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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 788 में से

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पृष्ठ 527

करने का विचार भी मन में आया। श्री मोहनलाल सक्सेना वकील को तार दी गयी।
जब उन्हें बताया गया कि वायसराय ने सभी की दरख्वास्तें नामंजूर कर दी हैं तो
किसी को यक़ीन ही नहीं हो रहा था। उनसे कह-सुनकर प्रिवी कौंसिल में अपील
करवायी गयी। परिणाम पहले ही पता था, अपील ख़ारिज हो गयी।
अब सवाल उठेगा कि सबकुछ पहले से ही जानते हुए मैंने माफ़ीनामा, रहम
की दरख्वास्त, अपीलों पर अपीलें क्यों लिख-लिख भेजीं? मुझे तो इसका एक ही
कारण समझ में आता है कि राजनीति एक शतरंज का खेल है। सरकार ने बंगाल
आर्डिनेंस के क़ैदियों सम्बन्धी असेम्बली में ज़ोर देकर कहा था कि उनके ख़िलाफ़
बड़े सबूत हैं, जो गवाहों की सुरक्षा के लिए हम खुली अदालत में पेश नहीं करते।
हालाँकि दक्षिणेश्वर बमकाण्ड और शोभा बाज़ार षड्यन्त्र के मुक़दमे खुली अदालत
में चले। खुफ़िया पुलिस के सुपरिटेण्डेण्ट को मारने का मुक़दमा भी खुली
अदालत में चला। काकोरी केस भी डेढ़ साल चला सरकार की ओर से 300 गवाह
पेश हुए। कभी किसी गवाह पर मुसीबत न आयी, हालाँकि यह भी कहा गया था
कि काकोरी षड्यन्त्र की शुरुआत बंगाल में हुई। सरकारी घोषणाओं की पोल खोलने
की इच्छा से ही मैंने यह सब किया। माफ़ीनामे भी लिखे, अपीलें भी कीं, लेकिन
क्या होना था। असलियत तो यह है कि जोरावर मारे भी और रोने भी न दे।
हमारे ज़िन्दा रहने से कहीं विद्रोह नहीं हो चला था। अब तक क्रान्तिकारियों
के लिए किसी ने इतनी भारी सिफारिश नहीं की थी, लेकिन सरकार को इससे
क्या? उसे अपनी ताक़त पर नाज़ है, अपने बल पर अहंकार है। सर विलियम
मौरिस ने स्वयं शाहजहाँपुर और इलाहाबाद के दंगों में मौत की सज़ा पाने वालों की
मौत की सज़ाएँ माफ़ की थीं, जबकि वहाँ रोज़ दंगे होते थे। यदि हमारी सज़ा कम
करने से औरों की हिम्मत बढ़ती है तो यही बात साम्प्रदायिक दंगों सम्बन्धी भी
कही जा सकती है। लेकिन यहाँ मामला ही कुछ और था।
आज प्राण उत्सर्ग करते हुए मुझे कोई निराशा नहीं हो रही कि यह व्यर्थ गये।
बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाते। क्या पता हमारे जैसे लोगों की ठण्डी आहों से ही
यह परिणाम हुआ कि लॉर्ड बर्कन हैड के दिमाग़ में हिन्दुस्तान की ज़ंजीरें जकड़ने
के विचार आया और उसने रॉयल कमीशन भेजा, जिसके बायकाट के लिए
हिन्दू-मुसलमानों में फिर कुछ एकता हो रही है। ईश्वर करे कि इनको शीघ्र ही
सद्बुद्धि आये और यह फिर एक हो जायें। हमारी अपील नामंजूर होते ही मैंने श्री
मोहनलाल सक्सेना से कहा था कि इस बार हमारी यादगार मनाने के लिए
हिन्दू-मुसलमान नेताओं को इकट्ठा बुलाया जाये।
अशफ़ाक़उल्ला को सरकार ने रामप्रसाद का दायाँ हाथ बताया है। अशफ़ाक़
कट्टर मुसलमान होते हुए भी रामप्रसाद जैसे कट्टर आर्यसमाजी का क्रान्ति में
दाहिना हाथ हो सकता है तो क्या भारत के अन्य हिन्दू-मुसलमान आज़ादी के लिए
परिशिष्ट / 521