में अगर पूरी तरह नहीं तो मुख्य भूमिका अवश्य थी? अगर आप इन प्रश्नों का
सकारात्मक उत्तर देते हैं तो मुझे बहुत अधिक हैरानी नहीं होगी लेकिन मैं आपको
यक़ीन दिला सकता हूँ कि ब्रिटिश सरकार को इस आन्दोलन के सम्भावनासम्पन्न
होने का अहसास है। यहाँ तक कि स्वर्गीय मोंशेग्यू ने एक जाने-माने भारतीय से
यह बात कही थी कि महज युवा भारतीय क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के चलते
ही उन्होंने भारत आने की जहमत उठाई और अपने प्राणों को जोखिम में डाला।
अगर आप यह कहते हैं कि ये सुधार सच्ची प्रगति के सूचक नहीं हैं तो मैं
यह कहना चाहूँगा कि इस क्रान्तिकारी आन्दोलन ने भारत की नैतिक उन्नति में कोई
कम प्रगति नहीं हासिल की है। भारतीय मौत को लेकर दयनीय रूप से भयभीत
परिशिष्ट / 513
रहते हैं और इस क्रान्तिकारी पार्टी ने एक बार फिर भारतीयों को उदात्त ध्येय के
लिए मरने में निहित भव्यता और सौन्दर्य का अहसास कराया। क्रान्तिकारियों ने एक
बार फिर यह प्रदर्शित किया कि मृत्यु का भी कुछ आकर्षण होता है और वह हमेशा
भयावह चीज़ नहीं होती। अपने स्वयं के विश्वासों और आस्था के लिए मरना, इस
चेतना के साथ मौत को गले लगाना कि इस तरह से मरकर वह ईश्वर और राष्ट्र
की सेवा कर रहा है, ऐसे ध्येय के लिए जिस के न्यायोचित और वैध होने का
हमें ईमानदारी के साथ विश्वास होता है, मौत को स्वीकार करना या जान को उस
समय जोखिम में डालना जबकि मौत की पूरी सम्भावना हो क्या यह कोई नैतिक
प्रगति नहीं है?
यहाँ तक कि विपरीत परिस्थितियों और क्षणिक विफलताओं में भी अपने प्यारे
आदर्श को नहीं छोड़ना – क्षणिक उत्तेजनाओं और किसी आकर्षक व्यक्तित्व के
प्रकटतः उदात्त सिद्धान्तों के बहकावे में नहीं आना, लम्बी क़ैद बा-मशक़्क़त से विचलित
नहीं होना, सालों–साल अपनी अन्तरात्मा के प्रति सच्चे बने रहना – यह उद्देश्य की
दृढ़ता, चरित्र की यह मज़बूती उस सच्ची नैतिक प्रगति का सूचक नहीं है, जिसे
भारत ने हासिल किया है? और क्या यह क्रान्तिकारी आदर्शों का स्पष्ट परिणाम
नहीं है?
आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “हो सकता है कि आपको अपने जीवन की
परवाह न हो लेकिन आप अपने उन देशवासियों की अनदेखी नहीं कर सकते
जिनकी शहीद की मौत मरने की कोई इच्छा नहीं है।” अलबत्ता, क्रान्तिकारी इस
वाक्य के अर्थ को समझने में दुखद रूप से विफल रहे हैं। क्या आपके कहने का
मतलब यह है कि क्या क्रान्तिकारी उन 70 लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं
जिन्हें कि चौरी–चौरा मुक़दमे में फाँसी की सज़ा सुनायी गयी? क्या आपके कहने
का मतलब यह है कि जलियाँवाला बाग और गुजराँवाला में बमबारी और मासूमों
की हत्या के लिए क्रान्तिकारी ज़िम्मेदार हैं? क्या क्रान्तिकारियों ने पिछले बीस वर्षों
में अपने संघर्ष के दौरान या मौजूदा समय में भूखे–नंगे लोगों से कभी क्रान्तिकारी
संघर्ष में भाग लेने के लिए कहा है? सम्भवतः अधिकतर वर्तमान नेताओं के
मुक़ाबले क्रान्तिकारियों को जन–मनोविज्ञान का अधिक ज्ञान है। और यही वजह
थी कि उन्होंने तब तक अवाम को अपने साथ कभी नहीं लेना चाहा जब तक वे
अपनी स्वयं की शक्ति को लेकर आश्वस्त नहीं हो गये। उनका हमेशा से विश्वास
रहा है कि उत्तर भारत की जनता किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार है और
उनका यह सोचना भी सही है कि उत्तर भारत की जनता अत्यन्त घनीभूत
विस्फोटक पदार्थ है जिसके साथ सँभालकर पेश आना चाहिए। जनता की भावनाओं
का ग़लत आकलन तो आप और आपके सहयोगियों ने किया था जो उन्हें सत्याग्रह
आन्दोलन में घसीट ले गये। भीतर और बाहर से हज़ारो उत्पीड़न झेल रहे लोगों का
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गुस्सा भड़क उठना स्वाभाविक ही था, और आपको इसकी क़ीमत चुकानी ही थी।
लेकिन क्या आप ऐसा कोई उदाहरण दे सकते हैं जहाँ क्रान्तिकारियों ने अनिच्छुक
लोगों को मौत की घाटी में धकेला हो?
