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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 788 में से

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पृष्ठ 518

स्वीकार करने के लिए समूचे राष्ट्र को तैयार करने की कोशिश की। लेकिन यह
भावना भारतीयों के लिए में व्यक्तिगत साधना का मामला था। और सर्वोपरि तौर
पर भारत के अन्तिम राजनीतिक लक्ष्य की बाबत आपकी समझ साफ़ नहीं थी और
भी अस्पष्ट बनी हुई है। यह दुखद स्थिति है। स्वतन्त्रता का आपका विचार भारतीय
आदर्शों से मेल नहीं खाता है। भारत सर्वम परवशम दुखम् सर्वमत्वमसम सुखम और
इस आदेश की हिमायत करता है कि व्यक्ति का अस्तित्व पूर्णतया मानवता के
उद्देश्य के लिए होता है और मानवता के जरिये ईश्वर की सेवा होती है,
जगताथितमच, कृष्णमा च। वह अहिंसा जिसका भारत उपदेश देता है अहिंसा के
लिए अहिंसा नहीं है, वरन मानवता की भलाई के लिए अहिंसा है और जब मानवता
की भलाई हिंसा और रक्त-पात की माँग करेगी तो भारत ख़ून बहाने से उसी प्रकार
नहीं हिचकिचायेगा जिस प्रकार से शल्यक्रिया से ख़ून बहाने की आवश्यकता
उत्पन्न कर देती है। आदर्श भारतीय के लिए हिंसा या अहिंसा का एक जैसा महत्त्व
होता है, बशर्ते कि उनसे अन्ततोगत्वा मानवता की भलाई होती हो। विनाशाय च
दुष्कृताम् व्यर्थ में ही नहीं कहा गया है।
अतएव मेरे विचार में आपके द्वारा राष्ट्र के सम्मुख रखा गया आदर्श या आपके
द्वारा उसके सामने प्रस्तुत किया गया कार्रवाई का कार्यक्रम न तो भारतीय संस्कृति
के अनुरूप है और न ही राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर अमल में लाने योग्य।
यह सोचना बस अकल्पनीय और अबोधगम्य है कि आप अभी भी
थोड़ी-बहुत यह आशा पाले हुए हैं कि इंग्लैण्ड अपनी स्वयं की इच्छा से न्यायपूर्ण
और उदार हो सकता है – यह इंग्लैण्ड 'जोकि आत्मरक्षा के वैध उपाय के तौर
पर जलियाँवाला बाग़ नरसंहार' में यक़ीन करता है,' यह जिसने इंग्लैण्ड ओडायर
– नायर मामले की सुनवाई की और बर्बरता के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। अगर आप
के मन में ब्रिटिश सरकार की सद्बुद्धि में लेशमात्र भी आस्था बची हुई है तो
आपके अनुसार किसी कार्यक्रम की आवश्यकता ही आख़िर क्या है? अगर ब्रिटिश
सरकार को होश में लाने के लिए किसी आन्दोलन की आवश्यकता है, तो फिर
ब्रिटिश सरकार की ईमानदारी और नेक इरादों की बात क्यों की जाये? मुझे लगता
है कि आपके भीतर का पैग़म्बर मर चुका है और आप एक बार फिर कमज़ोर
मामले की पैरवी करने वाले वकील हैं; या सम्भवतः आप हमेशा से भाष्यकार रहे
हैं – केवल अर्द्ध-सत्यों के – ज़ोरदार व्याख्याकार। दुनिया के दूसरे स्वतन्त्र राष्ट्रों
के साथ गठजोड़ या महासंघ में समप्रभु स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र एक बात है और
इस साम्राज्यवादी ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासित भारत पूर्णतया दूसरी बात है।
ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर बने रहने की आपकी भावना बहुतेरी भयंकर भूलों में से
एक की याद दिलाती है, कि आपने मिथ्या औचित्य की वर्तमान ज़रूरतों के साथ
बेशक़ीमती आदर्श का समझौता किया है, और यही वह कारण है कि आप देश
512 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़