भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
में बहुत सहायता करती थीं और स्वदेशी आन्दोलन चलने पर दोनों इसी काम में
लग गये। हालाँकि हरिनाथ सान्याल सरकारी नौकरी में थे और अच्छा-खासा वेतन
पाते थे।
श्रीमती क्षीरोदवासिनी देवी अपने बच्चों को घर में स्वयं पढ़ाती थीं।
स्वदेशी आन्दोलन के बाद में उन्होंने स्वयं ही अपने पुत्रों को अनुशीलन समिति
में भरती करवाया। अनुशीलन समिति बंगाल की एक पार्टी थी, जो उस समय
तक खुफिया राजपरिवर्तनकारी दल नहीं बनी थी, लेकिन बाद में वही सबसे
बड़ी और शक्तिशाली राजपरिवर्तनकारी पार्टी बन गयी थी।
बाद में माँ को यह भी पता लग गया कि शचीन्द्र युगान्तकारी दल में शामिल
हुआ है। लेकिन वह कभी घबरायी नहीं, बल्कि हमेशा उनसे सहानुभूतिपूर्वक
व्यवहार करती थीं। वह प्रसन्न थीं कि उनका बेटा देश-सेवा में संलग्न है।
उनके सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के कारण काफी दूर-दूर से युगान्तकारी उनके
दर्शनों के लिए आते थे। उनमें श्री रासबिहारी बोस, हिन्दुस्तान के राजपरिवर्तनकारी
शहीदों के सिरमौर श्री जतीन्द्रनाथ मुकर्जी तथा श्री शशांक हाजरा आदि शामिल थे।
वह बंगाल के युगान्तकारियों में 'युगान्तकारी माँ' के रूप में मशहूर थीं। दूर
अण्डमान के बन्दियों के बीच भी उनकी ख्याति पहुँच चुकी थी।
1915 में जब गदर पार्टी ने चारों तरफ ज़बरदस्त बग़ावत करने की तैयारियाँ
की थीं, उस समय श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके दोनों युवा भाई इस काम
में जुटे हुए थे। स्मरण रहे कि इनके पिता का देहावसान हो चुका था। इस कारण
परिवार का बोझ भी इनके सिर आ पड़ा। जब फ़रवरी में विद्रोह पैदा करने की
तारीख़ भी तय हो चुकी थी, तब इन भाइयों में आपस में विवाद चल पड़ा कि
कौन पीछे रहकर परिवार की देखभाल करे, क्योंकि कोई भी पीछे रहने के लिए
सहमत नहीं होना चाहता था। दोनों की यह इच्छा थी कि देश के स्वतन्त्रता-संघर्ष
में वे सक्रिय रूप से मैदान में कूद पड़ें। तब उनकी वीर माता ने आगे आकर कहा
कि वह किसी की राह में नहीं आना चाहती, जिस किसी की भी इच्छा हो, वह
उनकी चिन्ता छोड़कर देश-सेवा के कार्य में जुट जाये।
पर वह सारा काम तो बीच में ही रह गया। ग़दर की सारी योजना फेल हो
गयी। मुक़दमा चला। श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन कैद हो गयी। जब वह
बनारस जेल से अण्डमान (कालेपानी) भेजे गये, उस समय उनकी आयु 22 बरस
की थी। माँ उनसे मिलने गयी और प्रसन्नतापूर्वक कहा - "मेरा पुत्र सचमुच
संन्यासी हो गया है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि उसने अपना जीवन देश-सेवा के लिए
अर्पित कर दिया है।" इसके पश्चात् पुलिस उनका पीछा करने लगी और बहुत
परेशान करती रही।
अब काकोरी केस चला और जब उनका छोटा पुत्र श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल भी
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 277
गिरफ़्तार कर लिया गया तो इनको बहुत घबराहट हुई, क्योंकि वह अभी बिल्कुल
बच्चा था और पढ़ रहा था। ज़्यादा चिन्ता यह थी कि संकट में कहीं वह घबरा
न जाये। लेकिन मालूम हुआ कि वह जेल में बिल्कुल निश्चन्तता से रह रहा है।
इस बात से इन्हें बहुत खुशी हासिल हुई। कहने लगीं, "मुझे अपने भूपेन्द्र से यही
आशाएँ थीं।"
लेकिन उनका सारा जीवन कठिनाइयों में ही गुज़र गया। उन्हें कभी चैन का
समय ही नहीं मिला। देखते-देखते काकोरी का मुक़दमा समाप्त हो गया। और
कोई ठोस सबूत न मिलने के बावजूद श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन क़ैद
और भूपेन्द्रनाथ को पाँच साल की सज़ा हो गयी। यह झटका उनसे बरदाश्त न हो
सका। यह चोट उनसे सही न गयी। वह फिर कभी न सँभल सकीं। लेकिन
अपने पुत्रों पर उन्हें बहुत फ़ख़्र रहा। उन्होंने शचीन्द्रनाथ सान्याल को अपने अन्तिम
पत्र में लिखा था कि दुनियादारी के हिसाब से भले ही मैं बहुत ग़रीब हूँ, लेकिन
मेरे जैसा अमीर कौन है जिसके पुत्र सत्यपथ पर चल रहे हैं और देश-सेवा में
जिन्होंने अपनी ज़िन्दगियाँ अर्पण कर दी हैं, मुझे अपने पर बहुत नाज़ है।
आह! ऐसी और कितनी माताएँ आज हमारे देश में हैं? धन्य है यह माँ और
धन्य-धन्य हैं इनके सुपुत्र!
278 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
षड्यन्त्र क्यों होते हैं
और कैसे रुक सकते हैं?
सितम्बर, 1928 के 'किरती' में छपा यह लेख राजनीतिक आन्दोलनकारियों पर
चलने वाले मुक़दमों के पीछे के विचारों पर केन्द्रित है। अंग्रेज़ सरकार इन्हें षड्यन्त्र
केस कहती थी। इसमें साफ़ कहा गया कि षड्यन्त्रों को रोकने का एक ही तरीक़ा
है – दुनिया से ग़रीबी व ग़ुलामी दूर करना। इस लेख में शान्तिपूर्ण व आतंकवादी
तरीक़ों पर भी बड़े तर्कपूर्ण ढंग से विचार किया गया है। भगतसिंह और उनके
साथियों के विचारधारात्मक विकास को जानने के लिए यह लेख महत्त्वपूर्ण
दस्तावेज़ों में से एक है। – स.
