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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 788 में से

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पृष्ठ 526

रामनाथ पाण्डे की तीन साल और प्रणवेश की क़ैद चार साल रह गयी। प्रेमकिशन
खन्ना पर से डकैती की सज़ा कम कर पाँच वर्ष क़ैद रह गयी। बाक़ी सबकी
अपीलें ख़ारिज कर दी गयीं। अशफ़ाक़ की मौत की सज़ा बनी रही, शचीन्द्रनाथ
बख्शी ने अपील ही नहीं की थी।
अपील से पहले मैंने गवर्नर के पास प्रार्थनापत्र लिख भेजा था जिसमें मैंने कहा
था कि मैं गुप्त षड्यन्त्रों में हिस्सा न लिया करूँगा और कोई सम्बन्ध भी उनसे
नहीं रखूँगा। रहम की अपील में भी इस प्रार्थनापत्र का ज़िक्र कर दिया था। लेकिन
जजों ने कोई ध्यान देना ज़रूरी न समझा। जेल से अपना बचाव मैंने खुद लिखकर
चीफ कोर्ट में भेजा, लेकिन जजों ने कहा कि यह बचाव रामप्रसाद का लिखा हुआ
नहीं, ज़रूर किसी बड़े सयाने आदमी की मदद से लिखा गया है। उल्टे उन्होंने यह
कहा दिया कि रामप्रसाद बड़ा भयानक क्रान्तिकारी है और यदि रिहा हुआ तो फिर
वही काम करेगा।
उन्होंने (मेरी) बुद्धिमत्ता-समझदारी आदि की प्रशंसा करने के बाद कहा कि
यह एक ऐसा निर्दयी क़ातिल है, जो उन पर भी गोली चला सकता है जिसके साथ
उसकी कोई दुश्मनी नहीं है। ख़ैर! क़लम उनके हाथ थी, जो चाहते वह लिखते।
लेकिन चीफ कोर्ट के फ़ैसले से स्पष्ट पता चलता है कि बदला लेने के विचार
से ही हमें फाँसी की सज़ा दी गयी है।
अपील ख़ारिज हो गयी; फिर लाट साहिब और वायसराय के पास रहम का
प्रार्थनापत्र दिया गया। श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी, श्री अशफ़ाक़उल्ला खान, श्री रोशन
सिंह और रामप्रसाद की मौत की सज़ा बदलने के लिए यू.पी. कौंसिल के लगभग
सभी चुने हुए सदस्यों के हस्ताक्षर से एक प्रार्थनापत्र दिया गया। मेरे पिता के प्रयत्नों
से 250 आनरेरी मजिस्ट्रेटों और बड़े-बड़े ज़मींदारों के हस्ताक्षरों सहित एक अलग
प्रार्थनापत्र दिया गया। असेम्बली और कौंसिल ऑफ़ स्टेट के 108 सदस्यों ने भी
हमारी मौत की सज़ा बदलने के लिए वायसराय के पास प्रार्थनापत्र दिया। उन्होंने
यह भी कहा कि जज ने कहा था कि यदि ये लोग पश्चाताप करें तो सज़ाएँ बहुत
कम कर दी जायेंगी। चारों ओर से इतनी घोषणाएँ हो चुकी थीं, लेकिन एक सिरे
से दूसरे सिरे तक सभी हमारे रक्त के प्यासे थे और वायसराय ने भी हमारी एक
न सुनी।
पण्डित मदनमोहन मालवीय जी कई और सज्जनों को लेकर वायसराय से
मिले। सबको उम्मीद थी कि अब ज़रूर मौत की सज़ा हटा ली जायेगी। लेकिन
क्या होना था। चुपचाप दशहरे से दो दिन पहले सभी जेलों में तार दे दी गयी कि
फाँसी की तारीख़ निश्चित हो गयी है। जब जेल के सुपरिटेण्डेण्ट ने यह तार मुझे
सुनायी तो मैंने कहा, अच्छा! आप अपना काम करो। लेकिन उनके ज़ोर देकर कहने
से एक रहम की तार बादशाह को भेज दी। उस समय प्रिवी कौंसिल में अपील
520 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़