लेकिन अगर इस वाक्य से आपका यह मतलब है कि क्रान्तिकारियों की
गतिविधियों के कारण निर्दोष लोगों को सताया, क़ैद किया और मारा जा रहा है,
तो मैं बेहिचक और ईमानदारी से स्वीकार करूँगा कि जहाँ तक मेरी जानकारी है,
ऐसे एक भी व्यक्ति को फाँसी नहीं दी गयी जो किसी क्रान्तिकारी कार्रवाई से
निर्दोष था; और गिरफ़्तारियों तथा यातनाओं के बारे में मैं कह सकता हूँ कि निर्दोष
स्त्री-पुरुषों को वास्तव में क़ैद किया गया और यातनाएँ दी गयीं। लेकिन क्या
विदेशी सरकार द्वारा किये गये अत्याचार के लिए क्रान्तिकारी पार्टी को दोषी ठहराया
जा सकता है? विदेशी सरकार राष्ट्र में पौरुष की हर अभिव्यक्ति को कुचल देने
पर आमादा है। लेकिन इस तरह कुचलने के दौरान सरकार भयंकर भूलें करेगी और
वीरों के साथ ही कायरों को भी क़ैद में डालेगी और यातनाएँ देगी। लेकिन क्या
कायरों के दुखों के लिए देश के वीर जन ज़िम्मेदार हैं? इतना ही नहीं, इन दुखों
को शहीद की मौत नहीं कहा जा सकता।
अन्त में, मैं ब्रिटिश सरकार की शक्ति के बारे में आपकी टिप्पणियों के बारे
कुछ कहना चाहूँगा। आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “आप जिन्हें गद्दी से हटाना
चाहते हैं वे आपसे बेहतर ढंग से हथियारबन्द हैं और आपसे बहुत अधिक अच्छी
तरह संगठित हैं।” लेकिन क्या यह शर्मनाक नहीं है कि मुट्ठीभर अंग्रेज़ हिन्दुस्तान
पर राज कर रहे हैं, हिन्दुस्तानी जनता की स्वतन्त्र इच्छा से नहीं बल्कि तलवार के
बल पर?और अगर अंग्रेज़ बेहतर ढंग से हथियारबन्द और संगठित हो सकते हैं तो
हिन्दुस्तानी और भी बेहतर ढंग से हथियारबन्द और संगठित क्यों नहीं हो सकते –
वे हिन्दुस्तानी जो उच्च आत्मिक भावना से ओत-प्रोत हैं? हिन्दुस्तानी भी उसी तरह
मनुष्य हैं जिस तरह अंग्रेज़ हैं। फिर भला कौन-सा कारण हिन्दुस्तानियों को इतना
लाचार बना देता है कि वे अपने अंग्रेज़ स्वामियों से बेहतर हथियारबन्द और संगठित
नहीं हो सकते? किस तर्क से आप उन क्षमताओं की अनदेखी कर सकते हैं जिनमें
क्रान्तिकारियों को पूरा भरोसा है? और इस लाचारगी तथा हताशा से जन्मी अहिंसा
की भावना शक्तिशाली की अहिंसा, भारतीय ऋषियों की अहिंसा कभी नहीं हो
सकती। यह सीधे-सीधे तमस है, और कुछ नहीं।
मुझे क्षमा करें महात्माजी, यदि मैंने आपके दर्शन और सिद्धान्तों की आलोचना
करने में कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग किया हो। आपने क्रान्तिकारियों की बहुत
असहानुभूतिपूर्वक आलोचना की है और आप यहाँ तक चले गये कि उन्हें देश का
शत्रु तक बता डाला। केवल इसलिए कि वे आपके विचारों और तरीक़ों से मतभेद
रखते हैं। आप उन्हें सहिष्णुता की सीख देते हैं लेकिन क्रान्तिकारियों की आलोचना
परिशिष्ट / 515
करने में आप स्वयं अत्यन्त असहिष्णु रहे हैं। क्रान्तिकारियों ने मातृभूमि की सेवा
के लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगा दिया है, और यदि आप उनकी सहायता नहीं
कर सकते, तो कम से उनके प्रति असहिष्णु तो न बनें।
516 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परिशिष्ट : चार
शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का पत्र
भगतसिंह काकोरी के शहीद राजेन्द्र लाहिड़ी से इतने प्रभावित हुए कि अपने
सबसे छोटे भाई, जिसका जन्म 1927 में हुआ, का नाम उन्होंने राजेन्द्र रखा। इसका
एक कारण यह था कि राजेन्द्र लाहिड़ी वैचारिक स्तर पर अपने साथियों से आगे
थे। यह पत्र भगतसिंह की टिप्पणी सहित अक्टूबर, 1927 में ‘किरती’ में छपा। –
स.