एक षड्यन्त्र की चर्चा अभी ख़त्म नहीं होती कि दूसरे षड्यन्त्र की चर्चा शुरू हो
जाती है। कुछ समय पूर्व हम काकोरी षड्यन्त्र का हाल पढ़ रहे थे, इन दिनों देवघर
के षड्यन्त्र के हाल सुन रहे हैं। इनसे पहले लाहौर षड्यन्त्र केस, दिल्ली षड्यन्त्र
केस, बोल्शेविक षड्यन्त्र केस और न जाने और कितने षड्यन्त्र केस चल चुके
हैं, जिनमें कि दर्जनों ही नौजवान फाँसियों पर लटकाये गये। गोलियों से उड़ा दिये
गये। सैकड़ों ही नहीं, हज़ारों कालेपानी भेजे गये, असंख्य देशभक्त अभी तक जेलों
में क़ैद काट रहे हैं।
षड्यन्त्र क्या होते हैं? सरकारों का विचार है कि मनुष्य के दिमाग़ में यह एक
बीमारी है, जो नियमित चल रही व्यवस्था को तोड़ने-फोड़ने के लिए षड्यन्त्रकारी
को मजबूर कर देती है। वह इस बीमारी के वश में होकर क़ानून तोड़ता है, शान्ति
भंग करता है, हत्याएँ करता है और डकैतियाँ डालता है और कई ऐसे तरीक़े
इस्तेमाल करता है जोकि समाज में गड़बड़ी फैलाने और शान्ति-भंग का कारण
बनते हैं। वह चल रही व्यवस्था की तोड़-फोड़ की ठान लेता है और फिर इस
लक्ष्य के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।
इसके विपरीत षड्यन्त्रकारी लोगों का दावा है कि षड्यन्त्र उन आदर्शवादी
लोगों की कोशिश होती है जो चल रही व्यवस्था की कमियों, अन्याय और
जुल्म को सहन नहीं कर पाते, जो अमीर-ग़रीब, बड़े-छोटे, ज़ालिम-मज़लूम,
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 279
शासक-प्रजा, पूँजीपति-मज़दूर, ज़मींदार-किसान आदि का फ़र्क़ ख़त्म कर एक
जैसे अधिकारों और आज़ादी का दौर लाना चाहते हैं और जो पुरानी, गन्दी और
अत्याचारी व्यवस्था को समाप्त कर एक नयी व सुन्दर व्यवस्था स्थापित करना
चाहते हैं, जिसमें कि कोई शासक-प्रजा, अमीर-ग़रीब, ज़मींदार-किसान न हो,
बल्कि सभी एक जैसे भाई-भाई हों। प्रत्येक काम करे और खाये और सभी की
प्रत्येक ज़रूरत पूरी हो।
ये बातें सही हैं या ग़लत जोकि दोनों अपने-अपने विचार को सामने रखकर
की जाती हैं, यह पाठक स्वयं ही अनुमान लगायें।
गुज़रे वक़्त का इतिहास प्रमाण है कि सख़्त सज़ाओं और फाँसियों से षड्यन्त्र
नहीं रुक सकते, न ही जुल्मों और अत्याचारों से — चाहे वे कितने भी भयानक
क्यों न हों — आज़ादी की चाह कुचली जा सकती है। असंख्य नौजवान, जो
किसी दूसरे आज़ाद देश में होते तो अपने देश के लिए तोहफ़ा साबित होते,
अत्याचारी और ज़ालिम शासकों के अत्याचारों का शिकार हो गये। हज़ारों देशभक्त
टुकड़े-टुकड़े कर क़त्ल कर दिये गये ताकि लोग इससे आतंकित होकर षड्यन्त्र
करने से बाज़ आ जायें और आज़ादी के लिए हाथ-पाँव न हिलायें। तमाम
सज़ाओं, फाँसियों, कैद और बेंत मार-मारकर देख लिया गया है, लेकिन ये
तमाम सज़ाएँ भी षड्यन्त्रों को रोकने में असफल रही हैं। बल्कि — 'बढ़ता है
शौक़े-शहादत हर सज़ा पाने के बाद' के अनुसार षड्यन्त्रों की आग भड़कती
गयी और इन सज़ाओं से न रुकी। यह क्यों है, आख़िर इन षड्यन्त्रों को रोकने
का क्या कोई इलाज भी हो सकता है?
यदि षड्यन्त्रों के पिछले इतिहास को अच्छी तरह देखा जाये तो हमें इस बात
का भली प्रकार पता चलता है कि षड्यन्त्रों को रोकने के लिए जितनी अधिक
कोशिशें होती हैं, उतने ही अधिक षड्यन्त्र किसी न किसी शक्ल में वजूद में आते
रहते हैं। इस तरह पता चलता है कि ये सज़ाएँ षड्यन्त्रों की आग भड़काने में लकड़ी
का ही काम करती हैं।
सैकड़ों नौजवान गोलियों से उड़ा दिये जाते हैं, लेकिन उनकी जगह भरने के
लिए हज़ारों ही नौजवान हथेलियों पर सर रखकर मैदान में कूद पड़ते हैं और अपने
प्राणों को ख़तरे में डाल उस अधूरे काम को शुरू कर देते हैं। आख़िर इसका कारण
क्या है?
बदला लेना इन्सानी स्वभाव है। इन्सान जब तक इन्सान है, वह अपने दुश्मनों
से बदला ज़रूर लेगा, ख़याली पुलाव पकाने वाले चाहे कुछ भी कहें। आम नौजवान
जब देखते हैं कि उनके भाई सिर्फ़ देशप्रेम के लिए ही किस बेदर्दी और बेरहमी
से जुल्मों का शिकार हो रहे हैं तो उनके दिलों में अपने भाइयों पर हुए जुल्मों का
बदला लेने की आग भड़क उठती है। वे शान्ति और सन्तोष को अलविदा कह देते
280 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हैं। अपनी किश्ती ईश्वर के सहारे छोड़ लंगर तोड़ देते हैं। फिर या तो वे खुद उस
बदले की आग में जलकर राख हो जाते हैं या दुश्मनों को राख करके ही साँस
लेते हैं। यह इन्सानी दिलेरी है। भँगेड़ियों, नशेबाज़ों का पुलाव नहीं है।
दूसरी ओर एक बुज़दिल और कायर होता है। उसे अपनी जान बहुत प्यारी होती
है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसके पास से ऐशो-आराम और सफ़ेद-स्याह करने
की ताक़त छीन ली जाये। पर जब उसकी जान पर हमला किया जाता है और
उसके मुँह से झाग गिरने लगती है तो वह गुस्से में आकर ऐसे-ऐसे कष्ट ढहाता
है कि ज़मीन और आसमान काँप उठते हैं। वह अत्याचार में अन्धा होकर जिस पर
भी हाथ उठाता है, चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो, उसे पार बुलाकर ही छोड़ता
है। इस तरह अक्सर गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है और हज़ारों ही बेगुनाह
नौजवान देश पर शहीद हो जाते हैं। यह निर्दोषों का खून होता है जो अन्त में रंग
लाता है। जनता में बेचैनी फैल जाती है। षड्यन्त्रकारियों के हाथ मज़बूत हो जाते
हैं, क्योंकि यह जुल्म, अन्याय और आतंक ही षड्यन्त्र पैदा करने के कारण हैं। वे
खुली घोषणाएँ कर देते हैं कि देखा, हम नहीं कहते थे कि लातों के भूत बातों से
नहीं सुधरते, लेकिन तुमने हमारी बातों पर ध्यान नहीं दिया। अब खूब गत बन रही
है। लेकिन यह तो –
इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या?
आगे-आगे देखिये होता है क्या?
