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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 788 में से

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पृष्ठ 517

यह कहना चाहते हैं कि प्रयोग पर्याप्त समय तक नहीं चला?
दरअसल, आपका कार्यक्रम विफल रहा है जिसमें भारतीयों की कोई ग़लती
नहीं है। आपके पास देश के लिए केवल एक कार्यक्रम है लेकिन आप विजयी
लक्ष्य तक राष्ट्र को नहीं ले जा सकते। यह कहना कि अहिंसक असहयोग इसलिए
विफल रहा कि लोग पर्याप्त मात्रा में अहिंसक नहीं थे, वकील की भाँति तर्क
करना है न कि पैग़म्बर की भाँति। लोग उससे अधिक अहिंसक नहीं हो सकते
जितना कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान रहे हैं। मैं यह कहना चाहूँगा कि वे उस
हद तक अहिंसक थे, जहाँ से कायरता की बू आती है। आप सम्भवतः यह कहेंगे
कि यह वह अहिंसा, कायरों की अहिंसा नहीं थी जोकि आपका अभीष्ट थी।
बल्कि आपके कार्यक्रम में वह बात ही नहीं थी जोकि कायरों को नायकों में
रूपान्तरित कर पाती या जो नायकों के समूहों के बीच से कायरों का पता लगाकर
अन्ततोगत्वा उन्हें ख़ारिज कर देती। इसमें जनता की कोई ग़लती नहीं थी। और यह
कहना कि असहयोग आन्दोलन में शामिल लोगों की बहुसंख्या नायकों की नहीं
वरन कायरों की थी, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना है। यह कहना राष्ट्र के पौरुष
के साथ खिलवाड़ करने जैसा कहीं अधिक है। भारतीय कायर नहीं हैं। उनकी
बहादुरी की तुलना हमेशा ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ नायकों की बहादुरी के साथ की
जा सकेगी। इस बात से इन्कार करना इतिहास से इन्कार करना है। जब मैं भारतीयों
की वीरता की बात करता हूँ तो मेरा मतलब गौरवशाली अतीत की जाज्वल्यमान
वीरता से ही नहीं होता वरन मैं उस वीरता को भी शामिल करता हूँ जोकि स्वयं
को वर्तमान में प्रकट कर रही है क्योंकि भारत में अभी भी मुरदे नहीं बसते।
भारत को गुरु गोबिन्द सिंह या गुरु रामदास और शिवाजी जैसे नेता की तरह
असली नेता की आवश्यकता है। भारत को एक कृष्ण की आवश्यकता है जोकि
उचित आदर्श प्रदान कर सके; जिसका अनुसरण अकेले भारत ही नहीं वरन सारी
मानवता द्वारा इस मानवता के विविध मिज़ाजों एवं क्षमताओं वाले सभी सदस्यों द्वारा
किया जाना वाला हो।
अहिंसक असहयोग आन्दोलन इसलिए नहीं विफल हुआ कि यत्र-तत्र दबी हुई
भावनाएँ फूट पड़ीं वरन इसलिए विफल हुआ कि आन्दोलन के पास उचित आदर्श
का अभाव था। आपके द्वारा बताया जाने वाला आदर्श भारतीय संस्कृति एवं
परम्पराओं के अनुरूप नहीं है। उसमें नक़ल की बू आती है। अहिंसा का आपका
दर्शन, कम से कम वह दर्शन जिसे आप लोगों को स्वीकार करने के लिए कहते
हैं, हताशा से उपजा हुआ दर्शन है। यह भारतीय ऋषियों की अहिंसा की भावना
नहीं है। यह टॉलस्टायवाद और बौद्ध-धर्म का अपूर्ण भौतिक मिश्रण है न कि पूरब
और पश्चिम का रासायनिक मिश्रण। आपने कांग्रेसों एवं सम्मेलनों की पश्चिमी
पद्धति को अपनाया और देश-काल से निरपेक्ष रहकर अहिंसा की भावना को
परिशिष्ट / 511