मैं फिर जन्म लूँगा
काकोरी षड्यन्त्र केस में जिन चार भाइयों को फाँसी की सज़ा हुई है उनके
नाम ये हैं – 1. रामप्रसाद 2. राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी 3. रोशन सिंह 4. अशफ़ाक़उल्ला
खान।
इनमें से राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी, एम.ए. कक्षा का छात्र था। वह बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय में पढ़ता था। वह 1925 में पकड़ा गया था। इसकी अपील व रहम
की दरख्वास्त की गयी थी, लेकिन वे सब नामंजूर हो गयीं।
इस बहादुर भाई ने निम्न पत्र अपने बड़े भाई को लिखा है।
मेरे प्रिय भाई!
आज मुझे सुपरिण्टेण्डेण्ट ने बताया कि वायसराय ने मेरी रहम की
दरख़्वास्त नामंज़ूर कर दी है। जेल के नियमों के अनुसार मुझे एक सप्ताह
के भीतर फाँसी पर चढ़ाया जायेगा। तुम्हें मेरे लिए अफ़सोस नहीं करना
चाहिए क्योंकि मैं अपना पुराना शरीर छोड़कर नया जन्म धारण कर रहा हूँ।
आपको यहाँ आकर मुलाक़ात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि कुछ दिन
पहले ही आप मुलाक़ात कर चुके हो। जब मैं लखनऊ में था तो बहिन ने
परिशिष्ट / 517
दो बार मुलाक़ात की थी। सभी को मेरी ओर से प्रणाम और लड़कों को
प्यार।
आपका प्रिय
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
इस पत्र ने हमें फिर करतार सिंह सराभा और भाई पिंगले आदि का समय याद
दिला दिया है और हमारे पुराने घावों को हरा कर दिया है।
518 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परिशिष्ट : पाँच
शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का अन्तिम सन्देश
दिसम्बर 1927 में काकोरी के चार क्रान्तिकारियों को फाँसी दे दी गयी।
जनवरी, 1928 के 'किरती' में भगतसिंह ने 'विद्रोही' नाम से इन पर कुछ लेख
छपवाये। यह उन्हीं में से एक है। इसमें भगतसिंह ने बिस्मिल के अन्तिम सन्देश को
प्रस्तुत किया है। - स.
आपने एक लेख 'निज-जीवन घटा' लिखा था जो गोरखपुर के 'स्वदेश' अख़बार
में छपा था। उसी को संक्षेप में हम पाठकों की सेवा में रख रहे हैं, ताकि वे जान
सकें कि उन क्रान्तिकारी वीरों के शहादत के समय क्या विचार थे।
आप 16 तारीख़ को लिखते हैं -
19 तारीख़ सुबह साढ़े छह बजे फाँसी का समय निश्चित हो चुका है। कोई
चिन्ता नहीं, ईश्वर की कृपा से मैं बार-बार जन्म लूँगा और मेरा उद्देश्य होगा कि
संसार में पूर्ण स्वतन्त्रता हो, कि प्रकृति की देन पर सबका एक-सा अधिकार हो
कि कोई किसी पर शासन न करे। सभी जगह लोगों के अपने पंचायती राज्य
स्थापित हों। अब मैं उन बातों का उल्लेख कर देना ज़रूरी समझता हूँ जो सेशन
जज के 6 अप्रैल, 1927 के फ़ैसले के बाद काकोरी के क़ैदियों के साथ हुईं। 18
जुलाई को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई। वह सिर्फ़ मौत की सज़ा पाये चार
क़ैदियों की ओर से थी। लेकिन पुलिस की ओर से सज़ा बढ़ाने की अपील हुई।
फिर बाक़ी क़ैदियों ने भी अपील कर दी, लेकिन श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, श्री
भूपेन्द्रनाथ सान्याल और इक़बालिया गवाह बनवारीलाल ने अपील नहीं की थी और
फिर प्रणव चटर्जी ने इक़बाल कर लिया और अपील वापस ले ली। फाँसीवालों
की सज़ा बहाल रही और श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी, श्री गोविन्दचरण कर और श्री
मुकन्दीलाल जी को दस साल की उम्रक़ैद हो गयी। श्री सुरेशचन्द भट्टाचार्य और
