भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
संघर्ष उन्हें राजनीतिक ताक़त हासिल करने के अन्तिम संघर्ष के लिए सचेत व
तैयार करेगा।
इसके अतिरिक्त सैनिक विभाग भी संगठित करना होगा। यह बहुत महत्त्वपूर्ण
है। कई बार इसकी बुरी तरह ज़रूरत होती है। उस समय शुरू करके आप ऐसा
ग्रुप तैयार नहीं कर सकते जिसके पास काम करने की पूरी ताक़त हो। शायद इस
विषय को बारीक़ी से समझाना ज़रूरी है। इस विषय पर मेरे विचारों को ग़लत रंग
दिये जाने की बहुत अधिक सम्भावना है। ऊपरी तौर पर मैंने एक आतंकवादी की
तरह काम किया है, लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं एक क्रान्तिकारी हूँ, जिसके
दीर्घकालिक कार्यक्रम-सम्बन्धी ठोस व विशिष्ट विचार हैं जिन पर यहाँ विचार
किया जा रहा है। 'शस्त्रों के साथी' मेरे कुछ साथी मुझे रामप्रसाद बिस्मिल की
तरह इस बात के लिए दोषी ठहरायेंगे कि फाँसी की कोठरी में रहकर मेरे भीतर
कुछ प्रतिक्रिया पैदा हुई है। इसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है। मेरे विचार वही हैं, मुझमें
वही दृढ़ता है और वही जोश व स्पिरिट मुझमें यहाँ है, जो बाहर थी – नहीं, उससे
कुछ अधिक है। इसलिए अपने पाठकों को मैं चेतावनी देना चाहता हूँ कि मेरे शब्दों
को वे पूरे ध्यान से पढ़ें।
उन्हें पंक्तियों के बीच कुछ भी नहीं देखना चाहिए। मैं अपनी पूरी ताक़त से
यह कहना चाहता हूँ कि क्रान्तिकारी जीवन के शुरू के चन्द दिनों के सिवाय न
तो मैं आतंकवादी हूँ और न ही था; और मुझे पूरा यक़ीन है कि इस तरह के तरीक़ों
से हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। हिन्दुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन पार्टी
के इतिहास से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। हमारे सभी काम इसी दिशा में थे,
यानी बड़े राष्ट्रीय आन्दोलन के सैनिक विभाग की जगह अपनी पहचान करवाना।
यदि किसी ने मुझे ग़लत समझ लिया है तो वे सुधार कर लें। मेरा मतलब यह
कदापि नहीं है कि बम व पिस्तौल बेकार हैं, वरन इसके विपरीत, ये लाभदायक
हैं। लेकिन मेरा मतलब यह ज़रूर है कि केवल बम फेंकना न सिर्फ़ बेकार, बल्कि
नुक़सानदायक है। पार्टी के सैनिक विभाग को हमेशा तैयार रहना चाहिए, ताकि
संकट के समय काम आ सके। इसे पार्टी के राजनीतिक काम में सहायक के रूप
में होना चाहिए। यह अपनेआप स्वतन्त्र काम न करे।
जैसे ऊपर इन पंक्तियों में बताया गया है, पार्टी अपने काम को आगे बढ़ाये।
समय-समय पर मीटिंगें और सम्मेलन बुलाकर अपने कार्यकर्ताओं को सभी
विषयों के बारे में सूचनाएँ और सजगता देते रहना चाहिए। यदि आप इस तरह से
काम शुरू करते हैं तो आपको काफ़ी गम्भीरता से काम लेना होगा। इस काम को
पूरा होने में कम से कम बीस साल लगेंगे। क्रान्ति-सम्बन्धी यौवन काल के दस
साल में पूरे होने के सपनों को एक ओर रख दें, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी के
(एक साल में स्वराज के) सपने को परे रख दिया था। न तो इसके लिए भावुक
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 487
होने की ज़रूरत है और न ही यह सरल है। ज़रूरत है निरन्तर संघर्ष करने, कष्ट
सहने और कुर्बानी भरा जीवन बिताने की। अपना व्यक्तिवाद पहले ख़त्म करो।
व्यक्तिगत सुख के सपने उतारकर एक ओर रख दो और फिर काम शुरू करो।
इंच-इंच कर आप आगे बढ़ेंगे। इसके लिए हिम्मत, दृढ़ता और बहुत मज़बूत इरादे
की ज़रूरत है। कितने ही भारी कष्ट कठिनाइयाँ क्यों न हों, आपकी हिम्मत न
काँपे। कोई भी पराजय या धोखा आपका दिल न तोड़ सके। कितने भी कष्ट
क्यों न आयें, आपका क्रान्तिकारी जोश ठण्डा न पड़े। कष्ट सहने और कुर्बानी
करने के सिद्धान्त से आप सफलता हासिल करेंगे और ये व्यक्तिगत सफलताएँ
क्रान्ति की अमूल्य सम्पत्ति होंगी।
इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद!
2 फ़रवरी, 1931
हमारे लिए सुनहरा अवसर
भारत की स्वतन्त्रता अब शायद दूर का स्वप्न नहीं रहा। घटनाएँ बड़ी तेज़ी से घट
रही हैं इसलिए स्वतन्त्रता अब हमारी आशाओं से भी जल्द ही एक सच्चाई बन
जायेगी। ब्रिटिश साम्राज्य बुरी तरह लताड़ा हुआ है। जर्मनी को मुँह की खानी पड़
रही है, फ्रांस थर-थर काँप रहा है और अमेरिका हिला हुआ है और इन सबकी
कठिनाइयाँ हमारे लिए सुनहरा अवसर है। प्रत्येक चीज़ उस महान भविष्यवाणी की
ओर संकेत कर रही है, जिसके अनुसार समाज का पूँजीवादी ढाँचा नष्ट होना अटल
है। कूटनीतिज्ञ लोग स्वयं को बचाने के लिए प्रयत्नशील हो सकते हैं और पूँजीवादी
षड्यन्त्र से 'क्रान्ति के बाघ' को अपने घर से दूर रखने की कोशिशें कर सकते
हैं। अंग्रेज़ों का बजट सन्तुलित हो सकता है और मृत्यु के मुँह में पड़े पूँजीवाद को
कुछ पलों की राहत मिल सकती है। 'डालर राजा' चाहे अपना ताज सँभाल लें तो
भी व्यापक मन्दी यदि जारी रही और जिसका जारी रहना लाज़िमी है, तो बेरोज़गारों
की फ़ौज तेज़ी से बढ़ेगी और यह बढ़ भी रही है, क्योंकि पूँजीवादी उत्पादन-
व्यवस्था ही ऐसी है। यह चक्कर पूँजीवादी व्यवस्था को पटरी से उतार देगा। बस,
बात कुछ महीनों की ही है। इसीलिए क्रान्ति अब भविष्यवाणी या सम्भावना नहीं,
वरन 'व्यावहारिक राजनीति' है जिसे सोची-समझी योजना और कठोर अमल से
सफल बनाया जा सकता है। इसके विभिन्न पहलुओं और तात्पर्य, इसके तरीक़ों और
उद्देश्यों-सम्बन्धी कोई विचारधारात्मक उलझन नहीं होनी चाहिए।
गाँधीवाद
कांग्रेस आन्दोलन की सम्भावनाओं, पराजयों और उपलब्धियों के बारे में हमें किसी
प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। आज चल रहे इस आन्दोलन को गाँधीवाद कहना
488 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
ही उचित है। यह दावे के साथ आज़ादी के लिए स्टैण्ड नहीं लेता, बल्कि सत्ता
में 'हिस्सेदारी' के पक्ष में है। 'पूर्ण स्वतन्त्रता' के अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं।
इसका तरीक़ा अनूठा है, लेकिन बेचारे लोगों के किसी काम का नहीं है। साबरमती
के सन्त को गाँधीवाद कोई स्थायी शिष्य नहीं दे पायेगा। यह एक बीच की पार्टी
– यानी लिबरल-रैडिकल मेल-जोल का काम कर रही है और करती भी रही
है। मौके की असलियत से टकराने में इसे शर्म आती है। इसे चलाने वाले देश के
