भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंशासक-प्रजा, पूँजीपति-मज़दूर, ज़मींदार-किसान आदि का फ़र्क़ ख़त्म कर एक
जैसे अधिकारों और आज़ादी का दौर लाना चाहते हैं और जो पुरानी, गन्दी और
अत्याचारी व्यवस्था को समाप्त कर एक नयी व सुन्दर व्यवस्था स्थापित करना
चाहते हैं, जिसमें कि कोई शासक-प्रजा, अमीर-ग़रीब, ज़मींदार-किसान न हो,
बल्कि सभी एक जैसे भाई-भाई हों। प्रत्येक काम करे और खाये और सभी की
प्रत्येक ज़रूरत पूरी हो।
ये बातें सही हैं या ग़लत जोकि दोनों अपने-अपने विचार को सामने रखकर
की जाती हैं, यह पाठक स्वयं ही अनुमान लगायें।
गुज़रे वक़्त का इतिहास प्रमाण है कि सख़्त सज़ाओं और फाँसियों से षड्यन्त्र
नहीं रुक सकते, न ही जुल्मों और अत्याचारों से — चाहे वे कितने भी भयानक
क्यों न हों — आज़ादी की चाह कुचली जा सकती है। असंख्य नौजवान, जो
किसी दूसरे आज़ाद देश में होते तो अपने देश के लिए तोहफ़ा साबित होते,
अत्याचारी और ज़ालिम शासकों के अत्याचारों का शिकार हो गये। हज़ारों देशभक्त
टुकड़े-टुकड़े कर क़त्ल कर दिये गये ताकि लोग इससे आतंकित होकर षड्यन्त्र
करने से बाज़ आ जायें और आज़ादी के लिए हाथ-पाँव न हिलायें। तमाम
सज़ाओं, फाँसियों, कैद और बेंत मार-मारकर देख लिया गया है, लेकिन ये
तमाम सज़ाएँ भी षड्यन्त्रों को रोकने में असफल रही हैं। बल्कि — 'बढ़ता है
शौक़े-शहादत हर सज़ा पाने के बाद' के अनुसार षड्यन्त्रों की आग भड़कती
गयी और इन सज़ाओं से न रुकी। यह क्यों है, आख़िर इन षड्यन्त्रों को रोकने
का क्या कोई इलाज भी हो सकता है?
यदि षड्यन्त्रों के पिछले इतिहास को अच्छी तरह देखा जाये तो हमें इस बात
का भली प्रकार पता चलता है कि षड्यन्त्रों को रोकने के लिए जितनी अधिक
कोशिशें होती हैं, उतने ही अधिक षड्यन्त्र किसी न किसी शक्ल में वजूद में आते
रहते हैं। इस तरह पता चलता है कि ये सज़ाएँ षड्यन्त्रों की आग भड़काने में लकड़ी
का ही काम करती हैं।
सैकड़ों नौजवान गोलियों से उड़ा दिये जाते हैं, लेकिन उनकी जगह भरने के
लिए हज़ारों ही नौजवान हथेलियों पर सर रखकर मैदान में कूद पड़ते हैं और अपने
प्राणों को ख़तरे में डाल उस अधूरे काम को शुरू कर देते हैं। आख़िर इसका कारण
क्या है?
बदला लेना इन्सानी स्वभाव है। इन्सान जब तक इन्सान है, वह अपने दुश्मनों
से बदला ज़रूर लेगा, ख़याली पुलाव पकाने वाले चाहे कुछ भी कहें। आम नौजवान
जब देखते हैं कि उनके भाई सिर्फ़ देशप्रेम के लिए ही किस बेदर्दी और बेरहमी
से जुल्मों का शिकार हो रहे हैं तो उनके दिलों में अपने भाइयों पर हुए जुल्मों का
बदला लेने की आग भड़क उठती है। वे शान्ति और सन्तोष को अलविदा कह देते
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