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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 788 में से

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पृष्ठ 495

ही उचित है। यह दावे के साथ आज़ादी के लिए स्टैण्ड नहीं लेता, बल्कि सत्ता
में 'हिस्सेदारी' के पक्ष में है। 'पूर्ण स्वतन्त्रता' के अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं।
इसका तरीक़ा अनूठा है, लेकिन बेचारे लोगों के किसी काम का नहीं है। साबरमती
के सन्त को गाँधीवाद कोई स्थायी शिष्य नहीं दे पायेगा। यह एक बीच की पार्टी
– यानी लिबरल-रैडिकल मेल-जोल का काम कर रही है और करती भी रही
है। मौके की असलियत से टकराने में इसे शर्म आती है। इसे चलाने वाले देश के
ऐसे ही लोग हैं जिनके हित इससे बँधे हुए हैं और वे अपने हितों के लिए बुर्जुआ
हठ से चिपके हुए हैं। यदि क्रान्तिकारी रक्त से इसे गर्मजोशी न दी गयी तो इसका
ठण्डा होना लाज़िमी है। इसे इसी के दोस्तों से बचाने की ज़रूरत है।
आतंकवाद
आइये, हम इस कठिन सवाल के बारे में स्पष्ट हों। बम का रास्ता 1905 से चला
आ रहा है और क्रान्तिकारी भारत पर यह एक दर्दनाक टिप्पणी है। अभी यह महसूस
नहीं किया गया कि इसका उपयोग व दुरुपयोग क्या है। आतंकवाद हमारे समाज
में क्रान्तिकारी चिन्तन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है; या एक पछतावा।
इसी तरह ये अपनी असफलता का स्वीकार भी है। शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ
था। इसने राजनीति को आमूल बदल दिया। नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को
चमकाया, आत्मत्याग की भावना को ज्वलन्त रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों
के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई और शक्ति को ज़ाहिर करने का अवसर
मिला। लेकिन यह स्वयं में पर्याप्त नहीं है। सभी देशों में इसका (आतंकवाद का)
इतिहास असफलता का इतिहास है – फ्रांस, रूस, जर्मनी में बाल्कन देशों, स्पेन
में – हर जगह इसकी यही कहानी है। इसकी पराजय के बीज इसके भीतर ही
होते हैं। साम्राज्यवादियों को अच्छी तरह पता है कि 30 करोड़ लोगों पर शासन के
लिए प्रति वर्ष 30 व्यक्तियों की बलि दी जा सकती है। शासन करने का स्वाद
बमों या पिस्तौलों से किरकिरा तो किया जा सकता है, लेकिन शोषण के
व्यावहारिक लाभ उसे बनाये रखने पर विवश करेंगे। भले ही हमारी उम्मीद के
अनुसार हथियार आसानी से मिल जायें और यदि हम पूरे ज़ोर से लड़ें, जैसाकि
इतिहास में पहले कभी न घटा हो, तो भी आतंकवाद अधिक से अधिक
साम्राज्यवादी ताक़त को समझौते के लिए ही मजबूर कर सकता है। ऐसे समझौते,
हमारे उद्देश्य – पूर्ण आज़ादी – से हमेशा ही कहीं दूर रहेंगे। इस प्रकार आतंकवाद,
एक समझौता, सुधारों की एक किश्त निचोड़कर निकाल सकता है और इसे ही
हासिल करने के लिए गाँधीवाद ज़ोर लगा रहा है। वह चाहता है कि दिल्ली का
शासन गोरे हाथों से भूरे हाथों में आ जाये। ये लोगों के जीवन से दूर हैं और इनके
गद्दी पर बैठते ही ज़ालिम बन जाने की बहुत सम्भावनाएँ हैं। आयरिश उदाहरण यहाँ
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 489