इस तरह षड्यन्त्र का वृक्ष निर्दोषों के खून से सिंचकर बढ़ता है और थोड़े ही
समय में फलने-फूलने लगता है।
जब तक लोग खुलेआम अपने दुख-तकलीफें व्यक्त कर सकते हैं और
सरकारी अत्याचारों की पोल खोल सकते हैं, तब तक तो षड्यन्त्रों की ज़रूरत नहीं
पड़ती, लेकिन जब सरकारें खुले आन्दोलनों को कुचलने लगती हैं और जब –
न तड़पने की इजाज़त है, न फ़रियाद की है।
घुट-घुट के मर जाऊँ, यही मर्ज़ी मेरे सैय्याद की है।
पर अमल शुरू हो जाता है तो इधर जोशीले और गर्वीले जवान भी इस बुरी
स्थिति में नहीं जीना चाहते। वे सिरों की बाज़ी लगा देते हैं और ऐसे अत्याचारी
(शासन) को तोड़ने की सिरतोड़ कोशिशों में व्यस्त हो जाते हैं।
जब तक शान्तिपूर्ण आन्दोलन में आज़ादी की माँग की छूट रही, कोई षड्यन्त्र
नहीं हुआ, कोई गुप्त आन्दोलन नहीं चल सका, लेकिन ज्यों ही शान्तिपूर्ण आन्दोलन
को कुचलने के आदेश जारी किये गये उसी समय गुप्त आन्दोलन शुरू हो गये और
षड्यन्त्रों की तैयारियाँ होने लगीं। सरकार की सख़्ती का दौर शुरू हुआ और काले
क़ानूनों के अधीन सैकड़ों नौजवानों को, जो खुले रूप में काम कर रहे थे, जेलों
में नज़रबन्द कर दिया गया तो जोशीले नौजवानों को इससे आग लग गयी और वे
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 281
तड़प उठे। बस फिर क्या था? किसी ओर काकोरी-षड्यन्त्र का तो कहीं किसी
और षड्यन्त्र का धुआँ निकलने लगा।
जब तक दुनिया में वहशी ज़माने की गुलामी और ग़रीबी जैसी स्मृतियाँ क़ायम
रहेंगी तब तक कोई भी ताक़त दुनिया के तख़्त से षड्यन्त्रों और गुप्त आन्दोलनों
को मिटा नहीं सकती। यदि ज़ोर-ज़बरदस्ती और जुल्म षड्यन्त्रों के रोकने का सही
इलाज होता तो षड्यन्त्रों का नामो-निशान कब का मिट गया होगा। लेकिन यह
इलाज नहीं है। सम्भव है, जुल्म और अत्याचार कुछ समय के लिए षड्यन्त्रों को
रोक सकें, लेकिन जुल्म और अत्याचार षड्यन्त्र रोकने का कोई कारगर नुस्ख़ा नहीं
है। कइयों का विचार है कि केवल आज़ादी ही षड्यन्त्रों को ख़त्म करने का असली
इलाज है, लेकिन हमारा इससे मतभेद है। यह तो ठीक है कि यह आज़ादी ही है
जो बहुत हद तक षड्यन्त्रों को रोक सकती है, लेकिन फिर भी इसमें सोलह आने
सच नहीं है, क्योंकि वर्तमान समय में साबित हो गया है कि केवल (आज़ादी की)
प्राप्ति से ही षड्यन्त्र नहीं रुक सकते। हमारे सामने अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस
आज़ाद देशों में माने जाते हैं और वे हैं भी बिल्कुल आज़ाद – किसी के गुलाम
या किसी तरह से भी मोहताज नहीं हैं, लेकिन फिर भी वहाँ षड्यन्त्र होते रहते
हैं, और अभी बहुत समय नहीं हुआ, जबकि 'साको' और 'वैनजिरी' को अमेरिका
की पूँजीपति सरकार ने षड्यन्त्र के अपराध में बिजली की कुर्सी पर बिठाकर मार
डाला था। जर्मनी में कम्युनिस्टों ने एक क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन वे
कब्ज़ा बनाकर न रख सके। फ्रांस और इंग्लैण्ड में भी षड्यन्त्र होते रहते हैं।
अमेरिका जैसा समृद्ध देश पूरी दुनिया के नक़्शे पर भी नहीं है। वहाँ
'राक-फैलरे' जैसे तगड़े अमीर आदमी हैं। यदि वे चाहें तो अकेले ही पूरे हिन्दुस्तान
को ख़रीद सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर बेरोज़गारी और ग़रीबी का यह हाल है कि
हज़ारों ही नहीं, बल्कि लाखों अमेरिकी मज़दूर ऐसे हैं जो बेरोज़गार भूखे दर-दर
भटक रहे हैं और जिनका गुज़ारा सिर्फ़ सरकारी दान से ही होता है। तो क्या जब
तक यह हद दर्जे की ग़रीबी और हद दर्जे की अमीरी दुनिया में क़ायम रहेगी,
षड्यन्त्र दुनिया से ख़त्म हो सकते हैं? हमारा विचार तो 'नहीं' में है। षड्यन्त्रों का
हटना या न हटना रोटी के सवाल के हल होने पर निर्भर है। यदि रोटी का सवाल
आज हल हो जाये तो आज ही षड्यन्त्रों की समाप्ति हो सकती है, लेकिन यदि
रोटी का सवाल न निपटा तो ये षड्यन्त्र कभी भी रुक नहीं सकते, चाहे नीरू और
जहाद जैसे ज़ालिम ही क्यों न पैदा हो जायें।
शायद कुछ लोग कहें कि यदि रोटी के सवाल का हल ही षड्यन्त्रों की
बीमारी के लिए अमृतधारा है तो फिर रूस में क्यों षड्यन्त्र होते हैं? हमारा जवाब
स्पष्ट है कि रूस में जो षड्यन्त्र होते हैं वे सिर्फ़ विदेशी पूँजीपति सरकारों के छोड़े
हुए कुछ भाड़े के टट्टुओं द्वारा करवाये जाते हैं और वे विदेशी सरकारें अपने एजेण्टों
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को धन आदि देकर उनसे षड्यन्त्र करवाती हैं, नहीं तो रूस में षड्यन्त्र करने के
लिए कोई कारण ही नहीं है, ना ही रूसी लोगों को कोई तकलीफ़ है, जिससे कि
उन्हें षड्यन्त्र करने की ज़रूरत पड़े। कुछ ज़ार के चेले-चपाटे हैं या विदेशी एजेण्ट
हैं जो कभी-कभार हंगामा करते हैं, वरना रूस तो इस समय एक ऐसा देश है जो
हर इन्सान को खुश देखना चाहता है और प्रत्येक इन्सान की ज़रूरतें पूरी करता है।
हिन्दुस्तान का क्या कहना। पहले तो यह गुलाम है। यहाँ के नौजवान जब दूसरे
देशों को उन्नति करते देखते हैं तो उनके कलेजों पर छुरियाँ चल जाती हैं। वे
अनुभव करते हैं कि उन्नति करना तो दूर रहा, उनके तो साँस लेने के लिए भी
यहाँ जगह नहीं है। इसलिए हिन्दुस्तान का गुलाम होना ही यहाँ आज़ादी की कोशिशों
के लिए एक अच्छा तर्क है। आज़ादी के लिए दो ही प्रकार की कोशिशें हो सकती
हैं - शान्तिपूर्ण व आतंकवादी तरीक़ों से। आज़ादी की प्राप्ति के हर तरीक़े की
एक न एक दिन परीक्षा होती है। वह तरीक़ा परीक्षा में खरा उतरे तो लोग उसमें
विश्वास करते हैं, लेकिन यदि परीक्षा में असफल रहे तो लोगों का विश्वास उससे
हट जाता है। हिन्दुस्तान में भारी संख्या उन लोगों की है जो शान्तिपूर्ण तरीक़े के
समर्थक हैं। शायद इसलिए कि उन्हें इसके सिवा और कुछ सूझता भी नहीं या यदि
कुछ सूझता भी है तो वे उस पर व्यवहार करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। लेकिन
यह बात अब सन्देह से परे है कि ऐसे आदमी भी हिन्दुस्तान में मौजूद हैं, जो
शान्तिपूर्ण तरीक़ों पर विश्वास खो चुके हैं, और हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए
काम भी करना चाहते हैं। जब तक ऐसे आदमी मौजूद हों तब तक षड्यन्त्रों का
होते रहना अचम्भे की बात नहीं है। लेकिन एक गुलामी ही क्या? हिन्दुस्तान में
इतनी ग़रीबी है कि तौबा ही भली। हज़ारों नहीं, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों ही
आदमी रोटी के दो टुकड़ों के लिए तरसते मर जाते हैं। जब तक गुलामी और ग़रीबी
ख़त्म नहीं होती तब तक लोग भला कैसे आराम से बैठ सकते हैं? हो सकता है
कि अमीर लोग ऐशो-आराम में आज़ादी को भूल जायें और गुलामी को पसन्द करें
क्योंकि उनके लिए तो ऐश-परस्ती ही आज़ादी हो सकती है, लेकिन जो लोग भूखे
मर रहे हैं, वे समझते हैं कि हमें मरना ही है, तो फिर क्यों न मर्दे-मैदान बनकर
इस अन्यायपूर्ण और ज़ालिम व्यवस्था को रद्द करने में मरें, क्यों न देश के ग़रीबों
को जगाने के लिए और भारतमाता को आज़ाद करवाने के लिए शीश दिये जायें?
