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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया।
आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और
अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक़्त है।
इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी हो गयी। लोगों के मनों में आवश्यक कार्यों
के प्रति घृणा पैदा हो गयी। हमने जुलाहे को भी दुत्कारा। आज कपड़ा बुनने वाले
भी अछूत समझे जाते हैं। यू.पी. की तरफ़ कहार को भी अछूत समझा जाता है।
इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई। ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा हो
रही हैं।
इन तबकों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहें
और न समझें। बस, समस्या हल हो जाती है। नौजवान भारत सभा तथा कांग्रेस ने
जो ढंग अपनाया है, वह काफ़ी अच्छा है। जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा,
उनसे अपने इन पापों के लिए क्षमा-याचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा
इन्सान समझना, बिना अमृत छकाये, बिना कलमा पढ़ाये या शुद्धि किये उन्हें अपने
में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना, यही उचित ढंग है। और आपस में
खिंचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक़ न देना, कोई ठीक बात नहीं है।
जब गाँवों में मज़दूर-प्रचार शुरू हुआ, उस समय किसानों को सरकारी आदमी
यह बात समझाकर भड़काते थे कि देखो, ये भंगी-चमारों को सिर पर चढ़ा रहे
हैं और तुम्हारा काम बन्द करवायेंगे। बस किसान इतने में ही भड़क गये। उन्हें याद
रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नहीं सुधर सकती जब तक कि वे इन
ग़रीबों को नीच और कमीना कहकर अपनी जूती के नीचे दबाये रखना चाहते हैं।
अक्सर कहा जाता है कि वे साफ़ नहीं रहते। इसका उत्तर साफ़ है – वे ग़रीब हैं।
ग़रीबी का इलाज करो। ऊँचे-ऊँचे कुलों के ग़रीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं
रहते। गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएँ बच्चों का
मैला साफ़ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं।
लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक कि
अछूत क़ौमें अपनेआप को संगठित न कर लें। हम तो समझते है कि उनका स्वयं
को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण
उनके बराबर अधिकारों की माँग करना बहुत आशाजनक संकेत है। या तो
साम्प्रदायिक भेद का झंझट ही ख़त्म करो, नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे
दो। कौंसिलों और असेम्बिलयों का कर्त्तव्य है कि वे स्कूल-कॉलेज, कुएँ तथा
सड़क के उपयोग की पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दिलायें। ज़बानी तौर पर ही नहीं, वरन
साथ ले जाकर उन्हें कुओं पर चढ़ायें। उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलायें।
लेकिन जिस लेजिस्लेटिव असेम्बली में बाल-विवाह के विरुद्ध पेश किये बिल
तथा मज़हब के बहाने हाय-तौबा मचायी जाती है, वहाँ वे अछूतों को अपने साथ
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 269

शामिल करने का साहस कैसे कर सकते हैं?
इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए
अधिक अधिकार माँगें। हम तो साफ़ कहते हैं कि उठो, अछूत कहलाने वाले
असली जन-सेवको तथा भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोविन्द सिंह की
फ़ौज की असली शक्ति तुम्हीं थे! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सबकुछ कर सके,
जिस कारण उनका नाम आज भी ज़िन्दा है। तुम्हारी कुर्बानियाँ स्वर्णाक्षरों में लिखी
हुई हैं। तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोत्तरी करके और ज़िन्दगी
सम्भव बनाकर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो, उसे हम लोग नहीं समझते।
लैण्ड-एलियनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी ज़मीन नहीं ख़रीद
सकते। तुम पर इतना ज़ुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती हैं –
उठो, अपनी शक्ति को पहचानो। संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिशें
किये बिना कुछ भी न मिल सकेगा। (Those who would be free must
themselves strike the blow) स्वतन्त्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को स्वयं
यत्न करना चाहिए। इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गयी हैं कि वह अपने
लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं उन्हें वह अपनी
जूती के नीचे ही दबाये रखना चाहते हैं। कहावत है, 'लातों के भूत बातों से नहीं
मानते'। अर्थात संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे
दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर
सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन
ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना
चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही
तुम्हारी गुलामी और ग़रीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी
न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सबकुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली
सर्वहारा हो...संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ हानि न होगी। बस गुलामी की ज़ंजीरें
कट जायेंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बग़ावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे
होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रान्ति पैदा कर
दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रान्ति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश
का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो, सोये हुए शेरो! उठो, और बग़ावत खड़ी
कर दो।
270 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

विद्यार्थी और राजनीति
इस महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मसले पर यह लेख जुलाई, 1928 में 'किरती' में छपा
था। उन दिनों अनेक नेता विद्यार्थियों को राजनीति में हिस्सा न लेने की सलाहें देते
थे, जिनके जवाब में यह लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह लेख सम्पादकीय विचारों में
छपा था, और सम्भवतः भगतसिंह का लिखा हुआ है। – स.
इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान (विद्यार्थी)
राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। पंजाब सरकार की राय बिल्कुल
ही न्यारी है। विद्यार्थियों से कॉलेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त
पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं कि वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे। आगे
हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मन्त्री है,
स्कूलों-कॉलेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ाने
वाला पोलिटिक्स में हिस्सा न ले। कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेण्ट्स यूनियन
या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था। वहाँ भी सर
अब्दुल कादर और प्रोफ़ेसर ईश्वरचन्द्र नन्दा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि
विद्यार्थियों को पोलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।
पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ (Politically backward)
कहा जाता है। इसका क्या कारण है? क्या पंजाब ने बलिदान कम किये हैं? क्या
पंजाब ने मुसीबतें कम झेली हैं? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे
पीछे हैं? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग
बिल्कुल ही बुद्धू हैं। आज पंजाब कौंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी
तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है
और फ़िज़ूल होती है। और विद्यार्थी युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा
नहीं लेता। उन्हें इस सम्बन्ध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते
हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते
हैं कि सुनकर स्वयं ही अफ़सोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता।
जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज ही अक्ल
के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 271

खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई
करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की
परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना
उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते
हैं, जो सिर्फ़ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की ज़रूरत ही
क्या है? कुछ ज़्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं – “काका, तुम पोलिटिक्स के
अनुसार पढ़ो और सोचो ज़रूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक
योग्य होकर देश के लिए फ़ायदेमन्द साबित होगे।”
बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी
सिर्फ़ ऊपरी बात है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक
पुस्तक ‘Appeal to the Young’ Prince Kropotkin (‘नौजवानों के नाम अपील’,
प्रिन्स क्रोपोटकिन) पढ़ रहा था। एक प्रोफ़ेसर साहब कहने लगे, यह कौन-सी
पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा
– प्रिन्स क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम
से परिचित होना प्रत्येक प्रोफ़ेसर के लिए बड़ा ज़रूरी था। प्रोफ़ेसर की ‘योग्यता’
पर लड़का हँस भी पड़ा। और उसने फिर कहा – ये रूसी सज्जन थे। बस!
‘रूसी!’ कहर टूट पड़ा। प्रोफ़ेसर ने कहा कि “तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम
पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो।”
देखिये आप प्रोफ़ेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या
सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गाँधी,
जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई
व्यावहारिक राजनीति, पर कमिशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या
वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित
कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी, तो फिर यह भी पोलिटिक्स
हुई कि नहीं? कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज़?
फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराज़गी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते
ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक
हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफ़ादारी करने वाले वफ़ादार
नहीं, बल्कि ग़द्दार हैं, इन्सान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं। तो हम किस तरह
कहें कि विद्यार्थी वफ़ादारी का पाठ पढ़ें।
सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की ज़रूरत है,
जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की
आज़ादी के लिए न्योछावर कर दें। लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे?
272 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फँसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल
सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फँसे हों
और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने
कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो। सिर्फ़ गणित और ज्योगराफ़ी का ही
परीक्षा के परचों के लिए घोंटा न लगाया हो।
क्या इंग्लैण्ड के सभी विद्यार्थियों का कॉलेज छोड़कर जर्मनी के ख़िलाफ़
लड़ने के लिए निकल पड़ना पोलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहाँ थे
जो उनसे कहते – जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो। आज नेशनल कॉलेज,
अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या
वे ऐसे ही मूर्ख रह जायेंगे? देखते हैं कि उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय
कितने योग्य आदमी पैदा करता है? सभी देशों को आज़ाद करवाने वाले वहाँ के
विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। क्या हिन्दुस्तान के नौजवान अलग-अलग
रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पायेंगे? नौजवानों के 1919 में
विद्यार्थियों पर किये गये अत्याचार भूल नहीं सकते। वे यह भी समझते हैं कि उन्हें
एक भारी क्रान्ति की ज़रूरत है। वे पढ़ें। ज़रूर पढ़ें। साथ ही पोलिटिक्स का भी
ज्ञान हासिल करें और जब ज़रूरत हो तो मैदान में कूद पड़े और अपने जीवन इसी
काम में लगा दें। अपने प्राणों का इसी में उत्सर्ग कर दें। वरन बचने का कोई उपाय
नज़र नहीं आता।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 273

श्री इन्द्रचन्द्र नारंग का मुक़दमा

श्री इन्द्रचन्द्र नारंग का देवघर षड्यन्त्र केस से सम्बन्धित यह सम्पादकीय
टिप्पणी – सितम्बर, 1928 ‘किरती’ में छपी थी। ब्रिटिश शासन में नागरिक स्वतन्त्रता
और जनवादी अधिकारों की स्थिति पर यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालती है।
– स.
पाठक पिछली बार देवघर साज़िश केस के बारे में पढ़ चुके हैं। उस मुक़दमे
के निर्णय के बारे में हमने संक्षेप में लिखा था। उसमें ही एक पंजाबी नौजवान
श्री इन्द्रचन्द्र नारंग को अकारण तीन साल की सज़ा दी गयी है। आज उनके मुक़दमे
का निर्णय हमारे सामने है। इसे पढ़ते हुए आश्चर्य हो रहा है कि किस कारण उन्हें
सज़ा दी गयी है। उनके विरुद्ध यही रहा कि देवघर की तलाशी में जो एक सूची
मिली थी उसमें उनका नाम भी था। और तलाशी में ‘बन्दी जीवन’ की साठ प्रतियाँ
मिली थीं और एक अन्य व्यक्ति के पास से तलाशी में डॉक्टर भूपेन्द्रनाथ दत्त,
अध्यक्ष राजनीतिक पीड़ित कॉन्फ़्रेंस (पोलिटिकल सफ़रर्स कॉन्फ़्रेंस) का पता मिला
था। उसने कहा था कि यह उसने श्री इन्द्रचन्द्र से लिया था, बस।
सूची में नाम मिलने से इन्द्रचन्द्र का कोई विशेष अपराध नहीं बन जाता।
अन्य साठ-सत्तर व्यक्तियों के भी तो नाम थे, लेकिन उनसे तो पूछताछ भी नहीं
की गयी।
सबसे अधिक ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि वह ‘बन्दी जीवन’ बेचता
था और इसलिए यह राजपरिवर्तनकारी साज़िश का सदस्य समझा जाता है। ख़ूब!
हम पूछते हैं कि ‘बन्दी जीवन’ क्या ज़ब्त किताब है? क्या सरकार ने उसकी
बिक्री पर रोक लगायी हुई है? यदि नहीं तो श्री इन्द्रचन्द्र को सज़ा किस बात
की दी गयी है? मज़ा तो यह है कि किताब उसके भाई ने लाहौर-हिन्दी भवन
से प्रकाशित की है। उसकी बिक्री के लिए सभी ने प्रयत्न किये हैं। लेकिन इसमें
साज़िश का क्या सबूत है? क्या डॉक्टर भूपेन्द्रनाथ दत्त का अध्यक्षीय सम्बोधन
सरकार ने ज़ब्त कर लिया है? यदि नहीं, तो वह किसी व्यक्ति को पढ़ने के
लिए देना ही किस तरह अपराध हो गया? पहले श्री इन्द्रचन्द्र ने समाचारपत्र की
एजेंसी लेने का प्रयास किया था। वह जैसे-तैसे पैसे कमाकर गुज़ारा कर रहा था
274 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

और शिक्षा भी प्राप्त कर रहा था। अगर वह अपने भाई द्वारा प्रकाशित किताब
की बिक्री करके कुछ धन कमा लेता है, तो क्या वह अपराध था? हम समझ
नहीं पा रहे हैं कि यह अपराध कैसे हो गया? आज हज़ारों व्यक्तियों के घरों में
'बन्दी जीवन' होगा। सैकड़ों आदमी वह किताब बेचते होंगे। तो क्या वे सभी
षड्यन्त्रकारी हैं? और जेल भेजने लायक हैं? अगर नहीं तो एक बेचारे इन्द्रचन्द्र
के हाथों में जाते ही 'बन्दी जीवन' ज़हर हो गया है? हमें तो दाल में कुछ
काला-वाला नज़र आता है। कहीं किसी और तैयारी के सिलसिले में ही उस
ग़रीब को यूँ ही जेल में तो नहीं डाल दिया गया? हमें लगता है कि पंजाब के
नौजवानों पर मुसीबत आने वाली है और यह इसी की तैयारी में पहला क़दम
उठाया गया है। लेकिन अंग्रेज़ी सरकार ज़रा ज़ार का इतिहास याद कर लिया करे।
इस तरह के जुल्म कर-करके अपने राज को मज़बूत पाँव पर खड़ा करता-करता
ज़ार आज अपनी हस्ती मिटा बैठा है। याद रखना चाहिए कि जुल्म के साथ कभी
शान्ति क़ायम नहीं हो सकती, राज मज़बूत नहीं हो सकते, बल्कि यह अपने पैरों
पर कुल्हाड़ा मारना है। लेकिन हमारे बड़े शोर-शराबा करने वाले देशभक्तों और
नेताओं को यह अन्धेरगर्दी बन्द करने के लिए आन्दोलन करना चाहिए।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 275

