भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें बहुत सहायता करती थीं और स्वदेशी आन्दोलन चलने पर दोनों इसी काम में
लग गये। हालाँकि हरिनाथ सान्याल सरकारी नौकरी में थे और अच्छा-खासा वेतन
पाते थे।
श्रीमती क्षीरोदवासिनी देवी अपने बच्चों को घर में स्वयं पढ़ाती थीं।
स्वदेशी आन्दोलन के बाद में उन्होंने स्वयं ही अपने पुत्रों को अनुशीलन समिति
में भरती करवाया। अनुशीलन समिति बंगाल की एक पार्टी थी, जो उस समय
तक खुफिया राजपरिवर्तनकारी दल नहीं बनी थी, लेकिन बाद में वही सबसे
बड़ी और शक्तिशाली राजपरिवर्तनकारी पार्टी बन गयी थी।
बाद में माँ को यह भी पता लग गया कि शचीन्द्र युगान्तकारी दल में शामिल
हुआ है। लेकिन वह कभी घबरायी नहीं, बल्कि हमेशा उनसे सहानुभूतिपूर्वक
व्यवहार करती थीं। वह प्रसन्न थीं कि उनका बेटा देश-सेवा में संलग्न है।
उनके सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के कारण काफी दूर-दूर से युगान्तकारी उनके
दर्शनों के लिए आते थे। उनमें श्री रासबिहारी बोस, हिन्दुस्तान के राजपरिवर्तनकारी
शहीदों के सिरमौर श्री जतीन्द्रनाथ मुकर्जी तथा श्री शशांक हाजरा आदि शामिल थे।
वह बंगाल के युगान्तकारियों में 'युगान्तकारी माँ' के रूप में मशहूर थीं। दूर
अण्डमान के बन्दियों के बीच भी उनकी ख्याति पहुँच चुकी थी।
1915 में जब गदर पार्टी ने चारों तरफ ज़बरदस्त बग़ावत करने की तैयारियाँ
की थीं, उस समय श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके दोनों युवा भाई इस काम
में जुटे हुए थे। स्मरण रहे कि इनके पिता का देहावसान हो चुका था। इस कारण
परिवार का बोझ भी इनके सिर आ पड़ा। जब फ़रवरी में विद्रोह पैदा करने की
तारीख़ भी तय हो चुकी थी, तब इन भाइयों में आपस में विवाद चल पड़ा कि
कौन पीछे रहकर परिवार की देखभाल करे, क्योंकि कोई भी पीछे रहने के लिए
सहमत नहीं होना चाहता था। दोनों की यह इच्छा थी कि देश के स्वतन्त्रता-संघर्ष
में वे सक्रिय रूप से मैदान में कूद पड़ें। तब उनकी वीर माता ने आगे आकर कहा
कि वह किसी की राह में नहीं आना चाहती, जिस किसी की भी इच्छा हो, वह
उनकी चिन्ता छोड़कर देश-सेवा के कार्य में जुट जाये।
पर वह सारा काम तो बीच में ही रह गया। ग़दर की सारी योजना फेल हो
गयी। मुक़दमा चला। श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन कैद हो गयी। जब वह
बनारस जेल से अण्डमान (कालेपानी) भेजे गये, उस समय उनकी आयु 22 बरस
की थी। माँ उनसे मिलने गयी और प्रसन्नतापूर्वक कहा - "मेरा पुत्र सचमुच
संन्यासी हो गया है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि उसने अपना जीवन देश-सेवा के लिए
अर्पित कर दिया है।" इसके पश्चात् पुलिस उनका पीछा करने लगी और बहुत
परेशान करती रही।
अब काकोरी केस चला और जब उनका छोटा पुत्र श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल भी
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 277