ऐसे ही लोग हैं जिनके हित इससे बँधे हुए हैं और वे अपने हितों के लिए बुर्जुआ
हठ से चिपके हुए हैं। यदि क्रान्तिकारी रक्त से इसे गर्मजोशी न दी गयी तो इसका
ठण्डा होना लाज़िमी है। इसे इसी के दोस्तों से बचाने की ज़रूरत है।
आतंकवाद
आइये, हम इस कठिन सवाल के बारे में स्पष्ट हों। बम का रास्ता 1905 से चला
आ रहा है और क्रान्तिकारी भारत पर यह एक दर्दनाक टिप्पणी है। अभी यह महसूस
नहीं किया गया कि इसका उपयोग व दुरुपयोग क्या है। आतंकवाद हमारे समाज
में क्रान्तिकारी चिन्तन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है; या एक पछतावा।
इसी तरह ये अपनी असफलता का स्वीकार भी है। शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ
था। इसने राजनीति को आमूल बदल दिया। नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को
चमकाया, आत्मत्याग की भावना को ज्वलन्त रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों
के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई और शक्ति को ज़ाहिर करने का अवसर
मिला। लेकिन यह स्वयं में पर्याप्त नहीं है। सभी देशों में इसका (आतंकवाद का)
इतिहास असफलता का इतिहास है – फ्रांस, रूस, जर्मनी में बाल्कन देशों, स्पेन
में – हर जगह इसकी यही कहानी है। इसकी पराजय के बीज इसके भीतर ही
होते हैं। साम्राज्यवादियों को अच्छी तरह पता है कि 30 करोड़ लोगों पर शासन के
लिए प्रति वर्ष 30 व्यक्तियों की बलि दी जा सकती है। शासन करने का स्वाद
बमों या पिस्तौलों से किरकिरा तो किया जा सकता है, लेकिन शोषण के
व्यावहारिक लाभ उसे बनाये रखने पर विवश करेंगे। भले ही हमारी उम्मीद के
अनुसार हथियार आसानी से मिल जायें और यदि हम पूरे ज़ोर से लड़ें, जैसाकि
इतिहास में पहले कभी न घटा हो, तो भी आतंकवाद अधिक से अधिक
साम्राज्यवादी ताक़त को समझौते के लिए ही मजबूर कर सकता है। ऐसे समझौते,
हमारे उद्देश्य – पूर्ण आज़ादी – से हमेशा ही कहीं दूर रहेंगे। इस प्रकार आतंकवाद,
एक समझौता, सुधारों की एक किश्त निचोड़कर निकाल सकता है और इसे ही
हासिल करने के लिए गाँधीवाद ज़ोर लगा रहा है। वह चाहता है कि दिल्ली का
शासन गोरे हाथों से भूरे हाथों में आ जाये। ये लोगों के जीवन से दूर हैं और इनके
गद्दी पर बैठते ही ज़ालिम बन जाने की बहुत सम्भावनाएँ हैं। आयरिश उदाहरण यहाँ
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 489
लागू नहीं होगा, यह चेतावनी मैं देना चाहता हूँ। आयरलैण्ड में इक्की-दुक्की
आतंकवादी कार्रवाइयाँ नहीं थीं, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर जनसाधारण की
बग़ावत थी, जिसमें बन्दूक़धारी अपनी नज़दीकी जानकारी और हमदर्दी से लोगों से
जुड़ा हुआ था। उन्हें बड़ी आसानी से हथियार मिल जाते थे, क्योंकि अमेरिकी
आयरिश उन्हें अथाह आर्थिक मदद दे रहे थे। भौगोलिक स्थिति भी ऐसे युद्ध के
लिए लाभदायक थी। लेकिन तो भी आयरलैण्ड को अपने आन्दोलन के अपूर्ण
उद्देश्यों के साथ ही सन्तोष करना पड़ा। इसने आयरिश जनता की गुलामी तो कम
की है, लेकिन आयरिश श्रमिक वर्ग को पूँजीपतियों के जंजाल से मुक्त नहीं
करवाया। भारत को आयरलैण्ड से सीखना है। यह एक चेतावनी भी है कि किस
प्रकार क्रान्तिकारी सामाजिक आधार से खाली राष्ट्रवादी आदर्शवाद, हालात के
साज़गार होने पर भी साम्राज्यवाद से समझौते की रेत में गुम हो सकता है। क्या भारत
को अभी भी आयरलैण्ड की नक़ल करनी चाहिए – यदि वह की भी जा सके,
तो भी?
एक प्रकार से गाँधीवाद अपना भाग्यवाद का विचार रखते हुए भी, क्रान्तिकारी
विचारों के कुछ नज़दीक पहुँचने का यत्न करता है, क्योंकि यह सामूहिक कार्रवाई
पर निर्भर करता है, यद्यपि यह कार्रवाई समूह के लिए नहीं होती। उन्होंने मज़दूरों
को आन्दोलन में भागीदार बनाकर उन्हें मज़दूर-क्रान्ति के रास्ते पर डाल दिया है।
यह बात अलग है कि उन्हें कितनी असभ्यता या स्वार्थ से अपने राजनीतिक
कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किया गया है। क्रान्तिकारियों को 'अहिंसा के फ़रिश्ते'
को उसका योग्य स्थान देना चाहिए।
आतंकवाद के शैतान को दाद देने की ज़रूरत नहीं है। आतंकवादियों ने काफ़ी
काम कर लिया है, काफ़ी कुछ सिखा दिया है। यदि हम अपने उद्देश्यों और तरीक़ों
सम्बन्धी भूलें न करें तो यह अभी भी कुछ लाभप्रद हो सकता है। विशेषतः निराशा
के समय आतंकवादी तरीक़ा हमारे प्रचार-अभियान में सहायक हो सकता है,
लेकिन यह पटाखेबाज़ी के सिवाय है कुछ नहीं और इसे विशेष समय और कुछ
गिने-चुने लोगों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। क्रान्तिकारी को निरर्थक आतंकवादी
कार्रवाइयों और व्यक्तिगत आत्मबलिदान के दूषित चक्र में न डाला जाये। सभी के
लिए उत्साहवर्द्धक आदर्श, उद्देश्य के लिए मरना न होकर उद्देश्य के लिए जीना
– और वह भी लाभदायक तरीक़े से योग्य रूप में जीना – होना चाहिए।
यह कहने की तो कोई ज़रूरत नहीं है कि हम आतंकवाद से पूरी तरह सम्बन्ध
नहीं तोड़ रहे। हम श्रमिक क्रान्ति के दृष्टिकोण से इसका पूरे तौर पर मूल्यांकन
चाहते हैं। जो नवयुवक परिपक्व व चुपचाप (तरीक़े से) संगठन के काम में फिट
नहीं होते, उनकी दूसरी भूमिका हो सकती है। उन्हें नीरस कामों से मुक्त कर अपनी
इच्छा पूरी करने के लिए छोड़ देना चाहिए। लेकिन संचालक संस्था को पार्टी और
490 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
उस काम के प्रभाव को, लोगों पर उसके प्रभाव और दुश्मन की ताक़त को पहले
ही देखना चाहिए। ऐसे काम पार्टी और जनता का ध्यान जुझारू जनसंघर्ष से हटाकर
तेज़ भड़कीले कामों की ओर लगा सकते हैं और इस प्रकार पार्टी की जड़ों पर
प्रहार करने का बहाना बन सकते हैं। इस प्रकार किसी भी स्थिति में इस आदर्श
को आगे नहीं बढ़ाना है।
लेकिन गुप्त सैनिक विभाग कोई श्रापग्रस्त चीज़ नहीं है। वास्तव में यह तो
अग्रिम पंक्ति है। क्रान्तिकारी पार्टी की ‘गोलीमार पंक्ति’ ‘आधार’ से पूरी तरह जुड़ी
होनी चाहिए। ‘आधार’ जुझारू व गतिशील जन-पार्टी को बनना है। संगठन के लिए
धन और हथियार संग्रह करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।
क्रान्ति
क्रान्ति से हमारा क्या आशय है, यह स्पष्ट है। इस शताब्दी में इसका सिर्फ़ एक