हो सकता है ऐसे विचार कुछ देर तक ग़रीबों के दिमाग़ में न आयें, लेकिन कब
तक रुक सकेंगे, इस अन्याय, गुलामी और ग़रीबी के ख़िलाफ़ शुरू से ही षड्यन्त्र
होते आये हैं। जब तक यह हाल रहेगा, जोशीले लोग षड्यन्त्र करते रहेंगे, क्योंकि
तमाम षड्यन्त्रों की जड़ ग़रीबी और गुलामी ही है। चाहे सरकारें इस बात को नहीं
मानतीं फिर भी यह बिल्कुल सही है कि शासक जो भी कुछ अधिकार या कुछ
सुविधाएँ देते हैं वे इन षड्यन्त्रकारियों के भय से ही दिया करते हैं। नहीं तो -
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 283
यदि नौजवान हथेलियों पर सिर रखकर बिना किसी स्वार्थ के समाज को अच्छा
बनाने के लिए बलिदान न करते तो सरकारों से जितने अधिकार अभी तक छीने
जा चुके हैं, उतने भी न छीने जा सकते।
1925 में विपिनचन्द्र पाल ने एक लेख में लिखा था कि “यह पोलिटिकल
क़ातिल ही थे, जिन्होंने कि मिण्टो-मारले योजना के लिए रास्ता साफ़ किया।” एक
और माडरेट एस.आर. दास ने लिखा था कि “इंग्लिस्तान को इस मीठी नींद से
जगाने के लिए कि हिन्दुस्तान के साथ ‘अच्छा सलूक’ हो रहा है, एक बम की
ज़रूरत थी।”
यों आमतौर पर नेता लोग इन षड्यन्त्रकारियों के ख़िलाफ़ ही रहा करते हैं तो
भी हमारे नेता साहिब बब्बर अकाली दल की तारीफ़ यह कहकर किया करते हैं
कि सिखों को गुरुद्वारा बिल इसी आन्दोलन ने दिलवाया है, नहीं तो गुरुद्वारा बिल
कभी भी न मिलता।
यह लेख लिखने से न तो हमारा यह आशय है कि बम फेंकने की प्रेरणा दी
जाये और न ही यह कि षड्यन्त्रकारियों की तारीफ़ के बड़े-बड़े पुल बाँध दिये
जायें, चाहे हम समझते हैं कि वे सच्चे देशभक्त होते हैं और अपने भीतर सच्ची
राष्ट्रीय और देशभक्ति की स्पिरिट रखते हैं और अपने विश्वासों के अनुसार काम
करते हैं, वे इसी में देश और क़ौम की बेहतरी समझते हैं। इस लेख को लिखने
का आशय तो यह है कि जनता को यह बताया जाये कि जहाँ भी गुलामी और
ग़रीबी मौजूद है वहाँ कुछ जोशीले लोग उठते ही रहेंगे और गुलामी और ग़रीबी के
जुए को उतार फेंकने के यत्न करते रहेंगे, चाहे वे सफल हों या नहीं। हम समझते
हैं कि इतिहास हमें यही बताता है कि इन षड्यन्त्रों को रोकने और हमेशा के लिए
ख़त्म करने का एक ही तरीक़ा है कि दुनिया से ग़रीबी और गुलामी दूर की जाये
और प्रत्येक देश में आज़ादी के साथ रोटी के सवाल का भी पूरा समाधान हो। जब
तक यह नहीं होता, षड्यन्त्रों का बन्द होना मुश्किल है।
284 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
श्रमिक आन्दोलन को दबाने की चालें
सितम्बर, 1928 के 'किरती' के चार और सम्पादकीय महत्त्वपूर्ण हैं। एक
पब्लिक सेफ़्टी बिल, दूसरा ट्रेड डिस्प्यूट बिल सम्बन्धी भगतसिंह और उनके साथियों
के विचारों को प्रकट करता है। इन्हीं बिलों के विरोध में भगतसिंह और बटुकेश्वर
दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को असेम्बली हॉल में बम का धमाका किया था। तीसरी
सम्पादकीय टिप्पणी में मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट पर चर्चा है और इसे बुर्जुआ विचारधारा
का प्रतीक बताया गया है। चौथे सम्पादकीय में बारदोली किसान आन्दोलन पर विचार
रखे गये हैं। सितम्बर, 1928 में ही हिन्दुस्तान प्रजातान्त्रिक पार्टी, हिन्दुस्तान समाजवादी
प्रजातान्त्रिक पार्टी बन गयी थी। – स.
विश्व में जो अन्धेरगर्दी इन खुदग़र्ज़ और बेईमान पूँजीपति शासकों ने मचा रखी है, वह
लिखकर लोगों को समझायी नहीं जा सकती। अब जब उनके पर्दे दुनिया में खुल रहे
हैं और अब जब श्रमिक भी इन लोगों को अपने श्रम पर हराम की मोटी-मोटी खाल
चढ़ाने से रोकने का यत्न करने लगे हैं तो ये तड़पते हैं और शान्ति-शान्ति का शोर
मचाने लगते हैं। सम्पत्ति खतरे में है, दुनिया कैसे चलेगी, आदि वाक्यों से शोर मचाकर
आम लोगों और श्रमिकों को समाजवादी आन्दोलन के विरोधी बना रहे हैं। साथ ही
साथ उन आन्दोलनों को दबाने के विचार से अन्धा अत्याचार करने की ठान ली है।
आज हम समाचारपत्रों में पढ़ रहे हैं कि लोगों की सुरक्षा नाम का एक (Public
Safety—removed from India-bill) बिल असेम्बली में पेश हो रहा है। पेश सरकार
की ओर से ही होना है। बिल का आशय यह है कि यदि समाजवादी विचारों का प्रचार
करने वाला कोई ऐसा आदमी भारत में आ जायेगा, जो यहाँ का नागरिक न होगा तो
उसे नोटिस देकर एकदम देश से निकाल दिया जायेगा। यह बिल क्यों पास किया
जायेगा और इसे पास करवाने के लिए क्या-क्या घटिया चालें चली जा रही हैं, यही
हम पाठकों को बताना चाहते हैं।
कुछ दिन पहले अख़बारों में एक पत्र छपा था जिसके बारे में कहा जाता
था कि कम्युनिस्टों की ओर से यह पत्र इंग्लैण्ड की कम्युनिस्ट पार्टी को लिखा
गया था। उसमें उन्होंने कहा था कि आख़िर में हम सशस्त्र क्रान्ति या हथियारों
से युद्ध कर ही क्रान्ति सम्पन्न करेंगे, लेकिन उससे पहले कम्युनिस्ट पार्टी गुप्त
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 285
रूप में काम करेगी और श्रमिक किसान पार्टी को नियन्त्रण में कर प्रचार का
काम खुले रूप में किया जायेगा, आदि। उधर क्योंकि रूस चाहता है कि
दुनियाभर में मज़दूरों का शासन स्थापित किये बग़ैर स्थायी शान्ति नहीं हो
सकती, इसीलिए वह हर जगह समाजवादी आन्दोलन करवाना चाहता है। और
चूँकि दुनिया में सबसे बड़े पूँजीपति और सम्राटपसन्द अंग्रेज़ हैं, इसलिए उनका
राज नष्ट करना ज़रूरी है और उनका राज ही हिन्दुस्तान के सिर पर है, इसीलिए
यहाँ क्रान्ति करवाना अनिवार्य है। ऐसी स्थिति में अंग्रेज़ रूस से बहुत भयभीत
हैं और वे कम्युनिस्ट या समाजवादी विचारों के प्रचार को रोकना चाहते हैं। पर
किया क्या जाये? हिन्दुस्तानी पूँजीपतियों की सहानुभूति जीतने के लिए वह पत्र
छपवाया गया। अख़बारों में लिखा गया था –
दिल्ली, अगस्त 20
निम्न पत्र को प्रसारित किया गया।
किसकी ओर से, कब, कहाँ? यह कुछ पता नहीं। और यह पत्र है भी पिछले
दिसम्बर की तारीख़ का। अब तक वह कहाँ छिपा रहा?