युगान्तकारी माँ
सितम्बर, 1928 के 'किरती' में सुप्रसिद्ध देशभक्त शचीन्द्रनाथ सान्याल की माँ
के बारे में प्रकाशित एक सम्पादकीय नोट। – स.
हमारे पाठक हिन्दुस्तान के प्रमुख युगान्तकारी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल जी के
नाम-काम से अच्छी तरह परिचित हैं। हम उनका चित्र भी 'किरती' में प्रकाशित
कर चुके हैं। उनका सम्पूर्ण परिवार ही युगान्तकारी है। 1914-15 वाले ग़दर
आन्दोलन में उनके दो भाई गिरफ़्तार किये गये थे, जिनमें से एक नज़रबन्द है और
दूसरे को दो साल की क़ैद हुई और स्वयं उन्हें आजीवन कारावास की सज़ाएँ हो
गयी थीं। अब उन्हें काकोरी केस में फिर आजीवन क़ैद की सज़ा हो गयी है। साथ
ही उनके सबसे छोटे भाई श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल जी को पाँच बरस की क़ैद हो
गयी है। यह भी अपने बड़े भाइयों की तरह दिलेर हैं और खुशदिल रहने वाले हैं।
ऐसे वीर पुत्रों की जननी माँ धन्य है। लेकिन हमें अफ़सोस के साथ कहना
पड़ रहा है कि 52 साल की उम्र में लगभग एक माह पूर्व उनका देहान्त हो गया
था। वह कोई सामान्य स्त्री नहीं थी। वह स्वयं भी पढ़ी-लिखी और क्रान्तिकारी
विचारों वाली थी।
इनका जन्म बंगाल के सबसे अधिक शिक्षित विद्वान और भक्ति के गढ़
शान्तिपुर के एक बड़े परिवार में हुआ। इनके एक बहन और एक भाई और थे। इनके
बड़े भाई श्री योगेशचन्द्र राय अब तक जीवित हैं। वे 1907 के स्वदेशी आन्दोलन
में काफ़ी सक्रिय रूप से काम करने वालों में हैं। बाद में राजपरिवर्तनकारी
आन्दोलनों के सम्बन्ध में उनकी अनेकों बार तलाशियाँ हुईं और पुलिस उनके पीछे
लगी रहती थी।
श्री शचीन्द्रनाथ की माता श्रीमती क्षीरोदवासिनी देवी काफ़ी शिक्षित थीं।
आपको पढ़ाई में अव्वल होने की वजह से वज़ीफ़ा मिलता रहा। आप हमेशा
समाचारपत्र, पत्रिकाएँ और नयी-नयी पुस्तकें पढ़ती रहती थीं।
श्री शचीन्द्र के पिता श्री हरिनाथ सान्याल भी स्वदेशी आन्दोलन के सक्रिय
समर्थक थे। 1907 के स्वदेशी आन्दोलन के बहुत पहले से ही वह स्वदेशी वस्तुओं
का ही उपयोग करने लगे थे। श्री शचीन्द्र की माता उनके ऐसे विचारों और कार्यों
276 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

में बहुत सहायता करती थीं और स्वदेशी आन्दोलन चलने पर दोनों इसी काम में
लग गये। हालाँकि हरिनाथ सान्याल सरकारी नौकरी में थे और अच्छा-खासा वेतन
पाते थे।
श्रीमती क्षीरोदवासिनी देवी अपने बच्चों को घर में स्वयं पढ़ाती थीं।
स्वदेशी आन्दोलन के बाद में उन्होंने स्वयं ही अपने पुत्रों को अनुशीलन समिति
में भरती करवाया। अनुशीलन समिति बंगाल की एक पार्टी थी, जो उस समय
तक खुफिया राजपरिवर्तनकारी दल नहीं बनी थी, लेकिन बाद में वही सबसे
बड़ी और शक्तिशाली राजपरिवर्तनकारी पार्टी बन गयी थी।
बाद में माँ को यह भी पता लग गया कि शचीन्द्र युगान्तकारी दल में शामिल
हुआ है। लेकिन वह कभी घबरायी नहीं, बल्कि हमेशा उनसे सहानुभूतिपूर्वक
व्यवहार करती थीं। वह प्रसन्न थीं कि उनका बेटा देश-सेवा में संलग्न है।
उनके सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के कारण काफी दूर-दूर से युगान्तकारी उनके
दर्शनों के लिए आते थे। उनमें श्री रासबिहारी बोस, हिन्दुस्तान के राजपरिवर्तनकारी
शहीदों के सिरमौर श्री जतीन्द्रनाथ मुकर्जी तथा श्री शशांक हाजरा आदि शामिल थे।
वह बंगाल के युगान्तकारियों में 'युगान्तकारी माँ' के रूप में मशहूर थीं। दूर
अण्डमान के बन्दियों के बीच भी उनकी ख्याति पहुँच चुकी थी।
1915 में जब गदर पार्टी ने चारों तरफ ज़बरदस्त बग़ावत करने की तैयारियाँ
की थीं, उस समय श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके दोनों युवा भाई इस काम
में जुटे हुए थे। स्मरण रहे कि इनके पिता का देहावसान हो चुका था। इस कारण
परिवार का बोझ भी इनके सिर आ पड़ा। जब फ़रवरी में विद्रोह पैदा करने की
तारीख़ भी तय हो चुकी थी, तब इन भाइयों में आपस में विवाद चल पड़ा कि
कौन पीछे रहकर परिवार की देखभाल करे, क्योंकि कोई भी पीछे रहने के लिए
सहमत नहीं होना चाहता था। दोनों की यह इच्छा थी कि देश के स्वतन्त्रता-संघर्ष
में वे सक्रिय रूप से मैदान में कूद पड़ें। तब उनकी वीर माता ने आगे आकर कहा
कि वह किसी की राह में नहीं आना चाहती, जिस किसी की भी इच्छा हो, वह
उनकी चिन्ता छोड़कर देश-सेवा के कार्य में जुट जाये।
पर वह सारा काम तो बीच में ही रह गया। ग़दर की सारी योजना फेल हो
गयी। मुक़दमा चला। श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन कैद हो गयी। जब वह
बनारस जेल से अण्डमान (कालेपानी) भेजे गये, उस समय उनकी आयु 22 बरस
की थी। माँ उनसे मिलने गयी और प्रसन्नतापूर्वक कहा - "मेरा पुत्र सचमुच
संन्यासी हो गया है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि उसने अपना जीवन देश-सेवा के लिए
अर्पित कर दिया है।" इसके पश्चात् पुलिस उनका पीछा करने लगी और बहुत
परेशान करती रही।
अब काकोरी केस चला और जब उनका छोटा पुत्र श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल भी
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 277

