भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक और दमनकारी क़ानून
जिस तरह हिन्दुस्तान में कारख़ाने बढ़ रहे हैं, उसी तरह हमारे पूँजीपति और अंग्रेज़ों
के लाभ-हानि भी साझे होते जा रहे हैं और ये दश में उभर रहे जन-आन्दोलन को
सामान्यतया दबाने का संयुक्त रूप से प्रयत्न कर रहे हैं। अब एक समय दो क़ानून
स्वीकृत हो रहे हैं : एक है जन-सुरक्षा बिल (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और दूसरा
है औद्योगिक विवाद बिल (ट्रेड्स डिस्प्यूट बिल) अर्थात किसी पूँजीपति और
मज़दूरों का किसी सवाल पर झगड़ा हो जाये तब तुरन्त एक पंचायत गठित कर
दी जाये, जिसमें पूँजीपति मालिकों तथा मज़दूरों के प्रतिनिधि शामिल हों और इसका
अध्येता एक निष्पक्ष व्यक्ति हो। वह जो निर्णय दे उसे सभी स्वीकारें। हड़ताल का
अधिकार नहीं होगा। हड़ताल करने वाले को 500 रुपये जुर्माना या एक माह की
क़ैद की सज़ा दी जायेगी और अगर कोई राजनीतिक विचारधारा को लेकर हड़ताल
करेगा, उसे तीन माह की क़ैद तथा 500 रुपये के जुर्माने की सज़ा होगी। लेकिन
ये सज़ाएँ क्यों? विवाद निपटाने के लिए जो कमेटी बनायी जायेगी, अगर वह
मज़दूरों की इच्छाओं के विरुद्ध फ़ैसला कर दे, तब? तो भी क्या उन ग़रीबों को
हड़ताल करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? बड़ी अजीब बात है। मज़दूरों को
जल्दी ही सँभल जाना चाहिए, क्योंकि ये उनके ही आन्दोलनों को दबाने का यत्न
हो रहे हैं। बम्बई की मज़दूर-किसान पार्टी ने घोषित किया है कि इस बिल के
विरुद्ध मज़दूरों को हड़तालें करनी चाहिए, बात भी ठीक है। असेम्बली के पूँजीपति
सदस्य तुरन्त ही यह क़ानून स्वीकृत कर देंगे। उन्हीं के लिए तो सरकार ने यह
क़ानून बनाया है। पहले ही प्रेमचन्द कीका भाई जैसे पूँजीपति सरकार से गुहार करते
थे कि मज़दूर-आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की जानी चाहिए। सो सरकार ने
इसका हल बनाकर पेश कर दिया है। दोनों क़ानून स्वीकृत हो जायेंगे। लेकिन
मज़दूरों को सँभल जाना चाहिए, क्योंकि यदि अभी कोई ध्यान न दिया गया तो
बाद में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। यह स्मरण रखना चाहिए कि
इंग्लैण्ड में भी ऐसा क़ानून स्वीकृत कराने की अंग्रेज़ी सरकार को हिम्मत नहीं हो
सकती। मज़दूरों के साथ रत्तीभर भी सहानुभूति रखने वाले सज्जनों को इस अवैध
तथा दमनकारी क़ानून के विरोध में आवाज़ उठानी चाहिए।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 287