कम्युनिस्ट पार्टी ने इस पत्र के साथ अपना कोई सम्बन्ध मानने से इन्कार कर
दिया है। श्रमिक किसान पार्टी ने भी ऐसी ही घोषणा की है। फिर यह पत्र आया
कहाँ से? और इसे अब ही क्यों छापा गया? ये बातें सोचने योग्य हैं। इस पत्र के
साथ, और रूस की कुछ घोषणाओं को बार-बार छापने से हिन्दी पूँजीपतियों को
भी सरकार ने अपने साथ मिला लिया। हमें पता है कि निठल्ले पूँजीपति मिलकर
यह बिल पास करवा लेंगे। पर क्या सरकार समझती है कि इस तरह समाजवादी
विचारों का प्रचार रुक जायेगा? क्या इन नीचताभरी चालों से वे अपने पैर पक्के
कर स्थिर रह सकेंगे? इतिहास की ओर से जान-बूझकर क्यों आँखें बन्द रखी जाती
हैं? आज फ्रांस के फ़्यूडल लॉर्ड्स और रूसी नोबल्स कहाँ है? क्या इन लोगों ने
इन विचारों को दबाने के लिए अपना-अपना ज़ोर नहीं लगाया और क्या क्रान्ति रुक
सकी थी? फिर यहीं क्रान्ति कैसे रुक सकेगी? जब तक भूख है और श्रम करने
वाले भूखे मरते रहेंगे और निठल्ले बैठने वाले हर तरह की मौज़ उड़ाते रहेंगे, तब
तक समाजवादी विचार दबाने से और भी ज़ोर पकड़ते रहेंगे। लेकिन श्रमिकों को
संभल जाना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि उनके आन्दोलन को दबाने के लिए
कितने अत्याचार किये जा रहे हैं और यदि वे अब भी न संभले तो बाद में पछताने
से कुछ हाथ न आयेगा।
286 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
एक और दमनकारी क़ानून
जिस तरह हिन्दुस्तान में कारख़ाने बढ़ रहे हैं, उसी तरह हमारे पूँजीपति और अंग्रेज़ों
के लाभ-हानि भी साझे होते जा रहे हैं और ये दश में उभर रहे जन-आन्दोलन को
सामान्यतया दबाने का संयुक्त रूप से प्रयत्न कर रहे हैं। अब एक समय दो क़ानून
स्वीकृत हो रहे हैं : एक है जन-सुरक्षा बिल (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और दूसरा
है औद्योगिक विवाद बिल (ट्रेड्स डिस्प्यूट बिल) अर्थात किसी पूँजीपति और
मज़दूरों का किसी सवाल पर झगड़ा हो जाये तब तुरन्त एक पंचायत गठित कर
दी जाये, जिसमें पूँजीपति मालिकों तथा मज़दूरों के प्रतिनिधि शामिल हों और इसका
अध्येता एक निष्पक्ष व्यक्ति हो। वह जो निर्णय दे उसे सभी स्वीकारें। हड़ताल का
अधिकार नहीं होगा। हड़ताल करने वाले को 500 रुपये जुर्माना या एक माह की
क़ैद की सज़ा दी जायेगी और अगर कोई राजनीतिक विचारधारा को लेकर हड़ताल
करेगा, उसे तीन माह की क़ैद तथा 500 रुपये के जुर्माने की सज़ा होगी। लेकिन
ये सज़ाएँ क्यों? विवाद निपटाने के लिए जो कमेटी बनायी जायेगी, अगर वह
मज़दूरों की इच्छाओं के विरुद्ध फ़ैसला कर दे, तब? तो भी क्या उन ग़रीबों को
हड़ताल करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? बड़ी अजीब बात है। मज़दूरों को
जल्दी ही सँभल जाना चाहिए, क्योंकि ये उनके ही आन्दोलनों को दबाने का यत्न
हो रहे हैं। बम्बई की मज़दूर-किसान पार्टी ने घोषित किया है कि इस बिल के
विरुद्ध मज़दूरों को हड़तालें करनी चाहिए, बात भी ठीक है। असेम्बली के पूँजीपति
सदस्य तुरन्त ही यह क़ानून स्वीकृत कर देंगे। उन्हीं के लिए तो सरकार ने यह
क़ानून बनाया है। पहले ही प्रेमचन्द कीका भाई जैसे पूँजीपति सरकार से गुहार करते
थे कि मज़दूर-आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की जानी चाहिए। सो सरकार ने
इसका हल बनाकर पेश कर दिया है। दोनों क़ानून स्वीकृत हो जायेंगे। लेकिन
मज़दूरों को सँभल जाना चाहिए, क्योंकि यदि अभी कोई ध्यान न दिया गया तो
बाद में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। यह स्मरण रखना चाहिए कि
इंग्लैण्ड में भी ऐसा क़ानून स्वीकृत कराने की अंग्रेज़ी सरकार को हिम्मत नहीं हो
सकती। मज़दूरों के साथ रत्तीभर भी सहानुभूति रखने वाले सज्जनों को इस अवैध
तथा दमनकारी क़ानून के विरोध में आवाज़ उठानी चाहिए।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 287
बारदोली सत्याग्रह
हम पहले से ही अपने पाठकों के सामने बारदोली के बहादुर किसानों के हालात
रखते रहे हैं। उन्होंने सत्याग्रह शुरू किया था, क्योंकि उनका बन्दोबस्त करके लगान
बढ़ा दिया गया है। उन्होंने लगान देने से ही इन्कार कर दिया था! बड़ा झगड़ा बढ़ा।
अन्त में समझौता हो गया। फ़ैसला यह हुआ कि एक व्यक्ति ने अपनी तरफ़ से
बढ़ा हुआ लगान जमा करवा दिया है तथा अब एक समिति जाँच करेगी कि लगान
बढ़ाना उचित है अथवा नहीं। और वह जो फ़ैसला करेगी वह दोनों पक्षों को मंजूर
करना पड़ेगा। अगर वह समिति फ़ैसला कर दे कि लगान बढ़ा दिया जाये – कोई
डर नहीं, तो फिर क्या होगा? बेचारे किसान पहले ही इतने कमज़ोर तथा असहाय
हैं कि वे एक पैसा भी अधिक नहीं दे सकते। फिर यह तो कुछ बात न बनी।
लेकिन हम देखते हैं कि यह सत्याग्रह सरकार के साथ संघर्ष के विचार से नहीं
आरम्भ किया गया वरन केवल यह शिकायत दूर करने के लिए था। नेताओं ने यह
स्वीकार भी किया है। लेकिन समझ में नहीं आता कि एक-एक शिकायत के लिए
लड़ने-झगड़ने के बजाय मूल या जड़ का क्यों नहीं इलाज किया जाता? असल
में ज़िम्मेदार नेता तो ज़िम्मेदारी से भागते हैं और तुरन्त समझौते पर उतर आते हैं।
तो यह बात स्पष्ट है कि इस तरह लाभ हमेशा ताक़तवर को ही होता है।
हम समझते हैं कि जब तक नेता युगान्तकारी भावना और उत्साह के साथ ऐसा
क्रान्तिकारी संघर्ष नहीं छेड़ेंगे, तब तक आज़ादी-आज़ादी का शोर करना दूर की
बात है।
288 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
नेहरू समिति की रिपोर्ट
हिन्दुस्तान भी अजब देश है। यहाँ के नेता भी अजीबो-ग़रीब हैं। बैठे-ठाले विचार
किया कि चलो एक संविधान ही तैयार कर लें कि हम हिन्दुस्तान में कैसा राज
चाहते हैं। तुरन्त सर्वदलीय कॉन्फ़्रेंस बुलायी गयी, जिसमें नेहरू समिति बनायी गयी
कि वह एक रिपोर्ट तैयार करे। रिपोर्ट तैयार हो गयी और प्रकाशित भी की गयी।
बड़ी प्रशंसा हो रही है, बड़ी श्लाघा हो रही है। तारीफ़ों के पुल बाँधे जा रहे हैं।
