भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 533, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेहनतकश वर्ग में से निकलकर खुशहाल वर्ग में शामिल हो जाये। दुनिया में हर
जगह और हर सूरत में बढ़ई, लोहार और किसान आदि मेहनतकश लोगों से राजा,
वजीर, वकील, न्यायाधीश, प्रोफ़ेसर, ज़मींदार, साहूकार, बैंकर आदि कहीं ज़्यादा
कमाते हैं। दुनिया की कोई शक्ति इन वर्गों को संयुक्त नहीं कर सकती।
हिन्दुस्तानी ‘सफ़ेदपोश’ शब्द उस गैर-मेहनतकश वर्ग के लिए ही इस्तेमाल में
लाया जाता है। यह तमाम चीजें जिनके कारण कि ज़िन्दगी रहने योग्य बन सकती
है, अथवा आराम, शिक्षा, हुनर, सफ़ाई, आरोग्य आदि दौलत के साथ ही प्राप्त
किये जाते हैं। बेचारे ग़रीब हर समय, हर जगह गन्दी जगहों पर ही बुरी ज़िन्दगी
गुज़ारने के लिए लाचार होते हैं। इन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए समय ही नहीं
मिलता। ग़रीब मज़दूर सारा-सारा दिन सिर्फ़ गुज़ारे के लिए पसीना-पसीना होकर
काम करता रहता है, जबकि विद्वान और अमीर लोग बढ़िया से बढ़िया भोजन
पाते हैं। घोड़ागाड़ियों और मोटरों पर चढ़कर सैर के लिए जाते हैं। खुशबूदार तेल
और इत्र के साथ मालिश करते हैं। रेशमी कपड़े पहनते हैं। कहने का मतलब यह
कि हर तरह ऐश की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं।
प्रश्न उठता है कि यह अजीब हालत पैदा ही किस तरह हो गयी? क्या कारण
है कि जो लोग खेती करते, कपड़े बुनते, कपड़े सिलते, नालियाँ साफ़ करते या
आटा पीसते हैं, उनकी आमदनी उन लोगों से कई गुना कम है जो केवल लेक्चर
देते हैं या मुक़दमों पर बहस करते हैं, जो न्याय करते या हकूमत करते हैं, जो
केवल दुआ करते या कुछ भी नहीं करते। क्या कभी किसी ने सोचकर देखा है
कि भगवान के हर बन्दे और समाज के लिए खेती-बाड़ी, कारीगरी, दस्तकारी
आदि करने वाले ‘क़ानून’ या ‘सरकार’, मज़हब या साहूकार या केवल ज़मींदार
(वे लोग जो ज़मीनों के मालिक तो बने बैठे हैं लेकिन काम कुछ नहीं करते) से
ज़्यादा ज़रूरी हैं। फिर क्या कारण है कि उस आदमी को, जोकि कुछ घण्टे कुर्सी
पर बैठकर कुछ आदमियों को जेल में भेज देता है, गेहूँ बोने वाले किसान और जूते
गाँठने वाले मोची से कई गुना अधिक तनख्वाह दी जाती है? एक राजा या मजिस्ट्रेट
या साहूकार ही मेहनतकश लोगों से कौन-सा अच्छा, लाभदायक और ज़रूरी काम
करता है? अनेक लोग सारा दिन चोटी का ज़ोर लगाकर काम करते हुए भी अपनी
ज़रूरी चीजें प्राप्त नहीं कर सकते। क्या वजह है कि एक आदमी बैठा पंखा खींचता
है और एक अन्दर पड़ा – भले ही वह हिन्दू, मुसलमान या ईसाई हो – खर्राटे
मारता है। इसे ही पंखा खींचने पर क्यों नहीं लगाया जाता? वह लोग जो अनाज,
दूध, मेवे, सब्ज़ी पैदा नहीं करते, बल्कि इन चीज़ों को इस्तेमाल करते और खाते
हैं, वास्तव में तो वही बेचारे किसान की मेहनत का लाभ उठाते हैं। इस बात को
समझने के लिए किसी फ़िलासफ़ी की ज़रूरत नहीं है। वे लोग जो रोटी पैदा नहीं
करते और न रुई कातकर, बुनकर कपड़ा तैयार करते हैं, और फिर भी रोटी खाते
परिशिष्ट / 527