ही अर्थ हो सकता है – जनता के लिए जनता का राजनीतिक शक्ति हासिल
करना। वास्तव में यही है ‘क्रान्ति’, बाक़ी सभी विद्रोह तो सिर्फ़ मालिकों के
परिवर्तन द्वारा पूँजीवादी सड़ाँध को ही आगे बढ़ाते हैं। किसी भी हद तक लोगों
से या उनके उद्देश्यों से जतायी हमदर्दी जनता से वास्तविकता नहीं छिपा सकती,
लोग छल को पहचानते हैं। भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ
नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को – भारत में साम्राज्यवादियों और उनके मददगार
हटाकर जोकि उसी आर्थिक व्यवस्था के पैरोकार हैं, जिसकी जड़ें शोषण पर
आधारित हैं – आगे आना है। हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर
कष्ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयाँ, एक स्वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का
स्थान लेने के लिए तैयार हैं।
साम्राज्यवादियों को गद्दी से उतारने के लिए भारत का एकमात्र हथियार श्रमिक
क्रान्ति है। कोई और चीज़ इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकती। सभी विचारों वाले
राष्ट्रवादी एक उद्देश्य पर सहमत हैं कि साम्राज्यवादियों से आज़ादी हासिल हो। पर
उन्हें यह समझने की भी ज़रूरत है कि उनके आन्दोलन की चालक शक्ति विद्रोही
जनता है और उसकी जुझारू कार्रवाइयों से ही सफलता हासिल होगी। चूँकि इसका
सरल समाधान नहीं हो सकता, इसलिए स्वयं को छलकर वे उस ओर लपकते हैं,
जिसे वे आरजी इलाज, लेकिन झटपट और प्रभावशाली मानते हैं – अर्थात चन्द
सैकड़े दृढ़ आदर्शवादी राष्ट्रवादियों के सशस्त्र विद्रोह के जरिये विदेशी शासन को
पलटकर राज्य का समाजवादी रास्ते पर पुनर्गठन। उन्हें समय की वास्तविकता में
झाँककर देखना चाहिए। हथियार बड़ी संख्या में प्राप्त नहीं हैं और जुझारू जनता
से अलग होकर अशिक्षित गुट की बग़ावत की सफलता का इस युग में कोई चांस
नहीं है। राष्ट्रवादियों की सफलता के लिए उनकी पूरी क़ौम को हरकत में आना
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 491
चाहिए और बग़ावत के लिए खड़ा होना चाहिए। और क़ौम कांग्रेस के लाउडस्पीकर
नहीं है, वरन वे मज़दूर-किसान हैं, जो भारत की 95 प्रतिशत जनसंख्या है। राष्ट्र
स्वयं को राष्ट्रवाद के विश्वास पर ही हरकत में लायेगा, यानी साम्राज्यवाद और
पूँजीपति की गुलामी से मुक्ति के विश्वास दिलाने से।
हमें याद रखना चाहिए कि श्रमिक क्रान्ति के अतिरिक्त न किसी और क्रान्ति
की इच्छा करनी चाहिए और न ही वह सफल हो सकती है।
कार्यक्रम
क्रान्ति का स्पष्ट और ईमानदार कार्यक्रम होना समय की ज़रूरत है और इस
कार्यक्रम को लागू करने के लिए मज़बूत कार्रवाई होनी चाहिए।
1917 में अक्टूबर क्रान्ति से पूर्व, जब लेनिन अभी मास्को में भूमिगत थे तो
उन्होंने सफल क्रान्ति के लिए तीन ज़रूरी शर्तें बतायी थीं –
- राजनीतिक-आर्थिक परिस्थिति।
- जनता के मन में विद्रोह-भावना।
- एक क्रान्तिकारी पार्टी, जो पूरी तरह प्रशिक्षित हो और परीक्षा के समय
जनता को नेतृत्व प्रदान कर सके।
भारत में पहली शर्त पूरी हो चुकी है, दूसरी व तीसरी शर्त अन्तिम रूप में
अपनी पूर्ति की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसके लिए हरकत में आना आज़ादी के सभी
सेवकों का पहला काम है और इसी मुद्दे को सामने रखकर कार्यक्रम बनाया जाना
चाहिए। इसकी रूपरेखा नीचे दी जा रही है और उसके प्रत्येक अनुभाग-सम्बन्धी
सुझाव अनुसूची ‘क’ व ‘ख’ में दर्ज हैं –
बुनियादी काम
कार्यकर्ताओं के सामने सबसे पहली ज़िम्मेदारी है जनता को जुझारू काम के लिए
तैयार व लामबन्द करना। हमें अन्धविश्वासों, भावनाओं, धार्मिकता या तटस्थता के
आदर्शों से खेलने की ज़रूरत नहीं है। हमें जनता से सिर्फ़ प्याज़ के साथ रोटी का
वायदा ही नहीं करना। ये वायदे सम्पूर्ण व ठोस होंगे और इन पर हम ईमानदारी और
स्पष्टता से बात करेंगे। हम कभी भी उनके मन में भ्रमों का जमघट नहीं बनने देंगे।
क्रान्ति जनता के लिए होगी। कुछ स्पष्ट निर्देश ये होंगे – - सामन्तवाद की समाप्ति।
- किसानों के कर्ज़े समाप्त करना।
- क्रान्तिकारी राज्य की ओर से भूमि का राष्ट्रीयकरण ताकि सुधरी हुई व
साझी खेती स्थापित की जा सके। - रहने के लिए आवास की गारण्टी।
492 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
- किसानों से लिए जाने वाले सभी ख़र्च बन्द करना। सिर्फ़ इकहरा
भूमि-कर लिया जायेगा। - कारख़ानों का राष्ट्रीयकरण और देश में कारख़ाने लगाना।
- आम शिक्षा।
- काम करने के घण्टे ज़रूरत के अनुसार कम करना।
जनता ऐसे कार्यक्रम के लिए ज़रूर हामी भरेगी। इस समय सबसे ज़रूरी काम
यही है कि हम लोगों तक पहुँचें। थोपी हुई अज्ञानता ने एक ओर से और
बुद्धिजीवियों की उदासीनता ने दूसरी ओर से – शिक्षित क्रान्तिकारियों और
हथौड़े-दराँत वाले उनके अभागे अर्धशिक्षित साथियों के बीच एक बनावटी दीवार
खड़ी कर दी है। क्रान्तिकारियों को इस दीवार को अवश्य ही गिराना है। इसके लिए
निम्न काम ज़रूरी हैं – - कांग्रेस के मंच का लाभ उठाना।
- ट्रेड यूनियनों पर क़ब्ज़ा करना और नयी ट्रेड यूनियनों व संगठनों को
जुझारू रूप में स्थापित करना। - राज्यों की यूनियनें बनाकर उन्हें उपरोक्त बातों के आधार पर संगठित
करना। - प्रत्येक सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों में (यहाँ तक कि सहकारिता
सोसायटियों), जिनसे जनता तक पहुँचने का अवसर मिलता है, गुप्त रूप
से दाख़िल होकर इनकी कार्रवाइयों को इस रूप में चलाना कि असल
मुद्दे और उद्देश्यों को आगे बढ़ाया जा सके। - दस्तकारों की समितियाँ, मज़दूरों और बौद्धिक काम करने वालों की
यूनियनें हर जगह स्थापित की जायें।
ये कुछ रास्ते हैं जिनसे पढ़े-लिखे, प्रशिक्षित क्रान्तिकारी लोगों तक पहुँच
सकते हैं। और एक बार पहुँच जायें तो प्रशिक्षण के जरिये पहले तो अपने अधिकारों
की उत्साहपूर्वक पुष्टि कर सकते हैं और फिर हड़तालों और काम रोकने के तरीक़ों
से जुझारू हल निकाल सकते हैं।
क्रान्तिकारी पार्टी
क्रान्तिकारियों के सक्रिय ग्रुप की मुख्य ज़िम्मेदारी, जनता तक पहुँचने और उन्हें
सक्रिय बनाने की तैयारी में होती है। यही हैं वे चलते-फिरते दृढ़ इरादों के लोग
