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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 788 में से

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पृष्ठ 299

तब 17 जुलाई, 1860 को बाक़ायदा जो शस्त्र-क़ानून कौंसिल में स्वीकृत हुआ था,
वायसराय ने उसे मंजूर कर लिया। अक्टूबर, 1860 से उसे अमल में लाया गया,
लेकिन उसके अनुसार भी सिवाय उन क्षेत्रों के जहाँ वे विशेष अशान्ति की आशंका
महसूस करते थे, बाक़ी देश में शस्त्रों की कोई मनाही नहीं थी। उस समय इस
बात पर बहुत ज़ोर दिया जाता था कि सामान्य-जन बिना लाइसेंस तोपें न रखें। कुछ
सामान्य शस्त्रों के लिए भी मनाही हो गयी। तब 1878 में वह कठोर क़ानून पास
हुआ जो 1891, 1919, 1920 के थोड़े-थोड़े संशोधनों के बाद से अब तक चल
रहा है।
सामान्य-जन को इस मामले में बड़ी बेचैनी हुई। (उधर) इस विचार के लोग
घबराकर कोई और कार्यवाही न कर बैठें, उनको क़ानूनी आन्दोलन
(Constitutional Agitation) सिखाने के लिए कांग्रेस की बुनियाद रखी गयी। यह
बात तो मानी हुई है कि उस वक़्त के गवर्नर जनरल या वायसराय लॉर्ड रिपन और
बाद में लॉर्ड डफ़रिन के कथनानुसार, मिस्टर ह्यूम ने कांग्रेस की नींव रखी थी और
सभी लोगों को उसके आसपास इकट्ठा किया था। उसमें शस्त्र-क़ानून पर
सामान्यतया बहस की जाती रही।
इसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चौथे अधिवेशन में, जोकि 1888 में इलाहाबाद
में हुआ था, जो प्रस्ताव पेश और पास हुआ, उसमें इस बारे में कहा गया कि –
जनता की वफ़ादारी और आर्म्स एक्ट की परेशानियों को देखते हुए यह
आवश्यक है कि सरकार को मनाया जाना चाहिए कि वह क़ानून को कुछ इस तरह
बना दे जिससे कि सिवाय (ऐसे व्यक्तियों के) जिन्हें सरकार ने विशेष रूप से
किसी कारणवश रोका हुआ है, प्रत्येक व्यक्ति को हथियार रखने की मंज़ूरी दे।
इस प्रस्ताव को स्वीकृत करते हुए उदारवादी नेता सर फ़िरोज़शाह मेहता ने एक
बहुत महत्त्वपूर्ण भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि यूँ ही जोश में आकर मैं इस
प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा नहीं हो गया। मैं तो यह कहता हूँ कि आप
सारे देश को नपुंसक न बनायें। कहते हैं कि वह समय भी जल्द आयेगा जब
शस्त्र-क़ानून हटा दिया जायेगा। लेकिन स्मरण रहे, एक बार यदि हिन्दुस्तानी जनता
नपुंसक बना दी गयी तो फिर उससे सँभलना मुश्किल हो जायेगा। साथ ही उन्होंने
उस व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसके बेटे को बादशाह ने किसी बात पर फाँसी
पर टँगवा दिया था। फिर एक बार जब बादशाह उससे सहायता माँगने गया तो उसने
जवाब दिया कि मेरे एक बेटा था, जिसे मैं आपकी सहायता के लिए भेज सकता
था, लेकिन इस वक़्त वह बेटा है ही नहीं, इसलिए मैं आपकी कोई मदद नहीं कर
सकता। आख़िर वह समय जल्दी ही आने वाला है जब हम भी अंग्रेज़ी सरकार को
यही उत्तर देंगे। लेकिन निःशस्त्र हम किस काम के हैं और हमारी क्या ताक़त, क्या
क़ीमत होगी?
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 293