भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 520, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहते हैं और इस क्रान्तिकारी पार्टी ने एक बार फिर भारतीयों को उदात्त ध्येय के
लिए मरने में निहित भव्यता और सौन्दर्य का अहसास कराया। क्रान्तिकारियों ने एक
बार फिर यह प्रदर्शित किया कि मृत्यु का भी कुछ आकर्षण होता है और वह हमेशा
भयावह चीज़ नहीं होती। अपने स्वयं के विश्वासों और आस्था के लिए मरना, इस
चेतना के साथ मौत को गले लगाना कि इस तरह से मरकर वह ईश्वर और राष्ट्र
की सेवा कर रहा है, ऐसे ध्येय के लिए जिस के न्यायोचित और वैध होने का
हमें ईमानदारी के साथ विश्वास होता है, मौत को स्वीकार करना या जान को उस
समय जोखिम में डालना जबकि मौत की पूरी सम्भावना हो क्या यह कोई नैतिक
प्रगति नहीं है?
यहाँ तक कि विपरीत परिस्थितियों और क्षणिक विफलताओं में भी अपने प्यारे
आदर्श को नहीं छोड़ना – क्षणिक उत्तेजनाओं और किसी आकर्षक व्यक्तित्व के
प्रकटतः उदात्त सिद्धान्तों के बहकावे में नहीं आना, लम्बी क़ैद बा-मशक़्क़त से विचलित
नहीं होना, सालों–साल अपनी अन्तरात्मा के प्रति सच्चे बने रहना – यह उद्देश्य की
दृढ़ता, चरित्र की यह मज़बूती उस सच्ची नैतिक प्रगति का सूचक नहीं है, जिसे
भारत ने हासिल किया है? और क्या यह क्रान्तिकारी आदर्शों का स्पष्ट परिणाम
नहीं है?
आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “हो सकता है कि आपको अपने जीवन की
परवाह न हो लेकिन आप अपने उन देशवासियों की अनदेखी नहीं कर सकते
जिनकी शहीद की मौत मरने की कोई इच्छा नहीं है।” अलबत्ता, क्रान्तिकारी इस
वाक्य के अर्थ को समझने में दुखद रूप से विफल रहे हैं। क्या आपके कहने का
मतलब यह है कि क्या क्रान्तिकारी उन 70 लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं
जिन्हें कि चौरी–चौरा मुक़दमे में फाँसी की सज़ा सुनायी गयी? क्या आपके कहने
का मतलब यह है कि जलियाँवाला बाग और गुजराँवाला में बमबारी और मासूमों
की हत्या के लिए क्रान्तिकारी ज़िम्मेदार हैं? क्या क्रान्तिकारियों ने पिछले बीस वर्षों
में अपने संघर्ष के दौरान या मौजूदा समय में भूखे–नंगे लोगों से कभी क्रान्तिकारी
संघर्ष में भाग लेने के लिए कहा है? सम्भवतः अधिकतर वर्तमान नेताओं के
मुक़ाबले क्रान्तिकारियों को जन–मनोविज्ञान का अधिक ज्ञान है। और यही वजह
थी कि उन्होंने तब तक अवाम को अपने साथ कभी नहीं लेना चाहा जब तक वे
अपनी स्वयं की शक्ति को लेकर आश्वस्त नहीं हो गये। उनका हमेशा से विश्वास
रहा है कि उत्तर भारत की जनता किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार है और
उनका यह सोचना भी सही है कि उत्तर भारत की जनता अत्यन्त घनीभूत
विस्फोटक पदार्थ है जिसके साथ सँभालकर पेश आना चाहिए। जनता की भावनाओं
का ग़लत आकलन तो आप और आपके सहयोगियों ने किया था जो उन्हें सत्याग्रह
आन्दोलन में घसीट ले गये। भीतर और बाहर से हज़ारो उत्पीड़न झेल रहे लोगों का
514 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़