गिरफ़्तार कर लिया गया तो इनको बहुत घबराहट हुई, क्योंकि वह अभी बिल्कुल
बच्चा था और पढ़ रहा था। ज़्यादा चिन्ता यह थी कि संकट में कहीं वह घबरा
न जाये। लेकिन मालूम हुआ कि वह जेल में बिल्कुल निश्चन्तता से रह रहा है।
इस बात से इन्हें बहुत खुशी हासिल हुई। कहने लगीं, "मुझे अपने भूपेन्द्र से यही
आशाएँ थीं।"
लेकिन उनका सारा जीवन कठिनाइयों में ही गुज़र गया। उन्हें कभी चैन का
समय ही नहीं मिला। देखते-देखते काकोरी का मुक़दमा समाप्त हो गया। और
कोई ठोस सबूत न मिलने के बावजूद श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन क़ैद
और भूपेन्द्रनाथ को पाँच साल की सज़ा हो गयी। यह झटका उनसे बरदाश्त न हो
सका। यह चोट उनसे सही न गयी। वह फिर कभी न सँभल सकीं। लेकिन
अपने पुत्रों पर उन्हें बहुत फ़ख़्र रहा। उन्होंने शचीन्द्रनाथ सान्याल को अपने अन्तिम
पत्र में लिखा था कि दुनियादारी के हिसाब से भले ही मैं बहुत ग़रीब हूँ, लेकिन
मेरे जैसा अमीर कौन है जिसके पुत्र सत्यपथ पर चल रहे हैं और देश-सेवा में
जिन्होंने अपनी ज़िन्दगियाँ अर्पण कर दी हैं, मुझे अपने पर बहुत नाज़ है।
आह! ऐसी और कितनी माताएँ आज हमारे देश में हैं? धन्य है यह माँ और
धन्य-धन्य हैं इनके सुपुत्र!
278 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

षड्यन्त्र क्यों होते हैं
और कैसे रुक सकते हैं?
सितम्बर, 1928 के 'किरती' में छपा यह लेख राजनीतिक आन्दोलनकारियों पर
चलने वाले मुक़दमों के पीछे के विचारों पर केन्द्रित है। अंग्रेज़ सरकार इन्हें षड्यन्त्र
केस कहती थी। इसमें साफ़ कहा गया कि षड्यन्त्रों को रोकने का एक ही तरीक़ा
है – दुनिया से ग़रीबी व ग़ुलामी दूर करना। इस लेख में शान्तिपूर्ण व आतंकवादी
तरीक़ों पर भी बड़े तर्कपूर्ण ढंग से विचार किया गया है। भगतसिंह और उनके
साथियों के विचारधारात्मक विकास को जानने के लिए यह लेख महत्त्वपूर्ण
दस्तावेज़ों में से एक है। – स.
एक षड्यन्त्र की चर्चा अभी ख़त्म नहीं होती कि दूसरे षड्यन्त्र की चर्चा शुरू हो
जाती है। कुछ समय पूर्व हम काकोरी षड्यन्त्र का हाल पढ़ रहे थे, इन दिनों देवघर
के षड्यन्त्र के हाल सुन रहे हैं। इनसे पहले लाहौर षड्यन्त्र केस, दिल्ली षड्यन्त्र
केस, बोल्शेविक षड्यन्त्र केस और न जाने और कितने षड्यन्त्र केस चल चुके
हैं, जिनमें कि दर्जनों ही नौजवान फाँसियों पर लटकाये गये। गोलियों से उड़ा दिये
गये। सैकड़ों ही नहीं, हज़ारों कालेपानी भेजे गये, असंख्य देशभक्त अभी तक जेलों
में क़ैद काट रहे हैं।
षड्यन्त्र क्या होते हैं? सरकारों का विचार है कि मनुष्य के दिमाग़ में यह एक
बीमारी है, जो नियमित चल रही व्यवस्था को तोड़ने-फोड़ने के लिए षड्यन्त्रकारी
को मजबूर कर देती है। वह इस बीमारी के वश में होकर क़ानून तोड़ता है, शान्ति
भंग करता है, हत्याएँ करता है और डकैतियाँ डालता है और कई ऐसे तरीक़े
इस्तेमाल करता है जोकि समाज में गड़बड़ी फैलाने और शान्ति-भंग का कारण
बनते हैं। वह चल रही व्यवस्था की तोड़-फोड़ की ठान लेता है और फिर इस
लक्ष्य के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।
इसके विपरीत षड्यन्त्रकारी लोगों का दावा है कि षड्यन्त्र उन आदर्शवादी
लोगों की कोशिश होती है जो चल रही व्यवस्था की कमियों, अन्याय और
जुल्म को सहन नहीं कर पाते, जो अमीर-ग़रीब, बड़े-छोटे, ज़ालिम-मज़लूम,
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 279

