भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 532, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : सात
वर्ग-रुचि का आन्दोलनों पर असर
सितम्बर, 1928 के ‘किरती’ में ‘एक निर्वासित’ एम.ए. के नाम से एक बहुत
ही दिलचस्प लेख प्रकाशित हुआ था। यह लेख लाला हरदयाल की रचना है।
भगतसिंह और उनके साथियों ने इस पर गहराई से विचार किया था। – स.
दुनियाभर में दर्शनशास्त्रों तथा भ्रातृत्व के उपदेश की सारी उलझनों और मुसीबतों
के होते हुए भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने है। वह यह कि दुनिया
इस समय अनेक वर्गों में बँटी हुई है। जो मनुष्य इस सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करता
है या जो ईश्वर के बन्दों की सच्ची सेवा करना चाहता है वह उस ज्योतिषी के
समान है जोकि कोशिश के सिद्धान्त तथा सितारों की गर्दिश से अनजान है। ख़ाली,
बेवक़ूफ़ और निकम्मा है। दुनिया के लोग, हालाँकि, अन्धे भी अच्छी तरह जानते
हैं कि दुनिया में अमीर और ग़रीब दो वर्ग हैं। दुनियाभर की भाषा-बोलियों में
अपने-अपने अलग-अलग शब्द इस वर्ग-विभाजन को जताने के लिए मौजूद हैं।
मालिक और नौकर, ज़मींदार और मज़दूर, शासक और प्रजा, पूँजीपति और
मेहनतकश आदि शब्द उस बुरे क़िस्से की याद दिलाते हैं, जिसने दुनिया से बन्धुत्व
को नष्ट कर दिया है।
इस समय दुनिया में अलग-अलग पार्टियाँ मौजूद हैं, लेकिन सरसरी निगाह
से देखने पर हम दो प्रकार के वर्गों को तो स्पष्ट तौर पर देखते हैं। एक तो वह
वर्ग जो शारीरिक श्रम करके कुछ अर्जित करता है। दूसरे वह जो मेहनत नहीं
करता। जो लोग खेतों, खदानों अथवा कारख़ानों आदि में काम करते हैं, वे
मेहनतकश वर्ग में शामिल हैं। जो लोग इन जगहों पर या अन्यत्र भी मेहनत करने
के लिए मजबूर नहीं किये जाते उनका वर्ग भिन्न है। दरअसल इस दुनिया में दो
ही क़ौमें हैं – ये ही दोनों वर्ग। इससे अधिक अगर कोई दूसरा विभाजन किया
गया है तो वह बेहूदा और हानिकारक है। इसी प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक
मेहनतकश व्यक्ति की यह इच्छा रहती है कि उसका पुत्र उन्नति करे और उस
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