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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 788 में से

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पृष्ठ 288

तड़प उठे। बस फिर क्या था? किसी ओर काकोरी-षड्यन्त्र का तो कहीं किसी
और षड्यन्त्र का धुआँ निकलने लगा।
जब तक दुनिया में वहशी ज़माने की गुलामी और ग़रीबी जैसी स्मृतियाँ क़ायम
रहेंगी तब तक कोई भी ताक़त दुनिया के तख़्त से षड्यन्त्रों और गुप्त आन्दोलनों
को मिटा नहीं सकती। यदि ज़ोर-ज़बरदस्ती और जुल्म षड्यन्त्रों के रोकने का सही
इलाज होता तो षड्यन्त्रों का नामो-निशान कब का मिट गया होगा। लेकिन यह
इलाज नहीं है। सम्भव है, जुल्म और अत्याचार कुछ समय के लिए षड्यन्त्रों को
रोक सकें, लेकिन जुल्म और अत्याचार षड्यन्त्र रोकने का कोई कारगर नुस्ख़ा नहीं
है। कइयों का विचार है कि केवल आज़ादी ही षड्यन्त्रों को ख़त्म करने का असली
इलाज है, लेकिन हमारा इससे मतभेद है। यह तो ठीक है कि यह आज़ादी ही है
जो बहुत हद तक षड्यन्त्रों को रोक सकती है, लेकिन फिर भी इसमें सोलह आने
सच नहीं है, क्योंकि वर्तमान समय में साबित हो गया है कि केवल (आज़ादी की)
प्राप्ति से ही षड्यन्त्र नहीं रुक सकते। हमारे सामने अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस
आज़ाद देशों में माने जाते हैं और वे हैं भी बिल्कुल आज़ाद – किसी के गुलाम
या किसी तरह से भी मोहताज नहीं हैं, लेकिन फिर भी वहाँ षड्यन्त्र होते रहते
हैं, और अभी बहुत समय नहीं हुआ, जबकि 'साको' और 'वैनजिरी' को अमेरिका
की पूँजीपति सरकार ने षड्यन्त्र के अपराध में बिजली की कुर्सी पर बिठाकर मार
डाला था। जर्मनी में कम्युनिस्टों ने एक क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन वे
कब्ज़ा बनाकर न रख सके। फ्रांस और इंग्लैण्ड में भी षड्यन्त्र होते रहते हैं।
अमेरिका जैसा समृद्ध देश पूरी दुनिया के नक़्शे पर भी नहीं है। वहाँ
'राक-फैलरे' जैसे तगड़े अमीर आदमी हैं। यदि वे चाहें तो अकेले ही पूरे हिन्दुस्तान
को ख़रीद सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर बेरोज़गारी और ग़रीबी का यह हाल है कि
हज़ारों ही नहीं, बल्कि लाखों अमेरिकी मज़दूर ऐसे हैं जो बेरोज़गार भूखे दर-दर
भटक रहे हैं और जिनका गुज़ारा सिर्फ़ सरकारी दान से ही होता है। तो क्या जब
तक यह हद दर्जे की ग़रीबी और हद दर्जे की अमीरी दुनिया में क़ायम रहेगी,
षड्यन्त्र दुनिया से ख़त्म हो सकते हैं? हमारा विचार तो 'नहीं' में है। षड्यन्त्रों का
हटना या न हटना रोटी के सवाल के हल होने पर निर्भर है। यदि रोटी का सवाल
आज हल हो जाये तो आज ही षड्यन्त्रों की समाप्ति हो सकती है, लेकिन यदि
रोटी का सवाल न निपटा तो ये षड्यन्त्र कभी भी रुक नहीं सकते, चाहे नीरू और
जहाद जैसे ज़ालिम ही क्यों न पैदा हो जायें।
शायद कुछ लोग कहें कि यदि रोटी के सवाल का हल ही षड्यन्त्रों की
बीमारी के लिए अमृतधारा है तो फिर रूस में क्यों षड्यन्त्र होते हैं? हमारा जवाब
स्पष्ट है कि रूस में जो षड्यन्त्र होते हैं वे सिर्फ़ विदेशी पूँजीपति सरकारों के छोड़े
हुए कुछ भाड़े के टट्टुओं द्वारा करवाये जाते हैं और वे विदेशी सरकारें अपने एजेण्टों
282 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़