शासक-प्रजा, पूँजीपति-मज़दूर, ज़मींदार-किसान आदि का फ़र्क़ ख़त्म कर एक
जैसे अधिकारों और आज़ादी का दौर लाना चाहते हैं और जो पुरानी, गन्दी और
अत्याचारी व्यवस्था को समाप्त कर एक नयी व सुन्दर व्यवस्था स्थापित करना
चाहते हैं, जिसमें कि कोई शासक-प्रजा, अमीर-ग़रीब, ज़मींदार-किसान न हो,
बल्कि सभी एक जैसे भाई-भाई हों। प्रत्येक काम करे और खाये और सभी की
प्रत्येक ज़रूरत पूरी हो।
ये बातें सही हैं या ग़लत जोकि दोनों अपने-अपने विचार को सामने रखकर
की जाती हैं, यह पाठक स्वयं ही अनुमान लगायें।
गुज़रे वक़्त का इतिहास प्रमाण है कि सख़्त सज़ाओं और फाँसियों से षड्यन्त्र
नहीं रुक सकते, न ही जुल्मों और अत्याचारों से — चाहे वे कितने भी भयानक
क्यों न हों — आज़ादी की चाह कुचली जा सकती है। असंख्य नौजवान, जो
किसी दूसरे आज़ाद देश में होते तो अपने देश के लिए तोहफ़ा साबित होते,
अत्याचारी और ज़ालिम शासकों के अत्याचारों का शिकार हो गये। हज़ारों देशभक्त
टुकड़े-टुकड़े कर क़त्ल कर दिये गये ताकि लोग इससे आतंकित होकर षड्यन्त्र
करने से बाज़ आ जायें और आज़ादी के लिए हाथ-पाँव न हिलायें। तमाम
सज़ाओं, फाँसियों, कैद और बेंत मार-मारकर देख लिया गया है, लेकिन ये
तमाम सज़ाएँ भी षड्यन्त्रों को रोकने में असफल रही हैं। बल्कि — 'बढ़ता है
शौक़े-शहादत हर सज़ा पाने के बाद' के अनुसार षड्यन्त्रों की आग भड़कती
गयी और इन सज़ाओं से न रुकी। यह क्यों है, आख़िर इन षड्यन्त्रों को रोकने
का क्या कोई इलाज भी हो सकता है?
यदि षड्यन्त्रों के पिछले इतिहास को अच्छी तरह देखा जाये तो हमें इस बात
का भली प्रकार पता चलता है कि षड्यन्त्रों को रोकने के लिए जितनी अधिक
कोशिशें होती हैं, उतने ही अधिक षड्यन्त्र किसी न किसी शक्ल में वजूद में आते
रहते हैं। इस तरह पता चलता है कि ये सज़ाएँ षड्यन्त्रों की आग भड़काने में लकड़ी
का ही काम करती हैं।
सैकड़ों नौजवान गोलियों से उड़ा दिये जाते हैं, लेकिन उनकी जगह भरने के
लिए हज़ारों ही नौजवान हथेलियों पर सर रखकर मैदान में कूद पड़ते हैं और अपने
प्राणों को ख़तरे में डाल उस अधूरे काम को शुरू कर देते हैं। आख़िर इसका कारण
क्या है?
बदला लेना इन्सानी स्वभाव है। इन्सान जब तक इन्सान है, वह अपने दुश्मनों
से बदला ज़रूर लेगा, ख़याली पुलाव पकाने वाले चाहे कुछ भी कहें। आम नौजवान
जब देखते हैं कि उनके भाई सिर्फ़ देशप्रेम के लिए ही किस बेदर्दी और बेरहमी
से जुल्मों का शिकार हो रहे हैं तो उनके दिलों में अपने भाइयों पर हुए जुल्मों का
बदला लेने की आग भड़क उठती है। वे शान्ति और सन्तोष को अलविदा कह देते
280 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हैं। अपनी किश्ती ईश्वर के सहारे छोड़ लंगर तोड़ देते हैं। फिर या तो वे खुद उस
बदले की आग में जलकर राख हो जाते हैं या दुश्मनों को राख करके ही साँस
लेते हैं। यह इन्सानी दिलेरी है। भँगेड़ियों, नशेबाज़ों का पुलाव नहीं है।
दूसरी ओर एक बुज़दिल और कायर होता है। उसे अपनी जान बहुत प्यारी होती
है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसके पास से ऐशो-आराम और सफ़ेद-स्याह करने
की ताक़त छीन ली जाये। पर जब उसकी जान पर हमला किया जाता है और
उसके मुँह से झाग गिरने लगती है तो वह गुस्से में आकर ऐसे-ऐसे कष्ट ढहाता
है कि ज़मीन और आसमान काँप उठते हैं। वह अत्याचार में अन्धा होकर जिस पर
भी हाथ उठाता है, चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो, उसे पार बुलाकर ही छोड़ता
है। इस तरह अक्सर गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है और हज़ारों ही बेगुनाह
नौजवान देश पर शहीद हो जाते हैं। यह निर्दोषों का खून होता है जो अन्त में रंग
लाता है। जनता में बेचैनी फैल जाती है। षड्यन्त्रकारियों के हाथ मज़बूत हो जाते
हैं, क्योंकि यह जुल्म, अन्याय और आतंक ही षड्यन्त्र पैदा करने के कारण हैं। वे
खुली घोषणाएँ कर देते हैं कि देखा, हम नहीं कहते थे कि लातों के भूत बातों से
नहीं सुधरते, लेकिन तुमने हमारी बातों पर ध्यान नहीं दिया। अब खूब गत बन रही
है। लेकिन यह तो –
इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या?
आगे-आगे देखिये होता है क्या?
इस तरह षड्यन्त्र का वृक्ष निर्दोषों के खून से सिंचकर बढ़ता है और थोड़े ही
समय में फलने-फूलने लगता है।
जब तक लोग खुलेआम अपने दुख-तकलीफें व्यक्त कर सकते हैं और
सरकारी अत्याचारों की पोल खोल सकते हैं, तब तक तो षड्यन्त्रों की ज़रूरत नहीं
पड़ती, लेकिन जब सरकारें खुले आन्दोलनों को कुचलने लगती हैं और जब –
न तड़पने की इजाज़त है, न फ़रियाद की है।
घुट-घुट के मर जाऊँ, यही मर्ज़ी मेरे सैय्याद की है।
पर अमल शुरू हो जाता है तो इधर जोशीले और गर्वीले जवान भी इस बुरी
स्थिति में नहीं जीना चाहते। वे सिरों की बाज़ी लगा देते हैं और ऐसे अत्याचारी
(शासन) को तोड़ने की सिरतोड़ कोशिशों में व्यस्त हो जाते हैं।
जब तक शान्तिपूर्ण आन्दोलन में आज़ादी की माँग की छूट रही, कोई षड्यन्त्र
नहीं हुआ, कोई गुप्त आन्दोलन नहीं चल सका, लेकिन ज्यों ही शान्तिपूर्ण आन्दोलन
को कुचलने के आदेश जारी किये गये उसी समय गुप्त आन्दोलन शुरू हो गये और
षड्यन्त्रों की तैयारियाँ होने लगीं। सरकार की सख़्ती का दौर शुरू हुआ और काले
क़ानूनों के अधीन सैकड़ों नौजवानों को, जो खुले रूप में काम कर रहे थे, जेलों
में नज़रबन्द कर दिया गया तो जोशीले नौजवानों को इससे आग लग गयी और वे
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 281

