भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंखुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई
करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की
परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना
उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते
हैं, जो सिर्फ़ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की ज़रूरत ही
क्या है? कुछ ज़्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं – “काका, तुम पोलिटिक्स के
अनुसार पढ़ो और सोचो ज़रूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक
योग्य होकर देश के लिए फ़ायदेमन्द साबित होगे।”
बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी
सिर्फ़ ऊपरी बात है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक
पुस्तक ‘Appeal to the Young’ Prince Kropotkin (‘नौजवानों के नाम अपील’,
प्रिन्स क्रोपोटकिन) पढ़ रहा था। एक प्रोफ़ेसर साहब कहने लगे, यह कौन-सी
पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा
– प्रिन्स क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम
से परिचित होना प्रत्येक प्रोफ़ेसर के लिए बड़ा ज़रूरी था। प्रोफ़ेसर की ‘योग्यता’
पर लड़का हँस भी पड़ा। और उसने फिर कहा – ये रूसी सज्जन थे। बस!
‘रूसी!’ कहर टूट पड़ा। प्रोफ़ेसर ने कहा कि “तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम
पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो।”
देखिये आप प्रोफ़ेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या
सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गाँधी,
जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई
व्यावहारिक राजनीति, पर कमिशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या
वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित
कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी, तो फिर यह भी पोलिटिक्स
हुई कि नहीं? कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज़?
फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराज़गी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते
ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक
हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफ़ादारी करने वाले वफ़ादार
नहीं, बल्कि ग़द्दार हैं, इन्सान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं। तो हम किस तरह
कहें कि विद्यार्थी वफ़ादारी का पाठ पढ़ें।
सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की ज़रूरत है,
जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की
आज़ादी के लिए न्योछावर कर दें। लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे?
272 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़