जो राष्ट्र को जुझारू जीवनी शक्ति देंगे। ज्यों-ज्यों परिस्थितियाँ पकती हैं तो इन्हीं
क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों – जो बुर्जुआ व पेटी बुर्जुआ से आते हैं और कुछ समय
तक इसी वर्ग से आते भी रहेंगे, लेकिन जिन्होंने स्वयं को इस वर्ग की परम्पराओं
से अलग कर लिया होता है – से क्रान्तिकारी पार्टी बनेगी और फिर इसके गिर्द
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 493
अधिक से अधिक सक्रिय मज़दूर-किसान और छोटे दस्तकार राजनीतिक कार्यकर्ता
जुड़ते रहेंगे। लेकिन मुख्य तौर पर यह क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों, स्त्रियों व पुरुषों की
पार्टी होगी, जिनकी मुख्य ज़िम्मेदारी यह होगी कि वे योजना बनायें, फिर उसे लागू
करें, प्रोपेगेण्डा या प्रचार करें, अलग-अलग यूनियनों में काम शुरू कर उनमें
एकजुटता लायें, उनके एकजुट हमले की योजना बनायें, सेना व पुलिस को
क्रान्ति-समर्थक बनायें और उनकी सहायता या अपनी अन्य शक्तियों से विद्रोह या
आक्रमण की शक्ल में क्रान्तिकारी टकराव की स्थिति बनायें, लोगों को विद्रोह के
लिए प्रयत्नशील करें और समय पड़ने पर निर्भीकता से नेतृत्व दे सकें।
वास्तव में वही आन्दोलन का दिमाग़ हैं। इसीलिए उन्हें दृढ़ चरित्र की ज़रूरत
होगी, यानी पहलक़दमी और क्रान्तिकारी नेतृत्व की क्षमता। उनकी समझ
राजनीतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक समस्याओं, सामाजिक रुझानों, प्रगतिशील
विज्ञान, युद्ध के नये वैज्ञानिक तरीक़ों और उसकी कला आदि के अनुशासित भाव
से किये गये गहरे अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। क्रान्ति परिश्रमी विचारकों
और परिश्रमी कार्यकर्ताओं की पैदावार होती है। दुर्भाग्य से भारतीय क्रान्ति का
बौद्धिक पक्ष हमेशा दुर्बल रहा है, इसीलिए क्रान्ति की अत्यावश्यक चीज़ों और
किये कामों के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया जाता रहा। इसलिए एक क्रान्तिकारी को
अध्ययन-मनन अपनी पवित्र ज़िम्मेदारी बना लेना चाहिए।
यह तो स्पष्ट है कि पार्टी कुछ विशेष मामलों में खुले रूप में काम कर सकती
है। जहाँ तक सम्भव हो, पार्टी को गुप्त नहीं होना चाहिए। इसमें सन्देह नहीं रहेंगे
और पार्टी को शक्ति और प्रतिष्ठा मिलेगी। पार्टी को बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी उठानी
होगी, इसलिए सुविधा की दृष्टि से पार्टी को कुछ समितियों में बाँटा जा सकता
है जो प्रत्येक क्षेत्र के लिए विशेष कामों की देखभाल करेंगी। काम का यह विभाजन
समय की आवश्यकता के अनुसार लचीला होना चाहिए या सदस्य की सम्भावनाएँ
आँककर उसे किसी स्थानीय समिति में काम दिया जा सकता है। स्थानीय समिति,
प्रान्तीय बोर्ड के अधीन होगी व बोर्ड सुप्रीम कौंसिल के अधीन। प्रान्त के भीतर
सम्पर्क का काम प्रान्तीय बोर्ड के अधीन होगा। बिखरे-बिखरे सभी कामों या
बिखराने वाले तत्त्वों को रोकना चाहिए, लेकिन अधिक केन्द्रीयकरण की सम्भावना
नहीं है, इसलिए उसकी अभी कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।
सभी स्थानीय समितियों को एक-दूसरे से सम्पर्क रखते हुए काम करने चाहिए
और समिति में एक सदस्य भी होना चाहिए। समिति छोटी, संयुक्त व कुशल हो
और इसे वाद-विवाद क्लब में पतित नहीं होने देना चाहिए।
इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में क्रान्तिकारी पार्टी इस तरह हो –
(क) सामान्य समिति : भरती करना, सेना में प्रचार, सामान्य नीति, संगठन,
जन-संगठनों में सम्पर्क – (परिशिष्ट क)।
494 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
(ख) वित्त समिति : समिति में महिला सदस्यों की संख्या अधिक हो
सकती है। इस समिति के सिर पर सबसे मुश्किल कामों से भी मुश्किल काम
निर्भर है, इसलिए सभी को खुले दिल से इसकी सहायता करनी चाहिए। धन के
स्रोत प्राथमिकता के अनुसार हों – स्वैच्छिक चन्दा, जबरी चन्दा (सरकारी धन),
विदेशी पूँजीपति या बैंक, विदेश में रहने वालों की देशी व्यक्तिगत सम्पत्ति पर
क़ब्ज़ा या ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े, जैसे गबन। (अन्तिम दोनों हमारी नीति के विपरीत
हैं और पार्टी को हानि पहुँचाते हैं, इसलिए इन्हें अधिक बढ़ावा नहीं देना चाहिए।)
(ग) एक्शन कमेटी (कार्रवाई समिति) : इसका रूप – साबोताज,
हथियार-संग्रह और विद्रोह का प्रशिक्षण देने के लिए एक गुप्त समिति।
ग्रुप (क) – नवयुवक : शत्रु की ख़बरें एकत्र करना,
स्थानीय सैनिक-सर्वेक्षण।
ग्रुप (ख) – विशेषज्ञ : शस्त्र संग्रह, सैनिक-प्रशिक्षण आदि।
(घ) स्त्री-समिति : यद्यपि ज़ाहिरा तौर पर स्त्री-पुरुषों में कोई भेदभाव नहीं
रखा जाता तथापि पार्टी को सुरक्षा व सुविधा के लिए ऐसी समिति की ज़रूरत है
जो अपने सदस्यों की पूरी ज़िम्मेदारी ओढ़ सके। उन्हें वित्त समिति का पूरा भार
सौंपा जा सकता है और काफ़ी हद तक सामान्य समिति के काम भी दिये जा सकते
हैं। कार्रवाई समिति के लिए इनमें अधिक सम्भावना नहीं है। इनकी प्रारम्भिक
जिम्मेदारियाँ हैं – स्त्रियों को क्रान्तिकारी बनाना और इनमें से प्रत्यक्ष सेवा के लिए
सक्रिय सदस्य भरती करना।
ऊपर बताये गये कार्यक्रम से यह निष्कर्ष निकालना सम्भव है कि क्रान्ति या
आज़ादी के लिए कोई छोटा रास्ता नहीं है। 'यह किसी सुन्दरी की तरह सुबह-सुबह
हमें दिखायी नहीं देगी' और यदि ऐसा हुआ तो वह बड़ा मनहूस दिन होगा। बिना
किसी बुनियादी काम के, बग़ैर जुझारू जनता के और बिना किसी पार्टी के, अगर
(क्रान्ति) हर तरह से तैयार हो, तो यह एक असफलता होगी। इसीलिए हमें स्वयं
को झिंझोड़ना होगा। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि पूँजीवादी व्यवस्था
चरमरा रही है और तबाही की ओर बढ़ रही है। दो या तीन साल में शायद इसका
विनाश हो जाये। यदि आज भी हमारी शक्ति बिखरी रही और क्रान्तिकारी शक्तियाँ
एकजुट होकर न बढ़ सकीं तो ऐसा संकट आयेगा कि हम उसे सँभालने के लिए
तैयार नहीं होंगे। आइये, हम यह चेतावनी स्वीकार करें और दो या तीन वर्ष में
क्रान्ति की ओर आगे बढ़ने की योजना बनायें।
(फ़रवरी, 1931)
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 495
युद्ध अभी जारी है...