तड़प उठे। बस फिर क्या था? किसी ओर काकोरी-षड्यन्त्र का तो कहीं किसी
और षड्यन्त्र का धुआँ निकलने लगा।
जब तक दुनिया में वहशी ज़माने की गुलामी और ग़रीबी जैसी स्मृतियाँ क़ायम
रहेंगी तब तक कोई भी ताक़त दुनिया के तख़्त से षड्यन्त्रों और गुप्त आन्दोलनों
को मिटा नहीं सकती। यदि ज़ोर-ज़बरदस्ती और जुल्म षड्यन्त्रों के रोकने का सही
इलाज होता तो षड्यन्त्रों का नामो-निशान कब का मिट गया होगा। लेकिन यह
इलाज नहीं है। सम्भव है, जुल्म और अत्याचार कुछ समय के लिए षड्यन्त्रों को
रोक सकें, लेकिन जुल्म और अत्याचार षड्यन्त्र रोकने का कोई कारगर नुस्ख़ा नहीं
है। कइयों का विचार है कि केवल आज़ादी ही षड्यन्त्रों को ख़त्म करने का असली
इलाज है, लेकिन हमारा इससे मतभेद है। यह तो ठीक है कि यह आज़ादी ही है
जो बहुत हद तक षड्यन्त्रों को रोक सकती है, लेकिन फिर भी इसमें सोलह आने
सच नहीं है, क्योंकि वर्तमान समय में साबित हो गया है कि केवल (आज़ादी की)
प्राप्ति से ही षड्यन्त्र नहीं रुक सकते। हमारे सामने अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस
आज़ाद देशों में माने जाते हैं और वे हैं भी बिल्कुल आज़ाद – किसी के गुलाम
या किसी तरह से भी मोहताज नहीं हैं, लेकिन फिर भी वहाँ षड्यन्त्र होते रहते
हैं, और अभी बहुत समय नहीं हुआ, जबकि 'साको' और 'वैनजिरी' को अमेरिका
की पूँजीपति सरकार ने षड्यन्त्र के अपराध में बिजली की कुर्सी पर बिठाकर मार
डाला था। जर्मनी में कम्युनिस्टों ने एक क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन वे
कब्ज़ा बनाकर न रख सके। फ्रांस और इंग्लैण्ड में भी षड्यन्त्र होते रहते हैं।
अमेरिका जैसा समृद्ध देश पूरी दुनिया के नक़्शे पर भी नहीं है। वहाँ
'राक-फैलरे' जैसे तगड़े अमीर आदमी हैं। यदि वे चाहें तो अकेले ही पूरे हिन्दुस्तान
को ख़रीद सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर बेरोज़गारी और ग़रीबी का यह हाल है कि
हज़ारों ही नहीं, बल्कि लाखों अमेरिकी मज़दूर ऐसे हैं जो बेरोज़गार भूखे दर-दर
भटक रहे हैं और जिनका गुज़ारा सिर्फ़ सरकारी दान से ही होता है। तो क्या जब
तक यह हद दर्जे की ग़रीबी और हद दर्जे की अमीरी दुनिया में क़ायम रहेगी,
षड्यन्त्र दुनिया से ख़त्म हो सकते हैं? हमारा विचार तो 'नहीं' में है। षड्यन्त्रों का
हटना या न हटना रोटी के सवाल के हल होने पर निर्भर है। यदि रोटी का सवाल
आज हल हो जाये तो आज ही षड्यन्त्रों की समाप्ति हो सकती है, लेकिन यदि
रोटी का सवाल न निपटा तो ये षड्यन्त्र कभी भी रुक नहीं सकते, चाहे नीरू और
जहाद जैसे ज़ालिम ही क्यों न पैदा हो जायें।
शायद कुछ लोग कहें कि यदि रोटी के सवाल का हल ही षड्यन्त्रों की
बीमारी के लिए अमृतधारा है तो फिर रूस में क्यों षड्यन्त्र होते हैं? हमारा जवाब
स्पष्ट है कि रूस में जो षड्यन्त्र होते हैं वे सिर्फ़ विदेशी पूँजीपति सरकारों के छोड़े
हुए कुछ भाड़े के टट्टुओं द्वारा करवाये जाते हैं और वे विदेशी सरकारें अपने एजेण्टों
282 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

को धन आदि देकर उनसे षड्यन्त्र करवाती हैं, नहीं तो रूस में षड्यन्त्र करने के
लिए कोई कारण ही नहीं है, ना ही रूसी लोगों को कोई तकलीफ़ है, जिससे कि
उन्हें षड्यन्त्र करने की ज़रूरत पड़े। कुछ ज़ार के चेले-चपाटे हैं या विदेशी एजेण्ट
हैं जो कभी-कभार हंगामा करते हैं, वरना रूस तो इस समय एक ऐसा देश है जो
हर इन्सान को खुश देखना चाहता है और प्रत्येक इन्सान की ज़रूरतें पूरी करता है।
हिन्दुस्तान का क्या कहना। पहले तो यह गुलाम है। यहाँ के नौजवान जब दूसरे
देशों को उन्नति करते देखते हैं तो उनके कलेजों पर छुरियाँ चल जाती हैं। वे
अनुभव करते हैं कि उन्नति करना तो दूर रहा, उनके तो साँस लेने के लिए भी
यहाँ जगह नहीं है। इसलिए हिन्दुस्तान का गुलाम होना ही यहाँ आज़ादी की कोशिशों
के लिए एक अच्छा तर्क है। आज़ादी के लिए दो ही प्रकार की कोशिशें हो सकती
हैं - शान्तिपूर्ण व आतंकवादी तरीक़ों से। आज़ादी की प्राप्ति के हर तरीक़े की
एक न एक दिन परीक्षा होती है। वह तरीक़ा परीक्षा में खरा उतरे तो लोग उसमें
विश्वास करते हैं, लेकिन यदि परीक्षा में असफल रहे तो लोगों का विश्वास उससे
हट जाता है। हिन्दुस्तान में भारी संख्या उन लोगों की है जो शान्तिपूर्ण तरीक़े के
समर्थक हैं। शायद इसलिए कि उन्हें इसके सिवा और कुछ सूझता भी नहीं या यदि
कुछ सूझता भी है तो वे उस पर व्यवहार करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। लेकिन
यह बात अब सन्देह से परे है कि ऐसे आदमी भी हिन्दुस्तान में मौजूद हैं, जो
शान्तिपूर्ण तरीक़ों पर विश्वास खो चुके हैं, और हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए
काम भी करना चाहते हैं। जब तक ऐसे आदमी मौजूद हों तब तक षड्यन्त्रों का
होते रहना अचम्भे की बात नहीं है। लेकिन एक गुलामी ही क्या? हिन्दुस्तान में
इतनी ग़रीबी है कि तौबा ही भली। हज़ारों नहीं, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों ही
आदमी रोटी के दो टुकड़ों के लिए तरसते मर जाते हैं। जब तक गुलामी और ग़रीबी
ख़त्म नहीं होती तब तक लोग भला कैसे आराम से बैठ सकते हैं? हो सकता है
कि अमीर लोग ऐशो-आराम में आज़ादी को भूल जायें और गुलामी को पसन्द करें
क्योंकि उनके लिए तो ऐश-परस्ती ही आज़ादी हो सकती है, लेकिन जो लोग भूखे
मर रहे हैं, वे समझते हैं कि हमें मरना ही है, तो फिर क्यों न मर्दे-मैदान बनकर
इस अन्यायपूर्ण और ज़ालिम व्यवस्था को रद्द करने में मरें, क्यों न देश के ग़रीबों
को जगाने के लिए और भारतमाता को आज़ाद करवाने के लिए शीश दिये जायें?
हो सकता है ऐसे विचार कुछ देर तक ग़रीबों के दिमाग़ में न आयें, लेकिन कब
तक रुक सकेंगे, इस अन्याय, गुलामी और ग़रीबी के ख़िलाफ़ शुरू से ही षड्यन्त्र
होते आये हैं। जब तक यह हाल रहेगा, जोशीले लोग षड्यन्त्र करते रहेंगे, क्योंकि
तमाम षड्यन्त्रों की जड़ ग़रीबी और गुलामी ही है। चाहे सरकारें इस बात को नहीं
मानतीं फिर भी यह बिल्कुल सही है कि शासक जो भी कुछ अधिकार या कुछ
सुविधाएँ देते हैं वे इन षड्यन्त्रकारियों के भय से ही दिया करते हैं। नहीं तो -
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 283

