भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 525, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : पाँच
शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का अन्तिम सन्देश
दिसम्बर 1927 में काकोरी के चार क्रान्तिकारियों को फाँसी दे दी गयी।
जनवरी, 1928 के 'किरती' में भगतसिंह ने 'विद्रोही' नाम से इन पर कुछ लेख
छपवाये। यह उन्हीं में से एक है। इसमें भगतसिंह ने बिस्मिल के अन्तिम सन्देश को
प्रस्तुत किया है। - स.
आपने एक लेख 'निज-जीवन घटा' लिखा था जो गोरखपुर के 'स्वदेश' अख़बार
में छपा था। उसी को संक्षेप में हम पाठकों की सेवा में रख रहे हैं, ताकि वे जान
सकें कि उन क्रान्तिकारी वीरों के शहादत के समय क्या विचार थे।
आप 16 तारीख़ को लिखते हैं -
19 तारीख़ सुबह साढ़े छह बजे फाँसी का समय निश्चित हो चुका है। कोई
चिन्ता नहीं, ईश्वर की कृपा से मैं बार-बार जन्म लूँगा और मेरा उद्देश्य होगा कि
संसार में पूर्ण स्वतन्त्रता हो, कि प्रकृति की देन पर सबका एक-सा अधिकार हो
कि कोई किसी पर शासन न करे। सभी जगह लोगों के अपने पंचायती राज्य
स्थापित हों। अब मैं उन बातों का उल्लेख कर देना ज़रूरी समझता हूँ जो सेशन
जज के 6 अप्रैल, 1927 के फ़ैसले के बाद काकोरी के क़ैदियों के साथ हुईं। 18
जुलाई को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई। वह सिर्फ़ मौत की सज़ा पाये चार
क़ैदियों की ओर से थी। लेकिन पुलिस की ओर से सज़ा बढ़ाने की अपील हुई।
फिर बाक़ी क़ैदियों ने भी अपील कर दी, लेकिन श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, श्री
भूपेन्द्रनाथ सान्याल और इक़बालिया गवाह बनवारीलाल ने अपील नहीं की थी और
फिर प्रणव चटर्जी ने इक़बाल कर लिया और अपील वापस ले ली। फाँसीवालों
की सज़ा बहाल रही और श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी, श्री गोविन्दचरण कर और श्री
मुकन्दीलाल जी को दस साल की उम्रक़ैद हो गयी। श्री सुरेशचन्द भट्टाचार्य और
श्री विष्णुशरण दुबलिस की सज़ा 7-7 साल से बढ़ाकर 10-10 साल कर दी गयी।
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