रिपोर्ट का अर्थ क्या है? क्या हमें भी सरकार कनाडा, आस्ट्रेलिया और आयरलैण्ड
जैसा राज दे दे? बहुत खूब! वायसराय अंग्रेज़ होगा जो काफ़ी अधिकार सम्पन्न
होगा। लेकिन चुनाव से ही कौंसिल और असेम्बली में सदस्य भेजे जायेंगे और चुनाव
में मत देने का अधिकार बालिग व्यक्तियों को ही होगा। सदन में वे स्वयं कुछ नहीं
कर सकेंगे। केवल वायसराय की उँगलियों पर नाचेंगे।
ऐसा लगता है कि वे कनाडा और आयरलैण्ड आदि के संविधान खोलकर और
सामने रखकर बैठ गये और यह रिपोर्ट लिख दी। लेकिन समस्या यह है कि यह रिपोर्ट
लिखी क्यों गयी? जब असहयोग आन्दोलन ज़ोरों पर था, उस समय बाबू भगवानदास
आदि ज़ोर-शोर से अपनी बातें उठाते रहे, लेकिन किसी ने स्वराज्य की व्याख्या करने
की आवश्यकता न समझी। पर आज जबकि कोई आन्दोलन भी नहीं है, संविधान
तैयार करके रख दिया गया है। आख़िर इसका क्या कारण है? असल में बात यह है
कि कुछ लोगों का विचार है कि साइमन कमीशन बना है तो यह ज़रूर कुछ न कुछ
देने के लिए ही बना है। और अब सरकार आने वाली जंग और अन्य देशों की
स्थितियों को सामने रखती हुई हिन्दुस्तान को कुछ न कुछ देने को तैयार है। कमीशन
का बहिष्कार तो इसलिए किया जा रहा है कि मिशन में कोई हिन्दुस्तानी सदस्य नहीं
है, और तो कोई बात नहीं। और अब सीधे नहीं बल्कि यों ही दूसरी तरह से कमीशन
को बताना चाहते हैं कि हम यह कुछ लेना चाहते हैं। एक सज्जन ने अच्छा उदाहरण
दिया कि एक फ़कीर ने अपनी लम्बी लाठी से एक लोटा बाँध लिया और कहने
लगा – मुझे भीख नहीं चाहिए, मेरे लोटे को दे दो! हमारे उग्र नेताओं की यह स्थिति
है। ये सभी समझे बैठे हैं कि अब कुछ न कुछ मिलकर ही रहेगा। इसलिए बता दें
कि हम क्या लेना चाहते हैं। अक्ल के अन्धे नेता आयरलैण्ड के समान अधिकार तो
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 289
ज़रूर माँगते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि आयरलैण्ड की जनता ने ये अधिकार किस
तरह लिए हैं? 1916 से 1923 तक एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर वे अंग्रेज़ों से संघर्ष
करते रहे और इन अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया। तंग आकर, मजबूर होकर जब
वहाँ से जड़ें बिल्कुल ही उखड़ गयीं तब उन्होंने उनको थोड़े-बहुत अधिकार दिये।
और हम चाहते हैं कि हमने बैठकर बतियाया है, इसलिए हमें भी उनके समान
अधिकार मिल जाने चाहिए! कितनी बड़ी ग़लतफ़हमी है? अच्छा फिर यह तो है ही
बड़ा भारी द्रोह। अभी पिछली कांग्रेस में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पास हुआ था। और
अब उन्होंने तुरन्त ही डोमेनियन स्टेट्स बनाया जाना मंजूर कर लिया है। इसका क्या
अर्थ है? कहा जाता है कि यह कांग्रेस पार्टी थोड़े ही थी, जिसने कांग्रेस के साथ द्रोह
किया हो, यह तो है सर्वदलीय कॉन्फ्रेंस। बहुत खूब! तुम कांग्रेस वाले ही समझौते के
ठेकेदार हो गये हो! उदारवादी नेताओं ने क्यों न समझौता करने के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता
स्वीकार की? उन्हें तो हिन्दुस्तान की स्वतन्त्रता की कोई आवश्यकता नहीं? तब
कांग्रेस के होने वाले अध्यक्ष पण्डित मोतीलाल नेहरू आदि कांग्रेस को पीछे खींचने
का यत्न न करेंगे? समझ नहीं आता कि पण्डित जवाहरलाल आदि जोकि समाजवादी
विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके?
क्या वह इन्कलाब नहीं चाहते, वैसे ही इन्कलाब-इन्कलाब चिल्लाते रहते हैं? क्या
उन्हें आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत की गयी हैं उन्हें स्वीकार
कर लेगी (ऐसा सोचना) जान-बूझकर आँखें मूँदना है। या नेहरू साहब केवल सरकार
को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतन्त्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन
राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत
बरबाद करती है। दास, बरकेन हैड की चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके
फरीदपुर के सम्बोधन से ही पता चल सकता है। आज सभी नेता उस राह पर चल
पड़े हैं।
स्वतन्त्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी। लेने से मिलेगी। शक्ति से हासिल की
जाती है। जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी
के पीछे-पीछे फिरता था और जब आन्दोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार-बार
ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर, ‘स्टूल कॉन्फ्रेंस’ भी न मानी।
इसलिए अपना और देश का समय बरबाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर
देश को स्वतन्त्रता-संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए। नहीं तो मुँह धोकर सभी
तैयार रहें कि आ रहा है – स्वराज्य का पार्सल!
नौजवानों को इन बहकावों से बचकर चुपचाप अपना काम करते रहना चाहिए।
290 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दिलचस्प और लाभदायक पुस्तकें
नवयुवकों को इस तरह की पुस्तकें पढ़ने का सुझाव दिया जाता था। - स.
- हिन्दुस्तान और आने वाली जंग (अंग्रेज़ी में)। लेखक, मिस एग्निस
स्मेडली, बर्लिन (जर्मनी)। क़ीमत - =) - ए काल टू एक्शन (अंग्रेज़ी में)। इसमें मौजूदा स्थिति को बड़ी भौंडी निगाह
से बयान किया गया है और साबित किया गया है कि मौजूदा नेता मुल्क़ को निजात
नहीं दिला सकते। क़ीमत-।।) - नौजवानों से दो-दो बातें (उर्दू)। लेखक, भाई छबीलदास बी.ए. ऑनर्स।
क़ीमत - ) - बन्दी जीवन, दोनों भाग (पंजाबी)
पंजाब और बंगाल की 1914-15 की ग़दर-लहर के पूरे और दिलचस्प
हालात। क़ीमत-2/- - शहीदों के दर्शन (पंजाबी)
बड़ा दिलचस्प, उपन्यास के ढंग का राजनीतिक पाठ है। क़ीमत-1)
'मैनेजर, किरती, अमृतसर'
सितम्बर, 1928
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 291
आर्म्स एक्ट ख़त्म कराओ
1857 के स्वतन्त्रता-संग्राम के बाद भारत को पूरी तरह जकड़ने के लिए बनाये
गये क़ानून के ख़िलाफ़ ‘किरती’ अक्टूबर, 1928 में प्रकाशित एक लेख। — स.