फाँसी पर लटकाये जाने से 3 दिन पूर्व – 20 मार्च, 1931 को – भगतसिंह,
सुखदेव और राजगुरु ने पंजाब के गवर्नर को यह पत्र भेजकर माँग की थी कि उन्हें
युद्धबन्दी माना जाये तथा फाँसी पर लटकाये जाने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।
– स.
हमें फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।
20 मार्च, 1931
प्रति, गवर्नर पंजाब, शिमला
महोदय,
उचित सम्मान के साथ हम नीचे लिखी बातें आपकी सेवा में रख रहे हैं –
भारत की ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च अधिकारी वायसराय ने एक विशेष
अध्यादेश जारी करके लाहौर षड्यन्त्र अभियोग की सुनवाई के लिए एक विशेष
न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) स्थापित किया था, जिसने 7 अक्टूबर, 1930 को हमें
फाँसी का दण्ड सुनाया। हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया है कि
हमने सम्राट जॉर्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है।
न्यायालय के इस निर्णय से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं –
पहली यह कि अंग्रेज़ जाति और भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा
है। दूसरे यह कि हमने निश्चित रूप में इस युद्ध में भाग लिया है, अतः हम
युद्धबन्दी हैं।
यद्यपि इनकी व्याख्या में बहुत सीमा तक अतिशयोक्ति से काम लिया गया
है, तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि ऐसा करके हमें सम्मानित किया
गया है। पहली बात के सम्बन्ध में हम तनिक विस्तार से प्रकाश डालना चाहते हैं।
हम नहीं समझते कि प्रत्यक्ष रूप में ऐसी कोई लड़ाई छिड़ी हुई है। हम नहीं जानते
कि युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या है? परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार
करते हैं और साथ ही इसे इसके ठीक सन्दर्भ में समझाना चाहते हैं।
496 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
युद्ध की स्थिति
हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती
रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय
के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है – चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज़ पूँजीपति
और अंग्रेज़ या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर
रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा
हो तो भी इस स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि आपकी सरकार कुछ नेताओं
या भारतीय समाज के मुखियों पर प्रभाव जमाने में सफल हो जायें, कुछ सुविधाएँ
मिल जायें, अथवा समझौते हो जायें, इससे भी स्थिति नहीं बदल सकती, तथा
जनता पर इसका प्रभाव बहुत कम पड़ता है। हमें इस बात की भी चिन्ता नहीं कि
युवकों को एक बार फिर धोखा दिया गया है और इस बात का भी भय नहीं है
कि हमारे राजनीतिक नेता पथ-भ्रष्ट हो गये हैं और वे समझौते की बातचीत में इन
निरपराध, बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गये हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से
क्रान्तिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु
समझते हैं, क्योंकि उनके विचार में वे हिंसा में विश्वास रखते हैं। हमारी वीरांगनाओं
ने अपना सबकुछ बलिदान कर दिया है। उन्होंने अपने पतियों को बलिवेदी पर भेंट
किया, भाई भेंट किये, और जो कुछ भी उनके पास था – सब न्योछावर कर दिया।
उन्होंने अपनेआप को भी न्योछावर कर दिया। परन्तु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही
समझती है। आपके एजेण्ट भले ही झूठी कहानियाँ बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और
पार्टी की प्रसिद्धि को हानि पहुँचाने का प्रयास करें, परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा।
युद्ध के विभिन्न स्वरूप
हो सकता है कि यह लड़ाई भिन्न-भिन्न दशाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करे।
किसी समय यह लड़ाई प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलती रहे, कभी
भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर युद्ध जारी रहे और कभी
यह घटना इतनी भयानक हो जाये कि जीवन और मृत्यु की बाज़ी लग जाये। चाहे
कोई भी परिस्थिति हो, इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा। यह आपकी इच्छा है कि
आप जिस परिस्थिति को चाहें चुन लें, परन्तु यह लड़ाई जारी रहेगी। इसमें
छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जायेगा। बहुत सम्भव है कि यह युद्ध भयंकर
स्वरूप ग्रहण कर ले। पर निश्चय ही यह उस समय तक समाप्त नहीं होगा जब
तक कि समाज का वर्तमान ढाँचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन
या क्रान्ति समाप्त नहीं हो जाती और मानवी सृष्टि में एक नवीन युग का सूत्रपात
नहीं हो जाता।
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 497
अन्तिम युद्ध
निकट भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा।
साम्राज्यवाद व पूँजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने
प्रत्यक्ष रूप में भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न
तो हमने प्रारम्भ ही किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा।
हमारी सेवाएँ इतिहास के उस अध्याय में लिखी जायेंगी जिसको यतीन्द्रनाथ दास
और भगवतीचरण के बलिदानों ने विशेष रूप में प्रकाशमान कर दिया है। इनके
बलिदान महान हैं। जहाँ तक हमारे भाग्य का सम्बन्ध है, हम ज़ोरदार शब्दों में आपसे
यह कहना चाहते हैं कि आपने हमें फाँसी पर लटकाने का निर्णय कर लिया है।
आप ऐसा करेंगे ही, आपके हाथों में शक्ति है और आपको अधिकार भी प्राप्त है।
परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला सिद्धान्त ही अपना रहे हैं
— और आप उस पर कटिबद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई इस बात को सिद्ध
करने के लिए पर्याप्त है कि हमने कभी कोई प्रार्थना नहीं की और अब भी हम
आपसे किसी प्रकार की दया की प्रार्थना नहीं करते। हम आपसे केवल यह प्रार्थना
करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार
हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है। इस स्थिति में हम युद्धबन्दी हैं, अतः
इस आधार पर हम आपसे माँग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबन्दियों जैसा ही व्यवहार
किया जाये और हमें फाँसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाये।
अब यह सिद्ध करना आपका काम है कि आपको उस निर्णय में विश्वास है
जो आपकी सरकार के एक न्यायालय ने किया है। आप अपने कार्य द्वारा इस बात
का प्रमाण दीजिये। हम विनयपूर्वक आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अपने
सेना-विभाग को आदेश दे दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली
भेज दी जाये।
भवदीय,
भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव
498 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परिशिष्ट : एक
दि रिवोल्यूशनरी
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का यह घोषणापत्र दिसम्बर 1924 के
आसपास शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा लिखा गया था। 31 दिसम्बर 1924 की रात और
1 जनवरी 1924 के बीच इसे उत्तर भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों में वितरित
किया गया था। — स.