श्री विष्णुशरण दुबलिस की सज़ा 7-7 साल से बढ़ाकर 10-10 साल कर दी गयी।
परिशिष्ट / 519
रामनाथ पाण्डे की तीन साल और प्रणवेश की क़ैद चार साल रह गयी। प्रेमकिशन
खन्ना पर से डकैती की सज़ा कम कर पाँच वर्ष क़ैद रह गयी। बाक़ी सबकी
अपीलें ख़ारिज कर दी गयीं। अशफ़ाक़ की मौत की सज़ा बनी रही, शचीन्द्रनाथ
बख्शी ने अपील ही नहीं की थी।
अपील से पहले मैंने गवर्नर के पास प्रार्थनापत्र लिख भेजा था जिसमें मैंने कहा
था कि मैं गुप्त षड्यन्त्रों में हिस्सा न लिया करूँगा और कोई सम्बन्ध भी उनसे
नहीं रखूँगा। रहम की अपील में भी इस प्रार्थनापत्र का ज़िक्र कर दिया था। लेकिन
जजों ने कोई ध्यान देना ज़रूरी न समझा। जेल से अपना बचाव मैंने खुद लिखकर
चीफ कोर्ट में भेजा, लेकिन जजों ने कहा कि यह बचाव रामप्रसाद का लिखा हुआ
नहीं, ज़रूर किसी बड़े सयाने आदमी की मदद से लिखा गया है। उल्टे उन्होंने यह
कहा दिया कि रामप्रसाद बड़ा भयानक क्रान्तिकारी है और यदि रिहा हुआ तो फिर
वही काम करेगा।
उन्होंने (मेरी) बुद्धिमत्ता-समझदारी आदि की प्रशंसा करने के बाद कहा कि
यह एक ऐसा निर्दयी क़ातिल है, जो उन पर भी गोली चला सकता है जिसके साथ
उसकी कोई दुश्मनी नहीं है। ख़ैर! क़लम उनके हाथ थी, जो चाहते वह लिखते।
लेकिन चीफ कोर्ट के फ़ैसले से स्पष्ट पता चलता है कि बदला लेने के विचार
से ही हमें फाँसी की सज़ा दी गयी है।
अपील ख़ारिज हो गयी; फिर लाट साहिब और वायसराय के पास रहम का
प्रार्थनापत्र दिया गया। श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी, श्री अशफ़ाक़उल्ला खान, श्री रोशन
सिंह और रामप्रसाद की मौत की सज़ा बदलने के लिए यू.पी. कौंसिल के लगभग
सभी चुने हुए सदस्यों के हस्ताक्षर से एक प्रार्थनापत्र दिया गया। मेरे पिता के प्रयत्नों
से 250 आनरेरी मजिस्ट्रेटों और बड़े-बड़े ज़मींदारों के हस्ताक्षरों सहित एक अलग
प्रार्थनापत्र दिया गया। असेम्बली और कौंसिल ऑफ़ स्टेट के 108 सदस्यों ने भी
हमारी मौत की सज़ा बदलने के लिए वायसराय के पास प्रार्थनापत्र दिया। उन्होंने
यह भी कहा कि जज ने कहा था कि यदि ये लोग पश्चाताप करें तो सज़ाएँ बहुत
कम कर दी जायेंगी। चारों ओर से इतनी घोषणाएँ हो चुकी थीं, लेकिन एक सिरे
से दूसरे सिरे तक सभी हमारे रक्त के प्यासे थे और वायसराय ने भी हमारी एक
न सुनी।
पण्डित मदनमोहन मालवीय जी कई और सज्जनों को लेकर वायसराय से
मिले। सबको उम्मीद थी कि अब ज़रूर मौत की सज़ा हटा ली जायेगी। लेकिन
क्या होना था। चुपचाप दशहरे से दो दिन पहले सभी जेलों में तार दे दी गयी कि
फाँसी की तारीख़ निश्चित हो गयी है। जब जेल के सुपरिटेण्डेण्ट ने यह तार मुझे
सुनायी तो मैंने कहा, अच्छा! आप अपना काम करो। लेकिन उनके ज़ोर देकर कहने
से एक रहम की तार बादशाह को भेज दी। उस समय प्रिवी कौंसिल में अपील
520 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
करने का विचार भी मन में आया। श्री मोहनलाल सक्सेना वकील को तार दी गयी।
जब उन्हें बताया गया कि वायसराय ने सभी की दरख्वास्तें नामंजूर कर दी हैं तो
किसी को यक़ीन ही नहीं हो रहा था। उनसे कह-सुनकर प्रिवी कौंसिल में अपील
करवायी गयी। परिणाम पहले ही पता था, अपील ख़ारिज हो गयी।
अब सवाल उठेगा कि सबकुछ पहले से ही जानते हुए मैंने माफ़ीनामा, रहम
की दरख्वास्त, अपीलों पर अपीलें क्यों लिख-लिख भेजीं? मुझे तो इसका एक ही