किसी देश पर कुछ लोग जब किसी प्रकार क़ब्ज़ा जमा लेते हैं तो उनकी यही
कामना रहती है कि वह देश हमेशा ही उनके क़ब्ज़े में रहे और वे उसका लहू
निचोड़-निचोड़कर मोटे होते रहें और मौज़ मारते रहें। इसके लिए वे लगातार
प्रयासरत रहते हैं। वे चाहते हैं कि उस क़ौम का कोई साहित्य तथा भाषा न रहे।
देश का कोई इतिहास न रहे। मर्दानगी और बहादुरी का निशान तक मिटा दिया जाये।
इस प्रकार वहाँ की जनता को लगातार दबाया जाता है।
आज हम गुलाम हैं। हमारे ऊपर शासन करने वाली क़ौम दुनियाभर की क़ौमों
में से ज़्यादा चालाक, बादशाहत के मामले में ज़्यादा योग्य और समझदार है। उन्होंने
धीरे-धीरे हिन्दुस्तान को कमज़ोर करने की कोशिशें कीं। ग़लतियाँ भी उनसे हुईं।
उनकी ऐसी ही ग़लतियों का नतीजा था 1857 में हिन्दुस्तान की स्वतन्त्रता की
पहली जंग जो इतनी ज़ोरदार रही। लेकिन वह अपनी ग़लतियों से सीख लेते रहे।
इसलिए हम देखते हैं कि उन्होंने फिर किसी जन-आन्दोलन को ज़ोर नहीं पकड़ने
दिया।
उसी समय उन्होंने एक विशेष योजना के अन्तर्गत हिन्दुस्तान को लगातार
कमज़ोर करने की कुछ नीतियाँ अपना लीं। उनमें से आज हम एक का ज़िक्र करना
चाहते हैं और वह है हिन्दुस्तानियों से शस्त्र छीनने की नीति। 1857 के ग़दर, विद्रोह
या स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सामान्य-जन के पास शस्त्र थे, इसलिए बहुत ऊधम
मचा। हिन्दुस्तानी बहादुरों ने एक बार हलचल मचा दी। लेकिन हिन्दुस्तान की
क़िस्मत और पंजाब के बुरे भाग्य। पंजाबियों ने कलंक का टीका माथे पर लगा
लिया। स्वतन्त्रता-आन्दोलन को कुचल डाला गया। अंग्रेज़ों ने सोचा, आख़िर यह
विदेश है — फिर अवसर मिला तो हिन्दुस्तानी पुनः विद्रोह खड़ा कर देंगे, इसलिए
एक बार में ही इनका पूरा इलाज कर देना चाहिए। उन्होंने एक साधारण-पत्र क़ानून
बनाया। उसके अनुसार उन्होंने कुछ विशेष ज़िलों के क्षेत्रों को निःशस्त्र कर दिया।
292 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
तब 17 जुलाई, 1860 को बाक़ायदा जो शस्त्र-क़ानून कौंसिल में स्वीकृत हुआ था,
वायसराय ने उसे मंजूर कर लिया। अक्टूबर, 1860 से उसे अमल में लाया गया,
लेकिन उसके अनुसार भी सिवाय उन क्षेत्रों के जहाँ वे विशेष अशान्ति की आशंका
महसूस करते थे, बाक़ी देश में शस्त्रों की कोई मनाही नहीं थी। उस समय इस
बात पर बहुत ज़ोर दिया जाता था कि सामान्य-जन बिना लाइसेंस तोपें न रखें। कुछ
सामान्य शस्त्रों के लिए भी मनाही हो गयी। तब 1878 में वह कठोर क़ानून पास
हुआ जो 1891, 1919, 1920 के थोड़े-थोड़े संशोधनों के बाद से अब तक चल
रहा है।
सामान्य-जन को इस मामले में बड़ी बेचैनी हुई। (उधर) इस विचार के लोग
घबराकर कोई और कार्यवाही न कर बैठें, उनको क़ानूनी आन्दोलन
(Constitutional Agitation) सिखाने के लिए कांग्रेस की बुनियाद रखी गयी। यह
बात तो मानी हुई है कि उस वक़्त के गवर्नर जनरल या वायसराय लॉर्ड रिपन और
बाद में लॉर्ड डफ़रिन के कथनानुसार, मिस्टर ह्यूम ने कांग्रेस की नींव रखी थी और
सभी लोगों को उसके आसपास इकट्ठा किया था। उसमें शस्त्र-क़ानून पर
सामान्यतया बहस की जाती रही।
इसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चौथे अधिवेशन में, जोकि 1888 में इलाहाबाद
में हुआ था, जो प्रस्ताव पेश और पास हुआ, उसमें इस बारे में कहा गया कि –
जनता की वफ़ादारी और आर्म्स एक्ट की परेशानियों को देखते हुए यह
आवश्यक है कि सरकार को मनाया जाना चाहिए कि वह क़ानून को कुछ इस तरह
बना दे जिससे कि सिवाय (ऐसे व्यक्तियों के) जिन्हें सरकार ने विशेष रूप से
किसी कारणवश रोका हुआ है, प्रत्येक व्यक्ति को हथियार रखने की मंज़ूरी दे।
इस प्रस्ताव को स्वीकृत करते हुए उदारवादी नेता सर फ़िरोज़शाह मेहता ने एक
बहुत महत्त्वपूर्ण भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि यूँ ही जोश में आकर मैं इस
प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा नहीं हो गया। मैं तो यह कहता हूँ कि आप
सारे देश को नपुंसक न बनायें। कहते हैं कि वह समय भी जल्द आयेगा जब
शस्त्र-क़ानून हटा दिया जायेगा। लेकिन स्मरण रहे, एक बार यदि हिन्दुस्तानी जनता
नपुंसक बना दी गयी तो फिर उससे सँभलना मुश्किल हो जायेगा। साथ ही उन्होंने
उस व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसके बेटे को बादशाह ने किसी बात पर फाँसी
पर टँगवा दिया था। फिर एक बार जब बादशाह उससे सहायता माँगने गया तो उसने
जवाब दिया कि मेरे एक बेटा था, जिसे मैं आपकी सहायता के लिए भेज सकता
था, लेकिन इस वक़्त वह बेटा है ही नहीं, इसलिए मैं आपकी कोई मदद नहीं कर
सकता। आख़िर वह समय जल्दी ही आने वाला है जब हम भी अंग्रेज़ी सरकार को
यही उत्तर देंगे। लेकिन निःशस्त्र हम किस काम के हैं और हमारी क्या ताक़त, क्या
क़ीमत होगी?