हर इन्सान को निःशुल्क हरेक इन्सान को वास्तविक
न्याय चाहे वह समान अवसर, चाहे वह
ऊँच हो या नीच ऊँच हो या नीच
अमीर हो या ग़रीब अमीर हो ग़रीब
रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ़ इण्डिया का मुखपत्र
पहली जनवरी, 1925
भाग 1
( हर एक ईमानदार हिन्दुस्तानी को इसे पूरा पढ़ना चाहिए और अपने दोस्तों
के बीच बाँटना चाहिए )
भारतीय क्रान्तिकारी पार्टी का घोषणापत्र
“नये तारे के जन्म के लिए उथल-पुथल ज़रूरी है।” और जीवन पीड़ा और व्यथा
के साथ जन्म लेता है। हिन्दुस्तान का भी एक नया जन्म हो रहा है और यह उस
उथल-पुथल और पीड़ा के दौर से गुज़र रहा है जिससे बचा नहीं जा सकता है।
हिन्दुस्तानी जन अपनी नियत भूमिका अदा करेंगे और तब सारे अनुमान बेकार सिद्ध
होंगे, सीधे-सादे और कमज़ोर लोगों से होशियारों और ताक़तवरों के हाथ-पैर फूल
जायेंगे, विशाल साम्राज्य चकनाचूर हो जायेंगे और नये राष्ट्रों का उदय होगा जो
अपनी शान और महिमा से मानवता को स्तब्ध कर देंगे।
यह नयी शक्ति, जो दुनिया की जड़ों तक को हिला रही है, यह नया जोश
परिशिष्ट / 499
जो पर्दे के पीछे चमत्कार कर रहा है, हिन्दुस्तान के युवा रक्त में भी प्रकट हो रहा
है और एक आन्दोलन को आकार दे रहा है। इस आन्दोलन से बुद्धिमान और विद्वान
नफ़रत करते और इसकी उपेक्षा करते हैं और इसे चन्द सिरफिरे लोगों के पागलपन
भरे सपने कहा जाता है। यह अनोखा आन्दोलन नौजवान हिन्दुस्तान का क्रान्तिकारी
आन्दोलन है। इस क्रान्तिकारी आन्दोलन ने नाजुक लोगों के होश उड़ा दिए हैं और
बलवान तथा स्वस्थ को प्रेरित किया है। इसने दुनियाभर और ज्ञानी लोगों को हैरान
कर दिया है। जिस तरह आने वाले बसन्त को रोका नहीं जा सकता है उसी तरह
से इस आन्दोलन को कभी कुचला नहीं जा सकता। जब तक यह उस मिशन को
पूरा नहीं कर लेता जिसके लिए उसने जन्म लिया है, तब तक यह मर नहीं सकता।
अत्याचारी इसे दबायेंगे। अविश्वासी इस पर ताने कसेंगे और सम्भ्रान्त इसकी निन्दा
करेंगे, लेकिन विचारों और सपनों को कभी भी तलवार से हराया नहीं जा सकता
और जो उदात्त संवेग इसके अस्तित्व की गहराई से पैदा हो गया है, उसको कभी
न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही हँसी में उड़ाया जा सकता है।
क्रान्तिकारी आन्दोलन उस नए जीवन की अभिव्यक्ति है जो राष्ट्र में जन्म ले
चुका है। इस जीवन की निन्दा अपनी खुद की समझ की निन्दा करना है।
बीस साल का बेरहम दमन इसको कुचल नहीं पाया है। विख्यात जन-नेताओं
द्वारा की गयी कठोर निन्दाएँ इसके बढ़ाव को रोक नहीं पायी हैं। क्रान्तिकारी पार्टी
की सम्भावनाएँ जितनी उज्ज्वल आज हैं उतनी पहले कभी नहीं थीं। भविष्य
सुनिश्चित है।
विदेशी शासकों के दमनकारी उपायों की निन्दा करने के लिए किसी भी
भारतीय को इस क्रान्तिकारी पार्टी के अस्तित्व से इन्कार नहीं करना चाहिए।
विदेशियों को भारत पर राज करने का कोई अधिकार नहीं है और इसलिए उनकी
निन्दा करनी चाहिए और उनको निकाल बाहर करना चाहिए। बात यह नहीं कि
उन्होंने हिंसा अथवा अपराध की कोई ख़ास कार्रवाई की है, विदेशी राज के कुछ
स्वाभाविक परिणाम होते हैं। इस विदेशी राज को ख़त्म कर दिया जाना ज़रूरी है।
भारत पर राज करने का उनका कोई औचित्य नहीं है सिवा तलवार के और इसलिए
क्रान्तिकारी पार्टी ने तलवार उठा ली है। लेकिन क्रान्तिकारी पार्टी की तलवार पर
विचारों की धार है।
राजनीति के क्षेत्र में क्रान्तिकारी पार्टी का फ़ौरी उद्देश्य संगठित एवं सशस्त्र
क्रान्ति के द्वारा भारत के मुक्त प्रान्तों के संघीय गणतन्त्र की स्थापना करना है। इस
गणतन्त्र के संविधान को ऐसे समय अन्तिम रूप दिया और घोषित किया जायेगा
जब भारत के प्रतिनिधियों के पास अपने फ़ैसले को अमल में लाने की शक्ति होगी।
अलबत्ता, इस गणतन्त्र का मूलभूत सिद्धान्त सार्विक मताधिकार और ऐसी समस्त
व्यवस्थाओं का उन्मूलन होगा जोकि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती
500 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हैं। अर्थात रेलवे और परिवहन के दूसरे साधनों, खानों और इस्पात एवं जलयानों के
विनिर्माण जैसे दूसरी तरह के बड़े-बड़े उद्योगों आदि का राष्ट्रीयकरण कर दिया
जायेगा। इस गणतन्त्र में निर्वाचकों के पास अपने प्रतिनिधियों को ज़रूरत पड़ने पर
वापस बुलाने का अधिकार होगा, ऐसा नहीं होने पर जनतन्त्र मखौल बनकर रह
जायेगा। इस गणतन्त्र में विधायिका के पास कार्यपालिका को नियन्त्रित करने और
आवश्यकता उत्पन्न होने पर उसे बदल देने का अधिकार होगा।
क्रान्तिकारी पार्टी राष्ट्रीय नहीं अपितु इन अर्थों में अन्तरराष्ट्रीय है कि उसका
अन्तिम उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रों के भाँति-भाँति के हितों का सम्मान और उनकी
गारण्टी के द्वारा दुनिया में मेल-मिलाप क़ायम करना है। इसका मक़सद विभिन्न
राष्ट्रों और राज्यों के बीच प्रतियोगिता नहीं वरन सहयोग है और इस लिहाज़ से यह
गौरवशाली अतीत के महान भारतीय ऋषियों और आधुनिक युग के बोल्शेविक रूस
के पदचिह्नों का अनुसरण करती है। भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए मानवता की
भलाई बेकार के एवं खोखले शब्द नहीं हैं। लेकिन कमज़ोर कायर और शक्तिहीन
अपनी या मानवता की कोई भलाई नहीं कर सकते।
साम्प्रदायिक प्रश्न के सम्बन्ध में क्रान्तिकारी पार्टी का विचार है कि विभिन्न
समुदायों को उनकी माँग के अनुसार अधिकार प्रदान कर दिये जायें बशर्ते कि वे
दूसरे समुदायों के हितों से न टकराते हों और निकट भविष्य में वे अन्ततोगत्वा
विभिन्न समुदायों के बीच दिली और जैविक एकता की ओर ले जाते हों।
आर्थिक एवं सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में पार्टी यथासम्भव बड़े से बड़े पैमाने
पर सहयोग की भावना को बढ़ावा देगी। निजी एवं असंगठित कारोबारी उपक्रमों
की बजाय पार्टी सहकारी यूनियन को तरजीह देती है।
आत्मिक क्षेत्र में पार्टी का उद्देश्य सत्य की स्थापना करना और इस बात का
प्रचार-प्रसार करना है कि दुनिया माया-मोह नहीं है जिसे कि दरकिनार कर दिया
जाये और जिससे नफ़रत की जाये, वरन यह एक ही आत्मा की अभिव्यक्ति है