कारण समझ में आता है कि राजनीति एक शतरंज का खेल है। सरकार ने बंगाल
आर्डिनेंस के क़ैदियों सम्बन्धी असेम्बली में ज़ोर देकर कहा था कि उनके ख़िलाफ़
बड़े सबूत हैं, जो गवाहों की सुरक्षा के लिए हम खुली अदालत में पेश नहीं करते।
हालाँकि दक्षिणेश्वर बमकाण्ड और शोभा बाज़ार षड्यन्त्र के मुक़दमे खुली अदालत
में चले। खुफ़िया पुलिस के सुपरिटेण्डेण्ट को मारने का मुक़दमा भी खुली
अदालत में चला। काकोरी केस भी डेढ़ साल चला सरकार की ओर से 300 गवाह
पेश हुए। कभी किसी गवाह पर मुसीबत न आयी, हालाँकि यह भी कहा गया था
कि काकोरी षड्यन्त्र की शुरुआत बंगाल में हुई। सरकारी घोषणाओं की पोल खोलने
की इच्छा से ही मैंने यह सब किया। माफ़ीनामे भी लिखे, अपीलें भी कीं, लेकिन
क्या होना था। असलियत तो यह है कि जोरावर मारे भी और रोने भी न दे।
हमारे ज़िन्दा रहने से कहीं विद्रोह नहीं हो चला था। अब तक क्रान्तिकारियों
के लिए किसी ने इतनी भारी सिफारिश नहीं की थी, लेकिन सरकार को इससे
क्या? उसे अपनी ताक़त पर नाज़ है, अपने बल पर अहंकार है। सर विलियम
मौरिस ने स्वयं शाहजहाँपुर और इलाहाबाद के दंगों में मौत की सज़ा पाने वालों की
मौत की सज़ाएँ माफ़ की थीं, जबकि वहाँ रोज़ दंगे होते थे। यदि हमारी सज़ा कम
करने से औरों की हिम्मत बढ़ती है तो यही बात साम्प्रदायिक दंगों सम्बन्धी भी
कही जा सकती है। लेकिन यहाँ मामला ही कुछ और था।
आज प्राण उत्सर्ग करते हुए मुझे कोई निराशा नहीं हो रही कि यह व्यर्थ गये।
बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाते। क्या पता हमारे जैसे लोगों की ठण्डी आहों से ही
यह परिणाम हुआ कि लॉर्ड बर्कन हैड के दिमाग़ में हिन्दुस्तान की ज़ंजीरें जकड़ने
के विचार आया और उसने रॉयल कमीशन भेजा, जिसके बायकाट के लिए
हिन्दू-मुसलमानों में फिर कुछ एकता हो रही है। ईश्वर करे कि इनको शीघ्र ही
सद्बुद्धि आये और यह फिर एक हो जायें। हमारी अपील नामंजूर होते ही मैंने श्री
मोहनलाल सक्सेना से कहा था कि इस बार हमारी यादगार मनाने के लिए
हिन्दू-मुसलमान नेताओं को इकट्ठा बुलाया जाये।
अशफ़ाक़उल्ला को सरकार ने रामप्रसाद का दायाँ हाथ बताया है। अशफ़ाक़
कट्टर मुसलमान होते हुए भी रामप्रसाद जैसे कट्टर आर्यसमाजी का क्रान्ति में
दाहिना हाथ हो सकता है तो क्या भारत के अन्य हिन्दू-मुसलमान आज़ादी के लिए
परिशिष्ट / 521
अपने छोटे-मोटे लाभ भुला एक नहीं हो सकते? अशफ़ाक़ तो पहले ऐसे मुसलमान
हैं जिन्हें कि बंगाली क्रान्तिकारी पार्टी के सम्बन्ध में फाँसी दी जा रही है। ईश्वर
ने मेरी पुकार सुन ली। मेरा काम ख़त्म हो गया। मैंने मुसलमानों में से एक नौजवान
निकालकर हिन्दुस्तान को यह दिखा दिया है कि मुस्लिम नौजवान भी हिन्दू
नौजवानों से बढ़-चढ़कर देश के लिए बलिदान दे सकता है और वह सभी
परीक्षाओं में सफल हुआ। अब यह कहने की हिम्मत किसी में नहीं होनी
चाहिए कि मुसलमानों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। यह पहला तजुर्बा था
जो पूरा हुआ।
अशफ़ाक़! ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शान्ति दे। तुमने मेरी और देश के सभी
मुसलमानों की लाज बचा ली है यह दिखा दिया है कि भारत में भी तुर्की और
मिस्र जैसे मुसलमान युवक मिल सकते हैं।
अब देशवासियों के सामने यही प्रार्थना है कि यदि उन्हें हमारे मरने का ज़रा
