भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने छोटे-मोटे लाभ भुला एक नहीं हो सकते? अशफ़ाक़ तो पहले ऐसे मुसलमान
हैं जिन्हें कि बंगाली क्रान्तिकारी पार्टी के सम्बन्ध में फाँसी दी जा रही है। ईश्वर
ने मेरी पुकार सुन ली। मेरा काम ख़त्म हो गया। मैंने मुसलमानों में से एक नौजवान
निकालकर हिन्दुस्तान को यह दिखा दिया है कि मुस्लिम नौजवान भी हिन्दू
नौजवानों से बढ़-चढ़कर देश के लिए बलिदान दे सकता है और वह सभी
परीक्षाओं में सफल हुआ। अब यह कहने की हिम्मत किसी में नहीं होनी
चाहिए कि मुसलमानों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। यह पहला तजुर्बा था
जो पूरा हुआ।
अशफ़ाक़! ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शान्ति दे। तुमने मेरी और देश के सभी
मुसलमानों की लाज बचा ली है यह दिखा दिया है कि भारत में भी तुर्की और
मिस्र जैसे मुसलमान युवक मिल सकते हैं।
अब देशवासियों के सामने यही प्रार्थना है कि यदि उन्हें हमारे मरने का ज़रा
भी अफ़सोस है तो वे जैसे भी हो, हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करें – यही हमारी
आख़िरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है। सभी धर्मों और सभी पार्टियों
को कांग्रेस को ही प्रतिनिधि मानना चाहिए। फिर वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेज़ों को
भारतीयों के आगे शीश झुकाना होगा।
जो कुछ मैं कह रहा हूँ, ठीक वही श्री अशफ़ाक़उल्ला खान वारसी का विचार
है। अपील लिखते समय लखनऊ जेल में मैंने उनसे बातचीत की थी। श्री अशफ़ाक़
तो रहम की दरख़्वास्त देने के लिए राजी नहीं थे। उन्होंने तो सिर्फ़ मेरी ज़िद पर,
मेरे कहने पर ही ऐसा किया था।
सरकार से मैंने यहाँ तक कहा था कि जब तक उसे विश्वास न हो, तब तक
मुझे जेल में क़ैद रखे या किसी दूसरे देश में निर्वासित कर दे, और हिन्दुस्तान न
लौटने दे। लेकिन सरकार को क्या करना था। सरकार को यही मंज़ूर था कि हमें
फाँसी ज़रूर दी जाये, हिन्दुस्तानियों के जले दिल पर नमक छिड़का जाये और वे
तड़प उठें; कुछ सँभल जायें और हमारे पुनर्जन्म लेकर काम के लिए तैयार होने
तक देश की हालत सुधर गयी हो।
अब तो मेरी यही राय है कि अंग्रेज़ी अदालत के आगे न तो कोई बयान दे
और न ही कोई सफ़ाई पेश करे। अपील करने के पीछे एक कारण यह भी था
कि फाँसी की तारीख़ बदलवाकर मैं एक बार देशवासियों की सहायता और
नवयुवकों का दम देखूँ। इसमें मुझे बहुत निराशा हुई। मैंने निश्चय किया था कि
सम्भव हो तो जेल से भाग जाऊँ। यदि ऐसा हो सकता तो बाक़ी तीनों की मौत
की सज़ा भी माफ़ हो जाती। यदि सरकार न करती तो मैं करवा लेता। इसका
तरीक़ा मुझे ख़ूब आता था। मैंने बाहर निकलने के लिए बड़े यत्न किये, लेकिन
बाहर से कोई सहायता नहीं मिली। अफ़सोस तो इसी बात का है कि जिस देश
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