जोकि समस्त शक्ति, समस्त ज्ञान और समस्त सौन्दर्य का सर्वोपरि स्रोत है।
क्रान्तिकारी पार्टी के पास अपनी स्वयं की नीति और अपना स्वयं का कार्यक्रम
है। सुस्पष्ट कारणों से यह अपनी समस्त गोपनीय बातों को प्रकट नहीं कर सकती।
परन्तु जब यह बिल्कुल निश्चित हो जायेगा कि सरकार हमारे अपने लोगों से ज़्यादा
जानती है तो जनसाधारण को भी बेहिचक उसकी योजना और तौर-तरीक़ों के बारे
में जानकारी दे दी जायेगी।
यह क्रान्तिकारी पार्टी कांग्रेस और उसके विभिन्न दलों के साथ सम्भव होने
पर सहयोग और आवश्यकता पड़ने पर विलगाव की नीति का अनुसरण करती है।
अलबत्ता यह पार्टी इस देश में समस्त संवैधानिक आन्दोलन को नफ़रत और उपेक्षा
की नज़र से देखती है। यह कहना हास्यास्पद है कि भारत की मुक्ति संवैधानिक
परिशिष्ट / 501
उपायों के जरिये हासिल की जा सकती है जहाँ पर कि किसी संविधान का
अस्तित्व ही नहीं है। यह कहना आत्मप्रवंचना है कि भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता
को शान्तिपूर्ण एवं वैध तरीक़ों से हासिल किया जा सकता है। जब दुश्मन अपनी
सुविधा के अनुसार शान्ति को भंग कर देने के लिए कटिबद्ध है तो “वैध” की
सुन्दर उक्ति उस समय अपना समस्त आकर्षण और महत्त्व गँवा बैठती है जब हम
अपने से हर क़ीमत पर शान्ति बनाये रखने की प्रतिज्ञा करते हैं।
हमारे जन-नेता दो-टूक शब्दों में यह कहने में हिचकिचाते हैं कि भारत
विदेशी नियन्त्रण से मुक्त पूर्ण स्वायत्तता चाहता है। सम्भवतः वे इस तथ्य से
अनजान हैं कि महान आदर्शों की प्रेरणा के जरिये राष्ट्र जन्म लेते हैं। यह
आत्मिक आदर्श को, जोकि पूर्ण स्वायत्तता की भावना को स्वीकार करने से
हिचकिचाता है, शायद ही आत्मिक कहा जा सकता हो; हालाँकि बहुत सम्भव है
कि एक नज़र में वे बेहद उदात्त जान पड़े। अब समय आ गया है कि
बेलाग-लपेट ढंग से सच कहा जाये और राष्ट्र के सम्मुख ऐसे आदर्श रखे जायें
जिन्हें वास्तव में आदर्श कहा जा सकता है।
हमारा आदर्श संगठित तरीक़े से मानवता की सेवा करना है। भारत इस आदर्श
को मूर्त रूप प्रदान नहीं कर सकता क्योंकि वह बन्धन या गुलामी की अवस्था में
बना हुआ है। भारत के ब्रिटिश भारत बने रहने तक इस आदर्श को कदापि प्राप्त
नहीं किया जा सकता। भारत अपने आदर्श को मूर्त रूप दे सके इसके लिए उसका
पृथक और स्वतन्त्र अस्तित्व बहुत ज़रूरी है। इस स्वतन्त्रता को कभी भी शान्तिपूर्ण
एवं संवैधानिक तरीक़ों से हासिल नहीं किया जा सकता। कोई बच्चा भी इस बात
को समझ सकता है कि ब्रिटिश भारत का शासन चलाने वाले क़ानून भारतीयों द्वारा
नहीं बनाये जाते और न ही उनके ऊपर उनका कोई नियन्त्रण ही हो सकता है।
ब्रिटिश भारत को कभी भी ब्रिटिश क़ानून और संविधान के जरिये कभी भी युक्त
प्रान्तों के संघीय गणतन्त्र में रूपान्तरित नहीं किया जा सकता। भारत के युवाओं,
अपने भ्रमों को दूर भगाओ और मज़बूत हृदय से वास्तविकता का सामना करो और
संघर्ष कठिनाइयों एवं कुर्बानियों से बचो नहीं। जो होना है वह होकर रहेगा। अब
और गुमराह नहीं होना है। आप शान्तिपूर्ण एवं वैध तरीक़े से शान्ति हासिल नहीं
कर सकते। महान अंग्रेज़ लेखक श्री रॉबर्ट्सन ये स्मरणीय शब्द भारत के बुद्धिमान
लोगों को और भी ज़्यादा समझदार बनाने का काम कर सकते हैं :
“सुधार का आन्दोलन और कार्यक्रम मुख्यतया आयरिश और प्रोटेस्टेण्ट नेताओं
की उपलब्धि था; जिनके आगे ब्रिटिश वक्तव्य ने यह घातक रहस्य उजागर किया
कि इंग्लैण्ड को धकियाया तो जा सकता है लेकिन उसे तर्क व विवेक से न्याय
एवं उदारता के पक्ष में नहीं खड़ा किया जा सकता” इंग्लिश अण्डर हैनोवेरियंस,
पृष्ठ 197)।
502 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भारतीय जन-नेताओं को अभी भी इस घातक रहस्य की जानकारी नहीं या
फिर वे जानबूझकर मूर्ख बने हुए हैं।
भारत के समझदार लोगों का कहना है कि इस बात की आशा पालना बेतुका
है कि भारत को हथियारों की ताक़त से आज़ाद कराया जा सकता है, हालाँकि वे
यह भूल जाते हैं कि यह मान लेना उतना ही या उससे भी ज़्यादा बेतुका है कि
मुट्ठीभर अंग्रेज़ों ने हथियारों के दम पर समूची मानव जाति के पाँचवें हिस्से को
अपने अधीन बनाकर रखा है। आगे आने वाली पीढ़ी बहुत सम्भव है कि इस तथ्य
की प्रामाणिकता पर सन्देह करे कि मुट्ठीभर अंग्रेज़ों ने भारत के ऊपर एक शताब्दी
तक शासन भी किया है; यह बात इतनी तो अकल्पनीय है।
आतंकवाद और अराजकतावाद के बारे में कुछ शब्द और। आज ये शब्द भारत
में सर्वाधिक क्षतिकारक भूमिका अदा कर रहे हैं। इन शब्दों को निरपवाद रूप से
क्रान्ति का सन्दर्भ आने पर ग़लत ढंग से प्रयुक्त किया जाता है क्योंकि इन नामों
की आड़ में क्रान्तिकारियों की भर्त्सना करना बहुत सुविधाजनक होता है। भारतीय
क्रान्तिकारी न तो आतंकवादी हैं और न ही अराजकतावादी। इस देश में अराजकता
फैलाना कभी भी उनका उद्देश्य नहीं रहा है और यही कारण है कि उन्हें कभी भी
अराजकतावादी नहीं कहा जा सकता। आतंकवाद कभी भी उनका लक्ष्य नहीं रहा
और उन्हें आतंकवादी नहीं कहा जा सकता। वे यह नहीं मानते कि अकेला
आतंकवाद ही आज़ादी दिला सकता है और वे आतंकवाद के लिए आतंकवाद नहीं
चाहते, हालाँकि यह सम्भव है कि वे समय-समय पर प्रतिकार के बहुत ही प्रभावी
साधन के रूप में इस तरीक़े को काम में ले आयें। मौजूदा सरकार का अस्तित्व
सिर्फ़ इसलिए क़ायम है कि विदेशी लोग भारतीय जनता को आतंकित करने में
सफल रहे हैं। भारतीय जनता अपने अंग्रेज़ मालिकों से प्रेम नहीं करती, वह नहीं
चाहती है कि वे यहाँ बने रहें, लेकिन वह अंग्रेज़ों के साथ सहयोग सिर्फ़ इसलिए
करती है कि वह उनसे बुरी तरह से डरी हुई है और यही वह डर है जोकि भारतीयों
को क्रान्तिकारियों के साथ सहयोग करने से रोकता है, ऐसा नहीं है कि वे उन्हें
प्यार नहीं करते।
सरकारी आतंकवाद का जवाब प्रति आतंकवाद से दिया जाना तय है। हमारे
समाज के प्रत्येक संस्तर में पूरी तरह से बेचारगी की भावना व्याप्त है और समाज
में समुचित जज़्बे की बहाली के लिए आतंकवाद प्रभावी उपाय है, जिसके बग़ैर
प्रगति मुश्किल होगी। इसके अलावा अंग्रेज़ मालिकों और उनके किराये के टट्टुओं