भी अफ़सोस है तो वे जैसे भी हो, हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करें – यही हमारी
आख़िरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है। सभी धर्मों और सभी पार्टियों
को कांग्रेस को ही प्रतिनिधि मानना चाहिए। फिर वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेज़ों को
भारतीयों के आगे शीश झुकाना होगा।
जो कुछ मैं कह रहा हूँ, ठीक वही श्री अशफ़ाक़उल्ला खान वारसी का विचार
है। अपील लिखते समय लखनऊ जेल में मैंने उनसे बातचीत की थी। श्री अशफ़ाक़
तो रहम की दरख़्वास्त देने के लिए राजी नहीं थे। उन्होंने तो सिर्फ़ मेरी ज़िद पर,
मेरे कहने पर ही ऐसा किया था।
सरकार से मैंने यहाँ तक कहा था कि जब तक उसे विश्वास न हो, तब तक
मुझे जेल में क़ैद रखे या किसी दूसरे देश में निर्वासित कर दे, और हिन्दुस्तान न
लौटने दे। लेकिन सरकार को क्या करना था। सरकार को यही मंज़ूर था कि हमें
फाँसी ज़रूर दी जाये, हिन्दुस्तानियों के जले दिल पर नमक छिड़का जाये और वे
तड़प उठें; कुछ सँभल जायें और हमारे पुनर्जन्म लेकर काम के लिए तैयार होने
तक देश की हालत सुधर गयी हो।
अब तो मेरी यही राय है कि अंग्रेज़ी अदालत के आगे न तो कोई बयान दे
और न ही कोई सफ़ाई पेश करे। अपील करने के पीछे एक कारण यह भी था
कि फाँसी की तारीख़ बदलवाकर मैं एक बार देशवासियों की सहायता और
नवयुवकों का दम देखूँ। इसमें मुझे बहुत निराशा हुई। मैंने निश्चय किया था कि
सम्भव हो तो जेल से भाग जाऊँ। यदि ऐसा हो सकता तो बाक़ी तीनों की मौत
की सज़ा भी माफ़ हो जाती। यदि सरकार न करती तो मैं करवा लेता। इसका
तरीक़ा मुझे ख़ूब आता था। मैंने बाहर निकलने के लिए बड़े यत्न किये, लेकिन
बाहर से कोई सहायता नहीं मिली। अफ़सोस तो इसी बात का है कि जिस देश
522 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
में मैंने इतना बड़ा क्रान्तिकारी दल खड़ा कर दिया था, वहीं अपनी रक्षा के लिए
मुझे एक पिस्तौल तक न मिला। कोई नौजवान मेरी सहायता के लिए आगे नहीं
आया। मेरी नौजवानों से प्रार्थना है कि जब तक सभी लोग पढ़-लिख न जायें, तब
तक कोई भी गुप्त पार्टियों की ओर ध्यान नहीं दे। यदि देश-सेवा की इच्छा है तो
खुला काम करें। व्यर्थ बातें सुन-सुनकर ख़याली पुलाव पकाते हुए अपने जीवन
को मुसीबतों में न डालें। अभी गुप्त काम का समय नहीं आया। हमें इस मुक़दमे
के दौरान बड़े अनुभव हुए, लेकिन उनका लाभ उठाने का अवसर सरकार ने हमें
नहीं दिया। लेकिन इस बात के लिए हिन्दुस्तान और ब्रिटिश सरकार बहुत
पछतायेगी।
मुलाक़ात के समय आपने यह भी कहा था कि, “क्रान्तिकारी लोगों में भी
हिम्मत की बहुत कमी है और जनता की हमदर्दी अभी उनके साथ नहीं है। साथ
ही इनमें भी प्रान्तीयता की भावना बहुत है। परस्पर पूरा विश्वास भी नहीं है।” इन
बातों के कारण हमारी हसरतें दिल में ही रह गयीं। मौखिक रूप से इन्कार करने
से ही मुझे 5000 रुपये नक़द और विलायत भेज बैरिस्टर बनने का वायदा मिल
रहा था। लेकिन इस बात को घोर पाप समझकर मैंने इसकी ओर ध्यान भी नहीं
दिया। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि बड़े-बड़े विश्वसनीय कहे जाने वाले
साथियों ने अपने सुख के लिए छिप-छिपकर पार्टी को धोखा दिया और हमारे साथ
दग़ा किया।
परिशिष्ट / 523
परिशिष्ट : छह
शहीद अशफ़ाक़उल्ला का फाँसीघर से सन्देश
यह सन्देश 16 दिसम्बर, 1927 को फ़ैज़ाबाद जेल से देशवासियों के लिए भेजा
गया। – स.