यदि नौजवान हथेलियों पर सिर रखकर बिना किसी स्वार्थ के समाज को अच्छा
बनाने के लिए बलिदान न करते तो सरकारों से जितने अधिकार अभी तक छीने
जा चुके हैं, उतने भी न छीने जा सकते।
1925 में विपिनचन्द्र पाल ने एक लेख में लिखा था कि “यह पोलिटिकल
क़ातिल ही थे, जिन्होंने कि मिण्टो-मारले योजना के लिए रास्ता साफ़ किया।” एक
और माडरेट एस.आर. दास ने लिखा था कि “इंग्लिस्तान को इस मीठी नींद से
जगाने के लिए कि हिन्दुस्तान के साथ ‘अच्छा सलूक’ हो रहा है, एक बम की
ज़रूरत थी।”
यों आमतौर पर नेता लोग इन षड्यन्त्रकारियों के ख़िलाफ़ ही रहा करते हैं तो
भी हमारे नेता साहिब बब्बर अकाली दल की तारीफ़ यह कहकर किया करते हैं
कि सिखों को गुरुद्वारा बिल इसी आन्दोलन ने दिलवाया है, नहीं तो गुरुद्वारा बिल
कभी भी न मिलता।
यह लेख लिखने से न तो हमारा यह आशय है कि बम फेंकने की प्रेरणा दी
जाये और न ही यह कि षड्यन्त्रकारियों की तारीफ़ के बड़े-बड़े पुल बाँध दिये
जायें, चाहे हम समझते हैं कि वे सच्चे देशभक्त होते हैं और अपने भीतर सच्ची
राष्ट्रीय और देशभक्ति की स्पिरिट रखते हैं और अपने विश्वासों के अनुसार काम
करते हैं, वे इसी में देश और क़ौम की बेहतरी समझते हैं। इस लेख को लिखने
का आशय तो यह है कि जनता को यह बताया जाये कि जहाँ भी गुलामी और
ग़रीबी मौजूद है वहाँ कुछ जोशीले लोग उठते ही रहेंगे और गुलामी और ग़रीबी के
जुए को उतार फेंकने के यत्न करते रहेंगे, चाहे वे सफल हों या नहीं। हम समझते
हैं कि इतिहास हमें यही बताता है कि इन षड्यन्त्रों को रोकने और हमेशा के लिए
ख़त्म करने का एक ही तरीक़ा है कि दुनिया से ग़रीबी और गुलामी दूर की जाये
और प्रत्येक देश में आज़ादी के साथ रोटी के सवाल का भी पूरा समाधान हो। जब
तक यह नहीं होता, षड्यन्त्रों का बन्द होना मुश्किल है।
284 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

श्रमिक आन्दोलन को दबाने की चालें

सितम्बर, 1928 के 'किरती' के चार और सम्पादकीय महत्त्वपूर्ण हैं। एक
पब्लिक सेफ़्टी बिल, दूसरा ट्रेड डिस्प्यूट बिल सम्बन्धी भगतसिंह और उनके साथियों
के विचारों को प्रकट करता है। इन्हीं बिलों के विरोध में भगतसिंह और बटुकेश्वर
दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को असेम्बली हॉल में बम का धमाका किया था। तीसरी
सम्पादकीय टिप्पणी में मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट पर चर्चा है और इसे बुर्जु‌आ विचारधारा
का प्रतीक बताया गया है। चौथे सम्पादकीय में बारदोली किसान आन्दोलन पर विचार
रखे गये हैं। सितम्बर, 1928 में ही हिन्दुस्तान प्रजातान्त्रिक पार्टी, हिन्दुस्तान समाजवादी
प्रजातान्त्रिक पार्टी बन गयी थी। – स.
विश्व में जो अन्धेरगर्दी इन खुदग़र्ज़ और बेईमान पूँजीपति शासकों ने मचा रखी है, वह
लिखकर लोगों को समझायी नहीं जा सकती। अब जब उनके पर्दे दुनिया में खुल रहे
हैं और अब जब श्रमिक भी इन लोगों को अपने श्रम पर हराम की मोटी-मोटी खाल
चढ़ाने से रोकने का यत्न करने लगे हैं तो ये तड़पते हैं और शान्ति-शान्ति का शोर
मचाने लगते हैं। सम्पत्ति खतरे में है, दुनिया कैसे चलेगी, आदि वाक्यों से शोर मचाकर
आम लोगों और श्रमिकों को समाजवादी आन्दोलन के विरोधी बना रहे हैं। साथ ही
साथ उन आन्दोलनों को दबाने के विचार से अन्धा अत्याचार करने की ठान ली है।
आज हम समाचारपत्रों में पढ़ रहे हैं कि लोगों की सुरक्षा नाम का एक (Public
Safety—removed from India-bill) बिल असेम्बली में पेश हो रहा है। पेश सरकार
की ओर से ही होना है। बिल का आशय यह है कि यदि समाजवादी विचारों का प्रचार
करने वाला कोई ऐसा आदमी भारत में आ जायेगा, जो यहाँ का नागरिक न होगा तो
उसे नोटिस देकर एकदम देश से निकाल दिया जायेगा। यह बिल क्यों पास किया
जायेगा और इसे पास करवाने के लिए क्या-क्या घटिया चालें चली जा रही हैं, यही
हम पाठकों को बताना चाहते हैं।
कुछ दिन पहले अख़बारों में एक पत्र छपा था जिसके बारे में कहा जाता
था कि कम्युनिस्टों की ओर से यह पत्र इंग्लैण्ड की कम्युनिस्ट पार्टी को लिखा
गया था। उसमें उन्होंने कहा था कि आख़िर में हम सशस्त्र क्रान्ति या हथियारों
से युद्ध कर ही क्रान्ति सम्पन्न करेंगे, लेकिन उससे पहले कम्युनिस्ट पार्टी गुप्त
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 285

रूप में काम करेगी और श्रमिक किसान पार्टी को नियन्त्रण में कर प्रचार का
काम खुले रूप में किया जायेगा, आदि। उधर क्योंकि रूस चाहता है कि
दुनियाभर में मज़दूरों का शासन स्थापित किये बग़ैर स्थायी शान्ति नहीं हो
सकती, इसीलिए वह हर जगह समाजवादी आन्दोलन करवाना चाहता है। और
चूँकि दुनिया में सबसे बड़े पूँजीपति और सम्राटपसन्द अंग्रेज़ हैं, इसलिए उनका
राज नष्ट करना ज़रूरी है और उनका राज ही हिन्दुस्तान के सिर पर है, इसीलिए
यहाँ क्रान्ति करवाना अनिवार्य है। ऐसी स्थिति में अंग्रेज़ रूस से बहुत भयभीत
हैं और वे कम्युनिस्ट या समाजवादी विचारों के प्रचार को रोकना चाहते हैं। पर
किया क्या जाये? हिन्दुस्तानी पूँजीपतियों की सहानुभूति जीतने के लिए वह पत्र
छपवाया गया। अख़बारों में लिखा गया था –
दिल्ली, अगस्त 20
निम्न पत्र को प्रसारित किया गया।
किसकी ओर से, कब, कहाँ? यह कुछ पता नहीं। और यह पत्र है भी पिछले
दिसम्बर की तारीख़ का। अब तक वह कहाँ छिपा रहा?
कम्युनिस्ट पार्टी ने इस पत्र के साथ अपना कोई सम्बन्ध मानने से इन्कार कर
दिया है। श्रमिक किसान पार्टी ने भी ऐसी ही घोषणा की है। फिर यह पत्र आया
कहाँ से? और इसे अब ही क्यों छापा गया? ये बातें सोचने योग्य हैं। इस पत्र के
साथ, और रूस की कुछ घोषणाओं को बार-बार छापने से हिन्दी पूँजीपतियों को
भी सरकार ने अपने साथ मिला लिया। हमें पता है कि निठल्ले पूँजीपति मिलकर
यह बिल पास करवा लेंगे। पर क्या सरकार समझती है कि इस तरह समाजवादी
विचारों का प्रचार रुक जायेगा? क्या इन नीचताभरी चालों से वे अपने पैर पक्के
कर स्थिर रह सकेंगे? इतिहास की ओर से जान-बूझकर क्यों आँखें बन्द रखी जाती
हैं? आज फ्रांस के फ़्यूडल लॉर्ड्स और रूसी नोबल्स कहाँ है? क्या इन लोगों ने
इन विचारों को दबाने के लिए अपना-अपना ज़ोर नहीं लगाया और क्या क्रान्ति रुक
सकी थी? फिर यहीं क्रान्ति कैसे रुक सकेगी? जब तक भूख है और श्रम करने
वाले भूखे मरते रहेंगे और निठल्ले बैठने वाले हर तरह की मौज़ उड़ाते रहेंगे, तब
तक समाजवादी विचार दबाने से और भी ज़ोर पकड़ते रहेंगे। लेकिन श्रमिकों को
संभल जाना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि उनके आन्दोलन को दबाने के लिए
कितने अत्याचार किये जा रहे हैं और यदि वे अब भी न संभले तो बाद में पछताने
से कुछ हाथ न आयेगा।
286 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