को कभी भी निर्बाध ढंग से मनमानी करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। उनके
रास्ते में हरसम्भव कठिनाई और प्रतिरोध खड़ा करना होगा। आतंकवाद का
अन्तरराष्ट्रीय प्रभाव भी होता है, क्योंकि इंग्लैण्ड के उत्कट शत्रु आतंकवाद और
क्रान्तिकारी प्रदर्शनों के जरिये फ़ौरन भारत की ओर उन्मुख होते हैं, और क्रान्तिकारी
परिशिष्ट / 503
पार्टी वर्तमान आन्दोलन में इस उग्र अभियान में शामिल होने से जानबूझकर खुद
को बचाये हुए है, इसका कारण बस यह है कि पार्टी निर्णायक प्रहार करने के लिए
इन्तज़ार कर रही है।
यह स्थिति तो तब है जबकि विदेशी सरकार के एजेण्टों ने उसकी माताओं
एवं बहिनों की मर्यादा भंग करके उकसावे की बड़ी-बड़ी कार्रवाइयाँ की हैं।
अलबत्ता, समय आने पर पार्टी आतंकवाद के बेतहाशा अभियान में शामिल होने से
हिचकिचायेगी नहीं, ऐसा होने पर ऐसे प्रत्येक अधिकारी और व्यक्ति का जीवन
असहय बना दिया जायेगा, जोकि विदेशी शासकों की किसी भी रूप में मदद करेंगे
फिर वे चाहे भारतीय हों या यूरोपीय, ऊपरी दर्जे के हों या निचले दर्जे के। लेकिन
उस स्थिति में भी पार्टी कभी भी यह नहीं भूलेगी कि आतंकवाद लक्ष्य नहीं है
और वे निरन्तर ऐसे निस्स्वार्थ एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के दल संगठित करने की
कोशिश करते रहेंगे जोकि अपने देश की राजनीतिक एवं सामाजिक मुक्ति के लिए
अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देंगे।
वे सदैव यह याद रखेंगे कि राष्ट्र-निर्माण के लिए हज़ारों ऐसे गुमनाम
स्त्री-पुरुषों के आत्मबलिदान की आवश्यकता पड़ती है जोकि अपने खुद के आराम
या स्वार्थ अपने स्वयं के जीवन या अपने प्रियजनों के जीवन के मुक़ाबले अपने
देश के विचार की अधिक परवाह करते हैं।
ह. वी.के.
अध्यक्ष, केन्द्रीय परिषद
भारत की क्रान्तिकारी पार्टी
504 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परिशिष्ट : दो
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संविधान
1925 की फ़ाइल न. 375, गृह विभाग (राजनीतिक), भारत सरकार
(एनएआई)।
1924 के आख़िर में शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा तैयार किया गया। इसे पीले
काग़ज़ पर मुद्रित किया गया था और यही कारण है कि इसका उल्लेख आमतौर
पर 'येलो पेपर' के नाम से किया जाता है। – स.
नाम : एसोसिएशन का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन होगा।
उद्देश्य : एसोसिएशन का उद्देश्य संगठित एवं सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा भारत
के संयुक्त प्रान्तों का संघबद्ध गणतन्त्र स्थापित करना होगा।
गणतन्त्र के संविधान का अन्तिम स्वरूप का निर्धारण और घोषणा जन
प्रतिनिधियों के द्वारा उस समय की जायेगी जबकि वे अपने फ़ैसलों को क्रियान्वित
करने की स्थिति में होंगे। गणतन्त्र का मूलभूत सिद्धान्त सार्विक मताधिकार और
ऐसी समस्त व्यवस्थाओं का उन्मूलन होगा जोकि किसी भी प्रकार के मनुष्य द्वारा
मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं।
संविधान : संचालन समिति/एसोसिएशन की संचालन समिति भारत के प्रत्येक
प्रान्त के प्रतिनिधियों से मिलकर बनी केन्द्रीय परिषद होगी। केन्द्रीय परिषद के
फ़ैसलों को पूरा अधिकार प्राप्त होगा।
केन्द्रीय परिषद का प्रमुख कार्य विभिन्न प्रान्तों की गतिविधियों पर निगरानी
रखना, उनके बीच तालमेल और समन्वय क़ायम करना होगा, जिसके बारे में उसे
पूरी जानकारी होगी। भारत के बाहर दूसरे देशों में किये जाने वाले कामों को सीधे
केन्द्रीय परिषद की देखरेख में किया जायेगा।
प्रान्तीय संगठन : एक समिति होगी जोकि प्रत्येक प्रान्त में एसोसिएशन के
पाँच भिन्न-भिन्न विभागों का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच लोगों से मिलकर बनी
होगी, जोकि प्रान्त में एसोसिएशन की समस्त गतिविधियों का नियमन करेगी।
समिति के समस्त फ़ैसले सर्वानुमति से लिये जायेंगे।
विभाग – प्रत्येक प्रान्तीय संगठन में निम्नलिखित विभाग होंगे :
परिशिष्ट / 505
- प्रचार
- लोगों को जुटाना
- निधियों की व्यवस्था करना और आतंकवाद
- अस्त्र-शस्त्र एवं गोला-बारूद का संग्रह एवं भण्डारण
- विदेशी सम्बन्ध
- प्रचार का काम इस प्रकार से किया जायेगा :
(ए) खुले एवं गुप्त प्रेस के द्वारा (बी) व्यक्तिगत वार्तालाप के जरिये (सी)
सार्वजनिक मंचों के जरिये (डी) संगठित कथाओं की व्यवस्था के जरिये और
(ई) मैजिक लैण्टर्न स्लाइड्स के जरिये। - लोगों को जुटाने का काम विभिन्न ज़िलों के प्रभारी संगठनकर्ताओं द्वारा
किया जायेगा। - निधियों की व्यवस्था करने का काम आमतौर पर स्वैच्छिक चन्दे के उपाय
को काम में लाकर किया जायेगा और यदा-कदा ज़बरन उगाही के उपाय को काम
में लाया जायेगा। विदेशी सरकार के एजेण्ट या एजेण्टों द्वारा दमन के अतीव मामलों
में एसोसिएशन का यह कर्त्तव्य होगा कि वह जिस भी रूप में ठीक समझे उसका
प्रतिकार करे। - एसोसिएशन के हर सदस्य को शस्त्र सज्जित करने के लिए समस्त प्रयास
किये जायेंगे; लेकिन इस तरह के सभी हथियारों को विभिन्न केन्द्रों पर रखा जायेगा
और उनका उपयोग केवल प्रान्तीय समिति के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही किया
जायेगा।
ज़िला संगठनकर्ता या विभाग के प्रभारी अधिकारी की जानकारी और अनुमति
के बग़ैर एक भी हथियार ज़िले के किसी भी स्थान से हटाया या उपयोग में नहीं
लाया जायेगा। - विदेशी सम्बन्ध। विभाग केन्द्रीय समिति से मिलने वाले सीधे आदेशों के
तहत अपने काम को पूरा करेगा।
ज़िला संगठनकर्ता - उसके कर्त्तव्य
ज़िला संगठनकर्ता अपने ज़िले के सदस्यों का अकेला प्रभारी होगा। वह अपने
ज़िले के प्रत्येक हिस्से में अपने एसोसिएशन की शाखाएँ खोलने की कोशिश करेगा।
भरती का काम प्रभावी तरीक़े से चलाने के लिए उसे अपने ज़िले के विभिन्न
सार्वजनिक निकायों और संस्थाओं के साथ सम्पर्क बनाये रखना होगा। ज़िला
संगठनकर्ताओं को हर प्रकार से प्रान्तीय समिति के अधीन रखा जायेगा जोकि
समस्त गतिविधियों की निगरानी और निर्देशन करेगी।
ज़िला संगठनकर्ता यह सुनिश्चित करेगा कि सदस्यगण अलग-अलग समूहों में
506 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़