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 293
खैर, हिन्दुस्तानी पहले से ही (यह क़ानून हटाने की) ज़रूरत महसूस करते
रहे हैं, लेकिन दिनोदिन सख़्ती बढ़ती ही चली गयी। पहले कहा गया था कि यह
क़ानून केवल चार या पाँच सालों के लिए ही है। बाद में वह ऐसा पक्का हुआ
कि अब यह लानत दूर होने में ही नहीं आती। एक बार संशोधन पेश हुआ कि जिस
तरह अंग्रेज़ों, एंग्लो-इण्डियनों और ऐसे दूसरे अन्य लोगों को लाइसेंस की
आवश्यकता नहीं पड़ती, उसी प्रकार आम हिन्दुस्तानियों को भी स्वतन्त्रता होनी
चाहिए। इसमें हमारा अपमान होता है। मगर अपमान का इलाज अंग्रेज़ों ने यह किया
कि चलो, लाइसेंस सभी के लिए आवश्यक कर देते हैं। अंग्रेज़ भी लाइसेंस लें।
हिन्दुस्तानियों को छूट नहीं दे सकते। लोग जानते ही हैं कि अंग्रेज़ों को लाइसेंस लेने
में कितना ‘कष्ट’ उठाना पड़ता है और हिन्दुस्तानियों की क्या गत बनती है। खैर,
मतलब तो यह है कि अंग्रेज़ी सरकार जोकि जानती है कि उसका क़ब्ज़ा हिन्दुस्तान
पर सरासर नाजायज़ और अन्यायपूर्ण है, वह किसी भी सूरत में हिन्दुस्तानियों को
हथियार रखने की इजाज़त नहीं दे सकती। मगर मुल्क़ के लिए ऐसे क़ानून हद
दर्जे के नुक़सानदेह होते हैं। लोगों में नामर्दी, बुज़दिली, कमज़ोरी इतनी ज़्यादा आ
गयी है कि सुनते ही शर्म आती है। आज हम देखते हैं कि जहाँ अन्य राष्ट्र
युद्ध-विद्या की आम शिक्षा देकर पूरे के पूरे देश को एक तरह की बिल्कुल तैयार
फ़ौज बनाकर (Nation in Arms) मुल्क़ को ज़्यादा महफ़ूज़ और फ़ौजी खर्च को
हद दर्जे तक घटा देते हैं, वहाँ हमारी यह हालत है कि हिन्दुस्तान में 99 फ़ीसदी
से अधिक लोग कभी पिस्तौल और बन्दूक़ की शक्ल भी नहीं देख सकते। फिर
कहा जाता है कि हिन्दुस्तान में से कोई प्रतिभाशाली जनरल (Military Genius) पैदा
नहीं हो रहे।
कहा जाता है कि हिन्द में अमन क़ायम रखने और अपराध घटाने के लिए
ही लोगों को निहत्थे रखा जाता है, लेकिन हम देखते हैं कि चोर और डाकू तो
जैसे भी बन पड़ता है, हथियार हासिल कर ही लेते हैं, लेकिन भले लोग अपनी
हिफ़ाज़त के लिए कहीं से भी हथियार हासिल नहीं कर सकते। कितनी सख़्त
तकलीफ़ हमें इस बात से होती है, यह अन्दाज़ा आसानी से ही लग सकता है।
जब भी सैनिक-शिक्षा का सवाल उठता है, उसी समय सरकार आयें-बायें
करके टालना शुरू कर देती है। क्या हमें साफ़ तौर पर नहीं समझ लेना चाहिए
कि यह हमें ख़ासतौर पर कमज़ोर बनाकर गुलाम बनाये रखने के लिए किया
जाता है? हम देखते हैं कि बेचारी औरतें भी अकेली सफ़र नहीं कर सकतीं,
क्योंकि उनके पास अपनी रक्षा का भी पूरा सामान मौजूद नहीं। अगर प्रत्येक स्त्री
के पास कम से कम एक पिस्तौल हो तो वह भी बेफ़िक्री के साथ घूम सकें
और आराम के साथ ज़िन्दगी गुज़ार सकें।
और यदि ज़रा ध्यान से देखें तो मालूम होगा कि इस विचार के साथ कि हमें
294 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अपनी रक्षा के लिए पुलिस का मुँह देखना चाहिए, हम लोग कितने कमज़ोर हो
रहे हैं। इस तरह हमारे भीतर से इन्सानियत ख़त्म की जा रही है। यही तो वजह
है कि हरि सिंहजी नलवा जैसे जरनैल पैदा कर सकने वाली क़ौम के आदमियों
को महज आज़ादी से डराने के लिए सरहिन्द के पठानों का भूत दिखाकर थर-थर
कँपा दिया जाता है।
सबसे बड़ी बात है कि यह इन्सानियत का अपमान है कि सारे मुल्क़ में से
हथियार ग़ायब कर दिये जायें। जहाँ अपनी फ़ौजी ताक़त को अंग्रेज़ दिनोंदिन बढ़ाये
चले जा रहे हैं, वहाँ हमें किस तरह निहत्थे करके फेंका गया है। और आजकल
ख़ासतौर पर पुलिस और खुफ़िया पुलिस की सारी ताक़त लुके-छिपे हथियार
खोजने में और भविष्य में उनका आना बन्द करने में ख़र्च हो रही है। बात क्या है?
रोल्ट रिपोर्ट में साफ़तौर पर लिखा हुआ है कि यदि 1914-15 में पंजाब और बंगाल
के राजपरिवर्तनकारियों के पास काफ़ी हथियार होते तो बड़ा अन्धेर हो जाना था।
यही बात ‘बन्दी जीवन’ में लिखी गयी है। आजकल लड़ाई के आसार नज़र आ
रहे हैं। लड़ाई भी वह सामने सरहद पर। इस बार पिछले अनुभवों से फ़ायदा उठाया
जा रहा है और पहले से ही अनुमान लगाये जा रहे हैं।
लेकिन हम अपना क़ौमी हक़ और इन्सानी हक़ समझते हैं कि हम भी
हथियार रख सकें। हम पहले श्री अवारी, नागपुर शस्त्र-सत्याग्रह का कुछ हाल दे
चुके हैं। लोगों में इसके विरुद्ध विचार तो पैदा हो रहा है। नौजवान भारत सभा की
प्रान्तीय कॉन्फ़्रेंस, अमृतसर ने भी पास किया था कि जल्द ही यह सत्याग्रह किया
जाना चाहिए। नौजवानों के आन्दोलनों को तो ख़ासतौर पर इस ओर ध्यान देना
चाहिए। वजह यह है कि नौजवानों के दिल में क़ुदरती जज़्बा पैदा हो जाता है कि
वह भी हथियार रखें। अगर कोई सिर पीटकर, कोशिश करके एक-आध पिस्तौल
पा भी लेता है तो सरकार झट उस पर साज़िश का केस चला देती है, और उम्रक़ैद
दे देती है। फिर ज़रा विचार तो करें कि क्या अन्धेर हो रहा है। कोई ग़रीब पिस्तौल
रख ही ले तो 3 साल की क़ैद!! गज़ब है! हो क्या गया? कोई राजनीतिक विचारों
वाला कोई हथियार रख ले तो सात साल की क़ैद! दफ़ा 20 के अनुसार बिना
लाइसेंस हथियार रखने के साथ, उनको छुपाने की सज़ा 7 साल है। यही तो वजह
है कि जहाँ आम लोगों को 3-3 महीने की क़ैद होती है, वहाँ के.सी. बनर्जी को
राजपरिवर्तनकारी समझकर पाँच साल क़ैद दे दी गयी थी। हम समझते हैं कि
प्रत्येक हिन्दुस्तानी को इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए। पहले लोगों को
इसकी ज़रूरत महसूस करवा देनी चाहिए। एक बार चारों तरफ़ से आवाज़ उठनी
चाहिए –
आर्म्स एक्ट उड़ा दो! (Repeal the Arms Act)
और फिर साथ ही सत्याग्रह शुरू कर देना चाहिए। असेम्बली और कौंसिलों
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 295
में ऐसे ही प्रस्ताव पास होने चाहिए। श्री अवारी ने जिस शुभ काम को शुरू किया
था, उसको क़ामयाब बनाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए, ताकि फिर हिन्दुस्तानी
नौजवानों में से कमज़ोरी, बुज़दिली दूर हो। फिर हिन्दुस्तान के उठने के आसार हों।
296 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़