भारतमाता के रंगमंच पर हम अपनी भूमिका अदा कर चुके हैं। ग़लत किया या
सही, जो भी हमने किया, स्वतन्त्रता-प्राप्ति की भावना से प्रेरित होकर किया। हमारे
अपने (अर्थात कांग्रेसी नेता) हमारी निन्दा करें या प्रशंसा, लेकिन हमारे दुश्मनों तक
को हमारी हिम्मत और वीरता की प्रशंसा करनी पड़ी है। लोग कहते हैं हमने देश
में आतंकवाद (Terrorism) फैलाना चाहा है, यह ग़लत है। इतनी देर तक मुक़दमा
चलता रहा। हमारे में से बहुत-से लोग बहुत दिनों तक आज़ाद रहे और अब भी
कुछ लोग आज़ाद हैं (संकेत चन्द्रशेखर आज़ाद की ओर है। – स.) फिर भी हमने
या हमारे किसी साथी ने हमें नुक़सान पहुँचाने वालों तक पर गोली नहीं चलायी।
हमारा उद्देश्य यह नहीं था। हम तो आज़ादी हासिल करने के लिए देशभर में क्रान्ति
लाना चाहते थे।
जजों ने हमें निर्दयी, बर्बर, मानव-कलंकी आदि विशेषणों से याद किया है।
हमारे शासकों की क़ौम के जनरल डायर ने निहत्थों पर गोलियाँ चलायी थीं और
चलायी थीं बच्चों, बूढ़ों, व स्त्री-पुरुषों पर। इन्साफ़ के इन ठेकेदारों ने अपने इन
भाई-बन्धुओं को किस विशेषण से सम्बोधित किया था? फिर हमारे साथ ही यह
सलूक क्यों?
हिन्दुस्तानी भाइयो! आप चाहे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय को मानने वाले हों,
देश के काम में साथ दो! व्यर्थ आपस में न लड़ो। रास्ता चाहे अलग हों, लेकिन
उद्देश्य सबका एक है। सभी कार्य एक ही उद्देश्य की पूर्ति के साधन हैं, फिर यह
व्यर्थ के लड़ाई-झगड़े क्यों? एक होकर देश की नौकरशाही का मुक़ाबला करो
अपने देश को आज़ाद कराओ। देश के सात करोड़ मुसलमानों में मैं पहला
524 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मुसलमान¹ हूँ, जो देश की आज़ादी के लिए फाँसी चढ़ रहा हूँ, यह सोचकर मुझे
गर्व महसूस होता है।
अन्त में सभी को मेरा सलाम!
हिन्दुस्तान आज़ाद हो!
मेरे भाई खुश रहें!
आपका भाई
अशफ़ाक़
- ऐतिहासिक तथ्य है कि एक सौ के क़रीब मुसलमान ग़दर पार्टी आन्दोलन में शहीद हुए और हज़ारों
1857 के आन्दोलन में। लेकिन अशफ़ाक़ को कमज़ोर करने और धोखा देने के लिए पुलिस ने एक बार
उनसे कहा था कि शहीद होने वाले तुम एकमात्र मुसलमान हो, शायद इसीलिए उन्होंने यह लिखा है। –
स.
परिशिष्ट / 525
परिशिष्ट : सात
वर्ग-रुचि का आन्दोलनों पर असर
सितम्बर, 1928 के ‘किरती’ में ‘एक निर्वासित’ एम.ए. के नाम से एक बहुत
ही दिलचस्प लेख प्रकाशित हुआ था। यह लेख लाला हरदयाल की रचना है।
भगतसिंह और उनके साथियों ने इस पर गहराई से विचार किया था। – स.
दुनियाभर में दर्शनशास्त्रों तथा भ्रातृत्व के उपदेश की सारी उलझनों और मुसीबतों
के होते हुए भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने है। वह यह कि दुनिया
इस समय अनेक वर्गों में बँटी हुई है। जो मनुष्य इस सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करता
है या जो ईश्वर के बन्दों की सच्ची सेवा करना चाहता है वह उस ज्योतिषी के
समान है जोकि कोशिश के सिद्धान्त तथा सितारों की गर्दिश से अनजान है। ख़ाली,
बेवक़ूफ़ और निकम्मा है। दुनिया के लोग, हालाँकि, अन्धे भी अच्छी तरह जानते
हैं कि दुनिया में अमीर और ग़रीब दो वर्ग हैं। दुनियाभर की भाषा-बोलियों में
अपने-अपने अलग-अलग शब्द इस वर्ग-विभाजन को जताने के लिए मौजूद हैं।
मालिक और नौकर, ज़मींदार और मज़दूर, शासक और प्रजा, पूँजीपति और
मेहनतकश आदि शब्द उस बुरे क़िस्से की याद दिलाते हैं, जिसने दुनिया से बन्धुत्व
को नष्ट कर दिया है।
इस समय दुनिया में अलग-अलग पार्टियाँ मौजूद हैं, लेकिन सरसरी निगाह
से देखने पर हम दो प्रकार के वर्गों को तो स्पष्ट तौर पर देखते हैं। एक तो वह