एक और दमनकारी क़ानून
जिस तरह हिन्दुस्तान में कारख़ाने बढ़ रहे हैं, उसी तरह हमारे पूँजीपति और अंग्रेज़ों
के लाभ-हानि भी साझे होते जा रहे हैं और ये दश में उभर रहे जन-आन्दोलन को
सामान्यतया दबाने का संयुक्त रूप से प्रयत्न कर रहे हैं। अब एक समय दो क़ानून
स्वीकृत हो रहे हैं : एक है जन-सुरक्षा बिल (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और दूसरा
है औद्योगिक विवाद बिल (ट्रेड्स डिस्प्यूट बिल) अर्थात किसी पूँजीपति और
मज़दूरों का किसी सवाल पर झगड़ा हो जाये तब तुरन्त एक पंचायत गठित कर
दी जाये, जिसमें पूँजीपति मालिकों तथा मज़दूरों के प्रतिनिधि शामिल हों और इसका
अध्येता एक निष्पक्ष व्यक्ति हो। वह जो निर्णय दे उसे सभी स्वीकारें। हड़ताल का
अधिकार नहीं होगा। हड़ताल करने वाले को 500 रुपये जुर्माना या एक माह की
क़ैद की सज़ा दी जायेगी और अगर कोई राजनीतिक विचारधारा को लेकर हड़ताल
करेगा, उसे तीन माह की क़ैद तथा 500 रुपये के जुर्माने की सज़ा होगी। लेकिन
ये सज़ाएँ क्यों? विवाद निपटाने के लिए जो कमेटी बनायी जायेगी, अगर वह
मज़दूरों की इच्छाओं के विरुद्ध फ़ैसला कर दे, तब? तो भी क्या उन ग़रीबों को
हड़ताल करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? बड़ी अजीब बात है। मज़दूरों को
जल्दी ही सँभल जाना चाहिए, क्योंकि ये उनके ही आन्दोलनों को दबाने का यत्न
हो रहे हैं। बम्बई की मज़दूर-किसान पार्टी ने घोषित किया है कि इस बिल के
विरुद्ध मज़दूरों को हड़तालें करनी चाहिए, बात भी ठीक है। असेम्बली के पूँजीपति
सदस्य तुरन्त ही यह क़ानून स्वीकृत कर देंगे। उन्हीं के लिए तो सरकार ने यह
क़ानून बनाया है। पहले ही प्रेमचन्द कीका भाई जैसे पूँजीपति सरकार से गुहार करते
थे कि मज़दूर-आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की जानी चाहिए। सो सरकार ने
इसका हल बनाकर पेश कर दिया है। दोनों क़ानून स्वीकृत हो जायेंगे। लेकिन
मज़दूरों को सँभल जाना चाहिए, क्योंकि यदि अभी कोई ध्यान न दिया गया तो
बाद में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। यह स्मरण रखना चाहिए कि
इंग्लैण्ड में भी ऐसा क़ानून स्वीकृत कराने की अंग्रेज़ी सरकार को हिम्मत नहीं हो
सकती। मज़दूरों के साथ रत्तीभर भी सहानुभूति रखने वाले सज्जनों को इस अवैध
तथा दमनकारी क़ानून के विरोध में आवाज़ उठानी चाहिए।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 287

बारदोली सत्याग्रह
हम पहले से ही अपने पाठकों के सामने बारदोली के बहादुर किसानों के हालात
रखते रहे हैं। उन्होंने सत्याग्रह शुरू किया था, क्योंकि उनका बन्दोबस्त करके लगान
बढ़ा दिया गया है। उन्होंने लगान देने से ही इन्कार कर दिया था! बड़ा झगड़ा बढ़ा।
अन्त में समझौता हो गया। फ़ैसला यह हुआ कि एक व्यक्ति ने अपनी तरफ़ से
बढ़ा हुआ लगान जमा करवा दिया है तथा अब एक समिति जाँच करेगी कि लगान
बढ़ाना उचित है अथवा नहीं। और वह जो फ़ैसला करेगी वह दोनों पक्षों को मंजूर
करना पड़ेगा। अगर वह समिति फ़ैसला कर दे कि लगान बढ़ा दिया जाये – कोई
डर नहीं, तो फिर क्या होगा? बेचारे किसान पहले ही इतने कमज़ोर तथा असहाय
हैं कि वे एक पैसा भी अधिक नहीं दे सकते। फिर यह तो कुछ बात न बनी।
लेकिन हम देखते हैं कि यह सत्याग्रह सरकार के साथ संघर्ष के विचार से नहीं
आरम्भ किया गया वरन केवल यह शिकायत दूर करने के लिए था। नेताओं ने यह
स्वीकार भी किया है। लेकिन समझ में नहीं आता कि एक-एक शिकायत के लिए
लड़ने-झगड़ने के बजाय मूल या जड़ का क्यों नहीं इलाज किया जाता? असल
में ज़िम्मेदार नेता तो ज़िम्मेदारी से भागते हैं और तुरन्त समझौते पर उतर आते हैं।
तो यह बात स्पष्ट है कि इस तरह लाभ हमेशा ताक़तवर को ही होता है।
हम समझते हैं कि जब तक नेता युगान्तकारी भावना और उत्साह के साथ ऐसा
क्रान्तिकारी संघर्ष नहीं छेड़ेंगे, तब तक आज़ादी-आज़ादी का शोर करना दूर की
बात है।
288 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़