भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारदोली सत्याग्रह
हम पहले से ही अपने पाठकों के सामने बारदोली के बहादुर किसानों के हालात
रखते रहे हैं। उन्होंने सत्याग्रह शुरू किया था, क्योंकि उनका बन्दोबस्त करके लगान
बढ़ा दिया गया है। उन्होंने लगान देने से ही इन्कार कर दिया था! बड़ा झगड़ा बढ़ा।
अन्त में समझौता हो गया। फ़ैसला यह हुआ कि एक व्यक्ति ने अपनी तरफ़ से
बढ़ा हुआ लगान जमा करवा दिया है तथा अब एक समिति जाँच करेगी कि लगान
बढ़ाना उचित है अथवा नहीं। और वह जो फ़ैसला करेगी वह दोनों पक्षों को मंजूर
करना पड़ेगा। अगर वह समिति फ़ैसला कर दे कि लगान बढ़ा दिया जाये – कोई
डर नहीं, तो फिर क्या होगा? बेचारे किसान पहले ही इतने कमज़ोर तथा असहाय
हैं कि वे एक पैसा भी अधिक नहीं दे सकते। फिर यह तो कुछ बात न बनी।
लेकिन हम देखते हैं कि यह सत्याग्रह सरकार के साथ संघर्ष के विचार से नहीं
आरम्भ किया गया वरन केवल यह शिकायत दूर करने के लिए था। नेताओं ने यह
स्वीकार भी किया है। लेकिन समझ में नहीं आता कि एक-एक शिकायत के लिए
लड़ने-झगड़ने के बजाय मूल या जड़ का क्यों नहीं इलाज किया जाता? असल
में ज़िम्मेदार नेता तो ज़िम्मेदारी से भागते हैं और तुरन्त समझौते पर उतर आते हैं।
तो यह बात स्पष्ट है कि इस तरह लाभ हमेशा ताक़तवर को ही होता है।
हम समझते हैं कि जब तक नेता युगान्तकारी भावना और उत्साह के साथ ऐसा
क्रान्तिकारी संघर्ष नहीं छेड़ेंगे, तब तक आज़ादी-आज़ादी का शोर करना दूर की
बात है।
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