वर्ग जो शारीरिक श्रम करके कुछ अर्जित करता है। दूसरे वह जो मेहनत नहीं
करता। जो लोग खेतों, खदानों अथवा कारख़ानों आदि में काम करते हैं, वे
मेहनतकश वर्ग में शामिल हैं। जो लोग इन जगहों पर या अन्यत्र भी मेहनत करने
के लिए मजबूर नहीं किये जाते उनका वर्ग भिन्न है। दरअसल इस दुनिया में दो
ही क़ौमें हैं – ये ही दोनों वर्ग। इससे अधिक अगर कोई दूसरा विभाजन किया
गया है तो वह बेहूदा और हानिकारक है। इसी प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक
मेहनतकश व्यक्ति की यह इच्छा रहती है कि उसका पुत्र उन्नति करे और उस
526 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मेहनतकश वर्ग में से निकलकर खुशहाल वर्ग में शामिल हो जाये। दुनिया में हर
जगह और हर सूरत में बढ़ई, लोहार और किसान आदि मेहनतकश लोगों से राजा,
वजीर, वकील, न्यायाधीश, प्रोफ़ेसर, ज़मींदार, साहूकार, बैंकर आदि कहीं ज़्यादा
कमाते हैं। दुनिया की कोई शक्ति इन वर्गों को संयुक्त नहीं कर सकती।
हिन्दुस्तानी ‘सफ़ेदपोश’ शब्द उस गैर-मेहनतकश वर्ग के लिए ही इस्तेमाल में
लाया जाता है। यह तमाम चीजें जिनके कारण कि ज़िन्दगी रहने योग्य बन सकती
है, अथवा आराम, शिक्षा, हुनर, सफ़ाई, आरोग्य आदि दौलत के साथ ही प्राप्त
किये जाते हैं। बेचारे ग़रीब हर समय, हर जगह गन्दी जगहों पर ही बुरी ज़िन्दगी
गुज़ारने के लिए लाचार होते हैं। इन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए समय ही नहीं
मिलता। ग़रीब मज़दूर सारा-सारा दिन सिर्फ़ गुज़ारे के लिए पसीना-पसीना होकर
काम करता रहता है, जबकि विद्वान और अमीर लोग बढ़िया से बढ़िया भोजन
पाते हैं। घोड़ागाड़ियों और मोटरों पर चढ़कर सैर के लिए जाते हैं। खुशबूदार तेल
और इत्र के साथ मालिश करते हैं। रेशमी कपड़े पहनते हैं। कहने का मतलब यह
कि हर तरह ऐश की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं।
प्रश्न उठता है कि यह अजीब हालत पैदा ही किस तरह हो गयी? क्या कारण
है कि जो लोग खेती करते, कपड़े बुनते, कपड़े सिलते, नालियाँ साफ़ करते या
आटा पीसते हैं, उनकी आमदनी उन लोगों से कई गुना कम है जो केवल लेक्चर
देते हैं या मुक़दमों पर बहस करते हैं, जो न्याय करते या हकूमत करते हैं, जो
केवल दुआ करते या कुछ भी नहीं करते। क्या कभी किसी ने सोचकर देखा है
कि भगवान के हर बन्दे और समाज के लिए खेती-बाड़ी, कारीगरी, दस्तकारी
आदि करने वाले ‘क़ानून’ या ‘सरकार’, मज़हब या साहूकार या केवल ज़मींदार
(वे लोग जो ज़मीनों के मालिक तो बने बैठे हैं लेकिन काम कुछ नहीं करते) से
ज़्यादा ज़रूरी हैं। फिर क्या कारण है कि उस आदमी को, जोकि कुछ घण्टे कुर्सी
पर बैठकर कुछ आदमियों को जेल में भेज देता है, गेहूँ बोने वाले किसान और जूते
गाँठने वाले मोची से कई गुना अधिक तनख्वाह दी जाती है? एक राजा या मजिस्ट्रेट
या साहूकार ही मेहनतकश लोगों से कौन-सा अच्छा, लाभदायक और ज़रूरी काम
करता है? अनेक लोग सारा दिन चोटी का ज़ोर लगाकर काम करते हुए भी अपनी
ज़रूरी चीजें प्राप्त नहीं कर सकते। क्या वजह है कि एक आदमी बैठा पंखा खींचता
है और एक अन्दर पड़ा – भले ही वह हिन्दू, मुसलमान या ईसाई हो – खर्राटे
मारता है। इसे ही पंखा खींचने पर क्यों नहीं लगाया जाता? वह लोग जो अनाज,
दूध, मेवे, सब्ज़ी पैदा नहीं करते, बल्कि इन चीज़ों को इस्तेमाल करते और खाते
हैं, वास्तव में तो वही बेचारे किसान की मेहनत का लाभ उठाते हैं। इस बात को
समझने के लिए किसी फ़िलासफ़ी की ज़रूरत नहीं है। वे लोग जो रोटी पैदा नहीं
करते और न रुई कातकर, बुनकर कपड़ा तैयार करते हैं, और फिर भी रोटी खाते
परिशिष्ट / 527