भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं। अपनी किश्ती ईश्वर के सहारे छोड़ लंगर तोड़ देते हैं। फिर या तो वे खुद उस
बदले की आग में जलकर राख हो जाते हैं या दुश्मनों को राख करके ही साँस
लेते हैं। यह इन्सानी दिलेरी है। भँगेड़ियों, नशेबाज़ों का पुलाव नहीं है।
दूसरी ओर एक बुज़दिल और कायर होता है। उसे अपनी जान बहुत प्यारी होती
है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसके पास से ऐशो-आराम और सफ़ेद-स्याह करने
की ताक़त छीन ली जाये। पर जब उसकी जान पर हमला किया जाता है और
उसके मुँह से झाग गिरने लगती है तो वह गुस्से में आकर ऐसे-ऐसे कष्ट ढहाता
है कि ज़मीन और आसमान काँप उठते हैं। वह अत्याचार में अन्धा होकर जिस पर
भी हाथ उठाता है, चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो, उसे पार बुलाकर ही छोड़ता
है। इस तरह अक्सर गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है और हज़ारों ही बेगुनाह
नौजवान देश पर शहीद हो जाते हैं। यह निर्दोषों का खून होता है जो अन्त में रंग
लाता है। जनता में बेचैनी फैल जाती है। षड्यन्त्रकारियों के हाथ मज़बूत हो जाते
हैं, क्योंकि यह जुल्म, अन्याय और आतंक ही षड्यन्त्र पैदा करने के कारण हैं। वे
खुली घोषणाएँ कर देते हैं कि देखा, हम नहीं कहते थे कि लातों के भूत बातों से
नहीं सुधरते, लेकिन तुमने हमारी बातों पर ध्यान नहीं दिया। अब खूब गत बन रही
है। लेकिन यह तो –
इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या?
आगे-आगे देखिये होता है क्या?
इस तरह षड्यन्त्र का वृक्ष निर्दोषों के खून से सिंचकर बढ़ता है और थोड़े ही
समय में फलने-फूलने लगता है।
जब तक लोग खुलेआम अपने दुख-तकलीफें व्यक्त कर सकते हैं और
सरकारी अत्याचारों की पोल खोल सकते हैं, तब तक तो षड्यन्त्रों की ज़रूरत नहीं
पड़ती, लेकिन जब सरकारें खुले आन्दोलनों को कुचलने लगती हैं और जब –
न तड़पने की इजाज़त है, न फ़रियाद की है।
घुट-घुट के मर जाऊँ, यही मर्ज़ी मेरे सैय्याद की है।
पर अमल शुरू हो जाता है तो इधर जोशीले और गर्वीले जवान भी इस बुरी
स्थिति में नहीं जीना चाहते। वे सिरों की बाज़ी लगा देते हैं और ऐसे अत्याचारी
(शासन) को तोड़ने की सिरतोड़ कोशिशों में व्यस्त हो जाते हैं।
जब तक शान्तिपूर्ण आन्दोलन में आज़ादी की माँग की छूट रही, कोई षड्यन्त्र
नहीं हुआ, कोई गुप्त आन्दोलन नहीं चल सका, लेकिन ज्यों ही शान्तिपूर्ण आन्दोलन
को कुचलने के आदेश जारी किये गये उसी समय गुप्त आन्दोलन शुरू हो गये और
षड्यन्त्रों की तैयारियाँ होने लगीं। सरकार की सख़्ती का दौर शुरू हुआ और काले
क़ानूनों के अधीन सैकड़ों नौजवानों को, जो खुले रूप में काम कर रहे थे, जेलों
में नज़रबन्द कर दिया गया तो जोशीले नौजवानों को इससे आग लग गयी और वे
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 281