भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंज़रूर माँगते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि आयरलैण्ड की जनता ने ये अधिकार किस
तरह लिए हैं? 1916 से 1923 तक एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर वे अंग्रेज़ों से संघर्ष
करते रहे और इन अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया। तंग आकर, मजबूर होकर जब
वहाँ से जड़ें बिल्कुल ही उखड़ गयीं तब उन्होंने उनको थोड़े-बहुत अधिकार दिये।
और हम चाहते हैं कि हमने बैठकर बतियाया है, इसलिए हमें भी उनके समान
अधिकार मिल जाने चाहिए! कितनी बड़ी ग़लतफ़हमी है? अच्छा फिर यह तो है ही
बड़ा भारी द्रोह। अभी पिछली कांग्रेस में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पास हुआ था। और
अब उन्होंने तुरन्त ही डोमेनियन स्टेट्स बनाया जाना मंजूर कर लिया है। इसका क्या
अर्थ है? कहा जाता है कि यह कांग्रेस पार्टी थोड़े ही थी, जिसने कांग्रेस के साथ द्रोह
किया हो, यह तो है सर्वदलीय कॉन्फ्रेंस। बहुत खूब! तुम कांग्रेस वाले ही समझौते के
ठेकेदार हो गये हो! उदारवादी नेताओं ने क्यों न समझौता करने के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता
स्वीकार की? उन्हें तो हिन्दुस्तान की स्वतन्त्रता की कोई आवश्यकता नहीं? तब
कांग्रेस के होने वाले अध्यक्ष पण्डित मोतीलाल नेहरू आदि कांग्रेस को पीछे खींचने
का यत्न न करेंगे? समझ नहीं आता कि पण्डित जवाहरलाल आदि जोकि समाजवादी
विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके?
क्या वह इन्कलाब नहीं चाहते, वैसे ही इन्कलाब-इन्कलाब चिल्लाते रहते हैं? क्या
उन्हें आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत की गयी हैं उन्हें स्वीकार
कर लेगी (ऐसा सोचना) जान-बूझकर आँखें मूँदना है। या नेहरू साहब केवल सरकार
को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतन्त्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन
राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत
बरबाद करती है। दास, बरकेन हैड की चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके
फरीदपुर के सम्बोधन से ही पता चल सकता है। आज सभी नेता उस राह पर चल
पड़े हैं।
स्वतन्त्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी। लेने से मिलेगी। शक्ति से हासिल की
जाती है। जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी
के पीछे-पीछे फिरता था और जब आन्दोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार-बार
ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर, ‘स्टूल कॉन्फ्रेंस’ भी न मानी।
इसलिए अपना और देश का समय बरबाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर
देश को स्वतन्त्रता-संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए। नहीं तो मुँह धोकर सभी
तैयार रहें कि आ रहा है – स्वराज्य का पार्सल!
नौजवानों को इन बहकावों से बचकर चुपचाप अपना काम करते रहना चाहिए।
290 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़